नारद: Anna team
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Tuesday, October 2, 2012

गिरगिट गैंग के गिरगिट समर्थक

कोंग्रेस का हाथ अन्ना के साथ 

गिरगिट (Chameleons) एक प्रकार की छिपकली है। तोते की तरह के उनके पैर; अलग-अलग नियंत्रित हो स्कने वाली उनकी स्टिरियोटाइप आँखें; उनकी बहुत लम्बी, तेजी से निकलने वाली जीभ; सिर पर चोटी (क्रेस्ट); तथा कुछ द्वारा अपना रंग बदलने की क्षमता इनकी कुछ विशिष्टताएँ हैं। इनकी लगभ्ग १६० जातियाँ "हैं " जो अफ्रीका, मडागास्कर, स्पेन पुर्तगाल, दक्षिण एशिया आदि में पायी जातीं हैं।

 लेकिन सन २०११-१२  के दौरान भारत में एक और १६१वें किस्म के  एक अनोखे और आश्चर्यजनक गिरगिट का पता चला जिसका चाल ढाल तो इंसानी था लेकिन बाकी विशेषताएं जैसे तेजी से निकलने वाली जीभ,  सिर पर चोटी (क्रेस्ट= अर्थात कोंग्रेस का हाथ); और अन्य विशेस्तावों से युक्त  पल पल रंग बदलने की अदभुद क्षमता, एसा माना जा रहा है की यह सबसे उन्नत किस्म का गिरगिट है जिसने  बाकि के १६० प्रजातियों को पछाड़ दिया है.

मेरा ये कहना गिरगिट और गिरगिट समर्थको को बुरा जरुर लगेगा, वो मुहे गालियाँ दे सकते हैं, या कुतरक, लेकिन हाँ तर्क सहित वो मेरी बात को गलत साबित नहीं कर सकते और इतना तो गिरगिट और गिरगिट समर्थक भी जानते  हैं.

जिस केजरीवाल और अन्ना  को दो साल पहले तक उसका खुद का मोहल्ला न जानता हो उसे आज पूरा देश जनता है. कैसे ??  सिर्फ और सिर्फ गिरगिट विकास के अध्याय में एक नयी  कड़ी जोड़ने के कारन मात्र, अब ध्यान देने योग्य बात ये है की इस नयी प्रजाति को विकसित करने की जरुरत क्या आन पड़ी ??


कई साल तक  पहले जमीनी कार्य और जनता  में अलख जगाने के बाद बाबा रामदेव ने काली सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने की तिथि की घोषणा जून २०११ निर्धारित कर दी तो महीनो पहले से जनता उस दिन का इन्तजार बेसब्री से करने लगी, क्योकि जनता सरकार के काली करतूतों से अजीज आ चुकी थी इसके कई कारन थे, पहला,  वेश्यावों के को रखने वालो, ब्लू फिल्म बनाने  वालो और अवैध बच्चो के पिता जी, और घोटाले उत्पादक सरकार से जनता तंग आ चुकी थी.. परेशांन थी, हैरान थी, उसको चाहिए था तो किसी का नेतृत्व, ये कमी बाबा राम देव ने पूरी कर दी तिथि  घोषणा के साथ.

जमीनी तौर से कई वर्षों से हर प्रकार के देश सेवा करने वाले बाबा रामदेव्  ने आन्दोलन से पहले जमीनी  रूप से ढेर सारे कार्य कर चाहे वो  स्वदेशी  हो, योग हो, आयुर्वेद  हो, या व्यापार हो शीर्षता हासिल कर  जनता मे परबा विश्वाश बना लिया था. जिससे कोंग्रेस  के पेट में बल पड़ने लगने, जरूरत थी एन केंन  प्रकारेंन  किसी भी तरह  योग गुरु बाबा रामदेव को नीचे दिखाना, लेकिन ये आसन काम नहीं था और न ही है. तो क्या किया जाए ?? अकबर  बीरबल के "रेखा छोटी करो" का सिध्धांत अपना बाबा के बराबर किसी भी इंसान को उस  स्तर तक लाया जा सके  चाहे  वो उस योग्य हो  या न हो, इसके लिए मिडिया का खूब इस्तमाल हुआ.

अब देखिये घटना क्रम कितनी तेजी से बदलता है.

बाबा के तिथि घोषणा के बाद है एक ऐसे गुमनाम शक्श को रातो रात भारत की जनता का मसीहा बनाया जाता है जिसको पिछली सुबह तक कोई जानता तक न था, जो शायद किसी महारष्ट्र के अनाम गाँव से था... वास्तव मैंने खुद भी इनका नाम कभी नहीं सुना था, और मेरी ही तह करोड़ो युवावों ने भी, जो महारष्ट्र से नहीं थे.

