नारद: गुरु का ज्ञान

Tuesday, July 3, 2012

गुरु का ज्ञान


गुरुर्ब्रह्मा गुरूविष्णु गुरुर्देवो महेश्वर,
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः 

अर्थात, ज्ञान देने वाले को ही सर्वोपरि माना गया है, एक सच्चे  शिष्य के लिए उसका गुरु  ही उसके लिए  ब्रम्हा, विष्णु और समस्त देवता होता  है.  लेकिन ये ठहरे वेद - पुराण  वाक्य, पुराने हो और  बूढ़े हो चुके हैं, आजकल बुजुर्गो की बात कौन सुनता है ? बुजुर्गों को बस घर की शान के लिए घर के द्वार पर बैठा कर हुक्का थमा दिया जाता है, लो गुडगुडाओ, इसी की आवाज निकले, इसी प्रकार वेदों को भी शो पिस बना के घर के किसी कोने में रख दिया जाता, मूड हुआ तो कभी कभार उठा के धुप में रख दिया या कोई कीड़ों वाली गोलि को  वेद का पडोसी बना दिया जाता है एक शशक्त पहरेदार के रूप में, की कहीं कीड़े - चूहे वेद ज्ञान आत्मसात न कर के शेर न बन जाये नहीं तो मोहल्ले में मारा मारी हो जायेगी. 

आजकल मामला उल्टा है,पहले एकलव्य जैसे शिष्य हुआ करते थे जो मूर्ति प्रतिस्थापना  के एवज में अंगूठा दान दिया करते थे, लेकिन आज एक अलग देसी श्लोक है "गुरु गुड रह गया और चेला चीनी हो गया" आज का एकलव्य मंत्र ज्ञान सीख के गुरु को अंगूठा देने की कौन कहे उल्टा अंगूठा दिखा देते हैं, इसमें भी गुरु प्रसन्न रहता है की कम से काम लात तो नहीं पड़ी. 

बचपन में गुरु जी लोग बड़ा तंग किया करते थे, कभी गृह कार्य देते कभी पी टी कराते, जिससे कभी कभी बच्चों की टोली गुरु जी को ही मंतर सूना देती थी, पंडि जी पंडि जी गुड खाब्यअअ, मारब धनुसिया से उड़ जाबअअ, खैर लड़कपन था, बच्चो को तो भगवान भी माफ कर देते हैं ये तो ठहरे इंसानी गुरु, दूसरे जो माफ न करे तो अगले दिन कुर्सी का कौन सा पाया टूट जाए कुछ पता नहीं, गुरु थे, ज्ञानवान थे, उन्हें अपने शिष्यों की कुशलता का भान था, अतः बिना कुछ कहे माफ कर दते थे. 

जब मै हाईस्कूल में था लगभग सभी विषय में अछ्छा था, सिवाय गणित के,  साप्ताहिक और महिन्वारी टेस्टो में सभी विषयों में उत्तम प्रदर्शन था, लेकिन गणित के पास रेखा के पास जाते जाते मेरी हिम्मत जवाब दे जाती अंतत मै  फेल हो जाता. शुरू में गणित वाले गुरु जी ने सोचा की लड़का ही गदहा है, सो कुछ नहीं बोलते थे. गदहों की कहाँ पूछ भला किसी भी जमाने में? निश्चय ही उनके मन में बड़े नकारत्मक व्यक्तित्व था मेरे पढाई लिखाई को ले के. कद में चार फूट आठ इंच रहें होंगे. कक्षा में जैसे ही प्रवेश करते बच्चे टिंगू जी टिंगू जी करने लगते. कौन बोला ?? गरजते,  लेकिन इतनी दुर्लभ जानकारी कौन दे  ??, सभी एक सुर में बोलते आचार्य जी हम लोग त्रिकोण मिति का पेट नेम रख दिया है टिंगू जी. 

एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया, पूछ तुमने मेरा नामकरण किया है?? मै आश्वस्त हूँ की तुमने ही किया है लेकिन फिर भी तुम्हारे मुह से सुनना चाहता हूँ. एक तो तुम पढाई में में कमजोर दूसरे ये सब हरकते?? एक तो तित लौकी दूजा नीम चढ़ा? बिना मेरा जवाब सुने मेरा कान पकड़ प्राचार्य  कक्ष की और चल दिए, मै भी अपने कान के पीछे पीछे चल दिया. 

प्राचार्य कक्ष में हिंदी और समाज शास्त्र, और विज्ञानं  के अध्यापक भी थे, मेरी दयनीय अवस्था देख उन्हें आश्चर्य हुआ, उनको शायद ये पता नहीं था की मेरी ये दयनीय अवस्था गणित में दयनीय होने की वजह से हुई है.  

अरे इसे क्यों पकड़ लाये शास्त्री जी ये तो भला बच्चा है. हिंदी वाले गजानन आचार्य  ने कहा. 
हाँ इसी भले बच्चे ने आपका भी कोई भला नाम रखा होगा, नहीं पता तो आप खुद इसके मुह से सुन लो, चल  रे बता क्या नाम रखा है बाकियों का ?? गणित वाले आचार्य अपने गणित के आधार पे बोलते गए.  एक तो इसका पढाई लिखाई में मन नहीं लगता ऊपर से एक नंबर का शैतान है. 

 मै चुप चाप अपने ऊपर लगाये जा रहे महाभियोग को सुनता रहा, 

उसको जाने दीजिए बात करते हैं, विज्ञान वाले आचर्य जी ने कहा. 
मै चुपचाप अपने कक्षा में चला आया, सहपाठी आँखों से सहानुभूति बरसाने लगे, कान छु के बोले बड़ा गरम हो गया है यार. 

