नारद: 2011

Saturday, December 24, 2011

सम्मलेन -मीट

सम्मेलन अर्थात व्यक्ति समूहों  का किसी एक स्थान पे मिलन, ये किसी भी प्रकार का हो सकता है, किसी नेता का सम्मेलन जिसमे विपक्ष की साजिश द्वारा मधुमख्खी आक्रमण करा दिया जाए, या किसी विश्व विद्द्यालय के पुरातन छात्रों का, जिसको अलुमनी मीट कहते हैं. व्यवसायियों के मीट को कारपोरेट मीट कहते है जिसको  को मै मीट नहीं मानता, क्योकि उसमे आर्थिक अर्थ निहित होता है. 

अलुमनी मीट  मुझे इसके बारे में पता न था, आखिर आज तक किसी ने प्यार से बुलाया ही न था, जिस स्कूल कालेज से निकले सब  ने चैन की साँस लली, की चलो  इस साल बला टली, बुलाने की तो बात दूर, मित्र से पूछा  तो उसने बताया, अलुमनी मीट में वरिष्ट छात्रों को बुला के उनसे कनिष्ठ छात्रों से परिचय करवाते हैं ताकि उनका मार्गदर्शन हो सके, फिर भी मेरे मन में संशय था की कहीं बुला के पुरानी बाते याद दिला के बेइज्जत तो न करेंगे, मुझे वैसे भी अपने अध्यापको पे विशवास  कम ही होता था, और मै कौन सा कनिष्ठों का मार्ग दर्शन कर दूँगा ??  बल्कि उल्टा मेरे लपेटे में आ गए तो सारी दुनियादारी सिखा एक नंबर का बना दूँगा, फिर उनको अपने भविष्य की चिंताए छोडनी पड़ेंगी, क्योकि तब उनका कुछ नहीं हो सकता . 


इस महीने मैंने एक ही दिन में दो सम्मेलन में उपस्थिति दर्ज कराई,  एक तो क्रिसमस की फैमिली मीट, जिसमे अपने पत्नी के साथ खुद भी उपस्थित होना था, हम भी आमंत्रित थे, ठीक नियत समय से पहुच गए, सबको नमस्कार-प्रणाम कर बच्चो से उनका नाम हाल पूछा, ठिठोली की, किसी ने  पूछा भाभी जी को नहीं लाये ? मैंने बता दिया , घर की बात घर में रहे तो जादा अच्छा है, मै किसी को नहीं बताना चाहता की दिन में एकाध बार पड़ भी जाती है.  वहाँ तमाम तरह के आयोजन किये थे, एक कोई मनोरंजन के लिए भी आया था जो बारी बारी हर एक जोड़ा को बुलाता, और पति से अपनी पत्नी को आई लव यू कहलवाने का असाध्य काम करवाता, 

मैंने उससे पूछा "तू शादी शुदा है ?? 
उसने कहा "नहीं , 
तो जितना आई लव यू बोलना है अभी बोल ले, शादी के बाद अपनी बीवी को बोल देगा तो पक्का मै गारंटी लेता हूँ तुझे "नोबेल"  दिलवाने का, यदि न दिलवा पाया तो तेरे सामने मै खुद अपनी बीवी को आई लव यू बोल दूँगा .



खैर जैसे तैसे निपटा के मै सापला कि तरह रवाना हुआ, सोचा एक आध घंटे में पहुच जाऊँगा तब भी बहुत सेलिब्रेटियों से मुलाक़ात हो जायेगी, वैसे पहले ही बहुत देर हो चूका था, समय पे पहुचना संभव न था,फिर भी दिल में जोश भर के निकल लिया. हालाकि यहाँ से कोई बुलाया तो न था लेकिन हम खुद मुह उठा के जाने को तैयार थे सो दो  चार बार सम्बन्धित व्यक्तियों को सूचित कर दिया था कि अवांछित व्यक्ति मै भी होऊंगा. 

रास्ते से अनजान था, तो बस पकडने कि सोच एक भद्र से बस स्टैंड का रास्ता पूछ लिया, "यहाँ सीधे चले जाओ, फिर रहीम पान वाला आयेगा, उसके सामने एक पीपल का पेड़ है, वहाँ पहुच के किसी से भी पूछ लेना कि बस स्टैंड कहाँ है "भद्र ने सलाह दी, जो कि मैंने नहीं ली.

बगल में एक युवती खड़ी थी, भली लगती थी, मैंने उनसे भी रास्ता पूछा  "तुम मर्दों को लड़किया ही दिखाई देती है रास्ता पूछने को, मौका मिला नहीं कि चूकना नहीं चाहते, तुम्हरे जैसे लडको के कारण ही लड़किया असुरक्षित है देलही में"  उनका जावाब सुन जब आस पास दृष्टी डाली तो लोग मुझे ही देख रहे थे,मन मसोस एक रिक्शा लिया और अंततोगत्वा  मै जिस २० रुपयों को बचाना चाहता था  न चाहते हुए भी उसकी आहुति देनी पड़ी.  

पूछताछ से पूछने पे पता चला कि अगली बस दो घंटे बाद का शेड्यूल हुआ है, सुन मन खिन्न हो उठा, एक तो उस बुजुर्ग कि सलाह, फिर उस युवती कि कचकच, अब इनकी बस वाली भविष्यवाणी. 
किसी ने सुझाया, मेंन  रोड से प्राईवेट बस ले लो, मुझे जंच गया, दिल पे पत्थर रख एक प्राईवेट बस में घुस तो गया लेकिन ऐसा लगता था जैसे अंग्रेज निरीह भारतीयों को ठूंस ठुसं के भरने के बाद एक जेल से दूसरे जेल ले जा रहें हैं, तभी बस के अंग्रेज ने हाक लगाई, "पाछन हो ले भाई , पछान हो ले " और डर के मारे  निरीह जनता खुद ही एक दूसरे  पे  दबाव बनाने लगी पीछे होने के लिए, कहीं ये अंग्रेज नाराज न हो जाए. 

मै किसी कोने खड़ा हो लिया और भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि कोई यहाँ  धक्का मुक्की करते न देख ले, 
बस थोड़ी ही दूर चली थी कि हलचल कि आवाजे आने लगी,
" मै तुम्हे देख लुंगी  जानते नहीं तुम मुझको " किसी महिला कि आवाज थी , 
" देखिये  आप अभद्रता से बात न कीजिये नहीं तो .." किसी पुरुष ने कातर शब्दों में याचना पूर्वक चेतावनी दी.

अगले स्टॉप पे दोनों ही उतर गए,
पीछे होने के कारण पीछे वाले बस अपने आगे वाले का सर ही देख सकते थे, सो कयास लगने लगे, "महिलाये पुरुषों पर तत्काल लांचन लगा देती है, अपनी गलती नहीं दिखती, पुरुष तो अच्छा दिखता था वो छेड छाड न करेगा, और उनको अपने उम्र का भी ख्याल नहीं , इस उम्र में कौन छेड़ेगा उनको".  जितनी मुह उतनी बाते, बाद में मामला साफ़ हुआ कि बात छेड -छाड को ले के नहीं, बल्कि सीट को ले के थी. कयास लगाने वालो के चहरे लटक गये, इस लिए नहीं कि उन्होंने गलत सोच लिया, बल्कि इस लिए कि इतने दिलचस्प मुद्दे पे लगाया कयास झूटा साबित हो गया, सीट वाली बात तो आम है, और उसमे कोई मजा भी नहीं. 

खैर जैसे तैसे "स्टैंडिंग लाईव  इंटरटेनमेंट" के  दो घंटे बाद अपने पहले पड़ाव पंहुचा, यहाँ आते आते शाम के पांच बज गए थे, फिर भी दिल में उमंग भर एक चाचा से वाहन के बारे में पूछा, तो उन्होंने झट हाथ पकड़ एक ओर खीचना शुरू किया, मैंने कहा "मैंने क्या किया बस रास्ता ही तो पूछा है",  तब तक उन्होंने मुझे एक जीप में घुसा दिया फिर कहा "ये वाली जायेगी साहेब " .  उनके इस अंदाज से पहले मै डरा लेकिन बाद में प्रभावित भी, सिर्फ बताया ही नहीं बल्कि चढा भी दिया. 

कुल तीस मिनट बाद  साँपला चौक उतर एक बुजुर्ग से फिर पूछा "ये कवि सम्मेलन कहा हो रहा है चाचा ?" पहले तो उन्होंने मुझे सर से पाँव तक घूरा जैसे कोई एलियन देख लिया हो, फिर कहा , मै तो समझता था कवि या लेखक अन्ना टाइप के बूढ़े बुजुर्ग लोग होते हैं, तुम तो अभी जवान हो फिर भी इन सब का शौक ?? बेरोजगार हो क्या ??? . चलो मै पंहुचा देता हूँ मै भी उसी तरफ जा रहा हूँ. कोई आधा किलोमाटर पैदल चलना था, उस बीस मिनट में मुझे उन्होंने पूरी दुनियादारी  बता दी, बताया कि कैसे आजकल युवा पीढ़ी साहित्य और कला के बारे में नहीं सोचती, बताया कि अपने ज़माने में वो अपने अध्यापको को कैसे पिटा करते थे, इतने मित्रवत हो गए कि अपने कई  प्रेयसी के नाम भी बता दिए साथ में स्पष्टीकरण भी कि शादी के बाद वो पत्नी समर्पित हो गए . मैंने मन ही मन कहा, खुद तो हुए नहीं होंगे, शेरनी देख अच्छे अच्छे  शेर मेमने बन जाते हैं. 

खैर बीस मिनट का "वाकिंग लाईव इंटरटेनमेंट" समाप्त हुआ और मै निर्धारित जगह पे पंहुचा गया. हाल में घुसते ही दो हट्टे -कट्टे लोग नजर आये, हमने पूछा, लोग यही हैं??? उन्होंने एक दूसरी तरफ अंगुली दिखा कहा 
 "उधर है आपकी मंडली "  शायद थकान के कारन उतरे हुए चहरे को देख उन्होंने भांप लिया था मेरी केटेगरी. 

खैर मीट खत्म हो चुकी थी उस समय तक लेकिन सम्मेलन बहरह बजे रात तक चलना था, अभी मध्यांतर चल रहा था सो सभी रजाई में दुबके, हास परिहास, वाद विवाद में उलझे थे, मै भी सबको सदर प्रणाम बोल रजाई के कोने पे कब्ज़ा जमाया,  सबसे परिचय होने के बाद जम के विभिन्न मुद्दों पे बहस भी हुआ कोई अन्ना -बाबा के बारे में बाते कर रहा था तो कोई जातिवाद कि चुटकी ले रहा था,  मैंने मौका देख आशुतोष भाई से  आयुर्वेदिक व्हिश्की बनाने की  दरख्वास्त को बाबा तक पहुचाने को बोल दिया . 



सबसे परिचय होने के बाद देलही के कुछ संगी चलने लगे, हमने सोचा चलो हम भी निकल लेते हैं , मिलने के लिए आया था सबसे वो तो कर लिया, अब यहाँ रुकने का क्या औचित्य, सो रेलवे स्टेशन कि तरफ बढ़ने  लगा, तभी आशुतोष भाई ने आवाज लगाई, चलो इसी में चलते हैं जल्दी पहुच जायेंगे, मैंने उनके कार कि तरफ देखा ,पहले ही तीन स्वस्थ लोग थे, मै कहाँ आ पाता फिर भी प्यार भरे आग्रह को न ठुकरा पाया, एक के ऊपर एक बैठ लिए, गाड़ी थी तो नयी चमाचम लेकिन शायद अभी शुरुआत थी इंजन रवा न हुआ था सो १० कि स्पीड से चली, आशुतोष जी जो खुद पाईलट कि सीट सम्हाल रहे थे चिंतित थे, कि पहुच भी पायेंगे या नहीं, लेकिन सच बताऊ तो मुझे बड़ा आनंद आ रहा था, पहली बार ऐसा मौका मिला थी कि व्यंग और अन्गुल्बाज अब एक साथ बैठे थे तो हो जाए लेट, और कार को धीरे चलने के लिए साधुवाद दे रहे मन ही मन, कार ने भी हमारी भावनाओं को पूरा इज्जत दी, इतनी मस्ती से चल रही थी कि रास्ते में पडने वाले किसी भी वस्तु का स्केच बनाया जा सकता था, मुझे मेरी स्केच बुक कि कमी खलने लगी. 