एक सभा बुलाई, बाबा राम देव को बुलाया, बाबा ने उसका परिचय अन्ना हजारे के नाम से इस देश को कराया. शायद ये सब पहले से सोची समझी योजना थी. शायद इसके पीछे केजरीवाल का दिमाग रहा हो.. केजरीवाल का इतिहास खंगाला  जाए तो केजरीवाल वास्तव में बहुत ही महत्वाकाक्षी व्यक्ति रहें है, एक बार इनसे  किसी टी वी वाले ने पूछा की अपने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ दी, तो इनका जवाब था, यहाँ न नाम है न इज्जत, मुझे और जादा चाहिए ... यानि ये दिल मांगे मोर...

अब अन्ना के लांचिंग के लिए  किस पैड का इस्तमाल हों ?? तो  इस्तमाल बाबा का किया जो इन   के मनसूबे से अनजान थे. उन्होंने सोचा काम देश का है तो एक से भले दो... उन्हें नहीं पता था की जिस भर्ष्टाचार को मिटने के लिए बाबा रामदेव,  इन  गिरगीटो  को अपना आशीर्वाद दे रहे हैं वही दोनों आगे चल के इनके लिए भस्मासुर साबित होंगे.  वास्तव में बाबा आज इस देश में  किसी भी व्यक्ति से लोकप्रिय  है, भारत ही नहीं वरन विदेशो में भी.. चाहे वो गूंगा प्रधान मंत्री हो या भ्रष्ट का कलंक लेने वाला राष्ट्रपति. तो अरविन्द अन्ना को खड़ा आगे कर बाबा को लांचिंग पैड बनाया, और अन्ना हजारे  को लांच कराया,

बाबा के द्वारा लांचिंग के बाद अन्ना और टीम को आम जनता जानने लगी तभी आना को जंतर मन्त्र पर बिठा दिया गया, और माया से  उनको भारत का हीरो, डुप्लिकेट गाँधी, और न जाने क्या क्या  बता दिया गया, जनता भी खुश, की चलो अब क्रांति हो के रहेगी, उधर बाबा और इधर अन्ना..

जब इन गिरगिट  को लगा की अब सरकार द्वारा प्रायोजित मिडिया से ये मजबूत हो चुके हैं तो बाबा को हाशिये पे डालने के काम शुरू किया, अप्रत्याशित ज्वार भाटीय जनता के समर्थन से इन गिर्गितो का रंग इतना बदला की माहात्व्कंक्षा वश मौके का फायदा उठाने को स्वयं कोंग्रेस के लिए भस्मासुर बन बैठे जो की इनके पोषक थे.

लेकिन बाबा कोई झूट के पुलिंदे पे तो थे नहीं , न ही पूर्ण रूप से मिडिया प्रायोजित . सो सफल न हो सके और जनता भी ये समझने लगी .

अभी हाल में जब अन्ना ने जंतर मंतर पे बाबा को नेयोता दिया तो बाबा अपना समर्थन ले के गए लेकिन जब मामा ने दुबारा रामलीला मैदान में बुलाता तो अन्ना पल्टू उर्फ़ गिरगिट अपने ही वायदे से मुकर गए.

वो जनता जो सरकार  के खिलाफ थी वो रे धीरे जनता दो भागो में  बंट गयी एक अन्ना समर्थक दूसरा बाबा समर्थक.लेकिन  धीरे -धीरे इन दोनों गिरगीटो का सच जनता के सामने आने लगा, तो इन गिरगीटो का जनाधार खोने लगा, तो अरविन्द एक बार फिर अपने पोषक कोंग्रेस से माफ़ी मांगी होगी, और उनके लिए दुबारा भश्मासुर न बनने की कसम खायी होगी.. यानि थूक  के चाटा होगा, कोंग्रेस के प्रति अपनी स्वामी भक्ति दुबारा सिध्ध करने के लिए ये इन गिरगीटो ने एक और  रंग बदल घोटालाबाज कोंग्रेस को छोड़ हर मामले में बी जे पी को कोसना शुरू कर दिया. लेकिन इन गिर्गितो को ये नहीं समझ आता की जनता सब देखती है.

इससे फिर इनका जनधार खोना शुरू हो गया. और बाबा के समर्थक यथावत उतने ही है बल्कि इन गिरगीटो को देख और बढ़ गए. जब गिरगिट गैंग को लगा की वो अब बाबा को पछाड़  नहीं सकते तो एक और नाटक खेला, आपसी सर फुट्टवल  का.. क्यों ??क्योकि एक बड़ी संख्या  में गिरगिट समर्थक इन गिरगीटो का साथ छोड़  समझदारी दिखाते हुए बाबा के पाले में चले गए जिसके कारन था अरविन्द ये जनता अब भी अन्ना को साफ़ सुथरा मानती है, अनजाने में ही सही . तो बचा खुचा जनाधार रोकने के लिए ये एक और रंग  बदल  आपसी समझौते के तहत खुद ही दो भागो में बंट गए  ताकि पल्टू अन्ना  के समर्थक कम से बाबा के पाले न जाए जो गिरगिट अरविन्द से खफा है, यानि घर का माल घर में रखने के लिए ये सब नाटक हो रहा है.

