नारद: ये जाहिल हैं, मुसलमान नहीं

Saturday, October 27, 2012

ये जाहिल हैं, मुसलमान नहीं


बकरीद आई और दंगे की छाप छोड़ गयी, समझ नही आता शान्ति के इस धर्म में इतने जाहिल क्यों है कैसे है? निश्चित तौर पर ये मुसलमान बाद में जाहिल पहले है, इंसानी जाहिल, हालाकि  जानवरों और जाहिलो में और जानवरों में कोई ख़ास नहीं, क्योकि दोनों में सोचने और समझने की क्षमता का अभाव होता है और इनके साथ सरकार भी सलूक जानवरों जैसा ही कर रही और ये सोचते है की ये सरकार के शह पे हैं या सरकार इनपे रहमत बरसा रही है. ये इतने जाहिल हैं की खुद अपने खिलाफ हो रही साजिश को भी नहीं पहचान रहे.  

हालाकि  सभी जाहिल नहीं, मै एसे ढेर सारे मुसलमानों को जानता हूँ जो जहीन है लेकिन वो बिचारे करे भी तो क्या ? अब हो रहे दंगो में वो किसी को रोके भी तो कैसे ? हिन्दू को रोकेंगे तो पिटेंगे, मुसलमान को रोकेंगे तो जादा पिटेंगे. अलबत्ता वो इस झमेले में पड़ना नहीं चाहते. जो मुसलमान नौकरी पेशा है वो इसमें अपने हाथ जलाये या अपने बीवी बच्चो को पाले या अपना भविष्य देखें ? मुसलमान पढ़ा लिखा और जहीन होते ही समझदार हिंदुवो की तरह इन सब पचड़ो से दूर भाग आता है, लेकिन कीचड़ के छींटे से अपने को बचा नहीं पाता, गेहू के साथ घुन की तरह पिस जाता है. शक और गालियों के बाण उसपे भी चल जाते हैं. लिखने वाले भी एक ही तराजू में सबको तौल देते हैं.

जब भी ईद या बकरीद आता है इस तरह का दंगा होना अनिवार्य हो गया है ? क्या खुदा दंगा करके रोजे खोलने को कहता है ? नहीं बिलकुल नहीं, वास्तव में ये रोजे अपने लिए नहीं बल्कि नेतावो के लिए खोल रहे हैं, और अपने ही खिलाफ दूसरी कौम को लामबंद कर रहे हैं. 

अभी हाल में फैजाबाद दंगे का कारन मालूम करने पर पता चला की मूर्ति विसर्जन (दुर्गा पूजा के बाद) के समय कुछ गुलाल मस्जिद परिसर पर गिर गया, इसी को लेकर दंगे भड़के थे, बाद में कुछ जाहिलो ने जो अपने आपको मुसलमान कहते हैं, ने बीकापुर में मदरसे के पास के इलाके हिंदुवो के घरो में आग लगा दी और इस तरह से कफर्यू लग गया. इस प्रकार के जाहिलो ने एक बार ने बल्कि कई बार इस्लाम के नाम पर दंगो की शुरुवात की, और सरकार इन्हें पकड़ने की बजाय वोट पर पकड़ बनाने में जादा दिखी. 

ये जाहिल नहीं समझ पा रहे की अपने ही कुकर्मो से ये इस्लाम को हिन्दुओ की नजर में जहरीला बना रहे है, हिन्दू  अपने कृत्य को "प्रतिक्रिया" का नाम दे के बच जाते हैं.  अब समझ ये नहीं आता की मस्जिद पे गुलाल गिरने से इस्लाम पे इसी कौन सी आफत टूट पड़ी, और यदि वो आफत टूट ही गयी तो तो घर जला के उस आफत को ये दूर कर पाए ? नहीं बल्कि ये दिन ब दिन दो समाजो में जहर भरते जा रहे हैं.
फिर मुल्ले हिंदुवो की प्रतिक्रिया को आक्रमण बता के फिर से इनके दिमाग में जहर भरते है. की हिन्दू कौम मुसलमानों से नफरत करती है.  तो भाई दोनों इसी देश के हैं, और यही रहना है, आप किसी के बहकावे में आ के क्रिया न करोगे तो तो प्रतिक्रया कहाँ से होगी, इसी देश में मौलाना कल्वी जी भी हैं,  जो सभी  हिन्दुवों के आदर पात्र हैं और बुखारी जैसे बिजली चोर भी. यदि सिर्फ मुसलमान के नाम पर ही नफरत करना होता तो हिन्दू "कल्वी" जी  से नफरत करते और अब्दुल कलाम से भी, ए आर रहमान से भी, इसी देश में फ़िल्मी दुनिया में  शाहरुख़ और सलमान को सबसे ऊँचे दर्जे पे रखने वाला हिन्दू समाज ही है क्योकि ये बाहुल्य है, इस बात को दिमाग से निकलना ही होगा की हिन्दू सिर्फ "मुसलमान" नाम से नफरत करता है, वो कर्ता है तो जाहिलो के कुकृत्यों से, जिसको आपके मौलवी हिन्दुवों की नफरत बता देते हैं, ये समझना आपका भी काम है. अफ़सोस इस्लाम के नाम वाले इस देश में जाहिल जादा और जहीन कम है. 