आशुतोष जी बार बार भगवान से प्रार्थना करते कि कि गाडी गति पकड़ ले, लेकिन वो क्यों पकडे भला ? हमारे ह्रदय को चोट जो लगती, कार थी भी बिलकुल जलन और इर्ष्या से रहित, सीधी  तो इतनी कि कोई साईकिल वाला भी पार कर जाता तो आग बबूला न होती. और पैलट सीट के बगल में बैठे लेखक मित्र कार और आशुतोष जी का उत्साह वर्धन कर रहे थे  " बहुत सही चल रही है , चले चलो बढे चलो, अब देल्ली दूर नहीं, हम अपने लक्ष्य तक जरुर पहुचेंगे" 

किसी ने सुझाव दिया कि किसी मकेनिक कि दूकान देख रोक ली जाए, तभी किसी ने कहा कि नहीं, जहाँ मकेनिक और ठेका दोनों हो वही रोकी जाए, लेकिन ठेका और मैकेनिक दोनों भारत-पाकिस्तान हो चले थे , एक साथ दिखाई ही न देते. 

खैर गाडी अब देलही के सीमा में प्रवेश कर चुकी थी तो  तय हुआ कि क्यों न भार कम कर दिया जाए ? सो एक मंडली में से एक मित्र को बस पकडाया गया, लेकिन गाडी आज पूरी तरह से मदमस्त हो सटर डे नाईट मनाने के मूड में थी. 
किसी तरह मेट्रो पास देख आशुतोष भाई ने सुझाव दिया कि कमल और कनिष्क मेट्रो पकड़ लें, हम घर पहुच के फोन कर देंगे , सुझाव पे अमल हुआ, हमलोग घर भी पहुच गए लेकिन आशुतोष भाई का फोन नहीं आया है अभी तक , आशा है की अब तक पहुच चुके होंगे , किसी को इसके बारे में जानकारी हो तो जरुर इत्तला करे... 

सादर कमल 

२५ / १२ / २०११ 

Monday, December 19, 2011

साँप


झुक जाता है सर मेरा, जब कोई मंदिर दीखता है ,
करता  लेता हूँ इबाबत जब कोई मस्जिद दीखता है ,
प्रेयर , करके इसा की, कुछ और आनंद ही आता है ,
स्वर्ण मंदिर देख, सर नतमस्तक हो जाता है,

शायद यही है  व्याख्या धर्म कि, जो ये अज्ञानी कर पाया,
ग्यानी हमें बनना नही , जिन्होंने धर्म भेद फैलाया,

सुना है ग्यानी आजकल , संसद में बैठते हैं,
धर्म को अधर्म बना, इस देश को डसते हैं ,

तो दोस्तों आप ही बताओ उन्हें ग्यानी कहूँ सांप,
जिनका काम है डसना उसको , जिसके आस्तीन में पलते हैं,


(कमल - १९ , १२ , २०११ )

Friday, December 16, 2011

जलन

"जलन", बहुत अपार महिमा है इसकी, कुछ स्वप्रबुद्धों ने इसकी निंदा की है, लेकिन अब मै उनसे जलता हूँ, क्यों निंदा की  इतने महान शब्द कि ???

जिसने भी इस शब्द का आविष्कार किया होगा वो निश्चय ही महान ज्वलनशील  होगा, कितना तपा होगा, ढेर सारे अनुभव होंगे उसके पास, और इतने मेहनत से किये गए आविष्कार को कालान्तर में निंदा दृष्टि से देखा जाए, कहाँ तक उचित है ?????

"जलन " का इतिहास भी  हिंदू धर्म  की  तरह आदि और अन्नत है, न इसका कोई ओर है, न इसका कोई छोर है, पुरानो के ज़माने से इसका जिक्र है, इन्द्र ने जलभुन के हनुमान पे वज्र चलाया था, और इन्द्र से जल भून के पवन देव ने ब्रम्हांड व्याकुल कर दिया. इससे एक और अर्थ निकलता है, आज का कारपोरेट कल्चर भी इसी जलन के आशीर्वाद से चल रहा है, पवन और इन्द्र कि तरह यहाँ भी पद वृक्ष होता है.

कभी कभी एक होना भी जलन का कारन होता है, तभी तो सूर्य कि प्रक्रिया में संलयन होने से, जलन कूट कूट के बाहर आता है और उसका मजा पूरा विश्व लेता है.

अजी जरा दिमाग तो लड़ाए, जलन ने हमे और हमारे इतिहास को कितना कुछ दिया है, न जाने कितने आदर्शो को दिया है.  यदि सुपर्णखा राम के प्यार में न जलती, तो लक्षमन उसके नाक कान क्यों काटते ??? यही नहीं काटते तो राम रावन से जल के सीता को क्यों किडनैप करता ?? नहीं करता राम रावन से जल के उसको मारते कैसे ?? और नहीं मारते तो क्या हम आज राम को आदर्श पुरुष कहते ???? वाल्मीकि डाकू के डाकू ही बने रहते, और तुलसी रामचरीत की  रचना कभी न कर पाते, और न ही हमें महान कालजयी रचनाये मिल पाती.

यदि भारत की अपार सम्पदा  से जल के मुगलों ने आक्रमण न किया होता तो भारत में एक और धर्म इस्लाम कैसे आता ??? न हम शराबी बाबर के बाबरी मस्जिद के लिए लड़ते, न ही कुकर्मी अकबर को महान बोल सकते, और हमारा इतिहास अधूरा रहता,  और न ही हमारा भारत महान धर्म निरपेक्ष होके धरम के आधार पे आठ प्रतिशत का आरक्षण देता...

मुहमद से जल के यदि पब्लिक पत्थर न मारती तो तो क्या तो कुरआन कैसे बनता ??और हम अपने बच्चों को क्या बताते कि राम कौन थे ?? रावन कि चिड़िया का नाम है?? मुहम्मद कौन , इसा कौन ??? कितनो को पी एच डी के लिए विषय भी न मिलता.  आज लोग इन्ही महा पुरुषों के नाम से एक दूसरे से जलते हैं, वर्चुअल बहस करते हैं, इसमें भी फायदा है, टाईपिंग गति बदती है, लोगो में दुर्भावना जगती है, नये नए तकनिकी  गालियों का आविष्कार होता है, जिससे दिल को तसल्ली मिलती है.

भाई जलन न होता तो बीवी आपको ले के  किसी दूसरे लडकी से क्यों जलती ?? इसी चक्कर में रोज नए नए पकवान कैसे खाते ??? और बीवी यदि पडोसी की  कार देख न जले तो आपको नयी कार की  प्रेरणा कहाँ से मिलती ??? विस्वाश मानिए जिंदगी भर लूना से चलेंगे.

पाकिस्तान यदि भारत से न जले तो आतंकी आक्रमण कैसे हो ? राजनीति कैसे होती ? कसाब   भारत के "अथिति देवो भव " कि संकल्पना का ज्ञान कैसे पाते ????
खूब है भाई आप लोग, खामख्वाह जलन को बदनाम कर रखा है,

जलन से ही प्रशांत भूषण  पिट गए और भारत बदलने को  भगत क्रान्ति सेना का भी निर्माण हुआ, अब कहिये ये क्या कम है ??

जलन न होता तो विश्वास मानीये हम कही के न होते,

जलन ढेर सारी वांछित वस्तुए भी दिला सकता है जैसे राजनीति करना हो किसी नेता से जल भून के जूते फेंक दें  फिर देखिए चौबीस घंटे आने वाले चैनल आपके  इस फ़ालतू काम को भी कैसे चमकाती है, बाबा को गाली दो देखो तुरन्त कोंग्रेस से प्रस्ताव आ जायेगा, निरपेक्षता के नाम पे हिन्दुओ को गाली दो , और त्वरित अपने प्रेस वाले  एक शानदार भूमिका के साथ कैसे आपको महिमा मंडित करते हैं, लेकिन अब सवाल ये है कि आप जूते क्यों मारो ????तो उसका प्रथम चरण है किसी के लिए अपने मन में जलन कि भावना लाओ तब जा के दिमाग और दिल हाथ का साथ देगा और कर दो लत्तम जुत्तम . जलन वह उत्प्रेरक है जो किसी भी इंसान को प्रेरित करता किसी खास और प्रसिध्ध कार्य के लिए. 

मेरी बात मानीये, जरा जल के तो देखिये , किसी के प्यार में ही सही, तो उसका मजा भी अलग है, छः छः महीने तक चक्कर काटना पड़ सकता है माशुका के लिए, इससे  धैर्य भावना का विकास होता है, पीछे पीछे भागने से स्वास्थ्य सही रहता है और मान लीजिए फिर आप से जल के माशुका कि भाई आपकी पिटाई कर दे तो इससे आप युध्द कौशल भी सीख जाते है जो आजकल अत्यंत दुर्लभ है, और कही दो बार से जादा पिट गए तो आप अपना पूर्णतः बचाव करने में सक्षम हो जाते हैं अपने भारतीय सेना कि तरह, जो कभी  अपने साले रूपी दुश्मनों  आक्रमण नहीं करती करती.

आप ही बताईये जलन का साथ छोड़ दे तो क्या प्यार करे ?? प्यार में बड़े बड़े खतरे हैं, प्यार करने वाला लड़का पिट जाता है, देश से प्यार करने वाले बाबा पिट जाते हैं, पडोसी से प्यार करने वाला पति पिट जाता है, भ्रस्टाचार से प्यार करने वाले कोंग्रेसी शरद पिट जातेआप ही बताईये जलन का साथ छोड़ दे तो क्या प्यार करे ?? 
तो आईये हम सब एक दूसरे कि जलन भावना का ख्याल रखते हुए इस परम्परा को और मजबूत किया जाए, हमारे देश के हित में, समाज के हित में .

कमल १६ दिसम्बर 

Tuesday, December 13, 2011

जोखुआ

"जोखुआ" हाँ यही कहते थे हम लोग उसको.

शरीर से हट्टा-कट्टा, जिस पर मै कभी कभी जल भून भी जाता था जब मेरे  रुआबी पीता श्री मुझे ताना देते, " देख ओकर, मजदूर बाप के नून रोटी खा के पहलवान भयल बा , एक तय हैं कि पेड़ से घी चुवावले तबो मुष्टि.

सच बात तो थी, वो दस  साल में भी चौदह से कम का कहीं से न लगता था, और उसी के हम उम्र हम भी  मानो संतूर लगा लिए हों, न उम्र बढती थी न शरीर, संग में चलता तो दुश्मन टोली दूर से भागती थी.
वो साथ रहता तो  दो - दो पैकेट पार्ले जी पे लगा क्रिकेट का मैच हम लोग आसानी  से बेईमानी कर के जीत लेते थे और दुश्मन टोली हाथ मलते रह जाती .

हर परेशानी में साथ होता, दिमाग तो ऐसा गजब चलाता कि आज अन्ना भी गच्चा खा जाते उससे.

हमें पिता जी बाग का अनार तोडने न दिया करते ,बोलते जब पक जाए तब तोडा जाएगा, और निशान के लिए हर आनार पे प्लास्टिक बाँधा करते और रोज गिना करते थे.

 लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे सो उसको नेवता दिया, उसने कुछ जुगाड फिट किया, अब हम रोज छक  के अनार उड़ाते और पिता जी को पता भी न चलता था. आज जब पिता जी को लगा कि अब अनार उतारना चाहिए तो गए बाग झोला झक्कड ले के.

अकसर वो स्कुल से हमारे साथ घर ही चला आता था और रोटी पानी निपटा के अपने घर जाता था आज भी मै जब स्कुल से जब घर आया तो जोखुआ भी साथ ही था, अचानक मेरी नजर पिता जी पे पड़ी तो साँस गुलाटी खाने लगा, गुस्सा तो उनका ऐसा था जैसे आज अन्ना को  लोकपाल के  न मिलने पे कोंग्रेस पे आता है.
पिता जी ने झोला ला के पटक दिया सामने , निकला मिट्टी का ढेला, मुझे तो कुछ समझ न आया पर जोखुआ खी खी कर के हँसने लगा, दोनों कि जम के पिटाई हो गयी, जितना अनार खाया था सब चमड़ी पे झलक रहा था.
हुआ ये था कि वो प्लास्टिक उतार के अनार तोड़ लेता और उसकी जगह मिट्टी का ढेला बाँध देता.

 पेड़ पे चढ चर्चा करना उसका पसंदीदा  कार्य था,  जिसकि भागीदार टोली भी होती थी, सबके अपने अपने चिन्हित डाल थे, जैसे  सारे मंत्री अपनी विचारधारा इसी समय रख सकते मानो डालो के हिलने से नए विचारों का प्रवाह आ जाता हो .
दुश्मन टोली को कैसे मजा चखाना है, या साधू बाबा को कैसे चिढाना है, या फिर दूसरे के खेत का गन्ना अपने मेंड पे ला के कैसे चूसा जाए, सारी योजनाये इसी समय तय होती.

