नारद: कमल
Showing posts with label कमल. Show all posts
Showing posts with label कमल. Show all posts

Saturday, March 26, 2016

वोट बैंक बनाम इंसान


जानेवालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे
एक इंसान हूँ, मैं तुम्हारी तरह.

आज मुझे लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का ये गाना याद आ रहा है. फिल्म दोस्ती में दो अपंग थे समाज से अपील करते फिरते थे, और भीख मांगते थे, कोई देता कोई न देता, चने खा के सो रहते और वो भी कभी कभी कोई छीन जाता.
वहां भी समाज था अपंग लोग अंग वालों से अपील कर रहे थे, यहाँ भी वही समाज है, लेकिन यहाँ कोई शारीरिक तौर पर अपंग नहीं लेकिन जहनी तौर पर जरुर हिन्दू समाज जरुर है. और अपंग करने वाले कौन है? निश्चित ही इसमें मिडिया और उसके बाद नेतावों का एक बड़ा हाथ है, कैसे? नीचे कुछ केस दे रहा हु, दोनों अलग अलग पक्ष के :-

केस स्टडी १.१ : दिल्ली दामिनी काण्ड :
एक लड़की का चलते बस में दुर्दांत रेप हुआ सके नाम बताये गए सिवाय एक के, यही नहीं उस समय रेप पे हल्ला मचाने वाले नेता बाद में मुख्यमंत्री बने और और उस मुस्लिम बलात्कारी को सिलाई मशीन गिफ्ट की. नया जीवन जीने के लिए.
केस स्टडी १.२ ||: अखलाख काण्ड :
एक अफवाह पे एक दुर्दांत भीड़ एक इंसान को क़त्ल कर देती है, नतीजा उसके फैमिली को ४० लाख, फ़्लैट से नवाजा जाता है.

केस स्टडी २.१ : घोडा टांग काण्ड :
जी हाँ, इसे काण्ड का ही नाम देंगे, साल में कई बार पारंपरिक रूप से बकरों के गर्दन रेतने वालो पर चूं न करने वाली मिडिया एक घोड़े की टांग पे इतना शोर मचाती है जैसे ISIS वालो ने हमला कर दिया हो जो बाद में झूठा निकला और झूठ फैलाने वाले पत्रकार मिडिया ने माफ़ी तक न मांगी. कारन यहाँ तथाकथित घोड़े की टांग तोड़ने वाले का नाम कोई हिन्दू था जो बाद में झूठ निकला.

केस स्टडी २.२ : डा नारंग मर्डर :
देश भर हुए हत्यावो की बात छोड़ देते है, छोड़ देते है प्रशांत पुजारी की हत्या जिसपे मिडिया चूं तक नहीं की. आईये डा नारंग की ही बात कर ले.
दुर्दांत भीड़ दवारा संघठित ढंग से योजना बना कर एक डा की पोश एरिया में हत्या कर दी जाती है, और मिडिया का रुख की कमुनल रूप न दें, ध्यान रहे वही मिडिया अपील कर रही जिसने अखलाख की हत्या पर पुरे देश के हिन्दुवों को हत्यारा घोषित कर दिया था, पूरी दुनिया में छवि बिगाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. डा नारंग हिन्दू थे, कोई मिलने वाला नहीं आया. न केजरीवाल न राहुल. एक बार मान ले की सभी हत्यारे हिन्दू थे, सांप्रदायिक रंग के बिना भी बात करें तो क्या कारन है की दादरी से हैदराबाद तक पीछे ग्रीस लगा कर सरपट जाने वाले केजरीवाल, राहुल यहाँ का रास्ता भूल गए ? झुग्गी झोपड़ी हटाने के समय पहुचने वाले रविश, बरखा, राजदीप और अंजुम चुप है…कोई ग्राउंड जीरो नहीं जा रहे ? बता सिर्फ ये रहे की साम्प्रदायिक नहीं है. मामला साम्प्रदायिक न होना क्या इस बात का लाइसेंस देता ही की डा नारंग के यहाँ कोई न जाए ? डा नारंग की बात कोई नहीं कर रहा. क्या डा नारंग की जान घोड़े की कपोल कल्पित टूटी टांग से भी कम है ? वो सिर्फ इसलिए की मरने वाला यहाँ हिन्दू है, यहाँ आने से भाई चारा नहीं बढेगा, साम्प्रदायिकता बढ़ेगी, इनकी हरकतों और सोंच से तो यही लगता है. दादरी में पहुचने वाले केजरीवाल कहते है की नारंग का परिवार अभी दुखी है तो क्या अखलाख के परिवार ने उन्हें डिनर पर ख़ुशी ख़ुशी बुलाया था ? की आईये जी, अखलाख जी मर गए, आईये ..कुछ लेंगे ? चाय पानी, दारु सोडा? या मफलर?

