नारद: वर्कशॉप

Wednesday, June 25, 2014

वर्कशॉप


स्वर्ग का अमरावती, कर्नाटक का हम्प्पी, और और ज्ञान का केंद्र ब एच यू को मिला के जो स्पेसिमेन कोपी बनेगा वो है गंगा के किनारे स्थित स्थित सामने घाट पर “ज्ञान प्रवाह”. 
भारत के इतिहास, कला का का औटोनमस् रिसर्च सेंटर. बेहद खूबसूरत. ओह्ह्ह, इतना खूबसूरत मुझे बी एच यु भी कभी नहीं लगा. 

नाथद्वारा पेंटिंग मे उदयपुर के प्रसिध्द चित्रकार राजाराम जी का वर्कशॉप था, और मै उत्सुक था. खड़ा था ब एच यू के गेट पर सुबह ९ बजे से, उन दिनों मैंने हॉस्टल मे ही रुकना सीख लिया था, हलाकि मै डे स्कालर था. गाडी ठीक समय पर आई सारे अनजान लड़के लड़किया बैठ गए. सभी के नजर चोर थे. एक बात खास थी की वो सारे ललित कला संकाय से थे और मै पर्यटन प्रबंधन का एकलौता छात्र. 

इस वर्क शॉप को करने के लिए मैंने बी एफ ए के प्रोफ़ेसर की स्पेशल सिफारिश की थी, नाम याद नहीं आ रहा उनका. वो भी पता नहीं क्या समझके मेरा नाम दे दिया “हम्म्म्म, पता नहीं क्यों मुझे लगता है की तुम्हे इस वर्क शॉप मे जाना दिया जाना चाहिए” कह कर मेरे फार्म पर साइन कर दिया.
तरह तरह के चित्रकार थे वहाँ जो नाथ्दारा स्टाईल सीखना चाहते थे, मै उनमे अपने आप को कही नहीं पा रहा था. वहाँ सभी एक दूसरे को जानते थे, सिर्फ मै था जिसे बस उसके ब्रश जानते थे.

“आप बी एफ ए के तो नहीं हो” एक लड़की ने मुझसे सवाल किया. 

मैंने सर हिला दिया, गजब का शर्मीला था मै उन दिनों, काँटा (असलि नाम- कांता) मुझे आज देख ले तो शायद वो विश्वाश न करे की ये मै ही हू. हालाकि आज भी मै खूब बोलता हू तो बस खास लोगो के साथ. 

“वोकल कार्ड खराब है क्या” – उसने कमेन्ट किया. 

मै फिर मुस्करा दिया बिना जवाब दिय्ये, जिससे शायद वो जल भून गयी होगी. 

कई दिन तक मै यू ही चुप रहा- स्वभावत: , बस गुरु राजा राम की अगुआई मे सीखता रहा. 
हाँ कभी कभी डाईरेक्टर प्रोफेसर आर सी शर्मा हमलोगों का हाल चाल ले जाते ( वो एक मूर्धन्य ग्यानी माने जाते है आज भी कला और इतिहास के, भारत कला भवन के डाईरेक्टर भी रहे वो- आज हमारे बीच नहीं है).

“यार तुम्हारा चेहरा जाना पहचाना सा लगता है”, अचानक एक दिन मैंने एक लड़के से मैंने पूछा, और शायद उस दिन पहली बार मेरी आवाज किसी ने उस वर्क शॉप मे किसी ने सुनी थी.

“पिछले जन्म मे तुम्हारा जीजा था” कह के वो हसने लगा, और मै कुढ़ गया. बेटा अब तो तू गया , पिटेगा तू ( मै शरीफ और शर्मीला था – कमजोर नहीं, और मै बनारस का ही हू तो जादा समस्या नहीं थी मुझे ये सब सांस्कृतिक कार्यकर्म का आयोजन करवाने मे) . 

ज्ञान प्रवाह की गाडी बी एच यू गेट पर छोड़ गयी. और मेरे दोस्त आ चुके थे, उनमे कुछ इंजीनयर थे, कुछ डाक्टर (सब आधा – यानी छात्र), कुछ उबन्तु शुध्ध बिरलाइट्स उस तथाकतित जीजा को पकड लिया, तो वो घबरा गया, उसे सपने मे भी गुमान नहीं था, की मेरे जैसा लौंडा की कोई बात भी सुनेगा. 