दो महीने बाद महीने छात्र वृत्ति  प्रतियोगिता थी सो सबकी तयारी शुरू थी, मै भी लगा था जी जान से, लेकिन जोखुआ उदास था कई महीनो से स्कूल  कहाँ गया था वो ? रोज स्कूल के समय से घर से रोज निकलता लेकिन कही जा के खेलता कूदता, स्कुल खत्म होने के समय हम लोगो के साथ हो वापिस हो लेता, सब समझते जम के पढाई कर रहा.
अब कलई खुली हजरत कि, मै मन ही मन खुश था, उसके खुरापाती  दिमाग कि वजह से मेरे मन भी जलन पैदा होती थी कभी-कभी , मै भूल गया कि न जाने कितनो  के बाग मैंने उसके सहयोग से उजाडा था, अब मौका मिला था मुझे सो कैसे छोड़ देता... ??

मैंने सुझाव दिया,कहा "सुन पंडित जी कहते हैं रोज सुबह वाला पानी यदि बबूल के जड़  में चालीस दिन तक डाला जाये तो जिन्न प्रकट होता है जो  मन चाही मुराद पूरी करता  है, लेकिन शर्त ये कि उस समय कोई तुझे देखे न, नहीं तो सब भंग हो जायेगा".
अब क्या था, जोखुआ बाग् बाग हो गया, वो रोज सुबह यज्ञ में लग गया, मै मन ही मन अपनी कुटिल चाल के कामयाबी पे प्रसन्न भी था. वो रोज सुबह चार बजे भोर में उठता , खेत से वापस आते ही मुंशी जी वाले बाड़े में लगे बबूल के पेड़ को पानी दे के इक्कीस बार चक्कर लगाता और खुश होता कि आज भी उसे किसी ने नहीं देखा.

चालीसवें दिन मै घात लगा के बैठा था, जैसे ही पानी डाल के चक्कर लगाना शुरू किया मै सामने आ गया, "भूत भूत " करके भागने लगा तो मैंने पकड़ लिया, वो हैरान "ब्रूटस इट्स यू " के तर्ज पे हैरान हो के कहा, " तुम" ?? और जोर जोर से रोने लगा ......

आज बरसो बाद जब उसके घर गया तो बारी मेरी थी, मै जोर जोर से रो रहा था और वो शांत, निश्छल, निर्भाव, जमीन पे पड़ा था,  किसी बुजुर्ग कि आवाज आई, "मिट्टी जल्दी ले चलो नहीं खराब हो जायेगा" ......

*मिट्टी = लाश

कमल , १३ दिसंबर २०१२ 

Friday, December 2, 2011

अन्ना एंड बाबा का गुल्ली डंडा

खेल भावना एक एसी भावना है, जिसमे एक होने कि पूरी "संभावना" होती है,  भारत पाकिस्तान को ही देख लीजिए, जब तक आपस में न खेले, एक होने कि नौबत ही नहीं आती है, चाहे क्रिकेट का खेल हो या बोर्डर का.

बोर्डर की खेल भावना जादा प्रबल है, दोनों समान भावना के साथ एक दूसरे पे  ठायं - ठायं और दोनों तरफ के सैनिक पृथ्वी छोड़ स्वर्ग में एक हो जाते है. क्रिकेट में तो फिर भी दान- दक्षिणा का प्रभाव है.

दान -दक्षिणा प्रभाव की  तो जितनी भी प्रशंशा कि जाए कम है. राजा बलि "दान" के चक्कर में अपना सर्वस्व चौपट कर पाताल जाना पड़ा, वहीँ वामन अवतार दान पाते है विराट हो गया, यानी दान किसी भी क्षुद्र व्यक्ति को कहाँ से वहाँ पंहुचा देता है, जहाँ  वह अमुक सोचता है.

भारत में तो इसका प्रचलन जोरो पे है, कोई जनता से दान लेता है, तो कोई बिदेशी जनता से,यहाँ तक है कि वेबसाइट बना के रुपया द्वार तक बना देते हैं, ताकि दान लेने में कोई दिक्कत न हो, ठूंस दो जितना ठूंस सकते हो. करते धरते कुछ नहीं सिवाए अनशन के और भारत भ्रमण कर कर के भ्रम फैलाते हैं, और रुपया दबा जातें हैं.
वहीँ  कुछ ऐसे  भी हैं जो पूरा दान  अपने गुण से लेते हैं बदले में कुछ देश को भी देतें हैं , प्रत्यक्ष रूप में लगा के देश सेवा करते हैं और  संपत्ति का   पूरा ब्यौरा देते है , कई लाख किलोमीटर यात्रा भी करते हैं, जन चेतना जगाते हैं .

जी हाँ, ये हैं अन्नासुर और बाबा रामदेव . दोनों के स्वभाव भी एक दूसरे से मिलते भी हैं. दोनों हमेशा माया से दूर रहे. बिचारे मन मसोस के इन्द्रियों को वश में रखा, दान के चक्कर में दोनों ने अपने आप को देश हित में दान कर दिया, और दोनों ने देश- विदेश से जम के दान लिया.

दोनों चट्टे बट्टे लेकिन कहते, लेकिन प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं. खैर बाबा रामदेव तो भगवा पहनते हैं .
(भगवा का मतलब संघ न समझ लीजियेगा, मै खलिश रंग कि बात कर रहा हूँ ) सो थोडा बहुत धुल धक्कड़ भागम भाग में लग भी जाए तो कोई बात नहीं.
लेकिन अन्नासुर की धोती एक दम चकाचक सफ़ेद.  शायद रोज शाम को मीडिया से साफ़ करवाते होंगे और पत्रकारों, लेखकों से इस्त्री. 

दोनों के अपने अपने समर्थक है,  कोई बाबा कि दवा खाता है तो कोई अन्ना की  कसम.
बाबा अपना समर्थन अन्ना को देने का भरकस प्रयास कर रहें हैं, लेकिन अन्ना खुद ही मजबूत आदमी हैं, क्यों ले भला????  "भगवान देता है मगर दुबे नहीं लेता"  इसको कहते हैं खुद्दारी, जो सिर्फ दान लेते समय नहीं होती, वैसे भी दान और खुद्दारी दो अलग अलग चीजें हैं.

एक सरकार है जो  न तो बाबा को काला धन देती है, न अन्ना को जनलोक्पाल. एकदम निरपेक्ष, दृण, मजबूत इरादों वाली सरकार. बुलंद हौसलों वाली सरकार.
वास्तव में असली योगी तो अपनी सरकार है, जिसको किसी माया मोह से कोई मतलब नहीं, इनके लिए क्या बाबा और क्या अन्ना, जनता तो बड़े दूर कि कौड़ी है. योगी को माया मोह हो भी क्यों भला ??, उसका तो बस एक ही लक्ष्य होना चाहिए. इस योगी का भी एक ही लक्ष्य है,

"माया -मोह छोड़, करे कोई कितना हूट,
लोक परलोक बन जयिहें, जब जम के करेगा लूट"

कोई कितना भी शोर मचाये-छाती पीटे ,विघ्न डाले क्या मजाल जो हमारी योगी सरकार अपने विचारों और लक्ष्य से भटके. योगी तो बस आश्वासन का आशीर्वाद दे सकता है. अपनी सरकार ने भी दिया "शीत सत्र में जनलोकपाल  का".  लेकिन अब आशीर्वाद फलित तो तब होगा जब योगी जोर लगायेगा. अरे, फिर वही बात,  योगी इस पचड़े में क्यों पड़े भाई, सो पलायन कर जाओ, सत्र ही न चलाओ. एफ डी आई का झुनझुना पकड़ा दो.
कोई भी सच्चा योगी अपना धर्म भ्रष्ट  क्यों करे भला ???   सो माया मोह को आपस में लड़ा दो, एक साथ रहे तो कौन जाने योगी धर्म भ्रष्ट हो जाए ??

सो साध्वी उमा को बाबा के मोह  का और योगी अग्निवेश को अन्ना के माया का ठेका दिया गया. दोनों ने बखूबी काम भी किया, पुरस्कार भी मिला, एक प्रदेश प्रभारी बन गयी दूसरा बिग बोस् का योगा टीचर.

अन्ना के माया  टीम में अभी भी भेदिया होना था, नहीं तो बाबा के मोह को कौन कोसता ?? और यदि न कोसता तो बाबा समर्थक  अन्ना समर्थक कि बखिया कैसे उखाडते ???  और नहीं उखाड़ते तो माया मोह कैसे नष्ट हो ??? सो एक भद्र पुरुष है डा कुमार विश्वास, जो किसी ज़माने  अपने रोमांसी कविता  और चुटकुलों के बीच बाबा के कसीदे पढ़ा करते थे,  सो पहला हमला माया टीम से मोह टीम कि ओर "गोली- वोली बेचते थे, क्या जरुरत थी इन सब कि, अन्ना ठहरे फकीर आदमी सो उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा, बाबा कि तो कितनी बड़ी दूकान है, उसी को सम्हालते"   लो भाई हो गया काम.  "लोटा बिन पेंदी का हो गया, जो कभी उधर लुढकता था आज इधर लुढक गया" .  वैसे बाबा ने किया भी था गलत, अपने "जागरण कवि सम्मलेन" में क्यों न बुलाया था, विश्वास  पे विश्वास न था??

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तभी  कोई बाबा समर्थक जो अन्ना के साथ भी  था, छटक गया,  मेल भेज दी " भाई किस बात का फकीर अन्ना ?? जिसने पता नहीं चूसा कितना गन्ना. करोरो के दान का मालिक हो के उसकी मर्जी कि मंदिर में रहे या मस्जिद में, भाई मंदिर में रहता होगा तो वहां व्यवस्था भी चका चक होगी,  नहीं इतना सफेदी आज के महगायीं में मेंटेन करना मुश्किल है, गाँव में हैं सो रोज के अलाटेड  छब्बीस रूपये तो सिर्फ धोती के मांड और इस्त्री में निकल जाते होंगे. फकीर तो सड़क में ही मर जाता है, न की  फाईव स्टार मेदान्ता हस्पताल में जाता है.  एसी बाते मत बोलो भाई नहीं तो  योगी -निर्मोही सरकार और तुम्हरे माया में क्या अंतर?  अन्ना मीडिया में कहते हैं कि उनके महीना का खर्च ४०० रुपया है, भाई क्या हवा पी  के जीते हैं, उनके आयोजन में जो लाखो खर्च होते हैं वो ?? खैर वो तो जनता का है.

अन्ना कहता है कि यदिलोक पाल पास हो गया तो कोंग्रेस का सपोर्ट करेगा, यानी कोंग्रेस का एजेंट है क्या ?? कभी ये हुआ कि चोर जब माल देदे तो पोलिस उसपे कोई करवाई न करे ??? गजब  कूटनीति है भाई अन्ना और उसके बन्दर टीम की  ....संघ और भाजपा  तो बाबा -अन्ना  दोनों को चिल्ला चिल्ला को समर्थन दे रही है , तो अकेले बाबा संघ पोषित  कैसे , जबकि भाजपा का गुणगान तो अन्ना ने ही किया था ( नितीश / मोदी ) .... बाबा करे तो राजनितिक , वही अन्ना करें तो सेकुलर ???अन्ना टीम की अफवाहें ये दोगली कूटनीति पे आधारित क्यों ????यदि बाबा के संग उमा भारती बैठी ती तो अन्ना भी तो अग्निवेश से इलू इलू कर रहे थे .. "
बाबा ने तो लाठी खायी, सहा , और तुम्हारे टीम ने मार पिटाई कर ली नागपुर में , तो जो तुम्हारी बात नहीं मानेगा उसकी नाक कान काट लोगे ???



फिर क्या था, दोनों में गुल्ली डंडा का खेल शुरू है, कभी माया, मोह को पदाति है कभी मोह, माया को , और योगी सरकार चुपचाप जनता के साथ वालमार्ट का मन्त्र पढ़ रही है ..

कमल  २ दिसम्बर २०११ 

Thursday, December 1, 2011

कुछ लिखना चाहता हूँ


आज कई दिन हो गए थे कुछ लिखे हुए,आज कुछ लिखना चाहता था मै ,
दिल टूटा  , देश टूटा  , व्यवस्था टूटी  ,  फिर भी लिखना चाहता था मै ,
थक के चूर हो के जब घर आया , तो माँ ने कुछ लाने  को बोल दिया ,

सो लेने चला गया,  नहीं लिख पाया, सोचा वापस आ के लिख लूँगा,
आग तो आग है, कभी भी जला  लूँगा,

फिर वापस आया, सोचा अब लिख लूँ,
तभी ऑफिस का फोन आया, जिसने कुल डेढ़ घंटे चबाया,
सो फिर लिख नहीं पाया,
फोन खत्म होते ही समझ में आया, अब मै फ्री हूँ ,
कलम से किसी  की भी  इज्जत  उतारने  को फ्री हूँ ,

सोचा  लिख मारो ऐसा, कि तहलका हो जाये,
दुनिया मुझे तक़दीर बादशाह समझने लगे ,

जैसे ही  ये बात मेरे दिल में आई  ,

तत्काल मेरी आत्मा मेरे सामने आई ,
उसने मुझसे  गुहार लगाई ,

रे मुरख क्या लिखेगा ??
किसकी धज्जी है उडानी ??
प्रेमिका के बारे में , उसको तू कभी रास न आया ,
या  बारे में माँ के, जिससे सादा प्यार ही प्यार है पाया,

एक काम कर, राजनीति  पे लिख दे ,
हिट भी होंगे तेरे खाते में ,
कुछ प्रोजेक्ट बताता हूँ , लिख मारेगा तो सब गुलाम हो जायेंगे 
आजकल मशहूर प्रोजेक्ट है बाबा , और अन्ना  हैं मार्केट में ,


अब ये तू सोच , किसको है साथ में लाना ??
इन दोनों को हैं लड़ाना,
या इनको जोड़ , इस कुव्यवस्था  में आग लगाना , ??

