नारद: धर्म है या बताशा ?

Monday, February 4, 2013

धर्म है या बताशा ?


बताशा चीनी को पिघला के उससे बनायी गयी एक मिठाई होती है, जो बहुत ही नाजुक होती है, उसका पानी , शीत, ठन्डे, गर्मी से दूर रखा जाता है, और जब मन हो अपने हिसाब से उसका लुफ्त उठाया जाता है.हलाकि की उसका नाजुक होना लाजिमी है जिसका आधार ही चीनी हो जो तुरंत गलने में सहायक है, अब अलिच्छित होने वाले पदार्थ का कितना भी रूप परिवर्तन कर दो गुण दोष धर्म नहीं जाता.  

आजकल कुछ एसा ही इस्लाम के साथ भी है, फिल्म आई नहीं की भावना आहत हो गयी, कुछ तो भावनाए सपने में ही आहत कर लेते, मुल्ला सपने में देख रहा है, की कोई एक रोशनी उसके पास आई है, फिर पूछती है, कैसे हो मेरे बच्चा, मुसलमान ने पूछा आप कौन, वह बोला,  हम परमेश्वर है, इश्वर है, तुमने हमारी बहुत सेवा की, सोचा तुमसे मिल लू, मुसलमान भड़क गया, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमसे मिलने की,कुरआन में नहीं लिखा की तुम मोहम्मद के बाद किसी से मिलोगे, तू निश्चित ही कोई बहरूपिया है, जरा अपना चेहरा दिखा,  तेरे घर कहाँ है, मुझे फूंकना है, इश्वर घबराया वह भगा, शायद सोच रहा था जिस मोहम्मद ने इन मानवों को हमारे पास आने का रास्ता दिखाया है वही इंसान हमें बहरूपिया कहता है. और इधर उस मुसलमान की नींद खुल चुकी थी, लेकिन तब उसकी भावनाए आहत हो चुकी थी. बिना सिनेमा देखे जब लोग आहत हो सकते हैं तो सपना तो फिर भी दीखता है.  

अब जम्मू के  बैंड पर एक मुल्ला द्वारा बैन लगाया है, और बाकी मुल्ले उसका समर्थन कर रहे, और जो "इस्लाम में औरत" टाइप के लेख लिखते हैं, वो कहीं दूम दबा के छुप चुके है, जो मुसलमान औरत की आजादी के दीवाने है, उनकी  दीवानगी उनसे बेवफा हो गयी है. उनके इस तरह के मौके पर छुपने से कसम से मेरी भावनाए आहत होती, और मन करता है उनके आगे पीछे जहाँ भी जगह मिले बांस ठूंस दूँ. इस्लाम या है , इस्लाम वा है, हाँ  इन सब को देखते हुए यही लगता है की  इस्लाम या और वा ही है और इसकी मान्यते भी  "या" और "वा"  ही है इससे जादा कुछ नहीं. 

सिनेमा से इस्लाम आहत होता है, और मुस्लिम बहुल (कश्मीर) क्षेत्र को आहत करने के लिए संगीत ही काफी है. इस्लाम धर्म है या बताशा ? अब जरा सोचिये क्या डेल्ही या मुंबई में इस तरह के फतवे या धमकिया आती तो क्या लडकिय बैंड बंद कर देती ? या धमकी देने वाले से डरती ?शायद कोई धमकी ही नहीं देता, क्यों ? सोचने वाली बात है. 

एक समझदार व्यक्ति को  ये सब हरकते देख यही समझ आएगा की  समझ में इस्लाम् मोम की गुडिया है, आग से पिघल जाती है, पानी से और ठोस हो जाती है, जिससे आतंक की बारिश होती है, फिर विनाश की "धुप" फैलाती है, जिसमें नहा के इस्लाम परस्तो की मोम से भावना की गुडिया तैयार होती है, और फिर मुसलमान कहते फिरते हैं की देखो इस्लाम तो कितना कोमल और सुन्दर है मोम की गुडिया जैसे. 

कश्मीर की घटना आज के आधुनिक भारत  में इस बात का सुबूत  है की की मुस्लिम जहाँ भी बहुसंख्यक हुए, वो देश और संविधान से ऊपर समझने लगते है. मुख्या मंत्री ओमर अब्दुल्ला की हालत एक वैसे पिता की है जो  अपने लडके से जादा प्यार करता है और वही लड़का जब किसी लड़की को छेड़ता है तो बस  विरोध की कर सकता है, मार या भगा नहीं सकता आखिर लाडला लड़का जो ठहरा मुल्ले मौलवी भी इस्लामिक शाशको के लिए कुछ इ इसी तरह के है,  हाँ कश्मीर में में  लोकतान्त्रिक नहीं बल्कि मुल्ला तंत्र कहना जादा उचित होगा क्योकि वहां कुछ भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं है. नहीं तो क्या शाशन सच में इतनी मजबूर हो सकती है ? यदि हाँ तो ओमर अब्दुल्ला ही इन सब के जड़ माने जायेंग और इसका भी मतलब यही निकलता है की  मुसलमान शाशक भी पहले  "मुसलमान"  और देश के संविधान के हिसाब से शाशक बाद में होता है और ये सब हम पकिस्तान या तालिबान में नहीं बल्कि अपने देश भारत में देख रहे हैं.

