नारद: आरक्षण और जातिवाद

Saturday, November 12, 2011

आरक्षण और जातिवाद



आरक्षण, एक जवलंत मुद्दा है, बहुत दिन से सोच रहा था इस मुद्दे पे कुछ विचार रखने का लेकिन हिम्मत न पडती थी, लेकिन भला हो मंडल जी का जिन्होंने बताया कि आजकल तो लोग १० रूपये का पत्रकार भी बन जाते हैं, शायद उन्होंने खुद १० रूपये में साईबर कैफे से पत्रकारिता कि होगी.

खैर उनके हौसलाफजाई से मेरी हिम्मत बढ़ी सो आज मै भी बैठ गया मुह में पान दबा के, बमुश्किल दो लाइन पूरी हुई होगी तभी मेरे दो मित्र आ गए जिनको देख के मै अपने दुश्मन तक को भूल जाता है था, उधार तो कभी लौटते ही न थे दोनों रंगा-बिल्ला.

रंगा धुर  पंडित और कालेज में प्रोफ़ेसर थे जबकि  बिल्ला प्रशाशनिक अधिकारी जिनको रंगा दिन रात कोसा करते थे "कोटे में आया है ". दोनों में "कोटे" को ले के तू तू - में में जिस दिन न हो उसके अगले दिन रंगा पढ़ा न पाता था, और बिल्ला अपने मातहतों को विदेशी घी में लपटी हुई गालियों के गोले देता था.

बैठका में घुसते दोनों धम्म से सोफे पे धंस गए,  श्रीमती को दूसरे के लिए चाय बनाने में ह्रदयाघात लगता था सो भुनभुनाते ह्रदयाघात हेतू  किचन में चल दीं.

तपाक से मैंने कहा : "महीने का पहला सप्ताह है भाई, कुछ बोहनी करा रहे हो क्या ?

सुनते ही दोनों एक दूसरे का मुह देखा, ठहाका लगा के कहा  "जिसका लेना कभी न देना मर जाना पछताना क्या ? "

कहो कैसे याद  किया ?? मैंने कहा .

"भाई कल  आरक्षण विरोधी आन्दोलन में जाना है, नेवता देने आया था "  रंगा ने कहा .

तुम कैसे आये भाई ??? बिल्ला कि ओर देख के कहा .

"यार आरक्षण विरोधी मोर्चा के विरोध में एक भाषण लिख के दे दो, इन्ही के सामने वाला मैदान बुक किया है. " बिल्ला ने कहा .

अमा यार हमको भगवान कृष्ण समझ रखा है ?? धर्म संकट में क्यों डालते हो ???

तभी श्रीमती जी अपना ह्रदयाघात तीन कप में सजा के ले के आयीं साथ में भुनभुनाहट का प्लेट  नमकीन भी .

"भाई देखो आरक्षण बड़ा ज्वलंत मामला है, चाय पी के न तो सहमति हो सकती है न मै विपक्ष में कुछ लिख सकता हूँ. एक काम करो कनाटप्लेस का एक बड़ा सुन्दर व्यवस्थित जगह है जहाँ हम तीनो कि व्यक्तिगतता  भी हो जायेगी और  स्वर्गादित इन्द्र पेय के बाद  विचार भी उमडेंगे. "  मैंने कहा, वैसे  भी इतने सुन्दर मौके को छोड़ने का मतलब ठीक वही था जैसे सोनिया जी कि कुर्बानी से मनमोहन का प्रधानमंत्री बनना .  

मन मसोस के दोनों ने स्वीकार किया और चले टारगेट पे. रास्ते दोनों ने  तीन बार बताया कि कार जादा पेट्रोल खाती है, बीच बीच में इसके लिए सरकार को मातृत्व का  साधुवाद और बहन का स्नेह उड़ेल रहे थे.

कोने का टेबल देख चिपक गए और बिना देर किये आत्म तृप्ति के लिए एक पूर्ण का आह्वाहन कर दिया.

"अब तो चलोगे न"  ? रंगा  ने कहा ,
"भाई लगे हाथ लिख भी दो , जादा टाइम नहीं है , और तुम्हारा कोई भरोसा भी नहीं होता जब तुम मग्नता में होते हो"  बिल्ला ने कहा.