मैंने कहा ,
मै बेचारा , दिल का मारा ,
मै जिसको एक बार , मिला वो मिला न दुबारा ,
बेहतर कि मै कुछ कर लूँ ,
उससे भी बेहतर है कि कुछ लिख लूँ ,
जैसे ही लिखने चला ,
नजर पड़ी , पासबुक पर ,
जो हो चुका था निरीह , लाचार ,
मेरी तरह वो भी रो रहा था बेजार ,

तो सोचा , कल का काम तैयार कर लूँ ,
बेहतर है आज नहीं , कल या कभी और लिख लूँ ,

सो आज भी लिख नहीं पाया ,
फूटपात पे हूँ , सो अपना बिस्तर  तक न गरमा पाया .
.हमेशा कि तरह , आज भी न सो पाया !!

(कमल) १ दिसंबर २०११

Tuesday, November 22, 2011

मौनी बाबा


"बाबा" बड़ा विचित्र शब्द है ये, सुनते तमाम किस्म के चहरे मष्तिस्क पटल पे आतें है. बाबाओं के कई प्रकार हमारे सभ्य समाज ने निर्धारित कियें हैं कुछ उदहारण इस प्रकार से हैं :-राहुल बाबा, रामदेव बाबा, नित्यानंद बाबा, और हम लोग अपने दादा जी को भी बाबा ही कहते थे, आजकल जिसकी मानसिकता जैसी होती है वो उस वाले  बाबा को मार्केट से चुन लेता है  .

हमारे खुनी रिश्ते ( ब्लड रिलेशन ) वाले बाबा का चेहरा आज के अन्ना जी से काफी मिलता था, आज हम अन्ना को देख के वशीभूत हो जाते है, लेकिन  अन्ना से विचारधारा इनकी अलग थी, शायद चलने फिरने में तकलीफ के कारण उन्होंने हिंसा का रास्ता अपना लिया था, दिन में दस बार लाठी फेंक के मारते थे यदि एक मिनट भी देर हो जाए तो, वो बात अलग है हमेशा हुक हो जाती थी. फिर वही लाठी उनको दूर से दे के भागना पडता था.

उनको रोज शाम मंदिर ले जाने कि जिम्मेदारी मेरी होती थी, वो बात अलग है कि सुबह सुबह मै अपने आप जाता था, मंदिर  कि सारी मिठाइयां चट  करने. मुझे लगता था इससे भगवान शंकर खूब खुश होते होंगे, आखिर उनके प्रसाद का पहला पात्र मै और मेरी टोली जो होती थी. शाम को पंडित आग लगाता था. "आपका पोता शिवलिंग रोज जूठा कर जाता है "

एक शाम जब हम और दादा जब मंदिर पहुंचे तो देखा पुजारी जी के बगल में एक और बाबा बैठे हैं, जिनके हाथ में सुन्दर सी चांदी कि चिलम थी, जिससे वो ऊर्जा ग्रहण कर भीड़ को भी उर्जावान बनने का प्रवचन रहे थे. उनकी  लंबी दाड़ी देख मुझे एक बार नोचने का भी मन किया, शकल से तो चोर दिख रहे थे, लेकिन स्वभवतः दादा जी उनके श्रधा के पात्र थे.  उनके साथ साथ  गाँव के मुखिया जी और मुंशी जी भी  बगल में आ के बैठ गए .

मुखिया जी ने कहा  "ये तो हमारे भाग्य कि आप इस गाँव में पधारे"
मै डर गया, कि बाबा के जाते ही मुखिया जी का भाग्य भी चला जायेगा और इस बार पक्का प्रधानी का चुनाव हारेंगे.

अस्तु, बाबा के रहने का इंतजाम मंदिर प्रांगण में ही बने एक कमरे को साफ़ कराया गया और अगले दिन  शाम को कीर्तन मंडल का कार्यक्रम रखा गया, बाबा उसके अगले दिन मौन व्रत पे जाने वाले थे.

जम के तैयारियां कि गयी, गांव समाजी ढोलक, मजीरा, हरमुनिया  मंदिर पर पहले से ही था, लेकिन जो बजाने वाला था वो एक हफ्ते पहले पड़ोस कि लडकी साथ भागा हुआ था, सो तय हुआ कि  पास के गाँव से बजवैया  आएंगे. खाने पीने का इंतजाम मुंशी जी ने सम्हाल लिया. बच गया बाबा जी का गांजा भांग सो उसकी भी कोई चिंता न थी, जोखू चाचा चलते फिरते दूकान थे, उनको निशुल्क दान के लिए भी तैयार कराया गया लेकिन शर्त थी कि "उतारे" के पैसे  से हिस्सा चाहिए.

आसपास के गाँव में मुनादी करा दी गयी कि, एक तेजस्वी बाबा गाँव में पधारे हैं, कल मौन व्रत पे आके उनके दर्शन का लाभ लें, यों लग रहा था जैसे १० साल बाद पुरे गाँव में किसी के घर लड्का पैदा हुआ था.

महिलाए आपस में बात करने लगी   "  ललिता  के माई , चलना है न " ??
दूसरी महिला   "हाँ, काहे नहीं , बाबा से बेबी के ब्याह का योग पूछना है"
पहली वाली  "कल के वास्ते  साडी  न कोई ढंग का , तुम्हरे पास हो तो तनिक इस्तरी करा लेना"
दूसरी वाली  "पिछली बार तुमने  बीडी फूंक के झौंस दिया, अबकी  ऐसा किया तो दंड लुंगी"

सबका तय हो गया, कौन सा चप्पल, कौन सा जूता, कौन धोती, कौन सा कुर्ता  कल के शुभ अवसर पे जंचेगा .सब दोपहरी बाद से लग गए तैयारी मे.  इतना तो हम पन्द्रह अगस्त के एक दिन पहले मिलने वाले आधा रेसस में भी न करते, उतने में  गिल्ली डंडा के तीन पदान निपटा देते थे.  सुबह पहुँच जाते थे गन्दा वर्दी पहिन के, अलबत्ता जलेबी मिल जाती थी.

सुबह शुरू हुआ मेला,  मौनी बाबा आसन जमाए हुए थे, उनके हाथ में स्लेट थी, सबकी शंका का समाधान दुधिया से लिख लिख के देते थे, समस्याए थी भी अपरम्पार, किसी को बच्चे कि, किसी को पत्नी कि, तो कोई पूछता, मेरी लडकी कब वापिस आयेगी जो अमुक लडके के साथ भाग गयी. बीच में बाबा कि दुधिया खत्म हो गयी पता चला एक सुन्दर बच्चा उनके बगल में रखा सारा दुधिया चबा गया.   बाबा ने हमको भी झूठा दिलासा दिलाया कि सम्मान पूर्वक पास होगे, उसके बाद तो मैंने पढना लिखना ही छोड़ दिया था, परिणाम आने पे जम के मार पड़ी थी. शाम को कीर्तन कम रंगा - रंग कार्यक्रम का आयोजन भी किया, बाबा मदमस्त थे, जवान लम्पट लडके- लड़कियों ने भी जम के चिठ्ठी -पत्री का आदान प्रदान किया. शाम तक अच्छा चढावा आ गया था, सब अपने घर लौटे, बाबा का मौन लंबा चलना था.

आदतन अगली सुबह पहुँच के हमारी बन्दर  टोली पहले मंदिर में न जाकर बाबा के कमरे कि ओर रुख किया. बाबा अनुपस्थित थे, शायद खेत कि ओर गएँ होंगे.  छक  के फल फुल उड़ाने के बाद पीछे मुड़े तो काटो तो खून नहीं, बाबा पीछे खड़े थे,  चिल्ला के कहा , "शर्म नहीं आती, बाबा का भोजन झूठा करते हो".  बबलू , भद्दू तो  भाग लिए फसां रह गया मै, कहा "आप ने अपना मौन व्रत तोड़ दिया, जाने देते हो कि गाँव में बताऊ कि पोंगा  आदमी हो"  बाबा ने कान पकड़ के बाहर निकाल दिया.

गाँव में जिसको भी बताया कि बाबा बोला, सबने डाट पिलाई, "अभी तो मौन व्रत पे है , भाग बन्दर कहीं का "
मन मसोस के रह गया. सब  हमारा  दूध भात मान के भगा दिए, कोई बात ही नहीं सुनता था.
मैंने अब वहाँ जाना ही छोड़ दिया, जब भी कीर्तन शुरू होता मै गन्दी गन्दी गालियाँ  सुनाना शुरू कर देता.

 चार दिन बाद स्कूल से लौटा तो पड़ोस में रोना पीटना मचा था .

लोग आपस में काना फूसी कर रहे थे .. "आजकल बाबा -बूबी, मौनी -सौनी  का कोई भरोसा नहीं, किसी को शक भी न हुआ कि सरीता कि माई को भगा ले जाएगा, राम बचाएं ऐसे मौनी से " . सब मुखिया और मुंशी जी को कोंस रहे थे, जोखू चाचा अलग सिर धुन रहे थे.

लेकिन अब पछताए का होत जब चिड़िया चुग गयी खेत.

कमल  २२ नोव २०११ 

Thursday, November 17, 2011

आयुर्वेदिक व्हिश्की



माता जी के आदेश से जब बाजार पंहुचा तो देखा चौराहे पर एक आदमी जोर जोर से भाषण दे रहा था जिसको बस दो चार भैंसे और एक आध और जीव  जंतु ही जुगाली कर सुन  रहे थे शायद, बाकी इंसान तो बस मुसकरा कर कल्टी काट रहा था, भाषण था भी एकदम जोशीला , चेतना जागृत करने वाला, केजरीवाल टाइप. 

  मैंने पास खड़े एक भाई साहब से पूछा, "इनको क्या तकलीफ है "

भाई साहब ने मुस्कराते हुए एक दूकान कि तरफ अंगुली दिखा दी,

नूरी, ठर्रा  १५ रुपया ,  बगल में एक खूबसूरत युवती का भी चित्र बना हुआ था उस पुरुष के जिसने नूरी हाथ में ली थी ...

अब समझ में आया इनके जड़ से चेतन होने का राज . मेरे भी एक मित्र हैं, जो चेतन अवस्था में आते ही जोर जोर से अंग्रेजी बोलना शुरू कर देते हैं.

इस पुरे जगत को दो भागो में बाटा गया है, अपने सरकार जैसे जड़ और  और अमेरिका जैसे चेतन, जो सबकी खबर ले कर अपने लीक से लिक करता है, और जड़ में चेतन  डालता है.  कुछ तो अपनी बुद्धि और चेतना के लिए  रासायनिक पदार्थों का भी उपयोग करते हैं, लेकिन इस विधि में चेतन के साथ  माता जी के दावानल भी मिलता  है जिससे वाष्प रूपी चेतन परलोक गमन कर जाते हैं.


एक दिन मेरी मुलाकात एक मित्र से हो गयी से हो गयी दोनों अलग अलग विचारधार के  जैसे कोंग्रेस और भाजपा,  फिर भी सभी मुद्दों पे असहमति होते हुए भी बस एक कड़ी थी जो आपस में जोड़े रखती थी .. जैसे भारत और पाकिस्तान को कश्मीर , दिल प्रसन्न हो जाता जब वो अध्धा पौवा कि बात करते .

उनकि  आयुर्वैदिक  व्हिश्की वाली बात तो जहन में समां गयी थी , कभी सोचता था कि काश ये वाली चीज आ जाए मार्केट में तो  कितना मजा आ जाये लाईफ में,  गर्लफ्रेंड  भी बोले कि "पि लिजिये जी मन मार के दो पेग, नाक बंद कर के ही पि लीजिए "  

मुझे भी विचार जंच गया, क्योकि आये दिन नशा मुक्ति मोर्चा वालों ने नाक में दम कर रखा था जिसकी अध्यक्ष हमारी पड़ोस वाली आंटी  थीं.

मैंने सोचा  बाबा तो न बनायेंगे, हाँ  हम जैसे कुछ उच्च कोटि के वैज्ञानिकों कि मदद ली जा सकती है.


