नारद: कांग्रेस
Showing posts with label कांग्रेस. Show all posts
Showing posts with label कांग्रेस. Show all posts

Sunday, February 16, 2014

असली नकली

"असली नकली" ये किसी बोलीवूड निर्देशक द्वारा निर्देशित कोई फिल्म नहीं है, बल्कि आजकल जनता, नेता, आमिर, गरीब, सजीव निर्जीव सब निर्देशक बन एक दुसरे को असली नकली का प्रमाण पत्र देने पे उतारू है, बस कंडीशन ये है की कंडीशन क्या क्या हो?  

आपके  पाले में  है तो असली है, दुसरे के पाले में है तो नकली है, या कुछ  यों कह ले की रूपये आपके जेब में है तो असली यदि दुसरे  के जेब में तो नकली, हम रईस तो व्हाईट मनी, वो रईस तो पक्का आपके  मन से भी काला  ब्लैक मनी,  असलियत चाहे जो कुछ भी हो उसमे आपना कीमती दिमाग जाया करने की जहमत कोई करना चाहता. दिमाग भी भला चलने की चीज है? अरे चलाना है व्यंग बाण चलिए, गाली चलाईये, धरना चलाईये, धरना के दौरान पुलिस पे पत्थर  चलाईये, और जब  पुलिस प्रतिक्रिया स्वरुप आप पे लाठी चलाये  तो आप पुनः अपने मूल रूप पे आके  पुरे जोश ए खरोश से, मुह से, दिल से, यहाँ से वहां से, जहाँ जहाँ से मन करे वहां वहां वहां से गाली चलाईये.  

आपका समर्थक है  तो असली देश भक्त, उनका है तो नकली वाला देश भक्त, नकली देशभक्त ?? नकली आदमी ? ये क्या होता है,  ये क्या कागज का होता है ? प्लास्टिक का होता है ? जुट का होता है ?  पटसन का होता है ? आदमी ही होता है ?? खैर भगवान् वो आपके हिसाब से जाने क्या होता है लेकिन इतना  तय है की वो आपके साथ नहीं तो आम आदमी नहीं, और आप आपके साथ है, आप आप है, गधे के भी बाप है लेकिन फिर भी असली है.

 गधे  के बाप यों की  आप नेता है, और नेता के लिए जनता बाई डिफाल्ट गधा ही होता है,  वास्तव में गधे जब प्रमोट हो जाए तो नेता होते है. आजकल कुछ गधे समूह बना कर नेता बन गए सो फाइनली वो प्रमोट हो के नेता है लेकिन वही ढाक के तीन पात गधो  के भले के नाम पर गधो को गधा बनाकर खुद गधे  से नेता बन बैठे, गधे बिचारे  फिर छले जा चुके है. ता अपने आप को सबका बाप समझते है की कोई गधा जब आपके पास आ जाता आप उसके सामने तत्काल दो मुठ्ठी अपना चारा छेंट देते है और यदि वो खा ले तो  टनाटन बुध्धिमान हो जाता है और तत्काल आपकी तरफ से बुध्धिमान का प्रमाण पत्र उसके गले में लटका दिया जाता है. वो गधा आपके सामान पवित्र और बुध्दिमान बन चूका है, वह कुछ भी ढेंचू ढेंचू करे पब्लिक को वाह वाह कहना ही  चाहिए अन्यथा पब्लिक अथवा गधा आटोमेटिक बाईडिफाल्ट  गधा है, भ्रष्टाचारी है, कमीना है,  कल को वही गधा आपके बड़े मुह या  आपके छोटे दिमाग के स्थान (सर )  पर दुल्लती मार दे तो आप तत्काल उसे अपनी रूहानी शक्तियों उसे उसका असली रूप बता देते हैं, तब गधा गधा देंछु ढेंचू करने लगते है और वो भी आपको गधा गधा ढेंचू  करते हैं. खैर वो आपका आपस का भाई चारा है, होता रहता है . 