यार रंगा  पिछले महीने वाला हिसाब भी साफ़ कर देते तो कल  पुरे मन से चलता जम के भाषण देता, और बिल्ला लिखने में तभी मजा आता है जब मन साफ़ हो, तुम भी रंगा का अनुशरण करो.

हिसाब  और एक चौथाई खत्म कर के रंगा से पूछा " भाई ये आरक्षण का विरोध क्यों ? "

रंगा   " यार अजीब हो , तुम्हारे पास आँखे हैं या अंडे ?, दिखता नहीं स्वर्ण मेधावी बच्चे कितने कुचक्र में फस रहें हैं, आजादी के साठ सालों बाद भी आरक्षण ? इतने सालो में इनका विकास न हुआ तो अब क्या होगा ? भीम राव जी ने आजादी के बस कुछ आगामी सालो तक आरक्षण का प्रावधान किया था, जो अब तक  चल रहा है, तुर्रा ये कि आरक्षण पाने  के बाद भी सवर्णों को गाली देते हैं, अलबत्ता इनकी शादी अधिकांशतः ब्राह्मण ही करता है, नर्क मचा रखा है दलितों ने.

मायावती ने दलितो के नाम पे अपनी मूर्ति खड़ी करा ली , अब तुम्ही बताओ किसी सवर्ण मुख्यमंत्री ने ऐसा किया ? कुछ दिन बाद उसी मूर्ति के आस पास जोड़े चोंच लड़ाए जायेंगे, दलित उत्थान  के नाम पे सवर्णों को लुटा खसूटा जा रहा है. ये सारे पुल आरक्षण वाले ही गिराते हैं.

कल को ये कहेंगे इन्हें हमारे तनख्वाह में से भी चाहिए. वो मंडल कहता है कि दलित एक भी अन्ना टीम में नहीं, मै कहता हूँ भाई तुम खुद तो  कोई शुरुवात कर नहीं सकते अलबत्ता मुह उठा के हिस्सा  माँगने चल देते हो.

 दलित भी कुछ अच्छा शुरुवात करे जो कि कभी करते नहीं,  और सवर्ण हिस्सा मांगे तो देखिये इनकी मोटी मोटी गालियाँ, जो की ये वैसे  भी देते हैं. दर्जनों बच्चे पैदा कर देश कि संख्या बढ़ाते हैं और फिर चिल्लाते हैं आरक्षण दो, तुर्रा ये कि बोल दो कि "कोटे से आया है"  तो भड़क जाते हैं जो है सो है , भडकना क्यों ? आरक्षण भी चाहिए और दलित भी नहीं कहलवाना चाहते,  गुड़ खायं और गुलगुले से परहेज  .

मै तो कहता हूँ कि जो योग्य हो वो आगे जाए, आरक्षण क्यों ? "   एक साँस में प्याला खत्म करते हुए एक साँस में बात भी ख़म कर दी रंगा ने.

बिल्ला कि भी आँखे लाल हो चली, कुछ असर प्याले का था कुछ रंगा कि बातों ने रंग चढ़ा दिया, रंगा को रंग दिखा के कहा   " हाँ हाँ क्यों नहीं सारे पुल हम गिराते हैं, अपना न देखते, दलितों को आगे बढते देख तुम्हारे आँख कान लाल हो जाते हैं, सोचते हो कि अब दरी कौन बिछायेगा ??? झाड़ू कौन लगायेगा, हमारी तरक्की देखि नहीं जाती तुमसे इसीलिए आरक्षण का विरोध करते हो . तुम लोगो कि वजह से पिछड़े हैं तो गाली किसे दें ????

हमने कहा  " यार  हम तीनो संग में पढ़े , बढे हुए , तब तक तो  एसी कोई बात विचार में न थी, किसी ने बिल्ला को दलित या पिछड़ा न माना, आज का ही वाक्य देख लो, श्रीमती ने तीनो को बराबर से ह्रदयाघात दिया . अब क्या हुआ कि अपने अपने काम छोड़ उटपटांग कामो में लग गए हो ? , भाई रंगा यदि जनसँख्या बढ़ाने वाली बात है तो तुम्हारे पिता जी कम थे , जो तुम्हे ७ और भाई घेलुवा में दे गए ? उनसे देश का विकास होता है , ???
सुनो आरक्षण जरुरी है , लेकिन जात के आधार पे नहीं बल्कि पिछडेपन के आधार पे.