मै दिन रात मेहनत  करने लगा, कि कैसे  मै एक एसी आयुर्वेदिक  व्हिश्की आविष्कार  करूँ जो हर बिमारी में काम आये,खुजली से ले के कैंसर तक, बच्चे कोम्प्लान कि जगह और बूढ़े सिरप कि तरह इस्तमाल करें.

 . इसके बाद  मै दुनिया के आँखों का तारा बन जाऊं, लेखक गण मेरे बारे में रोज लिखे , स्टार न्यूज में कमल  और कमल कि  प्रतिभा ( गलत न समझे = टैलेंट ) को लेकर बहस हो, इंडिया टी वी मुझे दुनिया का दशवाँ अवतार घोषित कर दे, बाबा हमें अपना सचिव घोषित कर दे, और अन्ना के कोर कमेटी में जगह पक्की हो जाए, राजनैतिक पार्टियों में होड मच जाए मुझे अपना उम्मीदवार बनाने का वो भी बिना पैसे दिए. 

एक दिन मेरी मेहनत सफल हो गयी,  दूसरे दिन अखबार में मेरे आविष्कार के साथ साथ  जहाज उर्फ दारु किंग के आत्म हत्या कि भी खबर छपी, बड़ा आघात लगा था उनको मेरे इस अविष्कार से. जहाज तो डूब ही चूका था अब दारु भी . मुझे थोडा सा छोभ तो हुआ, लेकिन अरबो जनता के आशीर्वाद  के बोझ में दब गया ..

मेरी हाहाकारी आयुर्वेदिक व्हिश्की पुरे विश्व में लांच  कि गयी डब्लू एच  ओ  कि मान्यता के साथ, अब तो ऋषि -मुनि लोग भी प्रसन्न हो गए, अब वो भी धड़ल्ले से मेरा आयुर्वेदिक सोमरस पान कर सकते थे वो भी मान्यता के साथ सरे आम, जनता के बीच.

इसका साफ़ असर  समाज के साथ साथ जनता और सरकार पे देखा गया. सरकार नीतियाँ बनाने में लग गयी कि कैसे कमल के व्हिश्की को सब्सिडी दे के सस्ता किया जाए, ताकि इसका गुणकारी लाभ ३२ रूपये के नीचे वाली आम  जनता भी ले सके.
...............
अब तो समाज का दृश्य  ही बदल चूका था, मम्मी  रोज जबरजस्ती करती, कि टाइम टाइम से पेग लिया करो स्वस्थ्य रहोगे तो बच्चे भी स्वस्थ्य ही आएंगे दुनिया में, नहीं तो तमाम सरकारी इंजेक्शन लगवाने पड़ेंगे साल भर छोटे छोटे नवजातो को.

एक दिन बगल से आंटी आ गयी, माता जी  से बोली , " जरा दो पेग देना मेरे यहाँ खत्म हो गया है, और बच्चों का एक्साम चल रहा है, आज ड्राई डे है, कल कोटा आयेगा तो वापिस कर दूंगी".

माता जी  ने दे तो दिया, लेकिन पीठ पीछे बडबडाने लगीं  "हफ्ते में दो दिन मांग के ले जाती है, कभी बच्चो के नाम पे तो कभी अपने पति के नाम पे, अब तक कुल चार  बोतल से भी जादा हो गया यदि जोड़ा जाए तो"

अगली सुबह जब टहलने निकला  तो सामने से सिंह साहब स्कूटर से आते दिखे, मै दोनों को ही श्रध्दा भाव से देखता था, सिंह साहब को उनके उम्र कि वजह से ( मैंने अपने सारे प्रयोग इन्ही पे किये थे ) और उनके स्कूटर को अनुभव कि वजह से, निहायत ही सीधा स्कूटर जिससे वो अपने श्रीमती जी से भी जादा प्यार करते थे, बिचारे में ब्रेक भी न था, पावँ से ही रुक जाता था.

मुझे देखते ही पावँ जमीन पे लगा दिया, कहा   " मिया तुम्हारा आविष्कार तुम पे खूब जंच रहा है, दिन ब दिन मोटे होते जा रहे हो, जरा सावधान रहो , आजकल तुम्हारे खिलाफ प्रपंच चलाये जा रहे हैं.

मै सहम के बोला  " मेरी इस अभूतपूर्व देंन में क्या कमी रह गयी. ???

सिंह साहब " भाई जब से तुमने अपना नुख्शा दुनिया को दिया है, लोग घर में चेतना जाग्रत करने लगे हैं, सारे बार , पब पर ताला लग गया है, सो ये तो होना ही था..

उनकी ये बाते किसी एक पत्रकार ने सुन ली और पेपर  में छाप दिया,

लोगो कि प्रतिक्रियाएं आने लगी, दिग्गु ने कहा " इसमें आर एस एस का हाथ है "
भाजपा ने कहा " सरकार बार व्यापारियों से प्रभावित है, बाबा को नहीं छोड़ा तो कमल क्या चीज है ? "
रजत जी ने मुझे अपनी अदालत में बुला कर बाईज्जत बरी कर दिया,  हमेशा  कि तरह जैसे बाकियों को किया करते थे .
मंदमोहन ने कहा मुझे इस बारे में कुछ मालुम नहीं.
अमूल बेबी ने कहा "जरुरत नहीं है कमल के भीख कि "
तमाम एन जी ओ जो कि मेरे समर्थन में आ गए थे, विदेश से फंड भी मंगवा लिया मेरे सुरक्षा के नाम पे .
सवर्णों ने कहा "अच्छा हुआ , बड़ा आरक्षण कि तरफदारी करता था "
दलितो ने कहा " अच्छा हुआ, सवर्णों के साथ ऐसा ही होना चाहिए, हम लोगो को अपने आविष्कार में आरक्षण तक न दिया  "

और मै उन व्यापारियों के साथ अपना गम गलत कर रहा था अपना पेय भूल के ...

 तभी एक  ध्वनि कान में आई "बेटा आज बाजार न जाओगे क्या "

मेरी तन्द्रा टूटी , झोला उठाया उसी चौराहे पे जाना था, जहाँ कल चेतना जागरण शुरू हुआ था ..

कमल   १७ नोव २०११ 

Saturday, November 12, 2011

आरक्षण और जातिवाद



आरक्षण, एक जवलंत मुद्दा है, बहुत दिन से सोच रहा था इस मुद्दे पे कुछ विचार रखने का लेकिन हिम्मत न पडती थी, लेकिन भला हो मंडल जी का जिन्होंने बताया कि आजकल तो लोग १० रूपये का पत्रकार भी बन जाते हैं, शायद उन्होंने खुद १० रूपये में साईबर कैफे से पत्रकारिता कि होगी.

खैर उनके हौसलाफजाई से मेरी हिम्मत बढ़ी सो आज मै भी बैठ गया मुह में पान दबा के, बमुश्किल दो लाइन पूरी हुई होगी तभी मेरे दो मित्र आ गए जिनको देख के मै अपने दुश्मन तक को भूल जाता है था, उधार तो कभी लौटते ही न थे दोनों रंगा-बिल्ला.

रंगा धुर  पंडित और कालेज में प्रोफ़ेसर थे जबकि  बिल्ला प्रशाशनिक अधिकारी जिनको रंगा दिन रात कोसा करते थे "कोटे में आया है ". दोनों में "कोटे" को ले के तू तू - में में जिस दिन न हो उसके अगले दिन रंगा पढ़ा न पाता था, और बिल्ला अपने मातहतों को विदेशी घी में लपटी हुई गालियों के गोले देता था.

बैठका में घुसते दोनों धम्म से सोफे पे धंस गए,  श्रीमती को दूसरे के लिए चाय बनाने में ह्रदयाघात लगता था सो भुनभुनाते ह्रदयाघात हेतू  किचन में चल दीं.

तपाक से मैंने कहा : "महीने का पहला सप्ताह है भाई, कुछ बोहनी करा रहे हो क्या ?

सुनते ही दोनों एक दूसरे का मुह देखा, ठहाका लगा के कहा  "जिसका लेना कभी न देना मर जाना पछताना क्या ? "

कहो कैसे याद  किया ?? मैंने कहा .

"भाई कल  आरक्षण विरोधी आन्दोलन में जाना है, नेवता देने आया था "  रंगा ने कहा .

तुम कैसे आये भाई ??? बिल्ला कि ओर देख के कहा .

"यार आरक्षण विरोधी मोर्चा के विरोध में एक भाषण लिख के दे दो, इन्ही के सामने वाला मैदान बुक किया है. " बिल्ला ने कहा .

अमा यार हमको भगवान कृष्ण समझ रखा है ?? धर्म संकट में क्यों डालते हो ???

तभी श्रीमती जी अपना ह्रदयाघात तीन कप में सजा के ले के आयीं साथ में भुनभुनाहट का प्लेट  नमकीन भी .

"भाई देखो आरक्षण बड़ा ज्वलंत मामला है, चाय पी के न तो सहमति हो सकती है न मै विपक्ष में कुछ लिख सकता हूँ. एक काम करो कनाटप्लेस का एक बड़ा सुन्दर व्यवस्थित जगह है जहाँ हम तीनो कि व्यक्तिगतता  भी हो जायेगी और  स्वर्गादित इन्द्र पेय के बाद  विचार भी उमडेंगे. "  मैंने कहा, वैसे  भी इतने सुन्दर मौके को छोड़ने का मतलब ठीक वही था जैसे सोनिया जी कि कुर्बानी से मनमोहन का प्रधानमंत्री बनना .  

मन मसोस के दोनों ने स्वीकार किया और चले टारगेट पे. रास्ते दोनों ने  तीन बार बताया कि कार जादा पेट्रोल खाती है, बीच बीच में इसके लिए सरकार को मातृत्व का  साधुवाद और बहन का स्नेह उड़ेल रहे थे.

कोने का टेबल देख चिपक गए और बिना देर किये आत्म तृप्ति के लिए एक पूर्ण का आह्वाहन कर दिया.

"अब तो चलोगे न"  ? रंगा  ने कहा ,
"भाई लगे हाथ लिख भी दो , जादा टाइम नहीं है , और तुम्हारा कोई भरोसा भी नहीं होता जब तुम मग्नता में होते हो"  बिल्ला ने कहा.

यार रंगा  पिछले महीने वाला हिसाब भी साफ़ कर देते तो कल  पुरे मन से चलता जम के भाषण देता, और बिल्ला लिखने में तभी मजा आता है जब मन साफ़ हो, तुम भी रंगा का अनुशरण करो.

हिसाब  और एक चौथाई खत्म कर के रंगा से पूछा " भाई ये आरक्षण का विरोध क्यों ? "

रंगा   " यार अजीब हो , तुम्हारे पास आँखे हैं या अंडे ?, दिखता नहीं स्वर्ण मेधावी बच्चे कितने कुचक्र में फस रहें हैं, आजादी के साठ सालों बाद भी आरक्षण ? इतने सालो में इनका विकास न हुआ तो अब क्या होगा ? भीम राव जी ने आजादी के बस कुछ आगामी सालो तक आरक्षण का प्रावधान किया था, जो अब तक  चल रहा है, तुर्रा ये कि आरक्षण पाने  के बाद भी सवर्णों को गाली देते हैं, अलबत्ता इनकी शादी अधिकांशतः ब्राह्मण ही करता है, नर्क मचा रखा है दलितों ने.

मायावती ने दलितो के नाम पे अपनी मूर्ति खड़ी करा ली , अब तुम्ही बताओ किसी सवर्ण मुख्यमंत्री ने ऐसा किया ? कुछ दिन बाद उसी मूर्ति के आस पास जोड़े चोंच लड़ाए जायेंगे, दलित उत्थान  के नाम पे सवर्णों को लुटा खसूटा जा रहा है. ये सारे पुल आरक्षण वाले ही गिराते हैं.

कल को ये कहेंगे इन्हें हमारे तनख्वाह में से भी चाहिए. वो मंडल कहता है कि दलित एक भी अन्ना टीम में नहीं, मै कहता हूँ भाई तुम खुद तो  कोई शुरुवात कर नहीं सकते अलबत्ता मुह उठा के हिस्सा  माँगने चल देते हो.

 दलित भी कुछ अच्छा शुरुवात करे जो कि कभी करते नहीं,  और सवर्ण हिस्सा मांगे तो देखिये इनकी मोटी मोटी गालियाँ, जो की ये वैसे  भी देते हैं. दर्जनों बच्चे पैदा कर देश कि संख्या बढ़ाते हैं और फिर चिल्लाते हैं आरक्षण दो, तुर्रा ये कि बोल दो कि "कोटे से आया है"  तो भड़क जाते हैं जो है सो है , भडकना क्यों ? आरक्षण भी चाहिए और दलित भी नहीं कहलवाना चाहते,  गुड़ खायं और गुलगुले से परहेज  .

मै तो कहता हूँ कि जो योग्य हो वो आगे जाए, आरक्षण क्यों ? "   एक साँस में प्याला खत्म करते हुए एक साँस में बात भी ख़म कर दी रंगा ने.