मिडिया का ये रुख क्यों हैं ?? :
अरब देशो से इन मीडियाई घरानों से पैसा आता है या नहीं मै इस पर बात नहीं करूँगा लेकिन ये सत्य है की इनका एक एजेंडा इन ऊपर के चार उदाहरानो से समझा जा सकता है. अन्यथा मरने वाला या मारने वाला मुसलमान हो तो हर तरह से बारिश, पैरवी, और मरने वाला या मारने वाला तो छोडिये सिर्फ कपोल कल्पित टांग तोड़ने वाला हिन्दू हो तो दुर्गति होती है. यही मिडिया के लोग सोशल मिडिया के लोगो को जेल में बुक अफवाह फैलाने के केस में बुक करने की पैरवी करते है जो खुद अफवाहों के मसीहा है. यही पैमाना है तो अफजल प्रेमी मिडिया गैंग के ९०% लोग जेल में होंगे.
दूसरा एक लेकिन बहुत बड़ा कारन ये भी है की हिन्दुवों का संघठित न होना, हिन्दुवों में कुछ दलितांध और स्वार्थी लोग नारंग में दलित सवर्ण मुद्दा ढूढ़ रहे. हिन्दू संघठित नहीं है. वो तो हर शुक्रवार आँ आँ आँ करने माइक पे सबको बुला लेते है, लेकिन हिन्दू हफ्ते में क्या तो सालो में कभी इकठ्ठा नहीं होता. इन अफजल प्रेमी मिडिया गैंग को शायद RSS इसीलिए बुरा लगता है की कुछ मुठ्ठी भर ही सही लेकिन RSS सुबह सबको अपने यहाँ संघठित करता है, खेल कूद करता है, एक होने को कहता है.
हिंदुवो, अभी भी समय है, एक हो, नहीं तो ४० रूपये तक नसीब न होंगे, मारे जावोगे वो अलग, घर में घुस के, फिर ये तुम्हारी मौत तक पर बहस न करने की अपील करेंगे. उनका क्या ? उम्रदराज है तो ४० लाख रुपया, जुवेनाईल है तो सिलाई मशीन का गिफ्ट तो है ही, और तुम गाते रहना,

“जानेवालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे
एक इंसान हूँ, मैं तुम्हारी तरह.”