यही बात आजकल धर्म बनाम पार्टी पे लागू है, आजकल कुच्छ अतिवादी (आप इन्हें अन्मैचोर भी कह सकते है) लोग किसी को सच्चा या झूठा मुसलमान का सर्टिफिकेट बाँट रहे है, सिर्फ़ इस आधार पर की वो किसको सपोर्ट करता है? वो किस पार्टी का है ? (हर जगह इस तरह एक लोग है) नक़वी जी और शाहनवाज़ को कॉंग्रेस समर्थक मुसलमान नकली कहते है, जबकि भाजपा समर्थक कॉंग्रेस मुस्लिम नेताओ को च्छद्म सेकुलर (कुच्छ हद ये सही भी है ) लेकिन असली नकली का स्रटिफिकेट कैसे देते हैं वो... मुझे समझ नही आता ?? कोई आपके पाले मे है तो असली, उनके पाले मे है तो नकली ? भाई पाला / पार्टी नही आदमी देखो . 
मै असदूद्दीन ओवैसी (बड़े वाले का छोटे का नही ) का भी उतना ही फ़ैन हू जितना मोदी का. 

मै कोंग्रेस के मदीनी जी का भी फैन हूँ , किसी मै सिर्फ इसलिए देश द्रोही या नकली नहीं कह सकता क्योकि वो मोदी विरोधी है .. मोदी विरोधी होना देश विरोधी नहीं है भाई , हो सकता है एक समय मे वो मोदी के नजदीक भी आ जाये तब अब आप क्या उनका नकली वाला सर्टिफिकेट सरेंडर करवा दुबारा असली इस्सु करेंगे ?? अरे ये पोलिटिक्स है भाई, भाजपा निश्चित रूप से आज के समय मे धर्म निरपेक्ष है बाकी पार्टियों की अपेक्षा लेकिन दूसरी पार्टी के लोगो को इस तरह का प्रमाणपत्र दे के अपना कागज़ और दिमाग न खराब करे|

मै मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध करता हू, मुस्लिम का नहीं

और अंत मे सबसे बड़ी बात इन फर्जी सर्टिफिकेट बाटने वालो फर्जी लोगो को तत्काल "असली" १००% या २४ कैरेट संघी होने का सर्टिफिकेट तथाकथित "फर्जी बुद्धजीवियों" से भी मिल जाता है - फ्री मे. 

इस प्रकार के नेतावो/ लोगो से आग्रह है की "आप" कुछ "उस" प्रकार के सिनेमा को "यू" सर्टिफिकेट दे के देखे, काम करता है या नहीं ? 

इती श्री प्रणाम पत्रं अथ कथा:
सादर

कमल कुमार सिंह
१६ फरवरी २०१४ 

Sunday, September 8, 2013

सेकुलरों का राजधर्म



मैंने टी वी पे कई फिल्मे एसी देखि जिसमे डाकू का एक गिरोह होता है, और इन डाकुवो का एक अड्डा भी होता है, वो सारे डाकू हफ्तों तक भेस बदल कर इधर उधर लूट, पाट हत्या करते है, लेकिन सरदार के नियम के अनुसार एक निश्चित दिन इकठ्ठा हो सरदार को सब कुछ अर्पित करते है, फिर उनका हिस्सा बाटा जाता,

 कभी कभार उसी "अड्डे"  पे कई योजनाये बनती है, कहाँ कब कैसे लूट पाट  करनी है ? कहाँ कब किसकी हत्या करनी है , कौन कौन उसके रास्ते मे आ रहा है? और अड्डे से निकल कर होता है हमला. लूट पाट, मार काट, बालात्कार, आगजनी. और ये सब करने के बाद जब पुलिस दौडाए तो वापीस अड्डे मे घुस जाना और वही से गोली बारी करना. 

 इनके सरदारों को सेट्टिंग भी होती थी, गाँव के कुछ सांपो जैसे विषैले लोगो से  सांठ गाँठ, डाकू उसको प्रधान बनाने मे मदद करते और और ये उन डाकुवो कि पुलिस इत्यादि से बचाने संरक्षण देने मे. इनकी मंशा पुरे इलाके - क्षेत्र मे अपना अधिकार जमाना होता है, डाकुपन फैलाना होता है जिसमे हार्डकोर का काम सम्हालते है "अड्डे वाले" डाकू और सोफ्टकोर यानि जनता जनार्दन के बीच कि कड़ी होते हैं संपोले  विषैले जैसे इंसान दोनों कि मंशा एक ही होती है राज करना., जब कभी जनता संपोलो से गुहार लगती है कि आप तो चौधरी है हमने  आपको जिताया है आप हमरी रक्षा करें तो संपोले दलील देते हैं , वो डाकू भी हमारे भाई है, हम उन्हें मुख्य धारा मे लाना है, आदि आदि, गाँव वाले बिचारे अपना सा मुह ले के चुप होते है, वही डाकू अपना डाकूपण दिखाते हुए न जाने किस प्रकार कि "हक" कि बाते करते है. 