बिल्ला कि भी आँखे लाल हो चली, कुछ असर प्याले का था कुछ रंगा कि बातों ने रंग चढ़ा दिया, रंगा को रंग दिखा के कहा   " हाँ हाँ क्यों नहीं सारे पुल हम गिराते हैं, अपना न देखते, दलितों को आगे बढते देख तुम्हारे आँख कान लाल हो जाते हैं, सोचते हो कि अब दरी कौन बिछायेगा ??? झाड़ू कौन लगायेगा, हमारी तरक्की देखि नहीं जाती तुमसे इसीलिए आरक्षण का विरोध करते हो . तुम लोगो कि वजह से पिछड़े हैं तो गाली किसे दें ????

हमने कहा  " यार  हम तीनो संग में पढ़े , बढे हुए , तब तक तो  एसी कोई बात विचार में न थी, किसी ने बिल्ला को दलित या पिछड़ा न माना, आज का ही वाक्य देख लो, श्रीमती ने तीनो को बराबर से ह्रदयाघात दिया . अब क्या हुआ कि अपने अपने काम छोड़ उटपटांग कामो में लग गए हो ? , भाई रंगा यदि जनसँख्या बढ़ाने वाली बात है तो तुम्हारे पिता जी कम थे , जो तुम्हे ७ और भाई घेलुवा में दे गए ? उनसे देश का विकास होता है , ???
सुनो आरक्षण जरुरी है , लेकिन जात के आधार पे नहीं बल्कि पिछडेपन के आधार पे.

भाई बिल्ला आरक्षण तुम्हे मिला तुम अधिकारी बन गए , अब तुम पिछड़े कहाँ ? रामविलास पासवान जैसे नेता जो हर सरकार में मंत्री हो वो पिछड़े कैसे ? लालू यादव को आरक्षण क्यों ? हर वो इंसान जो वास्तव में पिछड़ा था आज डाक्टर, अभियंता बन बराबरी में आ गया वो दलित कैसे ????
बाबा रामदेव यादव होके कहाँ से कहाँ पहुच गए, अच्छे अच्छे  मनुवादी  उनके मंजन से दांत चमकाता है.
 भाई आरक्षण का का नियम बना देना चाहिए कि जिसकी परिवार कि मासिक आय फला से ऊपर हो वो दलितों में नहीं आयेगा,
नेतावों और दस रूपये वाले पत्रकारों के चक्कर में पड़ोगे तो यही होगा, वो भला क्यों सही रास्ता दिखायेंगे, उन्हें अपनी दूकान बंद करानी है क्या ? जब एक बार विकास कर लिए तो आप  अपने बाकी भाईओं को भी मौका दो.
जब आरक्षण वाली पीढ़ी भी पढ़ लिख के समझदार हो चुकी है तो इन नेतावों के चक्कर में पढ़ कर के सवर्णों को गाली देना मूर्खता है नहीं तो सिर्फ और सिर्फ दुराव होगा और ये सवर्ण इसी  तरह से विरोध करेंगे, मलाई खायेंगे नेता .
तुम दोनों यही बाते कहना एक ही मैदान कहना . दूसरा मैदान  कैंसिल कर दो जो पैसा बचे तो कल फिर यहीं आ जायेंगे.  देखो मजा फिर यदि एक बार सबके समझ में तुम्हारी बातें आ गयी तो, दुराव फैलाने से बेहतर है मेरा उपाय लगाओ, और हीरो बन जाओ, खाना पीना संग में करते हो तो मुद्दा अलग कैसे. अब बताओ अब मै चलू या लिखूं ?

बहुत सही गुरु घंटाल बातें सही बता के कल का भी इंतजाम कर लिया, सभा समाप्त हुई और सब वापिस वाहन में,  रास्ते में  तीनो सरकार को मातृत्व का साधुवाद दे रहे थे,  आरक्षण निति पे .

कमलं  १३ नोव २०११ 

Saturday, October 22, 2011

जन्नत कि हूर




दीपावली आते ही पतियों कि जी के सांसत हो जाती है, हफ़्तों पहले अनावशयक चीजों कि लंबी सूचियाँ तैयार कर दी जाती है, और रोज शाम घर जाते डर लगता है कि कही कार्ड न मांग लिया जाए. 

खैर आज दोपहर कार्यालय में फोन आया "आज जल्दी घर आ जाना, सामान लाना है, सीधे जाना, इधर उधर मत देखना, तुम मर्दों कि नजर ठीक नहीं होती. तुमलोगों को घर कि जोरू मैली कुचैली और बाहर कि हूर लगती हैं."
तुम चुप भी करो, जब देखो  दिग्गी कि तरह ओसामा जी टाइप कि बाते कहती रहती हो , अरे हर मर्द गद्दाफी नहीं होता. झल्लाहट में फोन रख के बाहर निकला ही था तब से मेरे मित्र लातिफुर्ररहमान (जिनको हम प्यार से लफ्फु कहते थे )  मिल गए, बोले "चलो गुरु पान खाते हैं पन्नू चौरसिया के यहाँ से, कसम खुदा खा के जन्नत कि सैर करोगे"

मियाँ  दिमाग न खराब  किया करो  अब जन्नत के नाम पे पान  भी खिलाने लगे ???

लफ्फु : क्या बात करते हो मियाँ ??? इतना गरम क्यों ??सब ठीक तो है न ???

मैंने कहा :  यार  अखबार नहीं पढ़ते , तस्लीमा  ने कहा है कि हर मुस्लिम औरत को ७२ पुरुषों  के संसर्ग का लुफ्त जमीं पर ही लेना चाहिए, क्योकिं कुरआन में महिलाओं के लिए कोई सुविधा नहीं है.   मौलवी और मुल्लों ने शोर मचा रखा है, इसको को बंगलादेश से तो निकला ही था, अब लगता है उसको कहीं भी हिठने ने देंगे. भाई यदि कुरआन कहता है कि जो इस्लाम का पालन करे उसे मार दो तो जन्नत में तुम्हे हूरें मिलेंगी जो तस्लीमा से भी जादा भ्रष्ट और और सुन्दर होंगी तो तो मै भी तस्लीमा का समर्थन करता हूँ यदि ऐसा नहीं है तो    भरकस विरोध.

लफ्फु : भाई कुरआन का ये मतलब नहीं है, बस कुछ मुल्लाओं ने पता नहीं क्या साधने के लिए ऐसा बवंडर फैला रखा है कि पूछो मत.

मैंने कहाँ : अब ये तो तुम्हे ही पता होगा. यदि मनो ऐसा है तो इस्लामिक महिलाओं को जन्नत जाते ही खुदा से जेहाद करनी चाहिए कि ५० %  आरक्षण यहाँ भी दें, आखिर हक तो बराबरी का बनाता है न, उन्हें भी अधिकार है ७२ तंदरुस्त जवान मर्दों के साथ सुविधाएँ उठाने का.  ये तो हद है भाई, और मान लो कोई मुस्लिम महिला या पुरुष समलैंगिक हुआ तो क्या करोगे ??? कुरआन को संशोधित कराओ और उनके लिए भी जन्नत में ७२ समलैंगिक तैयार करो. आखिर ये सब जेहाद के नाम पर ही तो हो रहा है. भाई तस्लीमा ने जरा सी सही बात क्या कह दी इन मौलवियों ने शोर मचा के रख दिया है,यदि यही बाद कोई  अगर एसी कोई टिप्पड़ी हिंदू के बारे में कर दे तो आप लोग ही उसे सेकुलर बोलतें हैं. एम् हुसैन कि नग्न हिंदू  पेंटिंग्स को कला का नाम दिया गया और उसको बचाने भी  मुसलमान ही आये. भाई बड़प्पन तो तब होता जब आप भी उसका विरोध करते. आपका ही कोई यदि दूसरे धर्म के बारे में उल्टा सीधा कहे तो तो ठीक और अपने धर्म कि खामियां उजागर कर दे काफिर ??  फिर कहतें हैं कि मुसलमानों को शक कि नजर से देखा जाता है. . अलगाव वादी गिलानी का कभी विरोध किया है आपने ???? कभी यदि किया होता तो शक करने कि शायद कोई वाजिब वजह होती. आप लोगो के लिए धर्म देश से बढ़ कर है. 

जब यहाँ बाबरी मस्जिद गिराया तो बंगला देश में हिन्दुवों के साथ अत्याचार हुआ. ये कहाँ का नियम है, कि कुकर्म यहाँ के हिंदू करें और सजा वहाँ के हिन्दुवों  को मिले. पाकिस्तान और बंगलादेश में आज भी हिन्दुवों के साथ अत्याचार हो रहें हैं तो हम लोग आपको यहाँ हिकारत  भरी नजर से तो नहीं देखते ????

आज सिर्फ हिन्दुवादी होना इस्लाम का विरोध करना कहलाता है, जबकि इस्लाम का गैर मुसलमानों को मारना खुदा कि सेवा ??????

भाई किसी हिन्दुवों या ईसाईयों के ऐसे संगठन  का नाम सुना है जो जेहाद के तर्ज पे हिन्दाद करतो हो या किसी ईसाई को जो इताद करता हो ?

शक का कारन हैं मिया.  आप इस्लाम जेहाद से बढ़ाते हो, गैर मुस्लिमो को मार कर, जबकि ईसाई लोगो कि सेवा कर के, यही अंतर है आप में और ईसाईयों में नहीं तो वो भी शक कि नजरो से देखे जाते.

हो सकता है मेरी सोच गलत हो , लेकिन जो सिनेमा दिख तरह है उससे तो यही सोच बनाती है, जिस दिन आप लोग किसी दूसरे धर्म का सम्मान करना शुरू कर देंगे, विश्वास मानिए शक कि कोई गुंजाईश न रहेगी.

लफ्फु : मियां  मैंने जन्नत, का नाम क्या ले लिया आप तो पिल पड़े, चलिए चौरसिया का पान खिलाते हैं आपको और जन्नत कि सैर अपने आप हो जायेगी. गुस्सा थूक दिजिये, बस कुछ चालबाजों के चक्कर में पड़ के सब गुड़ गोबर हो जाता हैं.

इतना सुनते ही मै लफ्फु भाई के साथ जन्नत का मजा लेने चल दिया.

Friday, October 21, 2011

नवाब कसाब


नेता दिग्गु  जब  लेटेस्ट वाला घोटाला कारने के बाद रुपया लेके जब स्विस जमा कराने गए, तो उनकी  नजर लोबी में बैठे  एक महिला पे पड़ी, कजराई आँखे, छरहरा बदन, गोरा सुर्ख रंग, कोई हूर  थी शायद  जाना पहचाना चेहरा सोच नेता जी नजदीक गए, और फटाफट एक घटिया कसीदा पढ़ दिया  .

"कसम खुदा कि ऐसा हसीं चेहरा न देखा इस ज़माने में ,
खुदा ने भी किया होगा  घोटाला तुझे बनाने में,
लूट के ज़माने भर कि शोखी, तुझे इनायत कि,
मिल जाये तू तो घोटाला न करू इस ज़माने में"

ला हौल विला कुवद , कौन हैं आप मिया और दो बच्चों कि मा को भी नहीं छोडते, आपको इल्म न होगा मै कौन हूँ, पुरे दुनिया में डंका बज रहा है मेरी खूबसूरती का आजकल, ओसामा ने मुझे छेड क्या दिया ओबामा ने मौत कि सजा दे दी उसको,

नेता जी : माफ कीजियेगा मीना अब्बानी जी मै पहचान नहीं  पाया आपको आपकी खूबसूरत नज़रे पहली बार जो देखा बिना चश्मे के, "काश मै आपका चश्मा होता , हरदम नजरो के साथ होता"  पिछली बार जब भारत में मुलाकात हुआ था तो मैंने मन्नत मांगी थी कि दुबारा आपसे मुलाकात हुआ तो कसाब  कि सजा आगे बढ़वा दूँगा. भला हो हमारी घोटालाबाज़ आदतों कि  जो छूटती नहीं, वरना मुलाकात मुमकिन न था. कहिये आप यहाँ कैसे ???

