नारद: December 2011

Saturday, December 24, 2011

सम्मलेन -मीट

सम्मेलन अर्थात व्यक्ति समूहों  का किसी एक स्थान पे मिलन, ये किसी भी प्रकार का हो सकता है, किसी नेता का सम्मेलन जिसमे विपक्ष की साजिश द्वारा मधुमख्खी आक्रमण करा दिया जाए, या किसी विश्व विद्द्यालय के पुरातन छात्रों का, जिसको अलुमनी मीट कहते हैं. व्यवसायियों के मीट को कारपोरेट मीट कहते है जिसको  को मै मीट नहीं मानता, क्योकि उसमे आर्थिक अर्थ निहित होता है. 

अलुमनी मीट  मुझे इसके बारे में पता न था, आखिर आज तक किसी ने प्यार से बुलाया ही न था, जिस स्कूल कालेज से निकले सब  ने चैन की साँस लली, की चलो  इस साल बला टली, बुलाने की तो बात दूर, मित्र से पूछा  तो उसने बताया, अलुमनी मीट में वरिष्ट छात्रों को बुला के उनसे कनिष्ठ छात्रों से परिचय करवाते हैं ताकि उनका मार्गदर्शन हो सके, फिर भी मेरे मन में संशय था की कहीं बुला के पुरानी बाते याद दिला के बेइज्जत तो न करेंगे, मुझे वैसे भी अपने अध्यापको पे विशवास  कम ही होता था, और मै कौन सा कनिष्ठों का मार्ग दर्शन कर दूँगा ??  बल्कि उल्टा मेरे लपेटे में आ गए तो सारी दुनियादारी सिखा एक नंबर का बना दूँगा, फिर उनको अपने भविष्य की चिंताए छोडनी पड़ेंगी, क्योकि तब उनका कुछ नहीं हो सकता . 


इस महीने मैंने एक ही दिन में दो सम्मेलन में उपस्थिति दर्ज कराई,  एक तो क्रिसमस की फैमिली मीट, जिसमे अपने पत्नी के साथ खुद भी उपस्थित होना था, हम भी आमंत्रित थे, ठीक नियत समय से पहुच गए, सबको नमस्कार-प्रणाम कर बच्चो से उनका नाम हाल पूछा, ठिठोली की, किसी ने  पूछा भाभी जी को नहीं लाये ? मैंने बता दिया , घर की बात घर में रहे तो जादा अच्छा है, मै किसी को नहीं बताना चाहता की दिन में एकाध बार पड़ भी जाती है.  वहाँ तमाम तरह के आयोजन किये थे, एक कोई मनोरंजन के लिए भी आया था जो बारी बारी हर एक जोड़ा को बुलाता, और पति से अपनी पत्नी को आई लव यू कहलवाने का असाध्य काम करवाता, 

मैंने उससे पूछा "तू शादी शुदा है ?? 
उसने कहा "नहीं , 
तो जितना आई लव यू बोलना है अभी बोल ले, शादी के बाद अपनी बीवी को बोल देगा तो पक्का मै गारंटी लेता हूँ तुझे "नोबेल"  दिलवाने का, यदि न दिलवा पाया तो तेरे सामने मै खुद अपनी बीवी को आई लव यू बोल दूँगा .



खैर जैसे तैसे निपटा के मै सापला कि तरह रवाना हुआ, सोचा एक आध घंटे में पहुच जाऊँगा तब भी बहुत सेलिब्रेटियों से मुलाक़ात हो जायेगी, वैसे पहले ही बहुत देर हो चूका था, समय पे पहुचना संभव न था,फिर भी दिल में जोश भर के निकल लिया. हालाकि यहाँ से कोई बुलाया तो न था लेकिन हम खुद मुह उठा के जाने को तैयार थे सो दो  चार बार सम्बन्धित व्यक्तियों को सूचित कर दिया था कि अवांछित व्यक्ति मै भी होऊंगा. 

रास्ते से अनजान था, तो बस पकडने कि सोच एक भद्र से बस स्टैंड का रास्ता पूछ लिया, "यहाँ सीधे चले जाओ, फिर रहीम पान वाला आयेगा, उसके सामने एक पीपल का पेड़ है, वहाँ पहुच के किसी से भी पूछ लेना कि बस स्टैंड कहाँ है "भद्र ने सलाह दी, जो कि मैंने नहीं ली.

बगल में एक युवती खड़ी थी, भली लगती थी, मैंने उनसे भी रास्ता पूछा  "तुम मर्दों को लड़किया ही दिखाई देती है रास्ता पूछने को, मौका मिला नहीं कि चूकना नहीं चाहते, तुम्हरे जैसे लडको के कारण ही लड़किया असुरक्षित है देलही में"  उनका जावाब सुन जब आस पास दृष्टी डाली तो लोग मुझे ही देख रहे थे,मन मसोस एक रिक्शा लिया और अंततोगत्वा  मै जिस २० रुपयों को बचाना चाहता था  न चाहते हुए भी उसकी आहुति देनी पड़ी.  