 इस देश की जादा आबादी अभी भी गाँवों में रहती है. जहां एसे नौजवान रहते हैं जिनके हाथो को न काम है, न दिमागी खुराक, और एसे ही लोगो को ले के मौलवी इस्लाम के नाम पे अपनी ख़ुडक शांत करते दीखते है. इनको बड़ी आसानी से अपना शिकार बनाया जा सकता है, और यही वोटर भी होते हैं जो लामबंद हो के वोट करते हैं. और राजनेता इनके वोट ले के सत्ता तो पा जाते हैं, लेकिन इनको इनकी हालत पे ही छोड़ देते हैं, ताकि आगे फिर से इनके धार्मिक सुरक्षा के नाम पे इनसे वोट हथियाया जा सके, और दुसरे हिन्दुओ के खिलाफ भड़का के उन्हें एक तरफा वोट डालने के लिए दिमागी रूप से तैयार किया जा सके, क्योकि यदि इस कौम के जाहिलो का उत्थान कर दिया तो ये भी अपना भला बुरा समझने लगेंगे तब न इनके पास दंगो का समय होगा और न तोड़ फोड़ का, फिर ये भी सर उठा के चलने के लायक हो जायेंगे तो फिर धर्म के नाम पर इन नेताओं को सत्ता कौन दिलाएगा ? 

मैंने इस्लामी धर्म के पे लिखने वालो को काफी देखा है, जो इस्लाम की अच्छाइयां तो बतलाते हैं, लेकिन कुरीति को दूर करने के नाम पे चुप्पी साध लेते हैं. एसा नहीं है की इस्लाम को रास्ता देने या कुरीति दूर करने के लिए  कोई आगे ही नहीं  आया, आये और कै आये लेकिन उनको अतिवादियों द्वारा शाजिश करके शहीद कर दिया गया. दूसरी सबसे बड़ी बात की इस्लामी धर्म कर्म पे लिखने वाले  कभी अपनी कौमो के गलत कार्यो   निंदा  करते दिखाई नहीं देते जिससे हिन्दू समाज ये भ्रम फैलना स्वाभाविक  है की मुसलमान धार्मिक रूप से दंगाई है.  क्योकि गलत कार्यों की निंदा  न करना शह ही माना जायेगा, जबकि वहीँ हिन्दू अपने ही कुरूतियो की निंदा ही नहीं बल्कि बाबा -बुबियो की पोल भी खोलता दिखाई पड़ता है. रही सही कसर मुल्ला मौलवी पूरी कर देते हैं जो इन्हें इस्लामिक राज्य का झूठा भ्रम दिखला के इन्हें धर्म की बेड़ियों में जकड़ पीछे जाने के लिए प्रयासरत है. 

इनकी सबसे बड़ी समस्या है इनकी जनसँख्या, जो धर्म के रस्सी से बधी हुयी है, जो मुसलमान पढ़े लिखे होते हैं वो आज नसबंदी करा रहे हैं, और अपना भला बुरा सोच सकते हैं, उन्हें पता है  एक चादर में कितने पाँव फैलाए जा सकते हैं, सुकून से रहने के लिए चादर का बड़ा होना जरुरी है, जिसके बुनने के लिए उन्हें जहिनियत का जुलाहा बनाना पड़ेगा, और वो बन भी रहे हैं, लेकिन इस प्रकार के लोगो की संख्या नगण्य है.

जिस दिन सबके हाथो को काम और पेट में रोटी होगी यकींन मानिए दंगो का नामोनिशान मिट जाएगा, लेकिन ये जिम्मेदारी जिनकी है वो इन्ही के भूखे पेटों से रोटियाँ छीन उसे अपने राजनीति के मशीन में डाल कर वोट बना लेते हैं. और इन्हें अपने हाल पे छोड़ देते हैं और इनके मजहबी पथ प्रदर्शक इन्हें रास्ता न दिखा अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे है एसा लगता है जैसे इन्हें कौम मौलवी नहीं बल्कि नेतावो के सलाहकार है. 

