नारद: जन्नत कि हूर

Saturday, October 22, 2011

जन्नत कि हूर




दीपावली आते ही पतियों कि जी के सांसत हो जाती है, हफ़्तों पहले अनावशयक चीजों कि लंबी सूचियाँ तैयार कर दी जाती है, और रोज शाम घर जाते डर लगता है कि कही कार्ड न मांग लिया जाए. 

खैर आज दोपहर कार्यालय में फोन आया "आज जल्दी घर आ जाना, सामान लाना है, सीधे जाना, इधर उधर मत देखना, तुम मर्दों कि नजर ठीक नहीं होती. तुमलोगों को घर कि जोरू मैली कुचैली और बाहर कि हूर लगती हैं."
तुम चुप भी करो, जब देखो  दिग्गी कि तरह ओसामा जी टाइप कि बाते कहती रहती हो , अरे हर मर्द गद्दाफी नहीं होता. झल्लाहट में फोन रख के बाहर निकला ही था तब से मेरे मित्र लातिफुर्ररहमान (जिनको हम प्यार से लफ्फु कहते थे )  मिल गए, बोले "चलो गुरु पान खाते हैं पन्नू चौरसिया के यहाँ से, कसम खुदा खा के जन्नत कि सैर करोगे"

मियाँ  दिमाग न खराब  किया करो  अब जन्नत के नाम पे पान  भी खिलाने लगे ???

लफ्फु : क्या बात करते हो मियाँ ??? इतना गरम क्यों ??सब ठीक तो है न ???

मैंने कहा :  यार  अखबार नहीं पढ़ते , तस्लीमा  ने कहा है कि हर मुस्लिम औरत को ७२ पुरुषों  के संसर्ग का लुफ्त जमीं पर ही लेना चाहिए, क्योकिं कुरआन में महिलाओं के लिए कोई सुविधा नहीं है.   मौलवी और मुल्लों ने शोर मचा रखा है, इसको को बंगलादेश से तो निकला ही था, अब लगता है उसको कहीं भी हिठने ने देंगे. भाई यदि कुरआन कहता है कि जो इस्लाम का पालन करे उसे मार दो तो जन्नत में तुम्हे हूरें मिलेंगी जो तस्लीमा से भी जादा भ्रष्ट और और सुन्दर होंगी तो तो मै भी तस्लीमा का समर्थन करता हूँ यदि ऐसा नहीं है तो    भरकस विरोध.

लफ्फु : भाई कुरआन का ये मतलब नहीं है, बस कुछ मुल्लाओं ने पता नहीं क्या साधने के लिए ऐसा बवंडर फैला रखा है कि पूछो मत.

मैंने कहाँ : अब ये तो तुम्हे ही पता होगा. यदि मनो ऐसा है तो इस्लामिक महिलाओं को जन्नत जाते ही खुदा से जेहाद करनी चाहिए कि ५० %  आरक्षण यहाँ भी दें, आखिर हक तो बराबरी का बनाता है न, उन्हें भी अधिकार है ७२ तंदरुस्त जवान मर्दों के साथ सुविधाएँ उठाने का.  ये तो हद है भाई, और मान लो कोई मुस्लिम महिला या पुरुष समलैंगिक हुआ तो क्या करोगे ??? कुरआन को संशोधित कराओ और उनके लिए भी जन्नत में ७२ समलैंगिक तैयार करो. आखिर ये सब जेहाद के नाम पर ही तो हो रहा है. भाई तस्लीमा ने जरा सी सही बात क्या कह दी इन मौलवियों ने शोर मचा के रख दिया है,यदि यही बाद कोई  अगर एसी कोई टिप्पड़ी हिंदू के बारे में कर दे तो आप लोग ही उसे सेकुलर बोलतें हैं. एम् हुसैन कि नग्न हिंदू  पेंटिंग्स को कला का नाम दिया गया और उसको बचाने भी  मुसलमान ही आये. भाई बड़प्पन तो तब होता जब आप भी उसका विरोध करते. आपका ही कोई यदि दूसरे धर्म के बारे में उल्टा सीधा कहे तो तो ठीक और अपने धर्म कि खामियां उजागर कर दे काफिर ??  फिर कहतें हैं कि मुसलमानों को शक कि नजर से देखा जाता है. . अलगाव वादी गिलानी का कभी विरोध किया है आपने ???? कभी यदि किया होता तो शक करने कि शायद कोई वाजिब वजह होती. आप लोगो के लिए धर्म देश से बढ़ कर है. 

जब यहाँ बाबरी मस्जिद गिराया तो बंगला देश में हिन्दुवों के साथ अत्याचार हुआ. ये कहाँ का नियम है, कि कुकर्म यहाँ के हिंदू करें और सजा वहाँ के हिन्दुवों  को मिले. पाकिस्तान और बंगलादेश में आज भी हिन्दुवों के साथ अत्याचार हो रहें हैं तो हम लोग आपको यहाँ हिकारत  भरी नजर से तो नहीं देखते ????

आज सिर्फ हिन्दुवादी होना इस्लाम का विरोध करना कहलाता है, जबकि इस्लाम का गैर मुसलमानों को मारना खुदा कि सेवा ??????

भाई किसी हिन्दुवों या ईसाईयों के ऐसे संगठन  का नाम सुना है जो जेहाद के तर्ज पे हिन्दाद करतो हो या किसी ईसाई को जो इताद करता हो ?