पूछताछ से पूछने पे पता चला कि अगली बस दो घंटे बाद का शेड्यूल हुआ है, सुन मन खिन्न हो उठा, एक तो उस बुजुर्ग कि सलाह, फिर उस युवती कि कचकच, अब इनकी बस वाली भविष्यवाणी. 
किसी ने सुझाया, मेंन  रोड से प्राईवेट बस ले लो, मुझे जंच गया, दिल पे पत्थर रख एक प्राईवेट बस में घुस तो गया लेकिन ऐसा लगता था जैसे अंग्रेज निरीह भारतीयों को ठूंस ठुसं के भरने के बाद एक जेल से दूसरे जेल ले जा रहें हैं, तभी बस के अंग्रेज ने हाक लगाई, "पाछन हो ले भाई , पछान हो ले " और डर के मारे  निरीह जनता खुद ही एक दूसरे  पे  दबाव बनाने लगी पीछे होने के लिए, कहीं ये अंग्रेज नाराज न हो जाए. 

मै किसी कोने खड़ा हो लिया और भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि कोई यहाँ  धक्का मुक्की करते न देख ले, 
बस थोड़ी ही दूर चली थी कि हलचल कि आवाजे आने लगी,
" मै तुम्हे देख लुंगी  जानते नहीं तुम मुझको " किसी महिला कि आवाज थी , 
" देखिये  आप अभद्रता से बात न कीजिये नहीं तो .." किसी पुरुष ने कातर शब्दों में याचना पूर्वक चेतावनी दी.

अगले स्टॉप पे दोनों ही उतर गए,
पीछे होने के कारण पीछे वाले बस अपने आगे वाले का सर ही देख सकते थे, सो कयास लगने लगे, "महिलाये पुरुषों पर तत्काल लांचन लगा देती है, अपनी गलती नहीं दिखती, पुरुष तो अच्छा दिखता था वो छेड छाड न करेगा, और उनको अपने उम्र का भी ख्याल नहीं , इस उम्र में कौन छेड़ेगा उनको".  जितनी मुह उतनी बाते, बाद में मामला साफ़ हुआ कि बात छेड -छाड को ले के नहीं, बल्कि सीट को ले के थी. कयास लगाने वालो के चहरे लटक गये, इस लिए नहीं कि उन्होंने गलत सोच लिया, बल्कि इस लिए कि इतने दिलचस्प मुद्दे पे लगाया कयास झूटा साबित हो गया, सीट वाली बात तो आम है, और उसमे कोई मजा भी नहीं. 

खैर जैसे तैसे "स्टैंडिंग लाईव  इंटरटेनमेंट" के  दो घंटे बाद अपने पहले पड़ाव पंहुचा, यहाँ आते आते शाम के पांच बज गए थे, फिर भी दिल में उमंग भर एक चाचा से वाहन के बारे में पूछा, तो उन्होंने झट हाथ पकड़ एक ओर खीचना शुरू किया, मैंने कहा "मैंने क्या किया बस रास्ता ही तो पूछा है",  तब तक उन्होंने मुझे एक जीप में घुसा दिया फिर कहा "ये वाली जायेगी साहेब " .  उनके इस अंदाज से पहले मै डरा लेकिन बाद में प्रभावित भी, सिर्फ बताया ही नहीं बल्कि चढा भी दिया. 

कुल तीस मिनट बाद  साँपला चौक उतर एक बुजुर्ग से फिर पूछा "ये कवि सम्मेलन कहा हो रहा है चाचा ?" पहले तो उन्होंने मुझे सर से पाँव तक घूरा जैसे कोई एलियन देख लिया हो, फिर कहा , मै तो समझता था कवि या लेखक अन्ना टाइप के बूढ़े बुजुर्ग लोग होते हैं, तुम तो अभी जवान हो फिर भी इन सब का शौक ?? बेरोजगार हो क्या ??? . चलो मै पंहुचा देता हूँ मै भी उसी तरफ जा रहा हूँ. कोई आधा किलोमाटर पैदल चलना था, उस बीस मिनट में मुझे उन्होंने पूरी दुनियादारी  बता दी, बताया कि कैसे आजकल युवा पीढ़ी साहित्य और कला के बारे में नहीं सोचती, बताया कि अपने ज़माने में वो अपने अध्यापको को कैसे पिटा करते थे, इतने मित्रवत हो गए कि अपने कई  प्रेयसी के नाम भी बता दिए साथ में स्पष्टीकरण भी कि शादी के बाद वो पत्नी समर्पित हो गए . मैंने मन ही मन कहा, खुद तो हुए नहीं होंगे, शेरनी देख अच्छे अच्छे  शेर मेमने बन जाते हैं. 

खैर बीस मिनट का "वाकिंग लाईव इंटरटेनमेंट" समाप्त हुआ और मै निर्धारित जगह पे पंहुचा गया. हाल में घुसते ही दो हट्टे -कट्टे लोग नजर आये, हमने पूछा, लोग यही हैं??? उन्होंने एक दूसरी तरफ अंगुली दिखा कहा 
 "उधर है आपकी मंडली "  शायद थकान के कारन उतरे हुए चहरे को देख उन्होंने भांप लिया था मेरी केटेगरी. 