सबसे बड़ी समस्या ये है की भारत में मुसलमान इस तरह की हरकते करते हैं और ऊपर से " सेकुलरिज्म" की उम्म्मीद रखते है.  अरे भाई जब तुम अपनी बताशे बाजी कर रहे हो, और बाकी के बताशेबाज तुम्हारा समर्थन ( विरोध न करना भी समर्थन ही है ) तो जाहिर सी बात है गैर बताशेबाज हमेशा तुम्हारे करीब नहीं आ सकता फिर काहे का सेकुलरिज्म ?  फिर कहते हो भेदभाव किया जाता है  जबकि शुरुवात हमेशा  मुस्लिम्स  ही करते है. 

 इस तरह तरह के फ़तवो और मुसलमानों के विरोध से बड़ा तबका हिन्दू इनके करीब नहीं आ सकता.जो  बहुमत में राष्ट्रवादी है वो भारतीय सम्विधान का अपमान करने वालो के साथ कैसे आ सकते है ? जो कहते है की ये सब बाते कर के खाई मत बढ!वो, वो अपने मुल्ले और मौलवियों पे लगाम लगाने में ही असमर्थ है, और हम जैसो पर इलज़ाम लगता है की की मौका ढूंढ कर हम बदनाम कर रहे हैं, तो मेरे भाई, पहले अपने सांडो को  खुरापात करने से रोको, शेर खुद ही दूर रहेगा. क्यों मौका देते हो ये सब करने का ? और यदि तुम्हारी जमात में कोई एसा करता भी है तो क्यों नहीं उसका सड़को पर उतर के विरोध करते जो बात बात पे करने में माहिर हो, सड़क पे उतर कर तोड़ फाड़ करना आपकी फेवरेट होबी है, लेकिन आप उस समय नहीं उतर सकते जब तक वह इस्लाम से सम्बन्धित न हो. अब ये न कहना की  झूठा इलज़ाम लगाया है, तोड़ फोड़ तो हम पुरानी वस्तुवों की करते है ताकि नयी वस्तुवों का निर्माण हो सके, जिससे राष्ट्र प्रगति करे, खैर एसा  ये जमात कहती है तो कोई आश्चर्य नहीं.  

 चलो ठीक है, इस्लाम में औरत की आजादी नहीं लेकिन आप भारत में हैं तालिबान  में नहीं, यदि  भारत के तौर तरीके आपको नहीं पसंद  तो बेशक पाकिस्तान में जा सकते हैं, हम जैसो को कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उलटे हम आपकी मदद करेंगे अपना देश का कूड़ा साफ़ करने में. ऐसे मौको पे मिडिया, और मानवाधिकार की दुआई देने वाले बुध्ध्जिवियो सहित अपने अपने  बीवी के पहलू में जा छुपते है और वहां देखने की कोशिश करते है की नारी कितनी  महान है. 

इस तरह की हरकते सिर्फ मुल्ले करते हैं और बाकी मुसलमान उनका समर्थन करते है, यदि नही करते रहते तो सोचिया जो कौम मस्जिद पे गुलाल भर गिरने से आगजनी और दंगो पर उतर आती है वो भला चुप रहती ? 

मुझे समझ में नहीं आता की भारत धर्म निरपेक्ष है या सिर्फ इस्लाम परस्त? यदि इन साब बातो को ध्यान में रख अशोक सिंघल जैसे लोग यह कहे की भारत हिन्दू बहुल है इसको हिन्दू राष्ट्र बनाना है, उसके बाद मुसलमान को दोयम दर्जे का नागरिक तो मई बिलकुल भी असहमत नहीं हूँ. और किसी को भी नहीं होना चाहिए, क्योकि इस्लाम बहुल होते है, फ़तवा और हवा में कोई अंतर नहीं जो की चलती ही रहती है. 

हे मेरे मुसलमान दोस्तों या तो आप सडक पर उतर के विरोध करो या हम मान लेंगे आप समर्थन में हो. यदि आप समर्थन में हो तो अशोक सिंघल जैसे लोग बिलकुल सही और वाजिब है, और भगवा आतंकवाद नहीं  है तो अब  उनका होना भी किसी प्रकार से गलत नहीं. इंसानियत को इस्लामियत से ऊपर रखे, इंसान बने. हाँ इस्लाम के नियम क़ानून कायदे बनाने और उनको फालो करने है तो माफ़ करें, तालिबानियों के लिए भारत उचित  जगह नहीं,  हमारा भारत बक्श दें, हमें शांति से जीने दे. 

राष्ट्वादियों में सहिष्णुता का लोप मुल्लाओ के क्रिया कलापों से होता है  और मुसलमानों की चुप्पी   उसे पुख्ता बनाती है, इसके लिए राष्ट्रवादी  जिम्मेदार नहीं.

"पहले आ बल मुझे मार कहता है , फ़िर मार दिया तो "मार दिया " कह रोता फिरता है. 

 सादर 

 कमल कुमार सिंह. 

3 comments:

रविकर said...

बहुत दिनों बाद पढने को मिला |
स्वागत है-
सादर

प्रवीण गुप्ता-PRAVEEN GUPTA said...

कमल जी आपने बिल्कुल ठीक लिखा हैं, वह धर्म ही क्या हैं जो छोटी छोटी बात पर खतरे में पड़ जाए, इतने खुले विचारों के तो हम हिंदू ही हैं..वन्देमातरम...

Amit Agrawal said...

Nice