सादर
कमल कुमार सिंह

Sunday, March 20, 2016

हार की जीत

महान लेखक सुदर्शन जी क्षमा याचना करते हुए उनका शीर्षक चुराता हु (अपनी सज्जनता का ख्याल रखते हुए वर्ना लोग तो यहाँ लेख के कलेवर बदल कर अपने नाम से चाप लेते है) . बचपन में एक कहानी पढ़ी थ “हार की जीत” सारी कहानी बाबा भारती के घोड़े के इर्द गिर्द घुमती थी, ५ नंबर का एक प्रश्न भी आया था छमाही में, जवाब भी दिए थे, पास भी हुए थे. घोडा सुलतान, डाकू खड़ग सिंह और बाबा भारती कालांतर में समाज से कल्टी कर दिए गए. उनकी कहानी गयी और ८०-९० के दशक में एक बार फिर घोड़ो ने कान्तिशाह फिल्मो के दवारा जनता के दिलों में घर वापसी की. यहाँ तक की छोटे बच्चे ऐसी फिल्मो को देंख ले तो आपस में भागम भाग खेलते समय “कड़बक कड़बक” की आवाजें निकालते. कान्तिशाह के हर फिल्म के डाकू का साथी एक घोडा हुआ करता था जिसपे बैठ भीमा, दाद्दुवा, सांगा इत्यादि डाकू और आज के बुध्दजीवियों के नजर से देखें तो लाल सलाम वाले क्रांतिकारी लोग अपने कार्य बिना लेबर-ला के झंझट के ख़ुशी ख़ुशी मनमाफिक अधिकार लुट के क्रान्ति की अलख जगाया करते थे. कभी कभार प्रेम लीला करने के लिए या किसी किशोरी को छेड़ने या उससे विशेषाधिकार लेने के लिए भी घोड़ो को बराबरी का सहभागी बनाया जाता वो घोड़े आज होते तो डाकुवों के साथ साथ रेप में साथ देने की एवज में उसपे भी दफा ३०२ या षड्यंत्रकारी या षड्यंत्र में दात देने वाले टाइप का मुक़दमा घोषित हो जाता, और रविश को उन डाकुवों के साथ साथ घोड़े की भी लड़ाई लड़नी पड़ती, पूछ के “कौन जात हो" घोड़े अभी भी चर्चा में है, खैर चर्चे में तो गधे भी है, किस्म किस्म के, कहीं किसी मिडिया हॉउस में जो स्वयं अपना मुह काला करने निसंकोच सक्षम है, कहीं किसी यूनिवर्सिटी में तो कही किसी प्रदेश के विधान सभा के, लेकिन इन गदहों को ऑटो अपग्रेड सुभीते के लिए घोड़ो का नाम दे दिया गया है और उसकी अब बाकायदा ट्रेडिंग होती है “हॉर्स ट्रेडिंग”. अब मुद्दा ये है की घोड़े नाराज है की उनका नाम गधो को क्यों नहीं दिया गया ऊपर से ही चबाने पड़ते है, जबकि गधे, गधे होते हुए भी मलाई काट रहे और तुर्रा ये की घोड़ो का नाम भी छीन रहे. गधे इस बात से नाराज है की क्या गधों की कोई इज्जत नहीं? कोई पहचान नहीं? इस्तमाल उनका होता है लेकिन नाम किसी और का? वो भी अपने गधाधिकारों की लड़ाई के लिए अपने किसी जात भाई या किसी रविश, बरखा या पीपीबी (पुण्य प्रसून बाजपाई) का मुह ताक रहे हैं, लेकिन कोई उनके तरफ नहीं देखता, इंसानी चोलों के सारे गधे सिर्फ इंसाननुमा गधो की ही बात करते दिखाई दे रहे है. इन गदहा घोडा पचीसी में किसी जीत है और किसकी हार तय कर पाना उतना ही मुश्किल है जितना कोंग्रेस, क्म्युन्स्ट और वामपंथियों में अंतर ढूंढ लाना, फिलहाल शो चालु आहे. सादर कमल कुमार सिंह