खैर मीट खत्म हो चुकी थी उस समय तक लेकिन सम्मेलन बहरह बजे रात तक चलना था, अभी मध्यांतर चल रहा था सो सभी रजाई में दुबके, हास परिहास, वाद विवाद में उलझे थे, मै भी सबको सदर प्रणाम बोल रजाई के कोने पे कब्ज़ा जमाया,  सबसे परिचय होने के बाद जम के विभिन्न मुद्दों पे बहस भी हुआ कोई अन्ना -बाबा के बारे में बाते कर रहा था तो कोई जातिवाद कि चुटकी ले रहा था,  मैंने मौका देख आशुतोष भाई से  आयुर्वेदिक व्हिश्की बनाने की  दरख्वास्त को बाबा तक पहुचाने को बोल दिया . 



सबसे परिचय होने के बाद देलही के कुछ संगी चलने लगे, हमने सोचा चलो हम भी निकल लेते हैं , मिलने के लिए आया था सबसे वो तो कर लिया, अब यहाँ रुकने का क्या औचित्य, सो रेलवे स्टेशन कि तरफ बढ़ने  लगा, तभी आशुतोष भाई ने आवाज लगाई, चलो इसी में चलते हैं जल्दी पहुच जायेंगे, मैंने उनके कार कि तरफ देखा ,पहले ही तीन स्वस्थ लोग थे, मै कहाँ आ पाता फिर भी प्यार भरे आग्रह को न ठुकरा पाया, एक के ऊपर एक बैठ लिए, गाड़ी थी तो नयी चमाचम लेकिन शायद अभी शुरुआत थी इंजन रवा न हुआ था सो १० कि स्पीड से चली, आशुतोष जी जो खुद पाईलट कि सीट सम्हाल रहे थे चिंतित थे, कि पहुच भी पायेंगे या नहीं, लेकिन सच बताऊ तो मुझे बड़ा आनंद आ रहा था, पहली बार ऐसा मौका मिला थी कि व्यंग और अन्गुल्बाज अब एक साथ बैठे थे तो हो जाए लेट, और कार को धीरे चलने के लिए साधुवाद दे रहे मन ही मन, कार ने भी हमारी भावनाओं को पूरा इज्जत दी, इतनी मस्ती से चल रही थी कि रास्ते में पडने वाले किसी भी वस्तु का स्केच बनाया जा सकता था, मुझे मेरी स्केच बुक कि कमी खलने लगी. 

आशुतोष जी बार बार भगवान से प्रार्थना करते कि कि गाडी गति पकड़ ले, लेकिन वो क्यों पकडे भला ? हमारे ह्रदय को चोट जो लगती, कार थी भी बिलकुल जलन और इर्ष्या से रहित, सीधी  तो इतनी कि कोई साईकिल वाला भी पार कर जाता तो आग बबूला न होती. और पैलट सीट के बगल में बैठे लेखक मित्र कार और आशुतोष जी का उत्साह वर्धन कर रहे थे  " बहुत सही चल रही है , चले चलो बढे चलो, अब देल्ली दूर नहीं, हम अपने लक्ष्य तक जरुर पहुचेंगे" 

किसी ने सुझाव दिया कि किसी मकेनिक कि दूकान देख रोक ली जाए, तभी किसी ने कहा कि नहीं, जहाँ मकेनिक और ठेका दोनों हो वही रोकी जाए, लेकिन ठेका और मैकेनिक दोनों भारत-पाकिस्तान हो चले थे , एक साथ दिखाई ही न देते. 

खैर गाडी अब देलही के सीमा में प्रवेश कर चुकी थी तो  तय हुआ कि क्यों न भार कम कर दिया जाए ? सो एक मंडली में से एक मित्र को बस पकडाया गया, लेकिन गाडी आज पूरी तरह से मदमस्त हो सटर डे नाईट मनाने के मूड में थी. 
किसी तरह मेट्रो पास देख आशुतोष भाई ने सुझाव दिया कि कमल और कनिष्क मेट्रो पकड़ लें, हम घर पहुच के फोन कर देंगे , सुझाव पे अमल हुआ, हमलोग घर भी पहुच गए लेकिन आशुतोष भाई का फोन नहीं आया है अभी तक , आशा है की अब तक पहुच चुके होंगे , किसी को इसके बारे में जानकारी हो तो जरुर इत्तला करे... 

सादर कमल 

२५ / १२ / २०११ 

Monday, December 19, 2011

साँप


झुक जाता है सर मेरा, जब कोई मंदिर दीखता है ,
करता  लेता हूँ इबाबत जब कोई मस्जिद दीखता है ,
प्रेयर , करके इसा की, कुछ और आनंद ही आता है ,
स्वर्ण मंदिर देख, सर नतमस्तक हो जाता है,

शायद यही है  व्याख्या धर्म कि, जो ये अज्ञानी कर पाया,
ग्यानी हमें बनना नही , जिन्होंने धर्म भेद फैलाया,

सुना है ग्यानी आजकल , संसद में बैठते हैं,
धर्म को अधर्म बना, इस देश को डसते हैं ,

तो दोस्तों आप ही बताओ उन्हें ग्यानी कहूँ सांप,
जिनका काम है डसना उसको , जिसके आस्तीन में पलते हैं,


(कमल - १९ , १२ , २०११ )

Friday, December 16, 2011

जलन

"जलन", बहुत अपार महिमा है इसकी, कुछ स्वप्रबुद्धों ने इसकी निंदा की है, लेकिन अब मै उनसे जलता हूँ, क्यों निंदा की  इतने महान शब्द कि ???

