नारद: Islamic
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Tuesday, October 2, 2012

गिरगिट गैंग के गिरगिट समर्थक

कोंग्रेस का हाथ अन्ना के साथ 

गिरगिट (Chameleons) एक प्रकार की छिपकली है। तोते की तरह के उनके पैर; अलग-अलग नियंत्रित हो स्कने वाली उनकी स्टिरियोटाइप आँखें; उनकी बहुत लम्बी, तेजी से निकलने वाली जीभ; सिर पर चोटी (क्रेस्ट); तथा कुछ द्वारा अपना रंग बदलने की क्षमता इनकी कुछ विशिष्टताएँ हैं। इनकी लगभ्ग १६० जातियाँ "हैं " जो अफ्रीका, मडागास्कर, स्पेन पुर्तगाल, दक्षिण एशिया आदि में पायी जातीं हैं।

 लेकिन सन २०११-१२  के दौरान भारत में एक और १६१वें किस्म के  एक अनोखे और आश्चर्यजनक गिरगिट का पता चला जिसका चाल ढाल तो इंसानी था लेकिन बाकी विशेषताएं जैसे तेजी से निकलने वाली जीभ,  सिर पर चोटी (क्रेस्ट= अर्थात कोंग्रेस का हाथ); और अन्य विशेस्तावों से युक्त  पल पल रंग बदलने की अदभुद क्षमता, एसा माना जा रहा है की यह सबसे उन्नत किस्म का गिरगिट है जिसने  बाकि के १६० प्रजातियों को पछाड़ दिया है.

मेरा ये कहना गिरगिट और गिरगिट समर्थको को बुरा जरुर लगेगा, वो मुहे गालियाँ दे सकते हैं, या कुतरक, लेकिन हाँ तर्क सहित वो मेरी बात को गलत साबित नहीं कर सकते और इतना तो गिरगिट और गिरगिट समर्थक भी जानते  हैं.

जिस केजरीवाल और अन्ना  को दो साल पहले तक उसका खुद का मोहल्ला न जानता हो उसे आज पूरा देश जनता है. कैसे ??  सिर्फ और सिर्फ गिरगिट विकास के अध्याय में एक नयी  कड़ी जोड़ने के कारन मात्र, अब ध्यान देने योग्य बात ये है की इस नयी प्रजाति को विकसित करने की जरुरत क्या आन पड़ी ??


कई साल तक  पहले जमीनी कार्य और जनता  में अलख जगाने के बाद बाबा रामदेव ने काली सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने की तिथि की घोषणा जून २०११ निर्धारित कर दी तो महीनो पहले से जनता उस दिन का इन्तजार बेसब्री से करने लगी, क्योकि जनता सरकार के काली करतूतों से अजीज आ चुकी थी इसके कई कारन थे, पहला,  वेश्यावों के को रखने वालो, ब्लू फिल्म बनाने  वालो और अवैध बच्चो के पिता जी, और घोटाले उत्पादक सरकार से जनता तंग आ चुकी थी.. परेशांन थी, हैरान थी, उसको चाहिए था तो किसी का नेतृत्व, ये कमी बाबा राम देव ने पूरी कर दी तिथि  घोषणा के साथ.

जमीनी तौर से कई वर्षों से हर प्रकार के देश सेवा करने वाले बाबा रामदेव्  ने आन्दोलन से पहले जमीनी  रूप से ढेर सारे कार्य कर चाहे वो  स्वदेशी  हो, योग हो, आयुर्वेद  हो, या व्यापार हो शीर्षता हासिल कर  जनता मे परबा विश्वाश बना लिया था. जिससे कोंग्रेस  के पेट में बल पड़ने लगने, जरूरत थी एन केंन  प्रकारेंन  किसी भी तरह  योग गुरु बाबा रामदेव को नीचे दिखाना, लेकिन ये आसन काम नहीं था और न ही है. तो क्या किया जाए ?? अकबर  बीरबल के "रेखा छोटी करो" का सिध्धांत अपना बाबा के बराबर किसी भी इंसान को उस  स्तर तक लाया जा सके  चाहे  वो उस योग्य हो  या न हो, इसके लिए मिडिया का खूब इस्तमाल हुआ.

अब देखिये घटना क्रम कितनी तेजी से बदलता है.

बाबा के तिथि घोषणा के बाद है एक ऐसे गुमनाम शक्श को रातो रात भारत की जनता का मसीहा बनाया जाता है जिसको पिछली सुबह तक कोई जानता तक न था, जो शायद किसी महारष्ट्र के अनाम गाँव से था... वास्तव मैंने खुद भी इनका नाम कभी नहीं सुना था, और मेरी ही तह करोड़ो युवावों ने भी, जो महारष्ट्र से नहीं थे.

