नारद: भेडिया कि जीवनी

Saturday, June 23, 2012

भेडिया कि जीवनी


मै  भेड़िया हूँ , धूर्त , लम्पट लेकिन दिखने मे आम जानवरों जैसा ही हूँ .
एक समय था, जब आबादी कम और हम भी कम थे, भोजन का सामंजस्य बराबर था. धीरे धीरे समय बदला, मौसम बदला , मिजाज  बदला, हम ठहरे जानवर वैसे ही रह  गए , अलबत्ता इंसानों ने प्रगति कि, खूब प्रगति कि, खास कर भारत मे, यहाँ के लोगो मे पुरुषार्थ बहुत है, बहुत मेहनती है.  दिन रात मेहनत करते हैं, खूब बच्चे पैदा करते हैं. धीरे धीरे भारत मे आबादी  बढती गयी, इंसान बढते रहे और इंसानियत घटती रही . हम भी इन्तजार मे थे कि इस बढ़ने और घटने का फायदा हमें कैसे मिलेगा, लेकिन अफ़सोस.  हम पीछे होते  गये. 

इंसान बढ़ भी गया, चार्ल्स नियमानुगामी बन इंसानियत भी घट  गयी लेकिन अब तक इंसान जानवर नहीं बन पाया था. यही हमारी सबसे बड़ी चिंता थी. हमें भोजन कि कमी महसूस होने लगी. 

हमने अपनी सभा बुलाई, विषय  था जीवन यापन, खूब चर्चा हुई , खूब बहस हुआ , अंत मे उपाय निकला कि इंसानों मे सिर्फ इन्सानियती का घटना काफी नहीं है, कोई उपाय निकालो कि इंसान जानवर हो जाए , वो भी हमारे जैसे मारे काटे. 

एक प्रस्ताव पारित हुआ, इनको जानवर बनाओ. इसका जिम्मा लिया हमारे सर्वश्रेष्ठ भेडिया रक्षक के अधिपति श्री भेडिया चालक ने . 

अगले दिन जा के वो इंसानों के किसी ग्राम देवता के मूर्ति तोड़ आये, और हमारी योजना कामयाब हो गयी. 
लोग मार काट करने लगे और हमें माँस मिलने लगा, 

हमें अपने जीवित रहने का पक्का उपाय भी मिल चुका था. अब हम दशको से खुश है , कोई चिंता नहीं कोई परेशानी नहीं..


 क्या आप पहचान सकते है  कि हम भेडिया कौन ?????/ 

1 comment:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

उत्कृष्ट प्रविष्टि...गज़ब