जिसने भी इस शब्द का आविष्कार किया होगा वो निश्चय ही महान ज्वलनशील  होगा, कितना तपा होगा, ढेर सारे अनुभव होंगे उसके पास, और इतने मेहनत से किये गए आविष्कार को कालान्तर में निंदा दृष्टि से देखा जाए, कहाँ तक उचित है ?????

"जलन " का इतिहास भी  हिंदू धर्म  की  तरह आदि और अन्नत है, न इसका कोई ओर है, न इसका कोई छोर है, पुरानो के ज़माने से इसका जिक्र है, इन्द्र ने जलभुन के हनुमान पे वज्र चलाया था, और इन्द्र से जल भून के पवन देव ने ब्रम्हांड व्याकुल कर दिया. इससे एक और अर्थ निकलता है, आज का कारपोरेट कल्चर भी इसी जलन के आशीर्वाद से चल रहा है, पवन और इन्द्र कि तरह यहाँ भी पद वृक्ष होता है.

कभी कभी एक होना भी जलन का कारन होता है, तभी तो सूर्य कि प्रक्रिया में संलयन होने से, जलन कूट कूट के बाहर आता है और उसका मजा पूरा विश्व लेता है.

अजी जरा दिमाग तो लड़ाए, जलन ने हमे और हमारे इतिहास को कितना कुछ दिया है, न जाने कितने आदर्शो को दिया है.  यदि सुपर्णखा राम के प्यार में न जलती, तो लक्षमन उसके नाक कान क्यों काटते ??? यही नहीं काटते तो राम रावन से जल के सीता को क्यों किडनैप करता ?? नहीं करता राम रावन से जल के उसको मारते कैसे ?? और नहीं मारते तो क्या हम आज राम को आदर्श पुरुष कहते ???? वाल्मीकि डाकू के डाकू ही बने रहते, और तुलसी रामचरीत की  रचना कभी न कर पाते, और न ही हमें महान कालजयी रचनाये मिल पाती.

यदि भारत की अपार सम्पदा  से जल के मुगलों ने आक्रमण न किया होता तो भारत में एक और धर्म इस्लाम कैसे आता ??? न हम शराबी बाबर के बाबरी मस्जिद के लिए लड़ते, न ही कुकर्मी अकबर को महान बोल सकते, और हमारा इतिहास अधूरा रहता,  और न ही हमारा भारत महान धर्म निरपेक्ष होके धरम के आधार पे आठ प्रतिशत का आरक्षण देता...

मुहमद से जल के यदि पब्लिक पत्थर न मारती तो तो क्या तो कुरआन कैसे बनता ??और हम अपने बच्चों को क्या बताते कि राम कौन थे ?? रावन कि चिड़िया का नाम है?? मुहम्मद कौन , इसा कौन ??? कितनो को पी एच डी के लिए विषय भी न मिलता.  आज लोग इन्ही महा पुरुषों के नाम से एक दूसरे से जलते हैं, वर्चुअल बहस करते हैं, इसमें भी फायदा है, टाईपिंग गति बदती है, लोगो में दुर्भावना जगती है, नये नए तकनिकी  गालियों का आविष्कार होता है, जिससे दिल को तसल्ली मिलती है.

भाई जलन न होता तो बीवी आपको ले के  किसी दूसरे लडकी से क्यों जलती ?? इसी चक्कर में रोज नए नए पकवान कैसे खाते ??? और बीवी यदि पडोसी की  कार देख न जले तो आपको नयी कार की  प्रेरणा कहाँ से मिलती ??? विस्वाश मानिए जिंदगी भर लूना से चलेंगे.

पाकिस्तान यदि भारत से न जले तो आतंकी आक्रमण कैसे हो ? राजनीति कैसे होती ? कसाब   भारत के "अथिति देवो भव " कि संकल्पना का ज्ञान कैसे पाते ????
खूब है भाई आप लोग, खामख्वाह जलन को बदनाम कर रखा है,

जलन से ही प्रशांत भूषण  पिट गए और भारत बदलने को  भगत क्रान्ति सेना का भी निर्माण हुआ, अब कहिये ये क्या कम है ??