“महाराज जरा मटन बनाना” एक मटन को धोने के बाद दूसरा खायेंगे. बिरला होस्टल के मेस मे उसको पटक के किसी ने खानसामा से आवाज लगाई थी. उसका चेहरा फक पड़ चूका था, उसे नहीं समझ आ रहा था की उसे क्या क्या करना चाहिए या कहना चाहिए, क्योकि गलत तो वो कह चूका था. 
“भोसड़ी के तुम्हारा नाम क्या है ? “ एक एम् बी बी एस ३र्द इयर के लौंडे ने पूछा, जाहिर सी बात है की मेरे टोली का था.

“रामधनी” उसने रोवासा चेहरा बना के कहा. अब सच मे मुझे भी उस पर दया आने लगी थी. कलाकार का दिल कोमल होता है. . 

“कहा के रहने वाले हो ?” फिलोसफी के लड़के ने कुहनी मारी. 

“खमरिया – भदोही” – अब तक वो रो चूका था बस आँख मे आसूं नहीं थे. 
इतना सुनते ही मेरा पारा ठंडा हो गया.

वो इसलिए की वहाँ के ही कोलेज से मैंने दसवी की थी. रामधनी मेरे कान मे ये नाम दुबारा कौंधा, इस लडके के बारे मे ये कहा जाता था, की उस उम्र मे (जब वो ८ वि मे था) किसी का भी चेहरा देख कर दिन भर का कोमिक्स बना डालता था, ये नाम मैंने सुना था. 

अबे क्या हुआ ? – मेरे एक दोस्त ने मुझे सर पे हाथ रखे देख पूछा,

छोड़ यार इसको तुमलोग, मै बात करता हू. मैंने कहा. पता नहीं क्यों मुझे लगा की ये वही है जिसके बारे मे मै उस समय सुन चूका हू. 

अभी तक श्योर नहीं था मै, - कहा से पढे हो ? 

शहीद नरेश विद्या मंदिर . उसने जवाब दिया. 
हाँ ये पक्का वही है, बी एफ ए मे भी है, खमरिया का है, शाहिद नरेश से भी पढ़ा है. ये वही है. 

राहुल को जानते हो ? अमरनाथ को , मैंने एक साथ पूछा .

हाँ – उसने कहा . 

हाँ ये वही था . 

यार तुम चित्रकार आदमी ऐसी बदतमीजी करते है ? मैंने कहा . तब तक हमारा मटन आ चूका था, 

अरे यार इसका भी प्लेट लगवावो , हमारा गुरु भाई है . मेरे सारे दोस्त मेरा चेहरा देखने लगे थे. 

दूसरे दिन से हम ज्ञान प्रवाह साथ जाने लगे थे. अब हम अच्छे दोस्त थे. काई सालो तक दोस्ती रही. 

मै देल्ही आ गया, बनारस जाता रहा जब तक ओ डिपार्टमेंट मे रहा, मै जब भी बनारस जाता फैकल्टी आफ विजुअल आर्ट मेरा अड्डा रहा, हलाकि अपने डिपार्टमेंट कभी नहीं गया. जब भी जाता उसके साथ एक पेंटिंग जरूर बनाता . उसके बाद वो पुणे चला गया. 

अंतिम, समय मेरी उससे बात सन २०११ मे हुई, हाय हेल्लो हुआ , फिर उसने एक लड़की से भी बात कराई संभवतः वो उसकी गर्लफ्रेंड होगी. 

फिर मै अपने कामो मे व्यस्त हो गया. एक बार उसके नम्बर पर फोन किया तो “सेवा मे नहीं है “ की आवाज आई. मुझे लगा वो खुद मुझसे संपर्क करेगा. लेकिन उसने नहीं किया. 

कुछ दिनों बाद फेसबुक पे मुझे श्याम मिला, अब वो एन आई डी- अहमदाबाद मे था, “यार रामधनी का नंबर नहीं मिल रहा” मैंने उसे मसेज किया. 

“HE IS NO MORE” FLU ATTACKED HIM “ – उसने जवाब दिया और मेरी साँस अटक गयी. हाथ से ग्लास छूट गया. जितना पिया था अब वो आँख से बाहर आ रहा था,. ओह्ह . 

आज बरबस सब कुछ याद आ गया, जब मकान शिफ्ट करने के चक्कर मे उस वर्कशॉप का सर्टिफिकेट हाथ आया. 

और दोस्त तुम याद आ गए, ये फोटो मुझे कभी नहीं भूलती, तुमने जबरजस्ती करके मेरी ये एक्शिबिशन लगवायी थी. 

कमल

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाह बहुत सुन्दर! आपका दिन मंगलमय हो !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बेहतरीन प्रस्तुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (26-07-2014) को ""क़ायम दुआ-सलाम रहे.." (चर्चा मंच-1686) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'