नारद: आउटसोर्स

Monday, February 18, 2013

आउटसोर्स



आज कल आउट सोर्सिंग का जमाना है , 
बच्चे न हो कोई बात नहीं , रिकी डोनाल्ड का जमाना , है , 

हमने कहा एक कवी मित्र से यार अच्छा हास्य लिखते हैं , 
मेरे लिए भी लिखो कुछ , उसको हम अपने नाम से पढते हैं , '

कहा ससुर ऐसा करके हमो क्या मिल जायेगा, 
तुम्हारा हाल भी नारायण दत्त जैसा हो जायेगा , 

मेहनत करेंगे हम, ताली तुम ही लोगे , 
लिख भी दिया तो ये बताओ पैसे कितने दोगे , 

मै बोल्का भाई करो न द्रव्य कि बात , 
इसी द्रव्य के चक्कर मे , बुझी न किसी कि प्यास , 
इसके बदले मे मै तुम्हारा सम्मान करूँगा , 
जितना हो सके स्नेह और प्यार दूँगा , 

मित्र बोला चुप लम्पट क्या देगा मुझको प्यार , 
मिला नहीं जब मुझको उससे , जिससे किया इकरार , 

आज भी दिल पे मेरे दिल पे सांप लोट जाते हैं, 
जब कभी मेरे आउट सोर्स पुत्र मामा कह बुलाते हैं 

कमल ( १८ जून २०१२ )

3 comments:

रविकर said...

जू जू काटे काट जू, भांजे की ललकार |
चापर चॉपर चोट दे, बनता बुरा बिहार |
बनता बुरा बिहार, बड़ा लालची मीडिया |
विज्ञापन की दौड़, चढ़े क्यूँ वहां सीड़ियाँ |
रे प्रेस के अध्यक्ष, माँग के खाए काजू |
ले सत्ता का पक्ष, डराए कह के जू जू ||

DINESH PAREEK said...

बहुत सुन्दर
मेरी नई रचना
प्रेमविरह
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।