जलन न होता तो विश्वास मानीये हम कही के न होते,

जलन ढेर सारी वांछित वस्तुए भी दिला सकता है जैसे राजनीति करना हो किसी नेता से जल भून के जूते फेंक दें  फिर देखिए चौबीस घंटे आने वाले चैनल आपके  इस फ़ालतू काम को भी कैसे चमकाती है, बाबा को गाली दो देखो तुरन्त कोंग्रेस से प्रस्ताव आ जायेगा, निरपेक्षता के नाम पे हिन्दुओ को गाली दो , और त्वरित अपने प्रेस वाले  एक शानदार भूमिका के साथ कैसे आपको महिमा मंडित करते हैं, लेकिन अब सवाल ये है कि आप जूते क्यों मारो ????तो उसका प्रथम चरण है किसी के लिए अपने मन में जलन कि भावना लाओ तब जा के दिमाग और दिल हाथ का साथ देगा और कर दो लत्तम जुत्तम . जलन वह उत्प्रेरक है जो किसी भी इंसान को प्रेरित करता किसी खास और प्रसिध्ध कार्य के लिए. 

मेरी बात मानीये, जरा जल के तो देखिये , किसी के प्यार में ही सही, तो उसका मजा भी अलग है, छः छः महीने तक चक्कर काटना पड़ सकता है माशुका के लिए, इससे  धैर्य भावना का विकास होता है, पीछे पीछे भागने से स्वास्थ्य सही रहता है और मान लीजिए फिर आप से जल के माशुका कि भाई आपकी पिटाई कर दे तो इससे आप युध्द कौशल भी सीख जाते है जो आजकल अत्यंत दुर्लभ है, और कही दो बार से जादा पिट गए तो आप अपना पूर्णतः बचाव करने में सक्षम हो जाते हैं अपने भारतीय सेना कि तरह, जो कभी  अपने साले रूपी दुश्मनों  आक्रमण नहीं करती करती.

आप ही बताईये जलन का साथ छोड़ दे तो क्या प्यार करे ?? प्यार में बड़े बड़े खतरे हैं, प्यार करने वाला लड़का पिट जाता है, देश से प्यार करने वाले बाबा पिट जाते हैं, पडोसी से प्यार करने वाला पति पिट जाता है, भ्रस्टाचार से प्यार करने वाले कोंग्रेसी शरद पिट जातेआप ही बताईये जलन का साथ छोड़ दे तो क्या प्यार करे ?? 
तो आईये हम सब एक दूसरे कि जलन भावना का ख्याल रखते हुए इस परम्परा को और मजबूत किया जाए, हमारे देश के हित में, समाज के हित में .

कमल १६ दिसम्बर 

Tuesday, December 13, 2011

जोखुआ

"जोखुआ" हाँ यही कहते थे हम लोग उसको.

शरीर से हट्टा-कट्टा, जिस पर मै कभी कभी जल भून भी जाता था जब मेरे  रुआबी पीता श्री मुझे ताना देते, " देख ओकर, मजदूर बाप के नून रोटी खा के पहलवान भयल बा , एक तय हैं कि पेड़ से घी चुवावले तबो मुष्टि.

सच बात तो थी, वो दस  साल में भी चौदह से कम का कहीं से न लगता था, और उसी के हम उम्र हम भी  मानो संतूर लगा लिए हों, न उम्र बढती थी न शरीर, संग में चलता तो दुश्मन टोली दूर से भागती थी.
वो साथ रहता तो  दो - दो पैकेट पार्ले जी पे लगा क्रिकेट का मैच हम लोग आसानी  से बेईमानी कर के जीत लेते थे और दुश्मन टोली हाथ मलते रह जाती .

हर परेशानी में साथ होता, दिमाग तो ऐसा गजब चलाता कि आज अन्ना भी गच्चा खा जाते उससे.

हमें पिता जी बाग का अनार तोडने न दिया करते ,बोलते जब पक जाए तब तोडा जाएगा, और निशान के लिए हर आनार पे प्लास्टिक बाँधा करते और रोज गिना करते थे.

 लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे सो उसको नेवता दिया, उसने कुछ जुगाड फिट किया, अब हम रोज छक  के अनार उड़ाते और पिता जी को पता भी न चलता था. आज जब पिता जी को लगा कि अब अनार उतारना चाहिए तो गए बाग झोला झक्कड ले के.

अकसर वो स्कुल से हमारे साथ घर ही चला आता था और रोटी पानी निपटा के अपने घर जाता था आज भी मै जब स्कुल से जब घर आया तो जोखुआ भी साथ ही था, अचानक मेरी नजर पिता जी पे पड़ी तो साँस गुलाटी खाने लगा, गुस्सा तो उनका ऐसा था जैसे आज अन्ना को  लोकपाल के  न मिलने पे कोंग्रेस पे आता है.
पिता जी ने झोला ला के पटक दिया सामने , निकला मिट्टी का ढेला, मुझे तो कुछ समझ न आया पर जोखुआ खी खी कर के हँसने लगा, दोनों कि जम के पिटाई हो गयी, जितना अनार खाया था सब चमड़ी पे झलक रहा था.
हुआ ये था कि वो प्लास्टिक उतार के अनार तोड़ लेता और उसकी जगह मिट्टी का ढेला बाँध देता.

 पेड़ पे चढ चर्चा करना उसका पसंदीदा  कार्य था,  जिसकि भागीदार टोली भी होती थी, सबके अपने अपने चिन्हित डाल थे, जैसे  सारे मंत्री अपनी विचारधारा इसी समय रख सकते मानो डालो के हिलने से नए विचारों का प्रवाह आ जाता हो .
दुश्मन टोली को कैसे मजा चखाना है, या साधू बाबा को कैसे चिढाना है, या फिर दूसरे के खेत का गन्ना अपने मेंड पे ला के कैसे चूसा जाए, सारी योजनाये इसी समय तय होती.