एक सभा बुलाई, बाबा राम देव को बुलाया, बाबा ने उसका परिचय अन्ना हजारे के नाम से इस देश को कराया. शायद ये सब पहले से सोची समझी योजना थी. शायद इसके पीछे केजरीवाल का दिमाग रहा हो.. केजरीवाल का इतिहास खंगाला  जाए तो केजरीवाल वास्तव में बहुत ही महत्वाकाक्षी व्यक्ति रहें है, एक बार इनसे  किसी टी वी वाले ने पूछा की अपने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ दी, तो इनका जवाब था, यहाँ न नाम है न इज्जत, मुझे और जादा चाहिए ... यानि ये दिल मांगे मोर...

अब अन्ना के लांचिंग के लिए  किस पैड का इस्तमाल हों ?? तो  इस्तमाल बाबा का किया जो इन   के मनसूबे से अनजान थे. उन्होंने सोचा काम देश का है तो एक से भले दो... उन्हें नहीं पता था की जिस भर्ष्टाचार को मिटने के लिए बाबा रामदेव,  इन  गिरगीटो  को अपना आशीर्वाद दे रहे हैं वही दोनों आगे चल के इनके लिए भस्मासुर साबित होंगे.  वास्तव में बाबा आज इस देश में  किसी भी व्यक्ति से लोकप्रिय  है, भारत ही नहीं वरन विदेशो में भी.. चाहे वो गूंगा प्रधान मंत्री हो या भ्रष्ट का कलंक लेने वाला राष्ट्रपति. तो अरविन्द अन्ना को खड़ा आगे कर बाबा को लांचिंग पैड बनाया, और अन्ना हजारे  को लांच कराया,

बाबा के द्वारा लांचिंग के बाद अन्ना और टीम को आम जनता जानने लगी तभी आना को जंतर मन्त्र पर बिठा दिया गया, और माया से  उनको भारत का हीरो, डुप्लिकेट गाँधी, और न जाने क्या क्या  बता दिया गया, जनता भी खुश, की चलो अब क्रांति हो के रहेगी, उधर बाबा और इधर अन्ना..

जब इन गिरगिट  को लगा की अब सरकार द्वारा प्रायोजित मिडिया से ये मजबूत हो चुके हैं तो बाबा को हाशिये पे डालने के काम शुरू किया, अप्रत्याशित ज्वार भाटीय जनता के समर्थन से इन गिर्गितो का रंग इतना बदला की माहात्व्कंक्षा वश मौके का फायदा उठाने को स्वयं कोंग्रेस के लिए भस्मासुर बन बैठे जो की इनके पोषक थे.

लेकिन बाबा कोई झूट के पुलिंदे पे तो थे नहीं , न ही पूर्ण रूप से मिडिया प्रायोजित . सो सफल न हो सके और जनता भी ये समझने लगी .

अभी हाल में जब अन्ना ने जंतर मंतर पे बाबा को नेयोता दिया तो बाबा अपना समर्थन ले के गए लेकिन जब मामा ने दुबारा रामलीला मैदान में बुलाता तो अन्ना पल्टू उर्फ़ गिरगिट अपने ही वायदे से मुकर गए.

वो जनता जो सरकार  के खिलाफ थी वो रे धीरे जनता दो भागो में  बंट गयी एक अन्ना समर्थक दूसरा बाबा समर्थक.लेकिन  धीरे -धीरे इन दोनों गिरगीटो का सच जनता के सामने आने लगा, तो इन गिरगीटो का जनाधार खोने लगा, तो अरविन्द एक बार फिर अपने पोषक कोंग्रेस से माफ़ी मांगी होगी, और उनके लिए दुबारा भश्मासुर न बनने की कसम खायी होगी.. यानि थूक  के चाटा होगा, कोंग्रेस के प्रति अपनी स्वामी भक्ति दुबारा सिध्ध करने के लिए ये इन गिरगीटो ने एक और  रंग बदल घोटालाबाज कोंग्रेस को छोड़ हर मामले में बी जे पी को कोसना शुरू कर दिया. लेकिन इन गिर्गितो को ये नहीं समझ आता की जनता सब देखती है.

