नारद: क्षेत्रीय हिन्दू ह्रदय सम्राट - बाला साहब ठाकरे

Thursday, November 15, 2012

क्षेत्रीय हिन्दू ह्रदय सम्राट - बाला साहब ठाकरे


श्री केशव सीताराम एक उच्च कोटि के समाजसेवी, लेखक, और विद्वान थे. केशव जी को "प्रबोधन" ठाकरे के नाम से भी जाना जाता है. प्रबोधन नाम  इनके लेखन  ने दिलवाया, आप बहुत  ही प्रगतिवादी एवं जातिवादी के विरोधी थे. सीताराम के मामा राजनारायण जी आपको बचपन में पनवेल से अपने साथ देवास "मध्यप्रदेश" ले आये और आपका नामांकन विक्टोरिया कालेज में करवा दिया. काफी दिनों तक  वो मध्य प्रदेश में रहे जब तक वहां प्लेग का प्रकोप न फ़ैल गया. इसके बाद सीताराम जी के पिता केशव जी, आपको लेके वापिस  पनवेल पहुच गए. देवास मध्यप्रदेश का वह जगह हैं जहाँ भारतीय करेंसी छपती है . मई  इस जगह के बारे में इस लिए जनता हूँ की मई यहाँ कई बार गया हूँ चुकी मेरे आधे घर वाले यहीं रहते हैं . 

यहीं पनवेल में बाला साहब ठाकरे का जन्म २३ जनवरी  सन १९२६ में हुआ. आप पर आपके पिता का रचनात्मकता का प्रभाव पड़ा, और आप अपने करियर के शुरुवाती दौर में चोटी के कार्टूनिस्ट थे.चुकी आपका पिता जी के जुड़ाव जनता से बेहद करीबी रूप से था सो आप  फिर राजनीति में उतरे. आप मुस्लिम तुष्टिकरण के निति से बेहद दुखी थे, आप उनके दुश्मन नहीं थे फिर भी उनकी हर नाजायज मांगो की  पूर्ति आपको नहीं सुहाती थी, एसा आपका मानना था विरोधियों का नहीं, सो इसी दिशा में आपने १९ जून सन १९६६ में "शिव सेना "  का गठन किया जो पूर्ण रूपेण हिंद्वादी संगठन के रूप में जाने जाने लगी. कहते हैं की महाराष्ट्र में एक पत्ता भी आपके मर्जी के बिना नहीं हिलता,  मैंने भी  एक व्यंगकार से सुना था की मुंबई में सुनामी इस लिए नहीं आती क्योकि आपको पसंद नहीं .

बाला साहब ठाकरे का व्यकतित्व अपने स्पष्टवादिता के कारन के कारण  काफी विवादित रहे, आपकी  बेबाक टिप्पड़ी ने आप पर हमेशा सवाल उठाया, आपको विवादित बनाया. आपने हिंदुत्व का दायरा समेट कर सिर्फ महाराष्ट्र तक ही कर दिया था, या यों कह ले की आपकी नजर में हिन्दू सिर्फ महाराष्ट्रियन ही  थे. क्योकि गैर महाराष्ट्रियन को आप और आप की पौध शक की दृष्टि से देखती थी. मुझे नहीं पता की आपकी इस हिन्दुत्व  और क्षेत्रवादी वादी सोच से किसी हिन्दू का भला हुआ या नहीं लेकिन आपकी इस सोच से हुए मार काट और दंगो ने  महाराष्ट्र में एक इतिहास लिखा है. आक्रमण कारी और आगंतुक में बहुत फर्क होता है, आक्रमण कारी सिर्फ लूटना जनता है जबकि आगंतुक कुछ सीखना, लेकिन आपने दोनों में  कभी कोई भेद रखना नहीं सीखा. 

जो भी हो  लेकिन इसके बावजूद भी एक बड़ा तबका आपको भारत भर में अपना आदर्श मानता है. जो भी हो भारत में  नकारात्मक  जेहादी की सोच रखने वालो में आप भय के पर्याय थे. आपका वाणी और  व्यकतित्व अनोखी थी जो किसी पर भी अपना गहरा प्रभाव छोड़ जाती थी. आपके प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं रहा, क्या नेता और क्या अभिनेता. दुसरे के लिए कितने भी बुरे होने वाले  बाला साहब मराठियों के लिए किसी भगवान् और कम नहीं थे.

जिन जेहादियों और कट्टर पंथियों  की  आपके सामने जबान नहीं खुलती थी वो आज आपको हस्पताल में देख शेर बने हुए थे, और अब शायद गधे भी दहाड़ने लगे तो डार्विन का सिध्धांत लागू न होगा.

ताउम्र जो  हिंदुत्व के लिए लड़ता रहा,
तभी शायद यमराज भी डरता रहा ,
रखने  को आबरू  कैफियत देवों की
मान गया , यमराज साथ चलता गया, 

3 comments:

रविकर said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

जानकारी देने के लिए शुक्रिया!

अरूण साथी said...

पर मेरी नजर में उनकी पहचान बिहार और युपी बालों को पिटवाने वालों का है..