दो महीने बाद महीने छात्र वृत्ति  प्रतियोगिता थी सो सबकी तयारी शुरू थी, मै भी लगा था जी जान से, लेकिन जोखुआ उदास था कई महीनो से स्कूल  कहाँ गया था वो ? रोज स्कूल के समय से घर से रोज निकलता लेकिन कही जा के खेलता कूदता, स्कुल खत्म होने के समय हम लोगो के साथ हो वापिस हो लेता, सब समझते जम के पढाई कर रहा.
अब कलई खुली हजरत कि, मै मन ही मन खुश था, उसके खुरापाती  दिमाग कि वजह से मेरे मन भी जलन पैदा होती थी कभी-कभी , मै भूल गया कि न जाने कितनो  के बाग मैंने उसके सहयोग से उजाडा था, अब मौका मिला था मुझे सो कैसे छोड़ देता... ??

मैंने सुझाव दिया,कहा "सुन पंडित जी कहते हैं रोज सुबह वाला पानी यदि बबूल के जड़  में चालीस दिन तक डाला जाये तो जिन्न प्रकट होता है जो  मन चाही मुराद पूरी करता  है, लेकिन शर्त ये कि उस समय कोई तुझे देखे न, नहीं तो सब भंग हो जायेगा".
अब क्या था, जोखुआ बाग् बाग हो गया, वो रोज सुबह यज्ञ में लग गया, मै मन ही मन अपनी कुटिल चाल के कामयाबी पे प्रसन्न भी था. वो रोज सुबह चार बजे भोर में उठता , खेत से वापस आते ही मुंशी जी वाले बाड़े में लगे बबूल के पेड़ को पानी दे के इक्कीस बार चक्कर लगाता और खुश होता कि आज भी उसे किसी ने नहीं देखा.

चालीसवें दिन मै घात लगा के बैठा था, जैसे ही पानी डाल के चक्कर लगाना शुरू किया मै सामने आ गया, "भूत भूत " करके भागने लगा तो मैंने पकड़ लिया, वो हैरान "ब्रूटस इट्स यू " के तर्ज पे हैरान हो के कहा, " तुम" ?? और जोर जोर से रोने लगा ......

आज बरसो बाद जब उसके घर गया तो बारी मेरी थी, मै जोर जोर से रो रहा था और वो शांत, निश्छल, निर्भाव, जमीन पे पड़ा था,  किसी बुजुर्ग कि आवाज आई, "मिट्टी जल्दी ले चलो नहीं खराब हो जायेगा" ......

*मिट्टी = लाश

कमल , १३ दिसंबर २०१२ 

Friday, December 2, 2011

अन्ना एंड बाबा का गुल्ली डंडा

खेल भावना एक एसी भावना है, जिसमे एक होने कि पूरी "संभावना" होती है,  भारत पाकिस्तान को ही देख लीजिए, जब तक आपस में न खेले, एक होने कि नौबत ही नहीं आती है, चाहे क्रिकेट का खेल हो या बोर्डर का.

बोर्डर की खेल भावना जादा प्रबल है, दोनों समान भावना के साथ एक दूसरे पे  ठायं - ठायं और दोनों तरफ के सैनिक पृथ्वी छोड़ स्वर्ग में एक हो जाते है. क्रिकेट में तो फिर भी दान- दक्षिणा का प्रभाव है.

दान -दक्षिणा प्रभाव की  तो जितनी भी प्रशंशा कि जाए कम है. राजा बलि "दान" के चक्कर में अपना सर्वस्व चौपट कर पाताल जाना पड़ा, वहीँ वामन अवतार दान पाते है विराट हो गया, यानी दान किसी भी क्षुद्र व्यक्ति को कहाँ से वहाँ पंहुचा देता है, जहाँ  वह अमुक सोचता है.

भारत में तो इसका प्रचलन जोरो पे है, कोई जनता से दान लेता है, तो कोई बिदेशी जनता से,यहाँ तक है कि वेबसाइट बना के रुपया द्वार तक बना देते हैं, ताकि दान लेने में कोई दिक्कत न हो, ठूंस दो जितना ठूंस सकते हो. करते धरते कुछ नहीं सिवाए अनशन के और भारत भ्रमण कर कर के भ्रम फैलाते हैं, और रुपया दबा जातें हैं.
वहीँ  कुछ ऐसे  भी हैं जो पूरा दान  अपने गुण से लेते हैं बदले में कुछ देश को भी देतें हैं , प्रत्यक्ष रूप में लगा के देश सेवा करते हैं और  संपत्ति का   पूरा ब्यौरा देते है , कई लाख किलोमीटर यात्रा भी करते हैं, जन चेतना जगाते हैं .