अब आईये इनके गिरगिट समर्थको पे, कहा जाता है "संगत से गुण होत है संगत से गुण जात" . गिरगिट गैंग का जिन समर्थको पर जबरजस्त प्रभाव पड़ा वो उनके अन्दर भी गिरगिट वाले गुण आ गए हैं. वास्तव में मानसिक रूप से असहाय हैं, इन बिचारो को ये पता नहीं की दोनों ही कोंग्रेस के लिए काम कर रहे हैं, जिनके समझ में आया वो मेरी तरह इनसे भाग खड़े हुए और जो नहीं समझ पाए वो आज गिरगिट समर्थक बन चुके है  जो अपने गिरगिट सरदारों को देखते हुए अपना रंग बदलने पे मजबूर है.


अन्ना और उनकी भूतपूर्व टीम का गिरगीटीया सवभाव उसके अंध समर्थको पर भी पड़ा है.जो कल कहते है मै भी अन्ना, वही आज कह रहे है कौन अन्ना नेता तो अरविन्द है, और जो कल तक जो अरविन्द को बाप मानते थे वो अन्ना के साथ है .  इस प्रकार के गुट और उनके समर्थको का मनाना है की देश बहुत सादा है , रंगहीन है, इसलिए हमलोगों ने गिरगिट बन देश के माहौल में रंग भरने की  एक छोटी सी कोशिश की  है .

अन्ना अरविन्द दोनों की साठ- गाँठ था बाबा के आन्दोलन  को दबाने की और इसी योजना नुसार अन्ना का नाटक और दिखावा है अरविन्द से अलग होने के लिए, दोनों अलग हो के सारे देश वासियों के ऊपर काबिज हो कोंग्रेस को सत्ता दिलवाना चाहते है और कुछ नहीं. एक बहुत  बड़ा तबका अन्ना गैंग के खिलाफ हो चूका था खासकर अरविन्द को ले के, जिससे इनका आन्दोलन असफल हुआ, उस तबके को अन्ना गैंग अपने व पास वापिस लाने का तय एक षड्यंत्र रच है, ताकि  रामदेव से जुड़े लोग अन्ना के बारे में फिर से सकारत्मक सोच सके.   एक बात निश्चित है , की आने वाले दिनों में यदि इनका षड्यंत्र सफल हो गया, तो अन्ना अरविन्द फिर एक हो जायेंगे , वैसे आजतक का मेरा कोई भी विश्लेषण गलत नहीं  हुआ है ( इक्छुक लोग मेरे पुराने लेख पढ़ ले जो  गिरगिट गैंग के ऊपर था ). कभी अन्ना कहता है की की उसका नाम इस्तमाल न किया जाए कभी कहता है वो अरविन्द का प्रचार करता है , यानि गिरगिट प्रवृत्ति  अभी उछाल पे है.

टोपी पहनने के लिए बार बार टोपी का "कैप्शन" बदला गया .. कभी मै अन्ना हूँ , कभी मै अरविन्द हूँ , और आज , मै आम आदमी हूँ, अरे भाईओं आपसे एक छोटी सी टोपी तो सम्हलती नहीं ,आप देश कैसे सम्हालोगे ??

 अंत में बस एक बात कहना चाहूँगा  सच के कड़वाहट को कितना भी झूट के चाशनी में डुबो के रखा जाए कड़वाहट नहीं जाती.


सादर

कमल कुमार सिंह  

Saturday, August 4, 2012

सेलेक्शन कमेटी की चूक : ओलम्पिक


ओलम्पिक मे भारत की दुर्दशा ये दर्शाती है, की भारत अब खेल कूद से ऊपर उठ चूका है, खेल -कूद तो निठ्ठलों का काम है, बुध्ध्जिवी देश की जनता को बस देश दुनिया पे नजर रखनी चाहिए, न की खुद शामिल होना, कभी किसी बुध्ध्जिवी को प्रायोगिक रूप मे  आजतक कुछ करते देखा है ??? 

अपने प्रधानमन्त्री भी एक बुध्धिजीवी  है, शायद ही किसी ने कुछ करते देखा हो?  आजादी के बाद देश प्रगति पे था और बुध्द्जिवियों की खेती की जा रही थी, तो कुछ लोगो का रुझान "कुछ" खेलो मे था, बेहतरीन सफलता भी मिली, लेकिन  कालांतर मे ब्लड टेस्ट से डोम्पिंग मे पकड़ लिए, बदले मे उन्हें एक जीता जागता मेडल मिला, अपने खिलाडी महाराज बड़े उदार थे, भागते फिरते थे, प्रदर्सन मे अव्वल आने  के बाद भी इन्होने मेडल को स्वेच्छा  से त्याग दिया, बोले देश का देश को समर्पित, लेकिन मेडल भी बहुत जिद्दी निकला, बोला हम तो आपको ही डिजर्व करते हैं..  विश्व इतिहास मे शायद पहली बार किसी मेडल ने खिलाडी के लिए क्लेम किया है.. ऐसा है अपना देश, महान भारत, जहाँ खिलाडी फर्स्ट क्लास प्रदर्शन के बाद भी मेडल नहीं स्वीकारता जबकि मेडल खुद दौड़ा दौड़ा जबरजस्ती सीने पे चढ़ कोदो(मूँग) दरता है.  खैर ये तो था उस ज़माने के खेल जिसका मेडल अब मिला.