और ये खेल चलता रहता है, गाँव के सीधे साधे लोग इन मुठ्ठी भर  डाकुवों और संपोले के खेल मे पिसते रहते हैं, लेकिन उनका सीधापन ही उन्हें खाता रहता है, वो जादा होने के बावजूद भयग्रस्त रहते हैं,  क्योकि उनका स्वभाव लुट पाट, हत्या बलात्कार नहीं होता, न ही वो कर सकते है,  तभी कहीं से कोई बागी बनता है, वो गावँ वालो को एक करता है, फिर भी उसके खिलाफ प्रपंच चलाये जाते है, परेशानियां खड़ी कि जाती है, गाँव वालो को डराया धमकाया जाता है, लेकिन फिर भी विजय उसकि होती है क्योकि वो  सत्य के साथ होता है 

एसी फिल्मे आपने भी कई देखि होंगी, और इस तरह के कई कहानिया सुनी होंगी,  होंगी ??  अरे होंगी क्या ? अभी लाईव देखिये न .. अभी भी तो दिख ही रहा है.. नहीं ?? 

साम्प्रदायिकता का सांप ऐसा है जो किसी भी विकास को डस लेता है. और इस देश मे एक तबका ऐसा भी है जो चोरी के बाद सीना जोरी भी करता है, और जब तक उस सीने पे वजनी बठ्करे से प्रहार नहीं किया जायेगा तब तक वह तबका सीनाजोरी कर सर उठाता रहेगा. 

इन तत्वों को सहारा देते जो दीखते हैं जो अपने को सेकुलर कहते हैं, सांप के जहर का इलाज है लेकिन सेकुलरों का नहीं, यदि आपके एक दरवाजे पे एक कुत्ता और एक सेकुलर आ जाय तो कृपया कुत्ते को रोटी दें, लेकिन अब आप कहेंगे कि कोई सेकुलर तुम्हारे दरवाजे पे आयेगा क्यों ? तो आते हैं भाई, बिलकुल आते है, यूपी वालो के दरवाजो पे श्वान समूहों ने स्वांग रचकर रोटी ले ली, खा के मोटे और ताकतवर हो गए, सत्ता मिल गयी, अब वहाँ क्या हाल है पूरा देश देख रहा है.  कमोबेश अधिकतर सेकुलर पार्टियां यही करती है, 

जम्मू कश्मीर के किश्तवाड मे भी सेकुलरों का राज है, वहाँ क्या हुआ आज तक किसी को पता नहीं, और मिडिया उस समय एक बधूवा मजदुर दिखी  जिसके हाथ पाँव ही नहीं काट दाये गए बल्कि जीभ तक काट के उसके कानो मे भर दिए गए ताकि वो न बोल सके न सुन सके, मिडिया ने खुद अपने बैन का मुद्दा तक नहीं उठाया, कही कोई चर्चा नहीं. वहाँ भी शुरुवात एक सेकुलर स्थल से हुयी थी. अब समझ मे आता है कि क्यों  अमेरिका पुलिस द्वारा सेकुलर स्थलों कि निगरानी करने कि पहल कि गयी. भगवान जाने भारत सरकार को कब अक्ल आयेगी.  पता नहीं गुजरात कि तर्ज पे किश्तवाड के लोगो को सजा कब मिलेगी ? फिर भी ये सेकुलर है. इनका "नॉन सेकुलरों"  को साम्प्रदायिक कहना कुछ वैसा ही लगता है जैसे किसी  वेश्या का किसी दूसरे नारी के चरित्र पे अंगुली उठाना. 