इससे फिर इनका जनधार खोना शुरू हो गया. और बाबा के समर्थक यथावत उतने ही है बल्कि इन गिरगीटो को देख और बढ़ गए. जब गिरगिट गैंग को लगा की वो अब बाबा को पछाड़  नहीं सकते तो एक और नाटक खेला, आपसी सर फुट्टवल  का.. क्यों ??क्योकि एक बड़ी संख्या  में गिरगिट समर्थक इन गिरगीटो का साथ छोड़  समझदारी दिखाते हुए बाबा के पाले में चले गए जिसके कारन था अरविन्द ये जनता अब भी अन्ना को साफ़ सुथरा मानती है, अनजाने में ही सही . तो बचा खुचा जनाधार रोकने के लिए ये एक और रंग  बदल  आपसी समझौते के तहत खुद ही दो भागो में बंट गए  ताकि पल्टू अन्ना  के समर्थक कम से बाबा के पाले न जाए जो गिरगिट अरविन्द से खफा है, यानि घर का माल घर में रखने के लिए ये सब नाटक हो रहा है.

अब आईये इनके गिरगिट समर्थको पे, कहा जाता है "संगत से गुण होत है संगत से गुण जात" . गिरगिट गैंग का जिन समर्थको पर जबरजस्त प्रभाव पड़ा वो उनके अन्दर भी गिरगिट वाले गुण आ गए हैं. वास्तव में मानसिक रूप से असहाय हैं, इन बिचारो को ये पता नहीं की दोनों ही कोंग्रेस के लिए काम कर रहे हैं, जिनके समझ में आया वो मेरी तरह इनसे भाग खड़े हुए और जो नहीं समझ पाए वो आज गिरगिट समर्थक बन चुके है  जो अपने गिरगिट सरदारों को देखते हुए अपना रंग बदलने पे मजबूर है.


अन्ना और उनकी भूतपूर्व टीम का गिरगीटीया सवभाव उसके अंध समर्थको पर भी पड़ा है.जो कल कहते है मै भी अन्ना, वही आज कह रहे है कौन अन्ना नेता तो अरविन्द है, और जो कल तक जो अरविन्द को बाप मानते थे वो अन्ना के साथ है .  इस प्रकार के गुट और उनके समर्थको का मनाना है की देश बहुत सादा है , रंगहीन है, इसलिए हमलोगों ने गिरगिट बन देश के माहौल में रंग भरने की  एक छोटी सी कोशिश की  है .

अन्ना अरविन्द दोनों की साठ- गाँठ था बाबा के आन्दोलन  को दबाने की और इसी योजना नुसार अन्ना का नाटक और दिखावा है अरविन्द से अलग होने के लिए, दोनों अलग हो के सारे देश वासियों के ऊपर काबिज हो कोंग्रेस को सत्ता दिलवाना चाहते है और कुछ नहीं. एक बहुत  बड़ा तबका अन्ना गैंग के खिलाफ हो चूका था खासकर अरविन्द को ले के, जिससे इनका आन्दोलन असफल हुआ, उस तबके को अन्ना गैंग अपने व पास वापिस लाने का तय एक षड्यंत्र रच है, ताकि  रामदेव से जुड़े लोग अन्ना के बारे में फिर से सकारत्मक सोच सके.   एक बात निश्चित है , की आने वाले दिनों में यदि इनका षड्यंत्र सफल हो गया, तो अन्ना अरविन्द फिर एक हो जायेंगे , वैसे आजतक का मेरा कोई भी विश्लेषण गलत नहीं  हुआ है ( इक्छुक लोग मेरे पुराने लेख पढ़ ले जो  गिरगिट गैंग के ऊपर था ). कभी अन्ना कहता है की की उसका नाम इस्तमाल न किया जाए कभी कहता है वो अरविन्द का प्रचार करता है , यानि गिरगिट प्रवृत्ति  अभी उछाल पे है.

टोपी पहनने के लिए बार बार टोपी का "कैप्शन" बदला गया .. कभी मै अन्ना हूँ , कभी मै अरविन्द हूँ , और आज , मै आम आदमी हूँ, अरे भाईओं आपसे एक छोटी सी टोपी तो सम्हलती नहीं ,आप देश कैसे सम्हालोगे ??

 अंत में बस एक बात कहना चाहूँगा  सच के कड़वाहट को कितना भी झूट के चाशनी में डुबो के रखा जाए कड़वाहट नहीं जाती.


सादर

कमल कुमार सिंह  

Sunday, August 12, 2012

संस्कारित शान्ति

दिलचस्प ढंग से जिंदगी जीना भी एक कला है, कुछ लोग दिलचस्प जीवन जीने का दंभ तो भरते है लेकिन वास्तव मे होता वो नकारत्मक जीवन जी रहे होते है जो उन्हें भी नहीं पता होता, ठीक वैसे ही जैसे इस्लाम का अंधा सिर्फ एक  हरे रंग को ही सतरंगा मानता है या यों कहले की मुसलमान भाईचारे का दंभ भरते हैं.  