और तो और अपने अन्ना जी भी मनमोहन के मित्र होने जा रहे हैं, डेढ़ साल से करेंगे करेंगे लोकपाल लेंगे नहीं तो जान दे देंगे, मर जायेंगे मिट जायेंगे, सरकार हिला देंगे, लेकिन हाय रे पेट, भूख ने ऐसा हिला दिया की भगत सिंह का भूत १९४२ का  गांधी बन केजरीवाल से असहयोग आन्दोलन कर भाग बैठा..और नेहरु वाले भूत ने अरविन्द को  लेडी माउंटबटन एडविना  समझ मोहब्बत का इजहार किया. 

कालांतर मे सरकार ने खेलो पे खूब ध्यान दिया, खेलो ने खूब प्रगति की, कलमाड़ी जी इसके एक बेहतरीन उदाहरण  है, विश्व मे पहली बार किसी आयोजक ने खिलाडियों के खिलाड़ी बन अपने  बेहतरीन प्रदर्शन से देश का नाम ऊँचा किया. बोले इतने खिलाडियों को जब हम खुद खिल्वायेंगे तो हम खुद क्यों न खेले, बस खेल दूसरा था, अपनी अपनी पसंद.

अब आईये लन्दन पर, एक दो खिलाड़ी जो बुध्ध्जिविता से उब कर खेल वाले  खिलाड़ी बने तो उनको मिला क्या, कांस्य या चांदी, लेकिन इनके साथ अफसरों की चांदी जरुर  हुयी, फ्री मे लन्दन विसिट, बोले जीत गए ताली बजायेंगे, हार गए तो हमें क्या तुसाद गैलरी और लन्दन ब्रिज तो देख ही लिया.

वास्तव मे जानबूझकर अधिक मात्र मे  ऐसे खिलाड़ी भेजे गए जिनमे बुध्ध्जिविता जादा हो उससे इन अफसरों का ही फायदा था, जादा हारेंगे तो अगली बार फिर कहीं और जायेंगे, एक और ट्रिप पक्का.

वास्तव मे ओलम्पिक मे भेजने से पहले सरकार और अफसरों को पुरे देश मे खिलाडियों की खोज करनी थी, फेसबुक से , ट्विटर से जैसा की आजकल अन्ना टीम करती है, अरे भाई इन सब साधनों से जब  जनता जुटाई जा सकती  है तो खिलाड़ी ढूढना कौन सी बात है, लेकिन नहीं.. सरकार को आम तौर पर आम जनभागी नहीं चाहिए होता है .

सुबह कोने वाली दूकान पर चाय नाश्ता कर रहा था तभी, मेरे पड़ोस के पडोसी चले  आये, बोले यार देखो सारे देश इतना चांदी सोना लूट रहे हैं एक अपना भारत है ..

मैंने कहा तो ??

"तो क्या ?? मोहल्ले का "आदेश" क्या बुरा है, छंटा हुआ बदमाश है, पितौल चलाना जानता है, सोने से कम पे नहीं मानता, या तो निशाने से सोना लाता, न जीतता तो वही पितौल दिखा के ले आता.  या फिर "धमरुवा" को ले जाना था, आज भी गुलेल से सही आम तोड़ लेता है.".

मैंने सहमति मे हाँ हिलाई, उनकी आदत है, जो उनकी सहमति मे सर हिला दे उसके चाय नाश्ता का बिल वो खुद भर देते है.

फिर कहा "भागने की प्रतियोगिता मे अपने अन्ना जी को ले जाना था, जो देल्ही से मुंबई , मुंबई से रालेगन , राले गण से भर देल्ही, और फिर देल्ही से दूसरा ट्रेक पकड़ सकता है उसके सामने तो पि टी उषा भी फेल है , पक्का सोना  आता, जो न जीत पाते तो फोर्ड वाले कुछ सहायता कर देते इस मामले मे". \

मैंने फिर सहमति मे सर हिला दिया .

"तैरने वाले मे केजरीवाल को ले जाना था, इसमें वही जीत सकता है जो दूसरों को डुबाने का माद्दा रखता हो, इसने तो पुरे जनता को डूबाया और खुद तैर के भाग लिया.".

मैंने फिर सहमति मे हाँ की,

भईया कुल आज के २० रूपये और हफ्ते का मिला के १३०, चाय वाले की आवाज आयी..