पिछले साल यूपी मे रमजान के दौरान हर लगभग हर शुक्रवार और उस महीने मे कई दंगा हुआ, और शुरू होता था सेकुलर स्थल से, माफ करिये जहाँ से लोग निकल कर इतने उन्मादी हो जाए वह सेकुलर स्थल डाकुवों के अड्डे से कम नहीं, और न हीं उसको  किसी भी प्रकार स्थल मानना चाहिए, हाँ उसको "अड्डा" कह सकते हैं, जैसे कुछ अड्डे चम्बल मे डाकुवो ने विकसित कर रखे है, जहाँ सबकी जाने मे रूह कांपती है क्योकि उनका  भी धर्म अलग है, "डाकू धर्म" उनपे भारतीय कानून काम नहीं करता. इसलिए उनके अपने वहाँ अपने डाकू धर्म के कानून होते है, और सरकार ये नहीं कह सकती कि चम्बल या एसी जगहों पे जहाँ डाकू रहते हों वहाँ सिविल कोड ही होने चाहिए. क्योकि सरकार वही है जिन विषैलों कि बात ऊपर सीन मे कि गयी थी. 


हाल मे मुजफ्फरनगर मे एक लड़की को छेड़ने कि घटना का का विरोध करने पे दो भाईयों को पिट पिट कर मार दिया गया, उसके विरोध के लिए पंचायत बुलाई गयी, लेकिन एम्बुश लगा के उन पर आक्रमण किये गए वो भी अत्याधुनिक हथियारिओं के साथ. और तो और एफ आई आर उन मा बाप के खिलाफ लिखा गया जिनके बेटी,बेटो कि हत्या हो गयी.  

मिडिया तब तक चुप थी जब तक मामला सोशल मिडिया मे जन के नहीं उछला, ये तो उसको भी पचा जाते "खास किस्म के चूरन" के साथ लेकिन मामला तब बिगड गया जब एक मुस्लिम और हिंदू पत्रकार मारा गया. और दिखाया भी है तो खाने के बाद बस एक पाचक कि तरह, असली खाना तो इनका अभी आश्राम बना है, शायद आशाराम  जैसा इंसान इनके लिए जादा महत्वपूर्ण  बजाय कि दसियों जानो कि चिंता करने कि, इस समय मिडिया का सबसे बड़ा दुःख ये है कि ये हालत गुजरात मे क्यों नहीं बन रहे ? 

बावजूद इसके धर्म निरपेक्षता , गंगा जामुनी तहजीब और भाई चारा का हवाला दिया जाता है, गंगा -जमुनी तहजीब समझ मे नहीं आता ?  वास्तव मे  "गंगा - जेहादी" तहजीब सही टर्म है. क्योकि गंगा तो समझ मे आता है जो एक तहजीब से संबंध रखता है और दूसरा जेहादी और जेह्दाइयों का कोई धर्म नहीं होता. क्या अब  भी गंगा - जामुनी तहजीब कहना वाजिब है ? 

रही बात भाईचारा कि तो भाड़ मे जाए एसी भाईचारा जिसमे एक पक्ष बस "भाई" कहता रहे और  भाई दूसरे पक्ष को "चारा" मान उसका मनमानी तरीके से भक्षण करता रहे.  

खैर ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक हम सब एक न  हो जाएँ और एक होकर उस गाँव वाले बागी को नेता मान कमान सौंप  दें ताकि इन सांपो के जहर का इलाज और डाकुवो को आत्म समर्पण करवाया जा सके और गाँव मे सुख और शांति आये. 

सादर 

कमल कुमार सिंह.  

Friday, August 26, 2011

हम तुम और , और चूहा बिल्ली का खेल :




विष्णु नारद से : नारद कोई अपडेट मिला भारत का , आजकल उसके भविष्य की बड़ी चिंता रहती है मुझे है , सुना है घोंघा बसंत उर्फ  अमूल बेबी ने कुछ कहा आज अपनी मम्मी के भाषा में ....