जी हाँ, ये हैं अन्नासुर और बाबा रामदेव . दोनों के स्वभाव भी एक दूसरे से मिलते भी हैं. दोनों हमेशा माया से दूर रहे. बिचारे मन मसोस के इन्द्रियों को वश में रखा, दान के चक्कर में दोनों ने अपने आप को देश हित में दान कर दिया, और दोनों ने देश- विदेश से जम के दान लिया.

दोनों चट्टे बट्टे लेकिन कहते, लेकिन प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं. खैर बाबा रामदेव तो भगवा पहनते हैं .
(भगवा का मतलब संघ न समझ लीजियेगा, मै खलिश रंग कि बात कर रहा हूँ ) सो थोडा बहुत धुल धक्कड़ भागम भाग में लग भी जाए तो कोई बात नहीं.
लेकिन अन्नासुर की धोती एक दम चकाचक सफ़ेद.  शायद रोज शाम को मीडिया से साफ़ करवाते होंगे और पत्रकारों, लेखकों से इस्त्री. 

दोनों के अपने अपने समर्थक है,  कोई बाबा कि दवा खाता है तो कोई अन्ना की  कसम.
बाबा अपना समर्थन अन्ना को देने का भरकस प्रयास कर रहें हैं, लेकिन अन्ना खुद ही मजबूत आदमी हैं, क्यों ले भला????  "भगवान देता है मगर दुबे नहीं लेता"  इसको कहते हैं खुद्दारी, जो सिर्फ दान लेते समय नहीं होती, वैसे भी दान और खुद्दारी दो अलग अलग चीजें हैं.

एक सरकार है जो  न तो बाबा को काला धन देती है, न अन्ना को जनलोक्पाल. एकदम निरपेक्ष, दृण, मजबूत इरादों वाली सरकार. बुलंद हौसलों वाली सरकार.
वास्तव में असली योगी तो अपनी सरकार है, जिसको किसी माया मोह से कोई मतलब नहीं, इनके लिए क्या बाबा और क्या अन्ना, जनता तो बड़े दूर कि कौड़ी है. योगी को माया मोह हो भी क्यों भला ??, उसका तो बस एक ही लक्ष्य होना चाहिए. इस योगी का भी एक ही लक्ष्य है,

"माया -मोह छोड़, करे कोई कितना हूट,
लोक परलोक बन जयिहें, जब जम के करेगा लूट"

कोई कितना भी शोर मचाये-छाती पीटे ,विघ्न डाले क्या मजाल जो हमारी योगी सरकार अपने विचारों और लक्ष्य से भटके. योगी तो बस आश्वासन का आशीर्वाद दे सकता है. अपनी सरकार ने भी दिया "शीत सत्र में जनलोकपाल  का".  लेकिन अब आशीर्वाद फलित तो तब होगा जब योगी जोर लगायेगा. अरे, फिर वही बात,  योगी इस पचड़े में क्यों पड़े भाई, सो पलायन कर जाओ, सत्र ही न चलाओ. एफ डी आई का झुनझुना पकड़ा दो.
कोई भी सच्चा योगी अपना धर्म भ्रष्ट  क्यों करे भला ???   सो माया मोह को आपस में लड़ा दो, एक साथ रहे तो कौन जाने योगी धर्म भ्रष्ट हो जाए ??

सो साध्वी उमा को बाबा के मोह  का और योगी अग्निवेश को अन्ना के माया का ठेका दिया गया. दोनों ने बखूबी काम भी किया, पुरस्कार भी मिला, एक प्रदेश प्रभारी बन गयी दूसरा बिग बोस् का योगा टीचर.

अन्ना के माया  टीम में अभी भी भेदिया होना था, नहीं तो बाबा के मोह को कौन कोसता ?? और यदि न कोसता तो बाबा समर्थक  अन्ना समर्थक कि बखिया कैसे उखाडते ???  और नहीं उखाड़ते तो माया मोह कैसे नष्ट हो ??? सो एक भद्र पुरुष है डा कुमार विश्वास, जो किसी ज़माने  अपने रोमांसी कविता  और चुटकुलों के बीच बाबा के कसीदे पढ़ा करते थे,  सो पहला हमला माया टीम से मोह टीम कि ओर "गोली- वोली बेचते थे, क्या जरुरत थी इन सब कि, अन्ना ठहरे फकीर आदमी सो उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा, बाबा कि तो कितनी बड़ी दूकान है, उसी को सम्हालते"   लो भाई हो गया काम.  "लोटा बिन पेंदी का हो गया, जो कभी उधर लुढकता था आज इधर लुढक गया" .  वैसे बाबा ने किया भी था गलत, अपने "जागरण कवि सम्मलेन" में क्यों न बुलाया था, विश्वास  पे विश्वास न था??

