नारद: गैर के बहकावे में न आयें (ये काम हमारा है)

Friday, September 21, 2012

गैर के बहकावे में न आयें (ये काम हमारा है)


थर्ड डीग्री से तो गूंगा भी बोलता है,  जब यू पी ए की सरकार को लगा की अबकी जनता का डंडा तगड़ा लगाने वाला है तो उन्होंने अपने हर अवसर पर मौन रहने वाले मौन मोहन सिंह को "सेट" कर उनके स्वभाव के विपरीत फिर बोलने के लिए मजबूर कर दिया. 

सेटिंग में वैसे भी कोंग्रेस पुरोधा है,  पहले तमाम दल "सेट" कर सरकार बनाई, फिर सेट्टिंग को खुश रखने के लिए घोटाले किये, घोटालो को सेट करने के लिए मिडिया का सहारा लिया, बाद में जनता का ध्यान सेट करने के लिए महंगाई बढ़ाया फिर जनता की 'जान'  "सेट" करने के लिए ऍफ़ डी आई ले आया.  आजकल के मजनुवो को सरकार से सेटिंग की सीख लेनी चाहिए. जब जनता जान गयी की सरकार अब जनता की "जान" सेट करने वाली है तो जनता को सेट करने के लिए सोनिया ने मनमोहन को उनके स्वभाव के  विपरीत सेट कर टी वी सेट पर भेज दिया.

अपने स्वभाव के विपरीत  वो बोले तो सही लेकिन अपनी मौलिक रोबोटावस्था में, अब आदमी अपने स्वभाव  से कहाँ कहाँ "कोम्प्रोमाईज" करे ?? कुछ तो मौलिक होना चाहिए, माना  की सोनिया जी के निर्देश से बोले, माना की उनका लिखा हुआ भी बोले, सिर्फ भाव भंगिमा ही थी जो अपनी खुद की अपनाई जा सकती थी, सो जहाँ "स्पेस" मिला मौलिकता सेट कर दी.  

सरकार की गृहस्थी चलाने के लिए मनमोहन ने अब तक ममता को "सेट" कर रखा था, "मायके" से बुला  "ससुराल" में रखा, लेकिन हर सेटिंग डिमान्डिंग होती हैं भाई, खर्चीली होती है, आजकल महगाई के जमाने में सेट्टिंग करना  इतना आसान नहीं लेकिन सरकार ने कर दिखाया. ममता का मन  मनमोहिनी सरकार से टुटा तो सरकार को भी दिक्कत नहीं हुयी, आजकल लोग कई कई सेटिंग रखते हैं भाई. ममता के बारे में पूछे जाने पर कोंग्रेस कहती है हम उनकी आज भी इज्जत करते है ,हमेशा दरवाजा खुला है, उनका अपना  मुद्दा है ,"मतभेद है -मनभेद नहीं " इस पर मुझे सुनील जी की पंक्तिया याद आती है :- 

मैंने आज तक उसको, 
कभी  बेवफा कहा ही नहीं |
मगर वफ़ा की बात हो तो ,
उसका ज़िक्र भी अच्छा नहीं लगता |
ज़रूर उसकी बेवफायी भी
एक मज़बूरी रही होगी |
मेरे इस भरम का टूटना भी , 
मुझे कभी अच्छा नहीं लगता |(सुनील)

मनमोहिनी सरकार की वेवफाई से रूठ ममता जैसे ही वापिस "मायके" गई  "मुलायम" से नैना चार हो गए. अब सरकार चलाएगी मनमोहन और मुलायम की सेटिंग, खैर आजकल तो पुरुष का पुरुष से सेट्टिंग भी मान्य है. (आजकल सब मान्य है, कोर्ट का आदेश भी तो है इस पर ) सरकार ने गृहस्थी चलाने के लिए ढूँढा भी तो मुलायम जैसा गर्लफ्रेंड जो सरे आम कहती है मै "तीसरे"को जाउंगी, जो तेरा है वो मेरा है और जो मेरा है सिर्फ मेरा है,लेकिन सरदार के सरकार का दिल है की मानता नहीं.  

खैर जो भी हो प्रधानमन्त्री जी ने आज दिखा दिया की सरकार बुजदिल नहीं की जी जला के जिम्मेदारी भी न ले. ताल ठोक के बोला की छह सिलेंडर के बाद हम "ब्लैक"  करेंगे आप लोग इत्मीनान रखे, यदि नहीं रख सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम दूसरो के बहकावे में न आयें क्योकि ये काम सिर्फ हमारा है, और  हमें आप पे भरोसा और  इत्मीनान  है की आप सिर्फ हमारे बहकावे में आएंगे और हमारा साथ दे हाथ मजबूत कर सकेंगे, और हम आपको विश्वाश दिलाते हैं की आने वाले दिनों में विकास की गति और जादा होगी, भले वो महगाई या घोटालो का विकास हो. अभी हमने ८% की डर से घोटाले कर महगाई  को विकसित किया है आने वाले दिनों में और भी उंचाइयां छूनी है, भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाना है , और वो तभी होगा जब हम भारत को किसी शक्तिशाली देश के हवाले कर देंगे. इतना सुनना ही था की माता जी की आवाज आई "बंद करो टी वी, 'दाढ़ीजरवा' बोल रहा है".   और मै माता जी के बहकावे में आ टी वी बंद कर दिया, आगे का भाषण आप लोगो ने सुना हो तो कृपया बताएं .  

6 comments:

पूरण खण्डेलवाल said...