दिलचस्प जीवन जीने के लिए ये आवश्यक है की  जिंदगी मे कुछ नया होता रहे, सीधा सादा जीवन नीरस होता है उबाऊ होता है इसके लिए कुछ होना जरुरी है, जैसे एक कवि किसी "रचना" के लिए रचना रच के प्रसन्न हो सकता है, चित्रकार किसी "चित्रलेखा" का चित्र बना खुश हो लेता है,अपने जीवन को दिलचस्प बनाता है, ये तरीके सकारात्मक कहलाते है, जो औरो को यदि सुख न दे तो कम से कम तकलीफ नहीं देते, लेकिन कुछ लोग दिलचस्प बनाने के लिए कई प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं, जो उनके हिसाब से  निश्चय सांस्कृतिक है, जो वास्तव मे संस्कारित होते हैं. 

धीरे धीरे अब  मुझे समझ आने लगा है की इस्लामी शांति क्या है ?? इस्लामी शांति वो है, जो शांति पूर्वक गैर मुसलमानों की शांति भंग करने से मिलती है, और इस प्रकार के जीवन से मुसलमानों को काफी सुकून भी मिलता है, और इस प्रकार के शान्ति को प्राप्त करने के लिए किये गए संस्कारित सांस्कृतिक कार्यक्रममो से मुसलमानों  का जीवन भी दिलचस्प बना रहता है. 

सन ८९-९० के दौरान जब कश्मीर जैसा दिलचस्प जगह के बाहुल्य लोगो के जीवन मे नीरसता आई तो उन्होंने भी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा, "हिंदू भगाओ कार्यक्रम", कारण था हिन्दुवो का शांत स्वभाव होना, हिंदुओं के इस शांत स्वभाव ने मुसलमानों की संस्कारित शांत स्वभाव मे खलल डाला था अतः  हिन्दुओ के शांत  स्वभाव से आतंकित मुसलमानो ने एक फैसला किया, जब तक ये हिंदू कश्मीर छोड़ नहीं जाते तब तक हम शांति पूर्वक इनका क़त्ल करते रहेंगे, आदरपूर्वक इनकी महिलाओ का बाल्त्कार करते रहेंगे. किया भी यही, उस समय की पूरी बात समझने के लिए कृपया दिया हुआ  विडियो लिंक जरुर देखे :-  इस्लामी शान्ति 

इस तरह से एक पंथ और दो काज हो जाते हैं, एक जीवन दिलचस्प बना रहता है दूसरे इनको शान्ति का आभास  होता है. 

इनकी शान्ति इनके भाईचारा मे निहित होता है, अर्थात गैरमुस्लिम भाईयो का चारा छीन लो, नहीं मिल रहा तो क़त्ल कर दो,  इस्लामिक क्षेत्र मे ही इनकी शांति निहित होती है, अतः ये हमेशा इसके लिए सतत प्रयास रत रहते हैं.  जहाँ इनकी संख्या कम रहती है वहाँ ये खून का घूट पी कर सब कुछ सहते है, गैर मुसलमानों की शांति भी इनके संस्कारित शांति मे खलल तो डालती है जिससे इनका जीवन नीरस हो जाता है, अतः हमेशा ताक मे रहते हैं, प्रोग्राम सेट करते हैं, और मौका मिलते ही धमाका वमाका कर बता देते हैं, गैर मुसलमानों की शांति कितनी खतरनाक  होती है. 

इनकी कौम हमेशा अपने तरह के शांति टाइप भाई खोजते हैं, उनका समर्थन करते हैं, उनके ऊपर कोई आंच नहीं आने देते, यदि कोई पडोसी देश का मुसलमान भारत मे आ के कष्ट सह रहा है तो जाहिरान तौर पे गलत है, भले ही मूल निवासी  लेकिन गैर  मुसलमान  इन विस्थापितों से तंग आ चुका हो. 

शांति लाने के लिए ये जरुरी है की संख्या जादा हो, अतः नसबंदी हराम होता है, खैर ये भी संस्कार है जो बचपन से सिखाया  जाता है, और जैसे ही संख्या ठीक ठाक पहुच जाती है, ये अपना सांस्कृतिक  कार्यक्रम शुरू कर देते है.  सबसे मजे की बात ये की मुसलमान इसे खारिज कलर देते हैं, उन्हें ये कहते हुए भी पाया  जाता है की हम हुंडी टाइप के शांति के समर्थक है, लेकिन सिर्फ कहते हैं, विरोध मे सम्मलेन वगैरह नहीं होता  है, कारण ??? मुह मे आम बगल मे केवांच(एक जहरीला पौधा), लेकिन हाँ यदि इस्लामी शांति पर आंच आये तो तत्काल शांति सम्मलेन की घोषणा होती है, जिसमे ये आगजनी उपद्रव, हिंसा कर तुरंत शांति बहाल करने का  कार्य करते है. 