मीना अब्बानी :  मै सत्ता में नयी नयी आयीं हूँ , मुझे भी इस खाते कि जरुरत पड़ेगी सो पहले ही तयारी कर लूँ, कसाब  से याद आया, कि कैसा है वो ?? आपलोग ख्याल तो रखते हैं न ?? सुना है सुकून से है. मौज कर रहा है.
वास्तव में आपकी सरकार भली है जो  एक जेहादी कि सेवा करती है, जेहाद तो उसने जन्नत में जाने के लिए कि थी लेकिन आपने उसको जेल में ही जन्नत दे दी.  इससे हम पूरी तरह से इत्मीनान  है कि आगे भी ऐसा ही करेंगे, मै जल्द से जल्द ये सुझाव अपनी सरकार को दूंगी कि जेहादियों कि जन्नत भारतीय  जेल है , राजनीति मुस्लिम तुस्टीकरण कि निति के आगे देश प्रेम छोटा है, वहाँ के कुछ हमारे मुसलमान एजेंट भी हमें सपोर्ट करेंगे, मुआ अमेरिका वाला तो मानता  ही नहीं है, हमारे यहाँ भी आ के मेरे आशिक को जहन्नुम पंहुचा दिया, हमें तो इल्म ही न था नहीं तो उसको सुझा देती कि टावर उड़ाने से बेहतर है भारतीय मारो,  वहाँ जादा स्कोप है, कम से भारतीय जन्नत तो मिलता. आपलोगों ने पुरे विश्व के आतंकवादियों को एक नयी प्रेरणा दी है, और हम आपका समर्थन करतें हैं.

नेता जी : आप कहाँ इस खुशनुमा माहौले इश्क में रश्क मिला रहीं हैं ??  मेरा इश्क कबुल करे और हम एक नयी जन्नत बनाये मै आपके बच्चों का पूरा ख्याल रखूँगा और अपने जैसा खुर्राट घोटालेबाज  नेता बनाऊंगा, मेरा गुण और आपका कमीनापन जब साथ मिलेगा तो खुदा  कसम "मिनी ओसामा और मेरा" बड़ा नायाब मिश्रण होगा, लगे   हाथ वो काम भी हो जायेगा जो आज तक किसी नेता ने नहीं किया , भारत- पोर्किस्तान दोस्ती.

मीना अब्बानी : नेता जी, बात तो बुरी नहीं आपकी लेकिन लेकिन आपको मेरी  कुछ शर्ते माननी पड़ेंगी,

१.आपको अपना धर्म परिवर्तन करना होगा. क्योकि जब भी कोई हिंदू किसी मुस्लिम से विवाह करता है तो धर्म परिवर्तन हिंदू का ही होता है. आपको इसका इत्मीनान करना होगा.

२ . कुछ चिल्लर मेरे पास पहले से ही हैं फिर भी मै परिवार नियोजन न अपनाऊंगी,  हमारे धर्म में जनसँख्या बढ़ाना लिखा है, ताकि हम जादा से जादा हो के अलगवाव वादी निति लागू कर सकें, इतिहास गवाह है जहाँ भी हमारी थोड़ी सी जनसँख्या बढ़ी है, हमने वहाँ अलग होने के लिए जेहाद शुरू किया है, चाहे वो चेचन्या हो या भारत.  हाँ यदि कुछ बुद्धिमान इस्लामी इसका विरोध करें भी तो हम बर्बरता पूर्वक  उनको मिटा देतें हैं. हमारे आतंक के आने में आने वाले इस्लामी तक को तो हम छोडते नहीं तो बाकियों कि क्या बिसात ?? और इसमें भी आप साथ साथ रहने का इत्मीनान कराएँ .

३ . हम जैसे स्वार्थी, जहाँ  रहते हैं कुछ न कुछ बयान बजी एसी करतें हैं जिससे हिन्दुओ कि भावना आहत हो और माहौल बिगड़े, आखिर हिंदुओं में भी मूर्खो कि कमी नहीं है, १ % मुर्ख हिंदू और मुसलामनो का मिश्रण काफी है ९९ % सीधे- सरल  मुसलामनो और हिन्दुवो  के बीच भेद पैदा करने के लिए. इसमें भी आपको हमारे साथ रहने का इत्मीनान करना होगा .

४ . हम कुरआन के नाम पे लोगो को बहकाते हैं फुसलाते हैं ये सब चालबाजी आपको सीखनी होगी. हमें हर संभव कोशिश करनी होगी कि हिन्दुवों और मुसलमानों में विद्वेष हो, मै मुसलमानो का विंग देखूंगी और आप हिन्दुवों का.  इतना तो हमें भी पता है कि भारत में कोई हिंदू गलती करे तो तो कोई धर्मगुरु समर्थन नहीं देता , अलबत्ता अजमल और कसाब तक को वहाँ के कुछ नेता टाइप के मुल्ला मौलवी समर्थन करते हैं जो वास्तव  नेपथ्य से हमारे ही पोषित होतें हैं और  आप जैसे राजनेता वोट बैंक कि राजनीति में कुछ नहीं कर पाते,  जिससे  बाकी के सीधे साधे  इस्लाम  कौम को वहाँ  शक कि नजरो से देखा जाता है, इससे  हमारा काम और भी आसान होता है.

नेता जी को  अब तक तारे दिख रहे थे, गटा  गट हैंसे के घुट गटक के बोले :

" ये शर्तें है यां अजेंडा ??? इतना तो हम चुनाव लडने के लिए भी नहीं करते इतनी चालाकी काम न आयेगी , हमारे मोहब्त को तिजारत के तराजू से तौलती हो, हम कमीने है पर इतने भी नहीं,कौम न रहा तो घोटाला कहाँ से करेंगे ??? बेहतर है तुम पहला वाला उपाय ही लगाओ , और यहाँ हमले करवाओ , मुद्दे मिलते रहेंगे हम लूटते रहेंगे, वैसे भी वहाँ जादा नहीं रहने वाले, जनता जाग चुकी है चाहे हिंदू हो या मुसलमान सब समझते हैं, अब हमारे -तुम्हारे जैसों कि नहीं चलनी, मेरा तो ये अंतिम घोटाला था, तुम भी सुधर जाओ, नहीं तो गद्दाफी का हाल तो देखा होगा न , ४१ सेकेण्ड भी नहीं लगा ४१ साल के शाशक का जान लेने में, हमारा डेथ टाइम तो फिर भी १ मिनट होगा  ६० साल से ऊपर जो राज किया. काउंटर पे जाईये आपका नंबर  आ गया है .  

Thursday, October 13, 2011

जनमत संग्रह और पप्पू कि पिटाई :

नारायण नारायण , प्रभु आज आप चिंतित क्यों दिख रहे हैं ??कोई विशेष कारण ??

विष्णु : नहीं नारद बस पुराने जख्म याद गए , जब मैंने  लक्ष्मी को पाने के लिए  कछुए का भेस  बनाया , और मंदार जैसे पर्वत को धारण किया , हलाकि सख्त होने कि वजह से कुछ हुआ नहीं , लेकिन निशाँन  तो पथ्तर पे भी पड़ जाते हैं , इसलिए एक तरफ  हो के लेटा रहता हूँ बांह  के बल . , इतने के बाद भी असुरों से लड़ाई लेनी पड़ी , यादे तो यादें है , आ ही जाती हैं , दिल को रुला जाती हैं !

प्रभु सुना है जब दूसरे का दुःख जादा देखने को मिल जाये तो अपना कम लगने लगता है , आईये आपको आज पृथ्वी दर्शन कराता हूँ , कौन जाने दुःख कम हो आपका  ......

और नारद जी ने समुन्दर में एक थाप दी : चित्र उभरा   : इंडिया टी वी : 
आज तीनो युवको को कस्टडी में , जिन्होंने कल  पप्पू  कि पिटाई कि थी , 

पांच मिनट बाद , "   पप्पू के समर्थकों पे पड़े लात जूते "

प्रतिक्रिया  :- 
  खान्ग्रेस     " पप्पू से सहमत नहीं , लेकिन पिटाई उचित नहीं ( अंतर्मन - बहुत सही हुआ बड़ा अन्ना अन्ना करता था ) 
खाजपा : मंदमोहनावस्था (कोई प्रतिक्रिया नहीं ) 
टीवी : निंदनीय , 
प्रेस : निंदनीय : 
जनता : गयी तेल लेने , जनमत में जनता का  का कोई मत नहीं लेता . 
ब्लॉगर : मिलीजुली प्रतिक्रिया : 

तभी शेषनाग ने जम्हाई ली और कनेक्शन टूट गया .. 

" क्यों प्रभु कुछ राहत मिला " ????
विष्णु : ये गलत है , किसी के अपने विचार हैं कुछ बोले , इसका ये मतलब नहीं कि आप लात घूसों से पिटाई करोगे , ये कोई तरीका है भला .. 

क्यों प्रभु ??? जवालामुखी फूटे तो गलत , और अंदर ही अंदर उबले तो ठीक  तो सही ??? जवाला फूटना  तो आपके ही प्रकृति का नियम है न , 

प्रभु , पप्पू बोलता है कि कश्मीर में जनमत संग्रह करा लो यदि वो भारत के संग आना चाहे तो ठीक नहीं तो पाकिस्तान को दे दो , .. यदि शुक्राचार्य कहे कि  देव और असुरों में जनमत कराओ और असुरों के पक्ष में गया तो क्या आप स्वर्ग असुरों को दे देंगे ???? 

विष्णु : अरे विचार तो विचार हैं , कोई करने थोड़े जा रहा था वैसा ??? 

प्रभु असुरों का बस चले तो कब का आपको समुन्द्र में फेक के स्वर्ग हड़प ले , वो तो भला हो देवताओं का जो पिट के या पीट के हर बार बचा लेते हैं , यानि आप तब तक इन्जार करंगे कि वो सक्षम हो के देने के  लायक हो  तब विरोध करेंगे ???
आप ही कहते हैं न कथनी करनी में कोई फर्क नहीं होना चाहिए , विचार को क्रियान्वयन करना धर्म है , तब बच्चों ने विचार को व्यवहारिक रूप दे दिया तो तकलीफ क्या , इससे पहले कि कही पप्पू पास हो के कश्मीर देने का जनमत संग्रह तैयार  कर लेता  तो ??  दूसरी बात भारतीय संविधान के अनुसार कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है तो उसपे कैसा जनमत , तो क्या पप्पू के विचार  देशद्रोही वाले नहीं ??? यदि उसमे छमता होती तो कौन जाने करवा देता , लडको में विचार को रूप देने कि छमता थी सो कर दिया . 
नहीं तो विचारों का क्या है कुछ भी बोलते रहो , कल को किसी नेता को अपने विचार से गाली  दे दो  तो मुक़दमा , ओमपुरी का हाल अपने नहीं देखा ??? तो इसपर मुक़दमा क्यों नहीं ???? क्या बुरा किया लडको ने ?? 

पप्पू अहिंसावादी के साथ रहता है , इसको पता होना चाहिए कि देश के लिए तो अहिंसावादियों तक का खून  उबल जाता है और चाहिए भी , भारत पाकिस्तान कि लड़ाई  भी याद करिये जब एक गाँधी के पुजारी और महान अहिंसावादी ने सरहद पे फ़ौज भेज दी थी , तो क्या गलत किया ???? उसको लाठी ले के सीमा पे अनशन पे बैठना था तब भी , ...... ?????

इसीलिए कहता हूँ प्रभु सुबह शाम माया के नवनिर्मित  उद्यान का भ्रमण किया करो दिमाग ताजा रहेगा , कुतर्क न आयेगा ... सुना है बड़े निर्जीव हाथी है वहाँ उसी के जैसे , ऊपर से हाथी ने हाथी पे भी कमीशन खा लिया ... 

विष्णु : बात तो तुम्हारी सही है , नारद , अहिंसा का हमेशा पालन भी ठीक नहीं होता , नहीं तो भस्मासुर मुझे कब का भस्म कर चूका होता , और मेरा अवतार बाली वध भी नहीं कर पता , और न सीता वापिस आती , ......अब जा के मुझे कुछ आराम मिला , तुम्हारा उपाय तो लाजवाब है , 

हा हा , धन्यवाद प्रभु , आगे कौन जाने दिग्गी और बाकियों पे भी ठपली पड़े , और आपका दुःख और कम हो ... नारायण नारायण !!!

Monday, October 3, 2011

मेरा और प्रभु का संवाद - भाग दो

नारायण नारायण !!  हे प्रभु हमें  तीन महीने कि छुट्टी चाहिए, बिग बोस् देखना है !!!

विष्णु : क्यों वहाँ तो पहले ही बहुत से लोग है  तुम क्या करोगे जा के ? सुना है बर्तन मजवातें हैं, और किसी ने तुमको पिट पाट  दिया तो, शक्ति कपूर भी तो है वहाँ, वो तो एकदम धर्म, जाती, मानव, पशु,  लिंग, देव, दानव, सबको एक बराबर देखता है १०० प्रतिशत शुध्ध निरपेक्ष है, उसकी नियत का कोई ठिकाना नहीं, कहीं तुम्हारे  साथ कुछ उंच नीच हो गया तो ? तुम अपना सर्वस्व खो सकते हो !!!