शक का कारन हैं मिया.  आप इस्लाम जेहाद से बढ़ाते हो, गैर मुस्लिमो को मार कर, जबकि ईसाई लोगो कि सेवा कर के, यही अंतर है आप में और ईसाईयों में नहीं तो वो भी शक कि नजरो से देखे जाते.

हो सकता है मेरी सोच गलत हो , लेकिन जो सिनेमा दिख तरह है उससे तो यही सोच बनाती है, जिस दिन आप लोग किसी दूसरे धर्म का सम्मान करना शुरू कर देंगे, विश्वास मानिए शक कि कोई गुंजाईश न रहेगी.

लफ्फु : मियां  मैंने जन्नत, का नाम क्या ले लिया आप तो पिल पड़े, चलिए चौरसिया का पान खिलाते हैं आपको और जन्नत कि सैर अपने आप हो जायेगी. गुस्सा थूक दिजिये, बस कुछ चालबाजों के चक्कर में पड़ के सब गुड़ गोबर हो जाता हैं.

इतना सुनते ही मै लफ्फु भाई के साथ जन्नत का मजा लेने चल दिया.

6 comments:

रविकर said...

दीपावली की शुभकामनाएं ||
सुन्दर प्रस्तुति की बहुत बहुत बधाई ||

M.A.Zubairi,"Goldee' said...

Kaafiro ki soch hi ghatiya hoti hai...
Aakhir ise Kaafir kaha jo gaya.....
Yani Kuffr karne wala...
jo Allah ki Zaat me kisi Aur Ko Sharik kare...
72 jawano ke sath Najayaz Rishte Banana Kafiro ka hi Kaam hai...
Yani Rishte Bana Kar Harami Bachche Paida Karna. Hum Musalman to Nikah k Baad hi Rishte Banate Hai....
Chahe wo Mard ho ya Aurat..........
Rahi Quran Paak per comments karna to apni aadato se baaz aa jao....
Kon kise Shak ki nigah se dekhta hai is bat ka dunya hi gawah hai..
Yahan agar Paadne ki bhi aawaz hoti hai to kaha jata hai Musalmano ne Bomb balast kiya hai..
Apne Likhne aur Bolne me Tamiz lao..
Bolna aur Likhna hame bhi ata hai...
Khuda Haffiz..

नारद said...

रवि जी धन्यवाद ,

ज़ुबैरी साहब , यह लेख किसी को आहत करने के लिए नहीं है , माफ़ी चाहता हूँ यदि अनजाने में ऐसा हुआ मुझसे तो , मैंने तो उन आतंकवादियों के सोच को पिरोया है , न कि इस्लाम को , इस्लाम मेरे लिए उतना ही पूजनीय है , जितना हिंदुत्व ..

Anonymous said...

बहुत बढ़िया लेख है.... मज़ा आ गया...
लेख से भी ज्यादा मज़ा तो वीडियो देख कर आया... हँसते-हँसते लोट-पोत हो गया मैं तो...

ज़ुबैरी का गुस्सा एकदम ठस-बुद्दी कौम का प्रतिनिधित्व करता है| जो तर्क, अनुभव, विचार व विवेक से हीन अंधानुसरण को दर्शाता है...

Madhulika Tripathi said...

X - आज सिर्फ हिन्दुवादी होना इस्लाम का विरोध करना कहलाता है, जबकि इस्लाम का गैर मुसलमानों को मारना खुदा कि सेवा ??????
X -आप इस्लाम जेहाद से बढ़ाते हो, गैर मुस्लिमो को मार कर, जबकि ईसाई लोगो कि सेवा कर के, यही अंतर है आप में और ईसाईयों में नहीं तो वो भी शक कि नजरो से देखे जाते.
X -जिस दिन आप लोग किसी दूसरे धर्म का सम्मान करना शुरू कर देंगे, विश्वास मानिए शक कि कोई गुंजाईश न रहेगी
तीनो बिंदु विचारणीय हैं ,,अगर इनका पालन किया जाए तो निश्चित तौर पर सौहाद्रपूर्ण वातावरण निर्मित होगा ..
" बोया पेढ़ बबूल का...तो आम कहाँ से पाएगा "? .ये सच है की जिस भाव की अपेक्षा स्वयं के लिए आप दूसरों से करते हो...पहले खुद भी उस के अनुरूप व्यवहार करना पड़ता है.
बहुत विचारपरक रचना है...साधुवाद ..

Madhulika Tripathi said...

X - आज सिर्फ हिन्दुवादी होना इस्लाम का विरोध करना कहलाता है, जबकि इस्लाम का गैर मुसलमानों को मारना खुदा कि सेवा ??????
X -आप इस्लाम जेहाद से बढ़ाते हो, गैर मुस्लिमो को मार कर, जबकि ईसाई लोगो कि सेवा कर के, यही अंतर है आप में और ईसाईयों में नहीं तो वो भी शक कि नजरो से देखे जाते.
X -जिस दिन आप लोग किसी दूसरे धर्म का सम्मान करना शुरू कर देंगे, विश्वास मानिए शक कि कोई गुंजाईश न रहेगी
तीनो बिंदु विचारणीय हैं ,,अगर इनका पालन किया जाए तो निश्चित तौर पर सौहाद्रपूर्ण वातावरण निर्मित होगा ..
" बोया पेढ़ बबूल का...तो आम कहाँ से पाएगा "? .ये सच है की जिस भाव की अपेक्षा स्वयं के लिए आप दूसरों से करते हो...पहले खुद भी उस के अनुरूप व्यवहार करना पड़ता है.
बहुत विचारपरक रचना है...साधुवाद ..