Saturday, September 19, 2015

रविश के महाभक्त

रविश का मर्यादित ट्वीट
                                                                   
आजकल रविश का फेसबुक और सोशल मिडिया से चले जाना एक राष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है, रविश के भक्ति में वही डूबे है जो विरोधी विचारधारा को मानाने वाले को भक्त कहते है, अजीब है. 
रविश कैसे पतरकार है ये मुझे कुछ ख़ास नहीं मालुम, क्योकि उनके किसी भी रिपोर्ट या बहस से देश को कोई फायदा  नहीं हुआ है न ही उनसे कोई भी औसत बुध्धि का प्रभावित हो सकता है और विचार धारा बना सकता है,  उनसे वही प्रभावित हो सकते है जो पहले से ही भाजपा विरोधी है. टीवी रूम में बैठ के जब विभिन्न पार्टियों के लोग बहस के लिए आते है तो रविश का भाजपा और संघ विरोध साफ़ साफ़ दीखता है, ये क्यों है एक रिसर्च का सब्जेक्ट है. मै ये नहीं कह रहा है की रविश की पार्टी से सहनुभितु करते है या किसी पक्षपात करते है, लेकिन हाँ ये जरुर कहता हु या कोई भी जो उन्हें देखता है उसे मालुम है की भाजपा व संघ के अंध विरोधी जरुर है, एक अजीब किस्म की तल्खी है उनके दिल में न जाने क्यों ? और जब उन्ही के चैनल के बरखा दत्त जैसी पत्रकारों को लोग बाग़ कोंग्रेस के पार्टियों में देख चुके है तो उनके बारे मे क्या धारणाये बनायेंगे कोई भी औसत बुध्धि का ये बात समझ सकता है.
भाजपा के प्रति उनकी तल्ल्खी उनकी घृणा  देखने के बाद भी भाजपा और आर एस एस के प्रवक्तावों ने न ही NDTV का विरोध किया न ही इस चैनल का बायकाट किया बल्कि आज भी जाते है और मुस्करा के रविश की कुटिल तल्खी झेलते है, अपने प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया जानने के बाद भी. 
कुछ दिन पहले ही प्राइम टाइम पे रविश भाजपा के एक प्रवक्ता पे अमन पे इतना झल्ला गए की पुरे देश ने देखा होगा उनकी तल्खी, जब रविश जैसे संजीदा पत्रकार की भाजपा विरोधी तेवर और तल्खी इतनी साफ़ झलकती है की वो अपने आप को टीवी रूम में संयत नहीं रख पाता और मर्यादा तोड़ के चीखने चिल्लाने लगता है, जिसके विरोधी तेवर किसी से छुपे नहीं है, वही सोशल मीडिया पे विरोधियों और उनके समर्थको मर्यादित होने की अपेक्षा रख रहा है जो की उनकी तरह संजीदा पत्रकार तो क्या बहुत तो विद्यार्थी होंगे कुछ दूकानदार और प्रोफेशनल या इसी तरह के. रविश सोशल मिडिया आपका टीवी रूम नहीं है जहाँ लोग आपके हिसाब से चलेंगे, आपकी लोकप्रियता और तथाकथित उम्दा निष्पक्ष(?) पत्रकारिता किस लेवल की है देश की जनता ने आपको बता ही दिया है जिसके कारण आप भगोड़े हो गए है, सच तो ये है आप उस बदतमीज लड़की (सिर्फ बदतमीज लड़की ही) की तरह व्यवहार कर रहे जो पहले खुद जा किसी को पकड़ के झगड़ती है उकसाती है, प्रवोक करती है, काँव काँव करती है, लड़ती है, झगड़ती है, लेकिन जब लड़का उसी तरीके से उसको जवाब देना शुरू करता है तो कहती है " तुम्हे लड़की से बात करने की तमीज नहीं ? मैनर लेस, रास्कल, रुको पुलिस बुलाती हूँ ”  ब्ला ब्ला, . 

रविश आपके ट्वीट,  या टी वी पे सादगी के पीछे छुपा कुटिल मुस्कान देख कोई बच्चा भी समझ सकता है की आप  भाजपाईयों और संघियों से कितना चिढ़े हुए है, कितना जहर भर के रखते है, और आपके ट्वीट ये भी बताते हैं की प्रधान मंत्री यदि भाजपा का हो तो उसे हत्यारा और लुटेरा भी कहने से नहीं चुकते और आप को ये भी चाह है की उनके समर्थक आपको दलाल भी न कहे, क्या आप देश के संविधान या देश के प्रधानमन्त्री से बड़ा समझते है? आपको अपने द्वारा प्रधानमन्त्री के लिए इस्तमाल किया गया शब्द संयत और मर्यादित लगता है जबकि आप एक जिम्मेदार पत्रकार है, और एक आम नागरिक जो आपके विचारों, मंशावों को को अपनी समझ के हिसाब से जो की जाहिर है की आपकी तरह बड़ा फिगर नहीं, जो आपकी तरह पढ़ा लिखे होंगे भी या नहीं, की भाषा गुंडई भरी लगाती है?  वास्तव में आपको भी पता है की आप दोहरे है, मानसिकता से, तर्क से, सच तो ये है की कोई आपका चरित्र भी आपको बताये तो आपको गाली ही लगेगी, तो बेहतर है की दूसरों को कोसने या गाली देने से बेहतर है की आप अपना चरित्र सुधारें ताकि आपका चरित्र आपको गाली न लगे यदि कोई आपकी ही भाषा में अपने हिसाब से बताये तो. 
आ जाईये वापिस, आपके जाने से बहुत लोग दुखी है, लोग “रविश के साथ खड़ा हु” टाइप का मुहीम चलाये है,  रविश भक्त उनके संग खड़े है, कहाँ खड़े है ? बिस्तर में, टायलेट में या बाथरूम में? ये नहीं पता बस खड़े हैं, एक टांग पे. और इनमे जो भी उनमे  आपके हुनर से प्रभावित भक्त लोग कम बल्कि वो लोग जादा है जो संघ या भाजपा के अंध विरोधी है, आपीए हैं, कोंग्रेसी है, छुपे हुए नक्सली या यों कह ले एनजीओ कुछ तथाकथित समाज सेवक है,  जिनका दिल तोड़ दिया है आपने है, इनके समर्थन को अपनी लोकप्रियता मानते है तो आपका भ्रम है, जबकि आपके पक्ष में खड़ा रहने वालो की सबसे बड़ी जमात भाजपा विरोधी होना है न की आपके भक्तो की संख्या, बात जो भी हो, आपके भक्त आपका इन्तजार कर रहे है, और आपके विरोधी के भक्त भी , कम बैक प्लीज. 