मैंने देने के लिए जेब मे हाथ डाला, तभी सर हिलाने का मुवावजा देने के लिए शर्मा जी ने कहा, "आप जाओ सिंह साहब, मै दे दूँगा अभी मै कुछ देर और बैठ ओलम्पिक का जनमत करूँगा".

मैंने फिर सहमति मे सर हिलाया, समय हो चुका था, लिखने का. 

Monday, July 30, 2012

अन्ना अनशन असफल क्यों ??


कोई साल भर पहले जमीनी कार्य और जनता  में अलख जगाने के बाद बाबा रामदेव ने काली सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने की तिथि की घोषणा जून २०११ निर्धारित कर दी तो महीनो पहले से जनता उस दिन का इन्तजार बेसब्री से करने लगी, क्योकि जनता सरकार के काली करतूतों से अजीज आ चुकी थी. परेशांन थी, हैरान थी, उसको चाहिए था तो किसी का नेतृत्व, ये कमी बाबा राम देव ने पूरी कर दी तिथि  घोषणा के साथ. चुकी बाबा रामदेव  जमीनी तौर से कई वर्षों से हर प्रकार के देश सेवा में लगे है, चाहे वो स्वदेशी  हो, योग हो, आयुर्वेद  हो, या व्यापार में शिर्षता हो, इसलिए जनता  का भरोसा बाबा के ऊपर निश्चय ही था . 

अब देखिये घटना क्रम कितनी तेजी से बदलता है. 

बाबा के तिथि घोषणा के बाद है एक ऐसे गुमनाम शक्श को रातो रात भारत की जनता का मसीहा बनाया जाता है जिसको पिछली सुबह तक कोई जानता तक न था, जो शायद किसी महारष्ट्र के अनाम गाँव से था... वास्तव मैंने खुद भी इनका नाम कभी नहीं सुना था, और मेरी ही तह करोड़ोयुवावों ने भी, जो महारष्ट्र से नहीं थे. 

एक सभा बुलाई, बाबा राम देव को बुलाया, बाबा ने उसका परिचय अन्ना हजारे के नाम से इस देश को कराया. शायद ये सब पहले से सोची समझी योजना थी (अभी मै शाजिश नहीं कह सकता). शायद इसके पीछे केजरीवाल का दिमाग रहा हो.. केजरीवाल का इतिहास खंगाला  जाए तो केजरीवाल वास्तव में बहुत ही महत्वाकाक्षी व्यक्ति रहें है, एक बार इनसे  किसी टी वी वाले ने पूछा की अपने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ दी, तो इनका जवाब था, यहाँ न नाम है न इज्जत, मुझे और जादा चाहिए ... यानि ये दिल मांगे मोर... 

 अब चुकी अन्ना सज्जन आदमी थे, सीधे थे भोले थे, अरविन्द की नजर इनपे गयी, लेकिन लांचिंग के लिए  किस पैड का इस्तमाल हों ?? अरविन्द  के आर टी आई लाने के बाद भी अरविन्द आम जनता में इतने लोकप्रिय न थे जितना बाबा, वास्तव में बाबा आज इस देश में  किसी भी व्यक्ति से लोकप्रिय  है, भारत ही नहीं वरन विदेशो में भी.. चाहे वो गूंगा प्रधान मंत्री हो या भ्रष्ट का कलंक लेने वाला राष्ट्रपति. तो अरविन्द अन्ना को खड़ा आगे कर बाबा को लांचिंग पैड बनाया, और अन्ना हजारे  को लांच कराया, उस समय तक बाबा भी  शायद पूरी बात नहीं समझ पाए थे, उन्होंने सोचा काम देश का है तो एक से भले दो... 

बाबा के द्वारा लांचिंग के बाद अन्ना और टीम को आम जनता जानने लगी तभी आना को जंतर मन्त्र पर बिठा दिया गया, और माया से  उनको भारत का हीरो, डुप्लिकेट गाँधी, और न जाने क्या क्या  बता दिया गया, जनता भी खुश, की चलो अब क्रांति हो के रहेगी, उधर बाबा और इधर अन्ना.. सो जनता ने पुरे जोश वो खरोश से अन्ना का समर्थन किया, इसके कई कारन थे , पहला,  वेश्यावों के को रखने वालो, ब्लू फिल्म बनाने वालो और अवैध बच्चो के पिता जी लोगो से जनता तंग आ चुकी थी... दूसरा अन्ना को बाबा रामदेव ने लांच किया था इसलिए बाबा को मानने वाले एक बड़ी संख्या अन्ना के साथ थी, तीसरा भाजपा कोंग्रेस के खिलाफ मौका ढूंढ रही थी,  अब तक सभी चाहे वो संघ हो या भजपा या बाबा खुद, टीम अन्ना सरकार के विपक्ष में जोरदार ढंग से खड़े हुए जो जनता भी चाहती थी .    

