नारद: इश्क नचाये जिसको यार

Friday, September 2, 2011

इश्क नचाये जिसको यार


बात बचपन की है जब मै नवीं  में पढ़ता था  नाम मात्र का ( हलाकि आजकल बच्चे आठवीं में ही जवान हो के सर्व ज्ञाता  हो जाते हैं , और बुढ्ढों के नाक कान काटते हैं ) .  अच्छे  खासे दिन बीत रहे थे बाँके लाल का कॉमिक्स पढ़ पढ़ के ( दूसरों से छिना हुआ ).  लेकिन कहते है न की सुख दुःख एक सिक्के के दो पहलू होते हैं ..

मुझे इश्क हो गया , वैसे तो एक तरफा मेरा तीसरा या चौथा होगा , फिर भी .. इससे पहले मै एक अभिनेत्री से बेपनाह मोहब्बत करता था , उम्र में शायद १० -१५ साल  बड़ी होंगी वो .

मै मै चिंता में घुला जा रहा था , की कैसे जल्दी से बड़ा हो जाऊं  और जल्दी जल्दी उनसे मिलके अपना प्रस्ताव रखूं .. हलाकि मेरी गणित कमजोर थी फिर भी मै हिसाब लगता था की अभी मै १४ का हूँ तो १० साल बाद २४ का हो जाऊंगा , नौकरी चाकरी करने लगूंगा फिर जाके प्रपोस भी कर दूँगा , जैसा की पहले ही बता चूका हूँ की गणित में कमजोर था इसलिए मै अपनी प्रिया के उम्र का हिसाब लगाना भूल जता था की , की १५ साल बाद उनकी कितनी उम्र होगी , सोच थी की ये सब तो सुंदरता का अमृत पि के आती होंगी .

फिर भी एक भय सताता था , की मेरे प्रपोज करने से  पहले  पड़ोस का गोलू या बबलू न जाके कर दे , क्योकि वो दोनों भी उसके बारे में बातें किया करते थे ..


आशंका बड़ी भयानक थी , लेकिन कहते हैं न , " हिम्मते मरदा -मददे खुदा "   उसी दिन सुबह  मेरे घर पे  गांव समाजी टी वी (अमूनन उन दिनों पुरे  गांवों में एक या दो टी वी हुआ करते थे , जिसपे पूरा गांव रामायण देखा करता था )  पे  रामायण देखते समय एक एड आया , अपनी लम्बाई बढ़ाये .

बस , मुझे जानो मुह मांगी मुराद मिल गयी हो .. अब दवाई तो ला नहीं सकता था , फिर भी बाज़ार में एक चांदसी  दवा खाना था जिसमे सुरेन्द्र ( नाम पे ध्यान मत दें -मुझे भी याद  नहीं है ) नाम के झोलाछाप डाक्टर बड़े मशहूर थे बवासीर का इलाज करने में .

देखते ही पूछा : शाम को मिर्ची जादा तो न खायी थी ??

मैंने कहा : नहीं डाक्टर साहब बात ये नहीं है .

डॉक्टर : तो बताओ कितने दिन से साफ़ नहीं हुआ ??

मैंने कहा : आप गलत समझ रहें हैं .

डॉक्टर : बात क्या है ??

मैंने कहा : किसी को बताओगे तो नहीं न ,

पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद उनको मैंने अपनी गुढ इश्किया बीमारी बताई .

डाक्टर : यार तो  तुम्हारी इस सनक के लिए इसमें मै क्या कर सकता हूँ ?? .

"मेरे प्यार को सनक मत बोलिए सुरेन्द्र , नहीं तो पिछली साल की तरह इस साल भी आपकी मडई होली में डाल देंगे , फिर बाबु जी के पास न जाना"  .. मैंने कहा ,.

डॉक्टर : यार छोटू तुम तो नाहक नाराज़ हो रहे हो , बताओ का करू ??

मैंने कहा : पहले तो कोई एक दवाई खिलाओ जिससे मै १५ साल बड़ा हो जाऊं , तुम डाक्टरों के पास सब होता है ( उन दिनो मुझे झोला छाप डॉक्टर  का मतलब न पता था - मुझे लगता था जिसके पास झोला भर दवाई हो ) .

डाक्टर : चलो मान लो तुम १५ साल बढ़ गए लेकिन क्या वो तुम्हे स्वीकारेगी ??? तुम करते क्या हो ???

मैंने कहा : मुझे इन्जिनियर  बनाने की दवाई भी खिला दो लगे हाथ , टाईम नहीं है जादा , गोलू और पड़ोस के लडके  वैसे ही पीछे पड़े है उसके , अबकी बार तो उनको रामायण भी न देखने दूँगा  लफुओं को  , बोल दूँगा की टी वी खराब है.  .

