नारद: कुछ लिखना चाहता हूँ

Thursday, December 1, 2011

कुछ लिखना चाहता हूँ


आज कई दिन हो गए थे कुछ लिखे हुए,आज कुछ लिखना चाहता था मै ,
दिल टूटा  , देश टूटा  , व्यवस्था टूटी  ,  फिर भी लिखना चाहता था मै ,
थक के चूर हो के जब घर आया , तो माँ ने कुछ लाने  को बोल दिया ,

सो लेने चला गया,  नहीं लिख पाया, सोचा वापस आ के लिख लूँगा,
आग तो आग है, कभी भी जला  लूँगा,

फिर वापस आया, सोचा अब लिख लूँ,
तभी ऑफिस का फोन आया, जिसने कुल डेढ़ घंटे चबाया,
सो फिर लिख नहीं पाया,
फोन खत्म होते ही समझ में आया, अब मै फ्री हूँ ,
कलम से किसी  की भी  इज्जत  उतारने  को फ्री हूँ ,

सोचा  लिख मारो ऐसा, कि तहलका हो जाये,
दुनिया मुझे तक़दीर बादशाह समझने लगे ,

जैसे ही  ये बात मेरे दिल में आई  ,

तत्काल मेरी आत्मा मेरे सामने आई ,
उसने मुझसे  गुहार लगाई ,

रे मुरख क्या लिखेगा ??
किसकी धज्जी है उडानी ??
प्रेमिका के बारे में , उसको तू कभी रास न आया ,
या  बारे में माँ के, जिससे सादा प्यार ही प्यार है पाया,

एक काम कर, राजनीति  पे लिख दे ,
हिट भी होंगे तेरे खाते में ,
कुछ प्रोजेक्ट बताता हूँ , लिख मारेगा तो सब गुलाम हो जायेंगे 
आजकल मशहूर प्रोजेक्ट है बाबा , और अन्ना  हैं मार्केट में ,


अब ये तू सोच , किसको है साथ में लाना ??
इन दोनों को हैं लड़ाना,
या इनको जोड़ , इस कुव्यवस्था  में आग लगाना , ??

मैंने कहा ,
मै बेचारा , दिल का मारा ,
मै जिसको एक बार , मिला वो मिला न दुबारा ,
बेहतर कि मै कुछ कर लूँ ,
उससे भी बेहतर है कि कुछ लिख लूँ ,
जैसे ही लिखने चला ,
नजर पड़ी , पासबुक पर ,
जो हो चुका था निरीह , लाचार ,
मेरी तरह वो भी रो रहा था बेजार ,

तो सोचा , कल का काम तैयार कर लूँ ,
बेहतर है आज नहीं , कल या कभी और लिख लूँ ,

सो आज भी लिख नहीं पाया ,
फूटपात पे हूँ , सो अपना बिस्तर  तक न गरमा पाया .
.हमेशा कि तरह , आज भी न सो पाया !!

(कमल) १ दिसंबर २०११

6 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत बढ़िया...मन की उधेड़बुन लिए भाव....

रविकर said...

वाह भाई वाह भाई वाह भाई वाह |
सुन्दर सुन्दर सुन्दर भाई |
उत्तम उत्तम उत्तम भाई ||

Madhulika Tripathi said...

सो आज भी लिख नहीं पाया ,
फूटपात पे हूँ , सो अपना बिस्तर तक न गरमा पाया ..हमेशा कि तरह , आज भी न सो पाया !!
बहुत खूब नारद जी...
वैसे आश्चर्य की विधि-वेदांत ज्ञाता को लिखने से पहले इतना मनन करना पड़ता है.... :-)

anju(anu) choudhary said...

मन की कशमकश ...ज़ारी है ..और वो ऐसे ही बनी रहेगी ......आभार

कविता रावत said...

जैसे ही लिखने चला ,
नजर पड़ी , पासबुक पर ,
जो हो चुका था निरीह , लाचार ,
मेरी तरह वो भी रो रहा था बेजार ,

तो सोचा , कल का काम तैयार कर लूँ ,
बेहतर है आज नहीं , कल या कभी और लिख लूँ ,
..kashmkash ke beech kab samay nikal jaata hai sach pata kahan chalta hai..
badiya prastuti

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें....!

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com