अब मुझे ए समझ नहीं आता की मुद्दा यदि देश का ही था, तो जून में क्यों न रख लिया बाबा के साथ ही ?? दो अलग अलग आन्दोलन क्यों ?? दोनों मिल के एक क्यों नहीं ??  इसका कारन  ये था की शायद अन्ना तो मान भी जाए, लेकिन अरविन्द का छिपा हुआ एजेंडा कुछ और ही था...इसलिए  इसने एक नहीं होने  दिया  बल्कि उलटी पुलती बयान बाजियां भी की, जो आजतक जारी है...  

सरकार ने सान्तवना दी अप्रैल खत्म हुआ इस आन्दोलन से अन्ना टीम के साथ बाबा वादी भी खुश संघ भी खुश की चलो परिवर्तन होने की रह में पहला भूख हड़ताल सफल रहा, लेकिन इनमे से कोई एक था जिसके चहरे पे कुटिल सोच के साथ कुटिल  मुस्कान थी, और वो था अरविन्द. 
अब जनता की नजर थी बहु प्रतीक्षित बाबा के विशाल आन्दोलन पर जो बाबा ने जमीन पर काम कर के खड़ा किया बजाय की सिर्फ  भाषण बाजी और सिर्फ अनशन के.  सरकार समझ गयी की जितने भी उसने ब्लू से ले के ब्लैक फिल्म बनाये जनता के सामने एक एक कर के सामने आ रहे हैं, और जनता अबकी इनकी रेटिंग कर देगी... सो बाबा को फेल करने के लिए सारी तैयारिया की गयी... 

बाबा का आन्दोलन हुआ, और उम्मीद से कई गुना जादा समर्थन मिला, सरकार के हाथ पाँव फूल गए, उसी समय जनरल डायर की आत्मा ने सरकार के शरीर में प्रवेश किया,  और डायर की आत्मा ने खूब उत्पात मचाया,  बाबा का हल भी लाजपत राय वाला हो जाता यदि उन्हें खुद कुछ पुलिस वाले न बचा के ले हाय होते तो.   ये दबाया हुआ  आंदोलन  भी सफल रहा, लेकिन जनता सरकार के रवैये से एक दम क्षुब्द थी, जनता की हालत हो उस इंसान की तरह हो गयी जिसका हाथ पाँव बाँध के समुन्द्र में फेंक दिया जाए, पूरी जनता बाबा का बदला लेने की ताक में थी,.

इसी समय अन्ना का दुसरा आंदोलन की घोषणा हुयी, अब जनता के हाथ पाँव की रस्सियाँ  खुल चुकी थी, वो तैरने लगा, फिर से सांस और शक्ति जुटा बाबा का बदला लेने अन्ना के समर्थन में शामिल हो गया... अबकी सरकार सचेत थी, अच्छी तरह से समझती थी, की अबकी कुछ किया तो जनता का हाथ पाँव  भी न बाँध पायेगी बल्कि जनता की लात खायेगी...मामला अब यही से घूमता है..यहाँ से अन्ना टीम गर्व में चूर हो जाती है और समर्थन वाले कारणों को भूलते हुए बाबा पे प्रहार होता है.. ...  सरकार समझ चुकी थी की  आंदोलन अहिंसक जरुर है लेकिन नपुंसक नहीं... सो चुपचाप आश्वाशन का पॅकेज दिया, और बला चलती कर दी... अन्ना का ये आंदोलन बस जनता के लिए सेफ्टी वाल्व का का काम किया जिसका दबाव बाबा ने बनाया था... यही से जनता शक की नजर से टीम अन्ना को देखने लगी , कही ये कोंग्रेस समर्थक तो नहीं ?? 

लेकिन जनता को एक और  झटका लगा जब अन्ना को खड़ा करने वाले बाबा ही अन्ना टीम के निशाना बने. 
दूसरा झटका जनता को तब लगा जब उन्होंने संघ को दूर रहने के लिए कहा, इतिहास गवाह है, चाहे वो जे पी आन्दोलन हो या गाँधी का  चम्पारण,  खोंग्रेस के खिलाफ सफल तभी हुआ जब उसमे राष्ट्रवाद शामिल हुआ... अब अन्ना टीम की असलियत जनता को धेरे धीरे समझ तो तो आने लगी  थी लेकिन फिर भी जनता शंका में थी, 

 लेकिन जल्द  ही बादल  हट गए, कुमार विश्वाश की बाबा के ऊपर विभत्स सल्वारी कुंठा वाली टिप्पड़ियों ने मामला साफ़ कर दिया और ये बता दिया की बाबा रामदेव का बस इस्तमाल हुआ था..उसके बाद तो एक एक बाद एक हमले ने चाहे वो सिसोदिया द्वारा किये गए हो या अन्य जनता ने सुनी और मंथन किया . बाबा ने तो माफ कर दिया, लें उनके समर्थक और संघ ने ये बात गाँठ बाँध ली.. और मुंबई में हुए अनशन में अन्ना को भागने पर मजबूर कर दिया जिससे टीम अन्ना को करारा झटका लगा.. एक है जो गोलि चलने पे उसको जबरजस्ती भगाया जाता है और दूसरा जो ठण्ड की मार तक नहीं झेल पाता, जनता सब देख रही थी, सो अन्ना से उनके खुद के गृह राज्य में समझा दिया.. 