अभी हाल मे ही  रमजान के पवित्र महीने मे इन्होने पुणे मे शान्ति  बहाल कायम करने की कोशिश की थी,  जो सफल न हो पाया अतः जरुरी था की अपने बंगला देशी(इस्लामी देशी-बाकि तो सब बिदेशी ) भायियो के विरोध मे सड़क पर उतरे, ये हुआ भी, जम के तोड़फोड़ हिंसा के बाद इनका कुछ मनोरंजन तो अवश्य हुआ जिससे शांति बहाल होने मे मदद मिलेगी.  मुंबई भाई चारा सम्मलेन का ये  वीडियो भी जरुर देखें :-  

भगवान इन्हें शांति दे , आमीन
मुंबई मे अमर जवान ज्योति को तहस नहस करता एक शांति  एवम भाईचारा प्रेमी 

Wednesday, August 1, 2012

हैपी रमजान शिंद जी,

जनाब  शिंद जी,                                                दिनांक - ३१ जुलाई २०१२ 

सलाम वालेकुम, 

शुन्य माता को मेरा सादर चरण स्पर्श कहियेगा, और अमूल भईया को के नमस्ते, आशा है वो लोग कुशल मंगल होंगे. उनकी कुशलता मे ही आपकी-हमारी कुशलता है, उनकी प्रसन्नता मे प्रसन्नता. 

रमजान के पाक महीने मे बिजली गुल करते ही अल्लाह ने आपकी  जिस प्रकार से आपकी बरकत दी है, उससे हमें  भी सुकून है की हमारी  भी बरकत होगी. आज शाम हम रमजान के पवित्र महीने और  आपके पदोन्नति के उपलक्ष मे धमाके बाजी कर खुशी का इजहार करेंगे, खुशी छोटी सी ही सही लेकिन कई बार मे मनाई जायेगी, क्या करे अभी कसाब भाईजान की तरह अल्लाह हम पर नजरे इनायत नहीं रखता, लेकिन  जब भी मौका मिलेगा हम एक बड़ी खुशी मनाएंगे इंशा अल्लाह,  इसी बहाने हमारी प्रक्टिस भी हो जायेगी. हाँ हम वादा करते हैं की मालो असवाब को कोई नुक्सान न होगा, रमजान के महीने मे इतना डिस्काउंट तो चलता है. हम उदार ब्लास्टर है..

आपके देश मे हमारे ही भाई हमें पसंद नहीं करते, कहते मुसलमान आतंकी नहीं हो सकता, अल्लाह उनको जल्द रास्ते पे लाये, दो चार तो आ भी गएँ हैं, क्या आप भी मानते है की हम मुसलमान नहीं?? दिग्गी अंकल ने हमारे धरम पिता "ओसामा जी"  का जो सम्मान किया उसको देखते हुए भी इस देश के मुसलमान भाईयों की शंका नहीं जाती. आशा इस दिशा मे आप कुछ नए कदम उठाएंगे. 

भारत - पकिस्तान मित्रता का जो कदम आपकी सरकार ने उठाया है वो काबिले तारीफ़ है, दो देश मित्र तभी हो सकते हैं जब दोनों की विचारधारा एक हो, हमारे यहाँ के साथ साथ आपके यहाँ भी धमाके हों, तब दर्द दूसरे दर्द को समझ पायेगा. हम आप मिलकर दोनों देशो के सम्बन्ध को और मजबूत बनायेंगे इशा अल्लाह. 

आशा है खुशी मनाने के इस तरह के तरीकों पे आपको एतराज न होगा, यहाँ की जनता भी इस प्रकार के जश्न की आदि हो गयी है, और आवाम भी खुश होती है, आपकी मिडिया को हमारा शुक्रगुजार होना चाहिए, कम से कम पचास घंटे का मैटर उनको भी मिलेगा.. साथ साथ आपकी सरकार को  भी, कुछ देर के लिए ही सही लेकिन अन्ना आन्दोलन से सबका ध्यान जरुर भटकेगा. 

 कृपया आप अपना विसिट कैंसिल कर दे, खामख्वाह लोग बाते बनायेंगे.  

रमजान मुबारक , 

शब्बा खैर. 

टेरिरिस्ट वेलफेयर असोसियेशन 

(भाईयों जितनी उर्दू आती है उसी हिसाब से लिखा है, बाकी खुद समझ लीजियेगा)