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तभी  कोई बाबा समर्थक जो अन्ना के साथ भी  था, छटक गया,  मेल भेज दी " भाई किस बात का फकीर अन्ना ?? जिसने पता नहीं चूसा कितना गन्ना. करोरो के दान का मालिक हो के उसकी मर्जी कि मंदिर में रहे या मस्जिद में, भाई मंदिर में रहता होगा तो वहां व्यवस्था भी चका चक होगी,  नहीं इतना सफेदी आज के महगायीं में मेंटेन करना मुश्किल है, गाँव में हैं सो रोज के अलाटेड  छब्बीस रूपये तो सिर्फ धोती के मांड और इस्त्री में निकल जाते होंगे. फकीर तो सड़क में ही मर जाता है, न की  फाईव स्टार मेदान्ता हस्पताल में जाता है.  एसी बाते मत बोलो भाई नहीं तो  योगी -निर्मोही सरकार और तुम्हरे माया में क्या अंतर?  अन्ना मीडिया में कहते हैं कि उनके महीना का खर्च ४०० रुपया है, भाई क्या हवा पी  के जीते हैं, उनके आयोजन में जो लाखो खर्च होते हैं वो ?? खैर वो तो जनता का है.

अन्ना कहता है कि यदिलोक पाल पास हो गया तो कोंग्रेस का सपोर्ट करेगा, यानी कोंग्रेस का एजेंट है क्या ?? कभी ये हुआ कि चोर जब माल देदे तो पोलिस उसपे कोई करवाई न करे ??? गजब  कूटनीति है भाई अन्ना और उसके बन्दर टीम की  ....संघ और भाजपा  तो बाबा -अन्ना  दोनों को चिल्ला चिल्ला को समर्थन दे रही है , तो अकेले बाबा संघ पोषित  कैसे , जबकि भाजपा का गुणगान तो अन्ना ने ही किया था ( नितीश / मोदी ) .... बाबा करे तो राजनितिक , वही अन्ना करें तो सेकुलर ???अन्ना टीम की अफवाहें ये दोगली कूटनीति पे आधारित क्यों ????यदि बाबा के संग उमा भारती बैठी ती तो अन्ना भी तो अग्निवेश से इलू इलू कर रहे थे .. "
बाबा ने तो लाठी खायी, सहा , और तुम्हारे टीम ने मार पिटाई कर ली नागपुर में , तो जो तुम्हारी बात नहीं मानेगा उसकी नाक कान काट लोगे ???



फिर क्या था, दोनों में गुल्ली डंडा का खेल शुरू है, कभी माया, मोह को पदाति है कभी मोह, माया को , और योगी सरकार चुपचाप जनता के साथ वालमार्ट का मन्त्र पढ़ रही है ..

कमल  २ दिसम्बर २०११ 

Thursday, December 1, 2011

कुछ लिखना चाहता हूँ


आज कई दिन हो गए थे कुछ लिखे हुए,आज कुछ लिखना चाहता था मै ,
दिल टूटा  , देश टूटा  , व्यवस्था टूटी  ,  फिर भी लिखना चाहता था मै ,
थक के चूर हो के जब घर आया , तो माँ ने कुछ लाने  को बोल दिया ,

सो लेने चला गया,  नहीं लिख पाया, सोचा वापस आ के लिख लूँगा,
आग तो आग है, कभी भी जला  लूँगा,

फिर वापस आया, सोचा अब लिख लूँ,
तभी ऑफिस का फोन आया, जिसने कुल डेढ़ घंटे चबाया,
सो फिर लिख नहीं पाया,
फोन खत्म होते ही समझ में आया, अब मै फ्री हूँ ,
कलम से किसी  की भी  इज्जत  उतारने  को फ्री हूँ ,

सोचा  लिख मारो ऐसा, कि तहलका हो जाये,
दुनिया मुझे तक़दीर बादशाह समझने लगे ,

जैसे ही  ये बात मेरे दिल में आई  ,

तत्काल मेरी आत्मा मेरे सामने आई ,
उसने मुझसे  गुहार लगाई ,

रे मुरख क्या लिखेगा ??
किसकी धज्जी है उडानी ??
प्रेमिका के बारे में , उसको तू कभी रास न आया ,
या  बारे में माँ के, जिससे सादा प्यार ही प्यार है पाया,

एक काम कर, राजनीति  पे लिख दे ,
हिट भी होंगे तेरे खाते में ,
कुछ प्रोजेक्ट बताता हूँ , लिख मारेगा तो सब गुलाम हो जायेंगे 
आजकल मशहूर प्रोजेक्ट है बाबा , और अन्ना  हैं मार्केट में ,


अब ये तू सोच , किसको है साथ में लाना ??
इन दोनों को हैं लड़ाना,
या इनको जोड़ , इस कुव्यवस्था  में आग लगाना , ??

मैंने कहा ,
मै बेचारा , दिल का मारा ,
मै जिसको एक बार , मिला वो मिला न दुबारा ,
बेहतर कि मै कुछ कर लूँ ,
उससे भी बेहतर है कि कुछ लिख लूँ ,
जैसे ही लिखने चला ,
नजर पड़ी , पासबुक पर ,
जो हो चुका था निरीह , लाचार ,
मेरी तरह वो भी रो रहा था बेजार ,

तो सोचा , कल का काम तैयार कर लूँ ,
बेहतर है आज नहीं , कल या कभी और लिख लूँ ,

सो आज भी लिख नहीं पाया ,
फूटपात पे हूँ , सो अपना बिस्तर  तक न गरमा पाया .
.हमेशा कि तरह , आज भी न सो पाया !!

(कमल) १ दिसंबर २०११