"आप हमेशा उल्टा क्यों सोचतें हैं ???कभी तो कोई ढंग कि बात किया कीजिये, जब देखो डरातें रहतें हैं.  आप अश्विनी कुमार से कान का इलाज कराईये, मैंने देखने कि बात कि है, प्रतियोगी बनने कि नहीं.  इस समय में मेरी ये लालसा नहीं.  क्या मै आपको एल के अडवानी लगता हूँ ?? पता नहीं कौन सा जवानी का तीर मारेगा अब भी  उसकी लालसा जाती ही नहीं, जब जवान था तब तो सहोदर ने हथिया लिया, अब बुढौती में मोदी, उसका  समय पूरा हो गया है अब हमारी जमात में आके आपके नाम लेने के दिन हैं उसके. निकलेगा रथ ले के , गुजरात के एडमिन मोदक ने तो बैन मार दिया उसको अब किसी बिहार ग्रुप में घुस के रथ खिचेगा   "

विष्णु : नारद , ये प्रकृति का नियम है , ला ऑफ द नेचर, हर मनुष्य के आगे बढ़ने का का रास्ता दूसरे के कंधे से हो के जाता है , जिस दिन ये सारे कंधे साथ साथ आ जाये, भारत विश्व गुरु हो जाये, लेकिन सबके विकास होने से कौन किसपे राज कर पायेगा ?? कौन किसको लूटेगा ?? तो कंधे को ही सीढ़ी माना जाता है.
 "
प्रभु आप हमको मुद्दे से भटका रहे हैं, हम भारत कि निरीह जनता नहीं कि भटक जाएँ , पहले वहाँ लोग गरीबों को अमीर बनाते है , फिर उन्ही चोरों में से कोई संशोधन के लिए विरोध करता है, और जनता फिर वही कि वही, निरीह असहाय !!

विष्णु : भाई जो भी हो  लेकिन इस योजना से कम से कम लोगो कि भक्ति हमारी तरफ बढती, ३२ रूपये से कम पाने वाले लोगो को नरेगा और मनरेगा से ले के बाकी सुविधावों से वंचित रखा जाता, जहाँ लोग हप्ते में एक दिन फाका करतें हैं, ४ दिन करतें, थक हार के हमारा नाम लेते,  लोगो का परलोक सुधर जाता,  भूखे रहने से कमजोरी आती, खून ठंडा रहता  जिससे झगडा कम होता और लोग अहिंसा वादी बनते, लोग भूख से भी जादा  मरते जिससे जनसँख्या कम होती और देश का विकास होता.जो भी हो जिसने भी ये योजना बनायीं है, वो परम भक्त है हमारा !

" नारायण नारायण " आप खान्ग्रेसियों कि तरह क्यों कुतर्क  दे रहें हैं ?? क्या आप भी मानतें हैं कि " धुप में बारिश हो तो सियार का बियाह होता है"  ???

विष्णु : भाई हम पालक हैं, हमें भी प्रकृति के अनुसार ही दुनिया चलाना होगा ! हम तो  सीख रहें है अब कुछ न कुछ , सोचता हूँ इस बार मै भी चलूँ तुम्हारे साथ, मंदमोहन से मिलवा देना, फिर देखना किसकी मुस्कान मोहक है मेरी या मंदमोहन कि , मेरी हुई तो मै जीता और जैसा चाहूँगा  वैसा करूँगा, और मंदमोहन कि हुई तो भी मै जीता, आखिर वो भी तो है  हमारा ही बच्चा !!!

"नारायण नारायण " फिर वही बात , चित भी आपकी , पट भी आपकी , जब चाहो दाम बढ़ा दो , चुनाव के समय कम कर दो, ये भी कोई बात है ??  प्रभु आप देव हैं इन सब पचडों में मत पड़े, नहीं लोगो का विश्वास आपके प्रति कम हो गया है , लोग यम को विष्णु बना देंगे और आपको यम, अब वहीँ देख लीजिए लोग खान्ग्रेस को छोड़ के खाजपा के चक्कर में पड़े हैं, प्रभु आप पहले वाले ही बन जाओ जैसे गांधी, लाल बहादुर थे,  नयी भ्रष्ट पीढ़ी का देख के लिलार मत फोड़ो  सिर्फ खून ही निकलेगा और माथा लाल होगा नहीं, दर्द होगा वो अलग ..!

 आप को मै न ले जाऊंगा अपने साथ कहीं राबर्ट के साथ सेट हो गए तो ? वहाँ कि जनता ने  आप पर नज़रें गडा रखी हैं, जो जनता कल तक आपको पुजती थी, वही अब उल्टा सीधा कहती है, वो समझ चुके  हैं कि आप पहले वाले पालन कर्ता नहीं रहे, आप छीर का पानी त्रिशंकु के राज्य में भी दे रहे हो !जनता पीड़ित हो के  आप से जादा यम को याद करती  है.
उनकी पीड़ा को सुनिए महसूस कीजिये, और कुछ कीजिये जनसमर्थन जुटाईए तभी छीर का पानी ठंडा लगेगा, कहीं ऐसा न हो, जनता कि आग आपके सागर को उबाल के रख दे, और आपके गद्दी रूपी शेष नाग जी उसकी तपिश न झेल, पतालावस्था को प्राप्त कर लें.आप सत्ता सीन हैं, हम जनता, हमने अपनी बात आप तक पहुंचा दी, बाकी निर्णय आपका है !!!!  नारायण नारायण !..

कमल
kamalunmatchable@gmail.com
kkumarsinghkamal@gmail.com


Sunday, September 18, 2011

पत्नी पीड़ित की व्यथा

विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे
 गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे।
 ह्वै हैं सिला सब चंद्रमुखी, परसे पद मंजुल कंज तिहारे,
 कीन्हीं भली रघुनायक जू जो कृपा करि कानन को पगु धारे!!

अर्थात - रामचंद्र जी विंध्य पर्वत पे आ रहे हैं , सुन सारे तपस्वी  प्रस्सन्न हो गए ये सोच के की  जब प्रभु एक पत्थर को नारी बना सकते ( शायद उस समय इंडिया टी वी  रहा होगा  जो राम वनवास का लाईव दिखा रहा होगा उन मुनियों को भी ) है तो यहाँ तो सब पत्थर ही पत्थर है . कौन जाने हम योगियों की भी चांदी हो जाये इस  निर्जन वन में !!

ये कविता मैंने यू पी बोर्ड के हाई स्कूल में पढ़ी थी , भगवान जाने तुलसीदास ने ये वाली कविता  क्यों लिखी , जबकि वो खुद भुक्तभोगी थे , पत्नी पीड़ित थे , फिर भी , !!शायद उनमे बदले की भावना आ गयी होगी , की  "हम बर्बाद हुए तो क्या सनम सबको ले डूबेंगे"" . 


उनको ये न समझ में की रामचंद्र जी नारी बनाने की फैक्ट्री नहीं थे , ऐसा होता तो क्या अपने लिए न बना लेते सीता जी के धरती में समां जाने के बाद ???, लेकिन नहीं बनाया ,

 वास्तविक बात ये है की वो खुद भी पीड़ित थे सीता जी से कभी हिरन मांगती थी सोने का तो कभी कुछ ! दम कर दिया था एकदम से  , सोचा चलो इसी बहाने जान छूटा , चुकी मर्यादा पुरुष थे , तो रोना धोना तो दिखाना ही होगा दुनिया को , ( होयिहे वही जो राम रूचि राखा)

अस्तु अस्तु , ये तो हुई तुलसी जी और प्रभु राम चंद्र जी की बात , 

आईये अब हम अपने एक मित्र की बात बताते है, कहने के लिए वो लेखक है, - 


मित्र कहींन :- 

सुबह सुबह जब लिखने लगा तो पहली वाणी  " सुनो  डोसा खाना हो तो उडद  की डाल लेते  आओ "  मै समझ गया की आज श्रीमती को डोसा खाने का मन है . 

मेरा मन किया की मना कर दूँ की नहीं खाना है , लेकिन पिछला इतवार याद आ गया , जब मुझे बाहर जा के खाना पड़ा था .

खैर , वापस आ के दुबारा शुरूं किया तभी आवाज आयी , मम्मी दूध लेन के लिए कह रही हैं , जब माता जी से पूछ तो उन्होंने कहा नहीं , खैर मन मसोस के वो भी आ गया , 

 फिर बैठा , फिर आवाज आयी , जो कर रहे हो जल्दी से निपटा लो , और जाओ टिकट ले आओ , सबको सिनेमा  जाना है .'
. मै चुपचाप उठा अपने यंत्र ले के , और पार्क में बैठ गया सोचा  जब वापस जाऊंगा तो बोल दूँगा की सीट फूल थी ..... तभी फोन आ गया , और मुझे अपने आप पे गुस्सा की ये मोबाइल तो घर ही छोड़ना था मुझे , 

बोला "आये क्यों नहीं अभी तक" ?? मैने योजनानुसार अपनी बात कह दी ! आवाज आयी  , शाम की लेते आओ न,

 मेरा दिल रो के रह गया अबकी बार , मरता क्या न करता ???

घर वापस आया , डिमांड पूरी करके , फिर शुरू किया लिखना ,

बोलीं - मम्मी का फोन आया था मेरे , जरा  तुमसे बात करनी थी उनको , अभी फोन कर लो ,

"अभी कुछ कर रहा हूँ"  मैंने कहा इतना सुनते ही

" बड़ा गोलमेज सम्मलेन कर रहे हो , बाद में कर लोगे तो भारत जीत नहीं जायेगा मैच में .आप मेरे मा पिता जी की इज्जत नहीं करते हो , कही ऐसा  भी होता है क्या ?? पिछली बार भी आप मेरे फूफा के मौसे के साली के बहन से भी बात नहीं किया था, पता नहीं क्या समझते हैं अपने आप  को, आपके किसी का ....................
( इसके बाद के शब्द मै सुन नहीं पाया था , कान में रुई भर ली थी )

" उफ्फ्फ" ( मन में - सामने तो उफ़ तक न किया जाता  )
खैर चलो ये भी हुआ , अब हो गयी शाम , तय शुदा प्रोग्राम के तहत सिनेमा देख के वापस आ गया .

ये तो रही मेरी बात ,   अब आपको एक मेरे मित्र सुरेश  की बात बताता हूँ , सुना है पिछले सप्ताह  वो गूंगा और बहरा हो गया है . उसको देखने गया उसके घर  , इशारे से हाथ हिला के पूछा ये क्या हुआ ??? उसके शकल से लगा की वो खुश है, गूंगा- बहरा बन के, मैंने कहा यार तुम पहले इंसान हो जो गूंगा बहरा बन के भी खुश है, भला ये क्यों ??? उसने इशारे से इशारा किया, ऊँगली को तरफ देखा तो वो भाभी जी की तरफ इशारा कर रहा था जो किसी से बात करने में मशगुल थी .

मैंने कहा भाई ऐसा क्या हुआ की  सब खो बैठे , हमें भी बताओ , वो मुस्कराया , तभी भाभी  जी आयीं , और सुरेश को कागज का टुकड़ा  पकड़ा कही बाहर चल दी  शायद किसी पडोसी के घर  !

 पुर्जे  में  लिखा था , "शाम को शोपिंग चलेंगे"  ! अब समझ में आया की इनकी स्तिथि और भी खराब थी .

मैंने उससे हसंते हुए कहा , गूंगा , बहरा तो हो गया , लगे हाथ यादाश्त भी खो देता , कम से कम पढ़ना तो न पडता .

" अगले हफ्ते वो भी खोने वाला हूँ " वो बोला ,  मै चौंक पड़ा ... यानि सब नाटक है ???
बोला   "तू भी कर ले , दो चार महीने तो ढंग से रहेगा "

" यार जब से शादी हुई है मै किसी दोस्त के घर नहीं जा पाता, पार्टी तो मै आजकल बस सपने में ही करता हूँ , किसी का फोन आने पे फालो अप शुरू हो जाता है, और दुनिया भर का क्लारिफिकेशन,  न्यूज देखे महीने हो गया, मज़बूरी में सास बहु देखना पडता है, हर शाम घुमाने पार्क न जाओ तो  रात दूभर, हफ्ते में शोपिंग न जाओ तो हफ्ता दूभर, महीने नयी जगह न ले जाओ तो महीना दूभर, हे भगवान कोई "अन्डू " का  या कंट्रोल जेड  का बटन  लाईफ में भी दे दो "     वो तब तक बोलता गया ,जब तक  मेरी भी आँख में आंसू न आ गए .

मै उसके मन की अवस्था को समझ रहा था , आखिर " जाके  पावँ  फटे बिवाई , वही जाने है पीर परायी " .


भारी मन से वापस लौटने लगा , तभी एक कार वाले ने टक्कर मार दी !! होश आया तो  अस्पताल में पाया श्रीमती बैठी थी खुश हो के कहा , " भगवान का लाख लाख शुक्र है ,  चलो दो दिन बाद सही होश में तो आये , मैंने मन्नत मांग ली थी , की आप होश में आ जाओगे तो अगले महीने तिरुपति बालाजी चलेंगे "

और  मै दुबारा बेहोश हो गया .

मित्र मेरी सहानुभूति है आपके साथ ............

कमल
१८ / ०९/ २०११