डाक्टर हस के : भाई इसका इलाज मेरे पास नहीं है ...

इतना कहना था की मैंने बगल में  पड़ा एक पत्थर उठा के दे मारा डॉक्टर को , वो भय से मुझे तो छोड़ दिया , लेकिन बाबु जी से कह दिया ,

शाम को बाबु जी ने जम के धुनाई की    शाम को ,
माता जी ने प्यार से बुला के चुटकी लेते हुए  कहा , "जाने दो उस हीरोईनी को , ,मन्जू आंटी  की लडकी से तुम्हारी बात कर तो रही हूँ " ...

खैर बात आयी गयी हो गयी ...

अब आईये इस वाले इश्क  की बात बता हूँ जिसपे बात शुरू हुयी थी ..

स्कुल मेरे घर से कोई ६ किलोमीटर दूर था जहा हम सवारी से आया जाया करते थे .

हुआ यूँ की मेरे बगल वाली क़क्षा में एक नयी नयी सुन्दर सुशिल लडकी भरती हुई (हांलाकि सुन्दर नहीं थी लेकिन राजस्थान में मदार  के कांटे को ही पेड़ बोलतें हैं ) .

क़क्षा खत्म होने के बाद मै उसके पिछे पीछे हो लिया इस कयास में की काश वो समझ जाये की मै उसके पीछे हूँ तो काम आसान हो जाये .. दायें बाएं देखते हुए , मन में अजीब सी गुदगुदी थी , और अजीब सा भय , की कोई ये तो न समझेगा की मै इसका पीछा कर रहा हूँ ( हलाकि बात सच थी ) .

इतना सोचता तब से उसके पिता जी अपना लम्ब्रेटा ले के आये , और वो इठलाती हुई बैठ के चल दी,

सच बताऊँ उसके पिताजी को मैंने उस दिन जम के कोसा और गालियाँ  दी इतना तो आजकल मै सर्कार को नहीं देता .

मै अपना मुह ले के वापस घर आया , माताजी ने पूछ क्या बात है उदास क्यों ??

क्या बोलता ?? पिछले बार वाली मार याद आ गयी बाबु जी की , और माता जी उनकी पक्की जासूस थी ..

शाम तक मेरे प्रिय मित्र ( उस समय जो भी उसके बारे में बात करता वो मुझे प्राण से भी जादा प्रिय लगता )  ने बताया की उसका घर यहाँ से २०० मीटर पे है बाजार की तरफ  , नयी आयी है मोहल्ले में , चल चले उसके घर के सामने पार्क में क्रिकेट खलते हैं , एक बार तेरा चेहरा देख ले तो काम बन जाये . मैंने कहा की कही उसके लम्ब्रेटा वाले फादर ने देखा तो ??  " तो क्या , पावँ नहीं अपने पास भाग लेंगे ,  या रात में उसका कुत्ता चुरा के भगा देंगे , तब पता  चलेगा हजरत को"  मित्र ने कहा .

अब मै रोज चार बार उस रास्ते जाता था की कही बालकनी में खड़ी न हो , कही से तो दिख जाये ..

जो लडका महीनो घरेलु काम से बाजार न जाता हो , अब वो घर का सामान पूछ पूछ के बाजार जाने लगा था दिन में चार बार और वो भी हर बार नहा के , पावडर लगा के  जो की गर्मियों में भी तिन- तिन  दिन का नागा देता था पानी के पास जाने में .

इस बात पे माताजी हैरान भी थी और खुश भी .

समय बिता , साल भर निकल गया , उसके पिता जी का स्थानान्तरण हो गया कही , और मेरा दिल भी टूट गया  ( चौथी बार ) अबकी बार भी ....

कुछ साल पहले मिली तो वो शायद पहचान गयी , बोली मुझे पता था की तुम मेरे पीछे थे ,
मैंने कहा तो उस समय क्यों न मुस्कराते बना मुझे देख के , इतना कहना ही था , की उसने किसी से परिचय कराया ,

" ये मेरे पति हैं मिस्टर xxxxxxx. "   फिर दिल टुटा , और समझ  में आया की लोग क्यों कहते हैं की
 " इतिहास अपने को दुहराता है " ..


कमल ३/ ०९/२०११

3 comments:

Arunesh c dave said...

हा हा जय हो नारद बाबू की

Praveen Pankaj said...

Very Nice writing Brother. After a long felt like reading something original.. May God Bless U. Very nice composition. Brgds, Praveen Pankaj

Vivek Mishra said...

nice one