 इसी बीच अन्ना टीम की कई  कार गुअजारियां सामने आई,  चाहे भूषण के जमींन का मामला हो या, प्रशांत के कश्मीर को लाग करने का बयां बाजी, जनता चक्कर खा गयी की हम इन देश द्रोहियों का साथ दे रहे हैं ?? जनता को पता चला की ये वही भूषण है जो आतंकवादियों के केस लड़ रहे हैं.. ये वही अरविन्द है जो जागरूकता तो फैलाते हैं लेकिन खुद वोट देने नहीं जाते.. ये वही किरण है जो छोटी मोटी रकम के लिए भी घोटाला कर देती है.. अब टीम अन्ना की जमीन खिसकती चली गयी.. 

अब अन्ना टीम को उसकी भूल में  आया. उसने फिर से कुटिलता पूर्वक अन्ना को बाबा से जोडने की पुरजोर कोशिश की बाबा जुड भी गए क्योकि बाबा  अन्ना टीम की विभत्स टिप्पडी से बड़ा देश को मानते थे.. और उनको पता था की उनका कार्य जमीनी है बजाय  की सिर्फ भाषण बाजी और अनशन के... जैसा का टीम अन्ना का था.. .. लेकिन जनता अब भी सचेत थी, शायद वो समझ चुकी थी अन्ना बस एक मुखौटा भर है, आंदोलन का असली कारन कोंग्रेस को सहयोग करना है जिससे शायद अन्ना खुद भी अनजान हो.

आंदोलनों के बहाने जम के चंदा उगाही की गयी, जब ठीक ठाक रकम हो जाता तो घोषणा की जाती की सरकार ने हमारी बातें मान ली है, अब हम अनशन खत्म कर  रहे हैं, और जब पैसे खत्म हो जाते तब घोषणा की जाती की सरकार ने धोखा किया है हम फिर से आन्दोलन करेंगे, निश्चय ही इन सब में अन्ना का कोई हाथ नहीं है, लेकिन वो बिचारे क्या करे ?? उनकी हालत भी मनमोहन से कुछ  भिन्न नहीं है, मनमोहन भ्रष्ट मंत्रियों से घिरे है और अन्ना अपने कुटिल टीम से...लेकिन ये पब्लिक है सब जानती है.. 

और अब अन्ना टीम के संजय सिंह बाबा से स्पष्टीकरण मांग रहे हैं की बाबा मोदी से क्यों मिले?? ये भी जनता देख रही है, और अरविन्द का बयांन की मोदी सांप्रदायिक है, यही नहीं भ्रष्ट भी है , ये भी जनता देख रही है ... जनता समझ चुकी है की अन्ना को अँधेरे में रख अरविन्द कोंग्रेस का पूरा साथ दे रहा है. शायद उनकी कुछ राजनितिक आकांक्षाएं भी हो. 

अब  निश्चय ही अब टीम अन्ना का आन्दोलन वेंटिलेटर पर है जिसकी साँसे कभी भी उखड सकती है, जनता भी समझ चुकी है उन्होंने लंगड़े घोड़े पे डाव खेला, और हार गए... 

 अब सबको इन्तजार है, बाबा के अगस्त क्रांति का, शायद बाबा ही अब एक मात्र विकल्प रह गए हैं.. 

सादर 

कमल 

Thursday, July 26, 2012

लोकपाल मिले न मिले - समर्थन दे दो प्लीज


अन्ना के तस्वीरी मुह मे अन्न डालता बालक (पेट की हालत बच्चे भी समझते हैं) 

पिछले साल के अप्रैल की गर्मी ने उसे बहुत सताया, फिर उसने ठण्ड का दामन पकड़ा, लेकिन कमबख्त ठण्ड ने भी अपनी दादागिरी जोर शोर से दिखाई, एसी कमर तोड़ी की मोर्डन गाँधी को मुंबई  से तडीपार होना पड़ा, उसके बाद शायद  जनता कुछ चेती, "ओफ्फ्हो, ये क्या ?? देश को एक नया मंत्र देके भाग गया.". ये थे अपने अन्ना जी, लेकिन एक बात साफ़ कर दूँ अन्ना जी मे कोई दोस् नहीं है, उनको पता है कि कभी कभी भागना स्वास्थ्य के लिए परम लाभदायक होता है. ये भागते हैं हैं तो इनके साथी भागते हैं, अतः सबका स्वाथ्य ठीक रहता है, चाहे वो अरविन्द हो या सिसोदिया... अतः अन्ना को पी टी अध्यापक भी कहा जा सकता है.. भ्रस्टाचार के साथ -साथ अब रोग को भगाएंगे अन्ना टीम वो भी भाग भाग के. 