बिलकुल सही बात "कोई दूसरों के बहकावे न आये " अच्छी प्रस्तुति !!

रविकर फैजाबादी said...

झूठ बोलने से भला, मारो-मन मुँह-मौन ।
चले विदेशी बहू की, कर बेटे का गौन ।
कर बेटे का गौन, कौन रोकेगा साला ।
ससुर निठल्ला बैठ, निकाले अगर दिवाला ।
आये वह ससुराल, दुकाने ढेर खोलने ।
भैया वन टू आल, लगे हैं झूठ बोलने ।।

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Virendra Kumar Sharma said...


रविवार, 23 सितम्बर 2012
ब्लॉग जगत में शब्द कृपणता ठीक नहीं मेरे भैया ,
ब्लॉग जगत में शब्द कृपणता ठीक नहीं मेरे भैया ,

नाव भंवर में अटक गई तो ,कोई नहीं नहीं खिवैया |

विषय बड़ा सपाट है अभिधा में ही आगे बढेगा ,लक्षणा और व्यंजना की गुंजाइश ही नहीं मेरे भैया .चिठ्ठा -कारी भले एक व्यसन बना कईओं का ,फिर भी भैया सहजीवन है यहाँ पे छैयां छैयां

.चल छैयां छैयां छैयां छैयां .आ पकड मेरी बैयाँ बैयाँ .

क्यों शब्द कृपण दिखता है रे ! कन्हैयाँ?

धन कंजूस चल जाता है .भई किसी का कुछ ले नहीं रहा ,अपना फायदा कर रहा है .सीधा सा गणित है कंजूसी का :मनी नोट स्पेंट इज मनी सेव्ड .लेकिन यहाँ मेरे राजन यह फार्मूला लगाया तो सारे समर्थक ,अभी तलक टिपियाए लोग आपके दायरे से बाहर आ जायेंगें .शब्द कृपणता आपको आखिर में निस्संग कर देगी .आप भले "निरंतर ",लिखें "सुमन" सा खिलें ,

साथ में चिठ्ठा -वीर और बिना बघनखे धारे चिठ्ठा -धीर दिखें .आखिर में कुछ होना हवाना नहीं है सिवाय इसके -

चल अकेला चल अकेला ,चल अकेला ,तेरा "चिठ्ठा "कच्चा फूटा राही चल अकेला .

यहाँ कुछ लोग आत्म मुग्ध दिखतें हैं .आत्म संतुष्ट भी .महान होने का भी भ्रम रखतें हैं/रखती हैं .आरती करो इनकी करो इनकी "वंदना "हो सकता है हों भी महान .शिज़ोफ्रेनिक भी तो हो सकते है .मेनियाक फेज़ में भी हो सकतें हैं बाई -पोलर इलनेस की ,मेजर -डिप्रेसिव -डिस -ऑर्डर की ..

ये चिठ्ठा है मेरे भाई ,अखबार की तरह एक दिनी अवधि है इसकी. बाद इसके कूड़े का ढेर .

इतनी अकड काहे की ?

निरभिमान बन ,मत बन शब्द कृपण .आपके दो शब्द दूसरे को सारे दिन खुश रख सकतें हैं .

शब्दों से ही चलती है ज़िन्दगी प्यारे .

कुछ शब्द हम अपने गिर्द पाल लेतें हैं .

"अपनी किस्मत में यही लिखा था भैया ,अपनी तो किस्मत ही फूटी हुई है ,कोई हाल पूछे तो कहतें हैं बीमार हूँ भैया "-बस तथास्तु ही हो जाता है .

बस इतना ध्यान रख तुझे लेके कोई ये न कहे मेरे प्रियवर तू मेरी टिपण्णी को तरसे .सारे दिन तेरा जिया धडके ...

और तू गाये :जिया बे -करार है ,छाई बहार है आजा मेरे टिपिया तेरा इंतज़ार है .

यहाँ प्यारे! आने- जाने का अनुपात सम है .स्त्री -पुरुष की तरह विषम नहीं .तेरा चिठ्ठा भी प्यारे कन्या भ्रूण की तरह किसी दिन कूढ़े के ढेर पे मिल सकता है .तू मेरे घर आ! मैं आऊँ तेरे. .जितनी मर्जी बार आ ,खाली हाथ न आ .भले मानस दो चार शब्द ला .

पटक जा मेरे दुआरे !

गुड़ न दे, गुड़ सी बात तो कह .

एक टिपण्णी का ही तो सवाल है जो दे उसका भला ,जो न दे उसका भी बेड़ा रामजी पार करें .

राम राम भाई !

सुन !इधर आ !

मत शरमा !

जिसने की शरम उसके फूटे करम

शर्माज आर दा मोस्ट बे -शर्माज . .

"मौन सिंह" मत बन .

इटली का कुप्पा सूजा मत दिख .

निर्भाव न दिख ,भाव भले ख़ा ,भावपूर्ण दिख .

प्यार कर ले नहीं तो पीछे पछतायेगा .

साईबोर्ग मत बन ,होमो -सेपियन बन ,

सीढ़ी -दर-सीढ़ी ऊपर की तरफ चढ़ ,

शब्द कृपण मत बन !

चढ़ लोगों की आँखों में चढ़ .

दिल में जगह बना सबकी !

खिलखिला के हँस !

उल्लेखित थीम पर आशु कविता चाहिए दाता .दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रख्खे .

Virendra Kumar Sharma said...

नारद जी आयें हैं ,हर बार की तरह दो फाड़ लायें हैं .