भूखा पेट ही अहिष्णु हो सकता है, जो सिर्फ हिन्दुओ के प्यार से नहीं भरा जा सकता. क्योकि भूखे पेट को प्यार चाहिए तो जरुर लेकिन पेट भरने के बाद, और ये प्रकृति का नियम भी है.



सादर
कमल कुमार सिंह
२७ अक्टूबर २०१२ 

6 comments:

Vidhan Chandra said...

Satik aur dhardar prasngik lekh narad bhai!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को आज दिनांक 29-10-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1047 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

Virendra Kumar Sharma said...

एक दम से सटीक विश्लेषण .हां ज़ालिम कौम नहीं होतीं हैं इनमें गफलत पैदा करने वाले बलवाई होते हैं .

lokendra singh said...

एक बात से इन जाहिल मुस्लिमों की मानसिकता को समझ जा सकता है -
एक बकरे का बच्चा जिसे ये बड़े लाड प्यार से पलते हैं उसे हलाल करते में इनके आंसू भी नहीं निकलते... जबकि हिन्दू घरों में किसी भी जीव को पलते हैं तो उसके साथ ह्रदय की भावनाएं जुड़ जाती हैं.और उसकी हत्या करना तो दूर उसकी सहज मौत पर भी घर में मायूसी छा जाती है,..

Anonymous said...

Very useful blog. Keep up the good work.

sanjay rai said...

दरअसल इस्लाम की उत्पति एक जंगली कबीले से हुई | बर्बरता इस्लाम मे इनबिल्ड है और ए कभी खत्म नही होगी } आज भी इस्लाम वही सदियो पुराना कबीलाई मजहब बना हुआ है क्योंकि इसमे बदलाव करना हराम है | सजा के नाम पर नागरिको द्वारा पत्थर मार मार कर जान लेना, आंखे निकाल लेना, हाथ काट लेना शामिल है जो किसी भी एंगल से मानवीय नही है | इतिहास उठाकार देखे तो इस्लामी नवाबो की गंदी करतूते उजागर होती है हारे हुए सैनिको का सर काटकर टांग देना उनकी आंखे निकाल लेना, उनके बच्चो को हिजड़ा बनाकर उनके साथ अप्रकरतिक सेक्स करना | अरब मे ग़ुलाम प्रथा कितनी गंदी थी | लड़कियॉ को भेद बकरियो की तरह बेचना और उनका बलात्कार जायज होना | अप्रकरतिक सेक्स इस्लाम मे बहुत पहले से है खास तौर से इस्लामिक सुल्तान और नवाब किया करते थे तभी से इस सेक्स को "नवाबी शौक" का नाम मिला है | छोटे छोटे बच्चो को ऊँट की गर्दन पर बाँधकर उन्हे जलाया जाता था और उनकी दौड़ कराई जाती थी तमाशबीन तालियाँ पीटते थे | बाकी धर्म का मूल "दया" है लेकिन इस्लाम तो विलोम पर आधारित एक शैतानी धर्म होने के कारण "बर्बरता" पर आधारित है | जानवर को भी तड़पा तड़पा कर मारते है जिसे "हलाल" कहते है और उनका ईश्वर इससे खुश होता है | दस बरस पहले बांग्लादेश ने भारतीय जवानो की आंखे निकाली थी और कुछ दिन पहले पाकिस्तानी सेना ने दो भारतीय जवानो की गर्दन काट कर सीमा मे ले गये | ठीक है तनातनी होती है लेकिन गर्दन काटना और आंखे निकाल लेना क्या मानवीय है ? और किसी भी देश की सेना ऐसे गन्दे काम नही करती | मदर टेरेसा को एक हजार नंगी औरते मिली थी जिसका पाकिस्तानी सेना ने रेप किया था और उनको नंगा करके छोड़ दिया | पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को हराया और उसको सलामत जाने दिया जबकि गौरी धोखे से जीता और पृथविराज की आंखे निकाल ली | कोई कुछ भी काहे लेकिन हकीकत सिर्फ ए है की इस्लाम एक शैतानी मजहब है और भविष्य मे भी रहेगा | मानवीयता, रहम का इस मजहब मे कोई स्थान नही है | बलात्कार भी इस धर्म मे जायज है | एक सतर साल का बुड्ढा भी दस साल की मासूम लड़की का बलात्कार निकाह का ड्रामा करके कर लेता है बस मौलवी को मुर्गा खिलाना पड़ता है |