मेरा बस चले तो मै गिनीज बुक वालो को आमंत्रित कर लूँ, कि आओ भईया,  तुम लोग अजूबो का नाम अपने किताब मे लिख के अमर बना देते हो न, तो आओ और फ्री मे दो चार नाम हमारे देश मे से भी लेते जाओ बिलकुल ताजा ताजा.... एक से बढ़ कर एक खासियत है इनमे, एक बुला के भाग जाता है, तो कोई मतदान करने की जागरूकता फैला के खुद वोट नहीं देने जाता. किसी ने सही कहा हैं, भारत मे नमूनों कि कमी नहीं. 

वैसे इसमें अरविन्द की कोई गलती नहीं है, वास्तव मे  वो भारतीय साहित्य का सम्मान करते हैं, हमारे भारतीय साहित्य मे लिखे एक लाइन से इतने प्रभावित हुए कि उसको जीवन मे ही उतार लिया  "पर उपदेश कुशल बहुतेरे"  हम कोर्ट का सम्मान करने के लिए लोगो से कहेंगे लेकिन खुद समय पे नहीं पहुचेंगे,  तो क्या हुआ ?? सम्मान तो करते हैं, इतना क्या कम है.. भ्रस्टाचार हटाने के लिए हम जागरूक तो करेंगे लेकिन खुद अपना टैक्स देने मे हीला हवाली करेंगे. कोई नहीं ये सब भारतीय साहित्य का असर है, यदि कोई पूछे तो एक लाइन सूना दो,"पर उपदेश कुशल बहुतेरे". 

शुरू शुरू मे मै भी बड़ा प्रभावित था, अन्ना का भोला चेहरा, रोगन बादाम खाए हुए गले से जब ओजस्वी आवाज मे भारत माता कि जय निकलता था तो लगता था जैसे भारत माता अभी झंडा ले के प्रगट हो जायेगी, और कौन जाने हो भी जाती है, लेकिन उनकी तस्वीर भी हटा ली, तो शायद भारत माता ने भी समझ लिया होगा, अरे सम्मान तो करता है इतना ही बहुत है, क्या हुआ जो मुए ने जो मुझे मंच से भगा दिया..आखिर है तो मेरा बेटा न.  खैर इससे पता चलता है की सम्मान करना कहने और और करने मे कोई खास फर्क नहीं है, सब चलता है.

अबकी की अन्ना टीम ने बहुत बुध्धिमानी से काम लेते हुए अनशन बरसात मे रखा, न गर्मी के थपेड़े न हड्डी तोडक ठण्ड की गुंडा गर्दी, वास्तव मे पिछली गलतियों का मौसमी अनुभव बहुत काम आया है, "बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले"  यदि कोई जुगाड होता बादल मे  विटामिन  और पोषक तत्व मिलाया जा सकता था खैर ये तो मेरी बस कल्पना है, लेकिन सुना है की वैज्ञानिक अब मनचाहे ढंग से बारिश कर सकते हैं, लेकिन इस विटामिन युक्त बरसात के लिए अन्ना टीम को इविज्ञान  बुध्द्जिवियों  से संपर्क करना पड़ेगा. 

वैसे भी कहा जाता है की टीम अन्ना मे  बुध्द्जिवियों  की भरमार है, बुध्द्जिवि अर्थात यदि आप उन्हें  दड़बे के मुर्गे गिनने को कहें तो पहले मुर्गे की टांग गिनेंगे फिर उसमे दो से भाग देंगे.... अरे विचारशीलता इसी को तो कहते हैं... बिना विचार वाले तो सीधे सर गिन लेते हैं..  

अन्ना और उनकी टीम अब जोर शोर से समर्थन मांग रही है, कोई समर्थन के लिए  मिस काल करने का नंबर देता है तो कोई कुछ, अरे समर्थन दे दो न भाई, वैसे भी बुखारी ने इन्हें भगा दिया, ओफ्फ्हो, अन्ना ने एक गलती कर दी गाँधी टोपी कि जगह यदि "क्रोसिये" से बुने हुए धागे का टोपी पहन जाते तो कौन जाने मिल जाता, लेकिन कोई बात नहीं, फलाँ  नो पे मिस काल करिये न --प्लिज , प्लीज , समर्थन दीजिए, हम दिमाग से हाथ हटा  दिल पे रख इन्तजार कर रहे हैं.... अमाँ मिया दे भी दो,... 

अब दिल्ली मे दिल डूबता - उतरता देखते हुए सूरज को भी गलतफहमी होने लगी है की वो सूरज ही है या अन्ना टीम का दिल. 
काश कोई एसी व्यवस्था हो जाय कि सूरज भी एस एम् एस  या मिसकाल से डूबने - उतरने लगे तो मजा आ जाये....  कम से कम मजनू लोग तो खुश हो ही जायेंगे .... 

सादर 

कमल