भाई बिल्ला आरक्षण तुम्हे मिला तुम अधिकारी बन गए , अब तुम पिछड़े कहाँ ? रामविलास पासवान जैसे नेता जो हर सरकार में मंत्री हो वो पिछड़े कैसे ? लालू यादव को आरक्षण क्यों ? हर वो इंसान जो वास्तव में पिछड़ा था आज डाक्टर, अभियंता बन बराबरी में आ गया वो दलित कैसे ????
बाबा रामदेव यादव होके कहाँ से कहाँ पहुच गए, अच्छे अच्छे  मनुवादी  उनके मंजन से दांत चमकाता है.
 भाई आरक्षण का का नियम बना देना चाहिए कि जिसकी परिवार कि मासिक आय फला से ऊपर हो वो दलितों में नहीं आयेगा,
नेतावों और दस रूपये वाले पत्रकारों के चक्कर में पड़ोगे तो यही होगा, वो भला क्यों सही रास्ता दिखायेंगे, उन्हें अपनी दूकान बंद करानी है क्या ? जब एक बार विकास कर लिए तो आप  अपने बाकी भाईओं को भी मौका दो.
जब आरक्षण वाली पीढ़ी भी पढ़ लिख के समझदार हो चुकी है तो इन नेतावों के चक्कर में पढ़ कर के सवर्णों को गाली देना मूर्खता है नहीं तो सिर्फ और सिर्फ दुराव होगा और ये सवर्ण इसी  तरह से विरोध करेंगे, मलाई खायेंगे नेता .
तुम दोनों यही बाते कहना एक ही मैदान कहना . दूसरा मैदान  कैंसिल कर दो जो पैसा बचे तो कल फिर यहीं आ जायेंगे.  देखो मजा फिर यदि एक बार सबके समझ में तुम्हारी बातें आ गयी तो, दुराव फैलाने से बेहतर है मेरा उपाय लगाओ, और हीरो बन जाओ, खाना पीना संग में करते हो तो मुद्दा अलग कैसे. अब बताओ अब मै चलू या लिखूं ?

बहुत सही गुरु घंटाल बातें सही बता के कल का भी इंतजाम कर लिया, सभा समाप्त हुई और सब वापिस वाहन में,  रास्ते में  तीनो सरकार को मातृत्व का साधुवाद दे रहे थे,  आरक्षण निति पे .

कमलं  १३ नोव २०११ 

5 comments:

Ravi S. Singh said...

आरक्षण पर कटाक्ष पर अभी तक जो मैंने पढ़ा था उसमें सबसे उम्दा व्यंग.. लगे रहो कमल भाई..

Madhulika Tripathi said...

खुद १० रूपये में साईबर कैफे से पत्रकारिता कि होगी.श्रीमती जी अपना ह्रदयाघात तीन कप में सजा के ले के आयीं साथ में भुनभुनाहट का प्लेट नमकीन भी .
इन पंक्तियों में आपने पत्रकारिता केस्तर पर चुटीला व्यंग किया है ..तो इंगित द्दोसरी पंक्ति में गृहणी की मनोव्यथा ...जो योग्य हो वो आगे जाए, आरक्षण क्यों ?इस बात से हम पूर्णत सहमत हैं
आपने वाकई ज्वलंत मुद्दा उठाया है जिस पर एक खुली बहस होना चाहिए ....क्योंकि आज का योग्य युवा जब आरक्षण की वजेह से कर्म क्षेत्र में असफल होता है तो इस व्यवस्था की खामियां रोष के रूप में सामने आती हैं....
.सामाजिक सरोकार से जुड़े प्रश्न और मुद्दे उठा कर जनचेतना जाग्रति के लिए प्रयासरत रहें ..इस लेखन के लिए साधुवाद .

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

सही और करारा व्यंग।

kanu..... said...

bahut hi karara vyang...accha laga...

चन्दन..... said...

बहुत हि अच्छा व्यंग जी