दिन बिता छुट्टी हो गयी, हम सब साईकिल स्टैंड की तरफ जाने लगे, "रुको"  पीछे मुड के देखा तो आचार्य जी की आवाज थी. "आज मै भी तुम्हारे साथ चलूँगा मै भी उधर ही जाता हूँ"   कह के साईकिल मेरी हाथ से छीन मुझे डंडे पे बैठने का इशारा किया.  वास्तव में बताऊ तो मुझे डंडे पे बैठने पर असह्ह्य पीड़ा होती थी, मन मार कर बैठ गया.  भगवान से प्रार्थना करता की देव गुरु जी का घर जल्दी आ जाए और ये मेरा पिंड छोड़े, कही रास्ते में रोक कर पिटाई न कर दे, प्राचार्य कक्ष में मौका न मिला, कसर कही रस्ते में न उतार दे. मन में बड़ा उतार चढ़ाव चल रहा था, इसी अनुभव से आज मै नेताओ के मन की स्थिति का आंकलन लगा सकता हूँ वोटिंग के समय की .   

थोड़ी दूर चले थे की तालाब आ गया जहाँ की दूकान से हम रोज सोमोसे खाया करते थे, समोसे खाने के बाद कुछ देर तालाब के मेढको का हल चाल पूछते फिर घर की और रवाना  होते. सबने अपने पने मेढक छांट रखे थे, पीला बड़ा वाला मेंढक मेरा था, इसी तरह से किसी का गहरे हरे रंग वाला, तो कोई हम दोनों के मेंढक को पसंद करता, जब तक हम लोगो को अपना अपना वाला मेंढक न दिख जाता हम हिलते नहीं थे वहाँ से. खैर उस समय की उम्र शायद मेंढक ही छांटने की होती है, संस्कार वश या कहिये उम्र का तकाजा उस वक्त कुछ और नहीं छांटा जा सकता था.  

गुरु जी भी उसी समोसे वाले से चार समोसे ले के आये, मै चौंका, उस समय तक मै अंगुलिमाल की कहानी पढ़ चूका था, सोचने लगा इनको कौन से बुध्ध मिले आज जो ह्रदय परिवर्तन हो गया. 

अरे घबराओ नहीं समोसे मुझे भी पसंद है, कह मेरी तरफ दो समोसे बढ़ा दिए. मैंने भी मन के डर को समोसे की रिश्वत दे ढांढस बधाया. 

"मैंने आज तुम्हारे सभी विषयो की जांच की, उत्तर पुस्तिका देखि". आधा समोसा मुह में भर के गुरु जी ने कहना शुरू किया.  मुझे लगा की लगता है ईद का बकरा बनाया है, समोसे खिला खिला के कोसेंगे.  

"विज्ञान हिंदी  और अन्य विषयों के अध्यापक ने मुझे झूठा बना डाला, मानने को तैयार ही नहीं की तुम मेरे विषय में कमजोर हो" आगे कहा. 

मैंने एक फिल्म देखि थी जिसमे गुंडा हीरो का की आँख की पट्टी पे आँख बाँध किसी घने जंगल में ले जा के कोई झूठा अपराध कुबूलने को कहता है . मुझे लगा की शायद कल स्कूल में  मुझे भी ये कुबूलना पड़ेगा की मै पढाई में फिसड्डी हूँ. अच्छा बनाया गुरु ने समोसे खिला के. 
बेटा देखो मै अपना अपराध मनाता हूँ जा कक्षा में आज हुआ लेकिन मुहे तुम्हारे बारे में पता न था, जब अन्य लोगो ने तुम्हारे बारे में बताया तो पता चला की तुम सिर्फ गणित में ही कमजोर हो. मान लो यदि तुम हर विषय में प्रथम भी आ गए लेकिन गणित में फेल हो गए तो बोर्ड में तो फेल ही हो जाओगे, बेहतर है की तुम गणित सुधारों. गणित के बिना न तुम बोर्ड पास कर सकते हो न दुनिया दारी. भिन्न भिन्न रूपों में हर जगह गणित का ही बोला है, बिना गणित के कहीं भी गणित नहीं लगती, कल मै तुम्हे रोज दो घंटे शाम को पढाया करूँगा आशा है की तुम अन्य विषयों की तरह गणितबाज भी बन जाओगे. 

अब मै खुश भी था साथ में रोने भी लगा था. उसके अगले दिन से गुरूजी ने निशुल्क मेरी कक्षाए लेनी शुरू कर दी, महीने के अंत में  फीस पूछा तो मना कर दिया.  उनका वास्तविक नाम मुझे याद  नहीं आ रहा, लेकिन उनके लिए आज भी मेरे मन में अपार श्रध्दा है. 

आजकल शायद इसे गुरुवों का अभाव हो गया, या शायद कहीं कहीं होते होंगे .  

सादर 
कमल 

3 comments:

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति ।।



इस प्रविष्टी की चर्चा बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी !

सूचनार्थ!

दिगम्बर नासवा said...

उस युग गुरु द्रोनोचारी जैसे गुरु थे इसलिए आज एकलव्य रूप बदल के आए हैं ... कहीं अंगूठा दुबारा न मांग लें ...
आपकी पोस्ट मजेदार है ...

bhuneshwari malot said...

aabhar ,bahut achchi rachana h.