नारद: लेकिन ये तो नेता है

Saturday, September 8, 2012

लेकिन ये तो नेता है






लोग कहते है इंसान इतिहास से सीखता है,  लेकिन "इंसान", नेता या हुक्मरान नहीं. अब आप कहोगे की क्या नेता इंसान नहीं ? इनके भी तो दो  हाथ  दो पावँ होते है.  तो भाई दो हाथ और पाँव बंदरों के  नहीं  होते क्या ??? मानव मानता है की उसके पूर्वज  बंदर थे, लेकिन आजकल के नेतावों को देख, शायद बन्दर उन्हें अपना पूर्वज मान रहा होगा.  

लेकिन कही मेरे इस वाक्य पे बन्दर  नाराज न हो जाए, क्योकि जिस तरह से ये संसद मे मारपीट, गाली गलौज करते हैं उससे बन्दर बिना इत्तेफाक रखे मेरे ऊपर मानहानि का दावा कर सकता है.  भाई हम कौन सा संसद मे बैठते है ?? न ही हम अपने जात बंदरों का ठेका ले रखा है, सब कुंद फांद मेहनत करते है और अपना अपना  खाते है , बल्कि ये कहो की तुम इंसानों जैसी इंसानियत दिखा अपने बच्चो और साथियो का भी ख्याल कर लेते है बिना अपनी जमात का नुक्सान किये . लेकिन तुम्हारे नेता तो अपना कम देश का जादा खाते हैं , खबर दार जो हमारी  तुलना उनसे की तो. 

तुम्हारे नेतावो मे थोड़ा सा भी "बंदरियत" होती तो पेट भर खा के आराम कर रहे होते, हमें देखो , एक बार पेट गर गया तो आपस मे एक दूसरे की जुएँ ढूढते है, एक तुम्हारे नेता, पेट भरते ही दूसरे देश का बैंक भरने लगते है. हम जानवर जरुर है लेकिन इतने गए गुजरे भी नहीं की हमरी तुलना नेताओ से करो.  

खैर, जब बन्दर नहीं तैयार  तो तुलना किससे की जाए ?? भेडिया ?? नहीं इससे भी नहीं की जा सकती, क्योकि भेडिया तो भेडिया है ये साफ़ साफ़  दिखता है, जानवर दूर से ही देख के पहचान सकते है, भाग सकते है, इनकी नेतावो की प्रजाति तो ये भी नहीं है, जो दीखते है वो निकल जाए तो "एक" के नहीं, जरुर सामूहिक परिश्रम का परिणाम है. 

जानवर एक बार जो गलती करे उसका फल उसे मिल जाए तो दुबारा नहीं करता .यहाँ तक की कुत्ता भी , "क्या कुत्तों की तरह बार बार चल्ला आता है" इस तरह की कहावते सर्वथा गलत है,  मान लो किसी कुत्ते को आप रोटी  दिखा के एक बार बुला लो और एक डंडा जड़ दो , दुबारा बुलाओ, फिर जड़ दो , तो तीसरी बार वो नहीं आयेगा. आप भी कर के देखना. कुत्ते का भी स्वाभिमान एक बिंदु पे पहुच जाग जाता है. 

लेकिन ये तो नेता है. इनकी गलतियाँ ठीक वैसी है जैसे पुराने ज़माने की नगरवधू (पतिता) बार बार धन ले और पतित होती जाती है, क्योकि ये उसका व्यापार होता है, वह जितना पतित होती जाती है उतनी गर्वित भी, की उसका बोला बाला है , उसे पतित करने के लिए तो लोग लाइन लगा के रखते है उसकी बोली लगते है. वो भी भला क्यों सीखे क्यों जाने की ये गलत है ऐसा  नहीं होना चाहिए. 

लेकिन ये तो नेता है , समर्थ है, तुलसीदास जी ने भी कहा है "समरथ को नहीं दोष गोसाईं" अतः जो समर्थ है उसे सीखने कि कोई जरुरत नहीं,  क्योकि वो समर्थ इसलिए है की जनता जिसे जानवर भी अस्वीकार कर देते है उसे मसीहा बना संसद भेज देती है. 

अस्तु, अब मूल बात पे आते है, रामायण मे  भगवान राम ने न जाने कितनी कोशिशे की की सीता बिना युध्द के वापिस आ जाये, हनुमान भेजा अंगद भेजा, लेकिन सब व्यर्थ, " होईहे वही जो राम रूचि राखा" यानि ये सब राम की ही प्लानिंग थी. आगे क्या हुआ आप सभी जानते है.  लेकिन उसमे राम का स्वार्थ बस इतना ही था की उन्होंने ने रक्तपात को टालना चाह था. 

महाभारत मे ने भी पांडवो ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, लेकिन कौरवो को पांच गाव भी देख मरोड़ उठने लगा, हुआ वही जो राम के अग्रज अवतार ने  चाहा था. 

लेकिन ये तो नेता है, अब पाकिस्तान से मैत्रीभाव बढ़ाना चाहते है, वीजा नियम सरलतम बनाना चाहते हैं. दोनों मुल्को के इंसानों के बीच संवाद स्थापित करना चाहते है, इससे एक्सपोर्ट इम्पोर्ट बढ़ेगा,  वैसे भी भारत एक्सपोर्ट इम्पोर्ट के मामले मे बहुत खराब है, सानिया दे के वीणा  मंगवाता है, यहाँ के टेक्नोकार्ट विदेश भेजता है, और विदेश से महेश भठ तारिणी "लीयोनी" बुलवाता है. 

रे नेता जी, संवाद स्थापित हो के क्या होगा ?? रोटी बेटी  का रिश्ता तो नहीं करना ?? एक दामाद कसाब जो बैठा  है उससे संतोष नहीं हो रहा ?? और कितने रखोगे ?? आतंकवादी दामाद जो इतने ही चाहिए तो वही क्यों नहीं चले जाते बीटीयावों के साथ?? किसने रोका है ?? क्यों भूल जाते हो  सैकडो कोशिशे बाद भी रामायण मे रावन नहीं सुधरा था, महाभारत मे कौरव नहीं सुधरा था. 

इतनी छोटी सी बात  कुत्ते जैसा जानवर तक समझता  है , लेकिन ये तो नेता है. 

सादर
कमल कुमार  सिंह 



2 comments:

Sunil Kumar said...

कुछ अलग सी पोस्ट सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी कृपया बंदरों को बदनाम ना करें :):)

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपके इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि का लिंक कल दिनांक 10-09-2012 के सोमवारीय चर्चामंच-998 पर भी है। सादर सूचनार्थ