नारद : अन्ना  अन्ना , प्रभु क्या बताऊँ , बात ही पूरी हो पाई उसकी , भुला गया बीचे में की क्या बोलना है , वहां परदा भी नहीं था की पीछे से कोई प्रौन्टिंग कर देता , खैर  सुनने में आया हैं , भयंकर  जंतु पार्टी ने खुल के समर्थन कर दिया दूसरे गाँधी का ,

विष्णु : ये ऊंट करवट बैठा कैसे ??


नारद : प्रभु   सरकार के गिरगिट की तरह रंग बदलने के कारन ऊंट भी करवट  बैठ गया  .

विष्णु : जरा विस्तार से बताओ नारद गोल गोल बातें समझ में नहीं आती , हम पालन कर्ता हैं , सर्कार नहीं की तुम्हारी  कुटिल  बातों को समझे .

नारद : प्रभु तो सुनिए , एक बार तो सरकार बोलती है की बातें मान ली , फिर वही गिरगीरटाने स्टाइल में में रंग बदला और कहा कुछ टाइम चाहिए , ताकि समय और बर्बाद हो , सेकेण्ड गाँधी के समर्थक उनके मुह में अन्न ठूंस दे , आखिर मारना तो वो भी नहीं चाहते उनको , सरकार एक दम अपने इन्द्र जैसे हो गयी वहाँ  की , आपके एक बहुत पुराने पुत्र चाणक्य के पुरे नियमों को फालो कर रही है , सुना है रात में कुछ मुस्टंडे भी भेजे थे उनके गिरोह में उनकों  धूमिल करने हेतु .

पहले तो कबूतर बाजों से चिठ्ठी मंगवाई अन्ना जी से , और उसका खुद का कागजे खतम हो गया , जबाव तक नहीं दिया .

फिर अगले ही दिन मुन्नू ने सेकंड गाँधी को सैलूट भी मारा , ऊपर से एक उदंड से भी माफ़ी मंगवा दी , और संसद में सभी पार्टयों से सहमति ले के अनशन तोड़वाने में पूर्ण सहमति ले ली   .. यानि "इज्जत दे के आन्दोलन बंद" .

भयंकर जंतु पार्टी समझ  गयी की इफ्तियार पार्टी वाली डील कैंसिल कर रही है सरकार , अन्ना को गले लगा के अगले साठ और साल मलाई खाने के चक्कर में है ,   ये देख उन्होंने ने भी पूर्ण सहमति दे दी , जो की मुन्नू के गली की हड्डी बन गयी , न उगलते बन रहा है न निगलते . झटके फटके में आखिर चर्चा करा दी , बाकि घोंघा बसंत का तो आपको मालूम ही है



विष्णु : तो क्या अन्ना खुश हुए ??

नारद : प्रभु , अन्ना बच्चे नहीं  नहीं है , उनको सरकार का इज्जत रूपी लोली पोप नहीं ,  जन्लोक्पाल चाहिए .   " क्यों घबराता है प्यारे इज्जत ले के ?? - पकड़ा जाये , छूट जा इज्जत ले के "  वो समझ गए की इज्जत देने के बाद उनसे लिखित आश्वाशन माँगा जा रहा हैं , जो इज्जत लुटने की पूरी तयारी है  , जैसे बाबा के साथ किया था , बाबा तो कूदान मुद्रा में भाग लिए लेकिन ये ऐसे न मानेगा , आखिर जनता जनार्दन भी तो है .

विष्णु : तो क्या स्वर्ग से अश्विनी कुमार को भेजा जाये , मुन्नू एंड कंपनी के दिमाग का इलाज करने ??

नारद : ना प्रभु ना ,  मान लीजिए सरकार उनको भी अपने कुटिल जाल में फांस लिया , सूरा , सुंदरी या इफ्तियार पार्टी दे डाली और वो वहीँ के हो कर रह गए तो  , तो आप  स्वर्ग के वैद्य से भी  हाथ धो बैठेंगे . भ्रस्चाटार के विशेषज्ञ अन्ना ही हैं , सम्हाल लेंगे , हम जैसों का पृथ्वी पे जाना ठीक नहीं है इस परिपेक्छ्य में ..

चलिए प्रभु आप छीर सागर र की ताज़ी हवा लीजिए , हम चले रामलीला मैदान , .. अन्ना अन्ना ..

कमल

२६/ ०८ / २०११