नारद: काफिर से हार

Monday, April 30, 2012

काफिर से हार




बात उन दिनों की है जब पंडित मदन मोहन मालवीय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जी जान से प्रयासरत थे.  इसाई से हिन्दू बनी श्रीमती एनी बेसेंट ने जब बनारस के "सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल" को विश्वविद्यालय में परिवर्तित करने का सुझाव मालवीय जी से साझा किया तो मालवीय जी सहर्ष  स्वीकार कर इस कार्य के लिए अग्रणी हुए.  सबसे बड़ी समस्या थी जमीन की  उस समय  तत्कालीन  काशी नरेश महाराजा बनारस ने तत्काल इस सत्कार्य के लिए  १५ किलोमीटर की जमीन उपलब्ध करायी  जिसमे साधे 6 किलोमीटर  नगर के  अन्दर   और बाकी की जमीन मिर्ज़ापुर के बर्कक्षा नामक स्थान पे थी.  अब समस्या थी धन की कुछ हद तक मदद महाराजा दरभंगा की तरफ से हुआ लेकिन पूरा न पड़ा. उस समय हैदराबाद के निजाम विश्व के धनाढ्यों में गिने जाते थे. मालवीय जी ने उनसे मदद लेने की सोच निजाम हैदराबाद के पास पहुचें.  लेकिन ये क्या ??? निजाम ने उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देख खूब खरी खोटी सुनायी  एक "हिन्दू विश्वविद्यालय "  की स्थापना के लिए मुझसे मदद मांगने की हिम्मत कैसे हुयी ?? मालवीय जी मुस्कराए  " क्या विश्वविद्यालय  हिन्दू होना ही अपराध मात्र है ??? " 

तब निजाम ने उनका तिरस्कार करने के लिए अपने जूते उनके हवाले कर दिया. " एक हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए मै तुम्हे  बस अपना जूता ही दे सकता हूँ इससे जादा कुछ नहीं." 

 मालवीय जी कुछ सोच मुस्कराए और जूता ले चुपचाप  निकल लिए.  

अगले दिन पुरे हैदराबाद में घोषणा करावा दी, की निजाम हैदराबाद के जूते बिकाऊ है, कृपया सभी लोग अपनी अपनी  सामर्थ्यनुसार ले के इस महान निजाम की जूते की बोली लगाये. 

घोषणा सुन निजाम घबराया, जिसके सामने कोई सर नहीं उठाता उसकी टोपी तो छोडो यह ब्राहमण जूते तक लीलाम करने पे तुला था . 

उसने तत्काल अपने कारिंदे को ताकीद दी की वो जाए और सबसे ऊँची बोली लगा वो जूता वापिस ले आये.  आखिरकार निजाम को अपना ही जूता खरीदना पड़ा, और मालवीय जी से क्षमा  माँगा. 

जिसके फलस्वरूप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे "रत्न खान"   की स्थापना हुयी जो आज तक  ढेरो रत्नों को उगल रहा है. 

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