आपका के भक्त तो नहीं पर अभिलाषी 

कमल कुमार सिंह. 

Saturday, June 20, 2015

हम न सुधरब, खाली रोवब

२१ जून को योग का जो आयोजन हो रहा है वो सबके लिए अनिवार्य है? जबरजस्ती है? कोई नहीं करेगा तो क्या उसे सजा होगी? नहीं ..... फिर कुछ विशेष लोगो द्वारा योग का विरोध समझ में नहीं आता .. आपको योग नहीं करना मत करिए, की कम्पलसरी नहीं है ...लेकिन जो विरोध कर रहे हैं वो आने वाले दिनों में “आ बैल मुझे मार” वाली स्थिति पैदा करेंगे, और गेंहू के साथ घुन भी जाने वाली स्थिति बना रहे. और बैल जब मारना शुरू कर देंगे तो ऐसे आप जैसों के साथ-साथ वो घुन भी पिसेग जो यहाँ की संस्कृति भी मानता है। फिर आपके वोटों के पेटेंट मालीक, मिडिया और आपके गुरु आदि का रंडी रोना शुरू हो जायेगा, कैसे ?? ओके ... हिन्दू भी नमाज नहीं पढता, प्रेयर नहीं करता..और उस पर कोई कम्पल्सन भी नहीं है .. कल वो नमाज/प्रेयर का विरोध करने पर उतारू हो जाए तो आप क्या करेंगे?, जिसके लिए आप स्वयं उन्हें उकसा रहे है तो आप कहाँ भागेंगे ? या रंडी-रोना रोयेंगे की आप भारत में सुरक्षित नहीं हैं.
हाँ ये अकाट्य सत्य और तथ्य आप बदल तो नहीं सकते है न की योग हिन्दू और हिन्दुस्तानी संस्कृति ही है, भारतीय संस्कृति है, आपका मजहब कुछ भी हो सकता है लेकिन संस्कृति नही, मजहब और संस्कृति दो अलग चींजे है, आप अपना मजहब मानने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उस देश की संस्कृति जिस देश का वो मूल धर्म/ संस्कृति है, को आप भारत पे थोप नहीं पा रहे जैसा की आपका का रवैया होता है, तो उसका फ्रस्टेशन भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग-योग का विरोध कर साफ़ दिखा रहें हैं जो आने वाले दिनों में आप पर घातक सिद्ध होगा. आप बहुसंख्यको को अपने खिलाफ भड़का रहे है।
आप जैसे देश के नहीं होते ये भावना आप जैसे कुछ लोगो ने ही भारतीय बहुसंख्यको के दिमाग में भरा है उन्होंने खुद नहीं भरा, अन्यथा आप भी इसी देश के हैं, आपको भी इस देश के संस्कृति से विरोध होने का कोई मतलब नहीं बनता था.
ये आप ही जैसे लोग है जो पानी भर भर के हम जैसे शांत लोगो को भी भड़का दिया आप लोगो को जवाब देने के लिए, पहले किसी शांत को बैल बनाते हो, फिर आ बैल मुझे मार कहते हो, फिर बैल मार देता है तो रंडी रोना रोते हो .. आप ही लोग जैसे थे बर्मा के रोहंगीया, आज अपने धर्म को दाख्खिन लगा के जहाज पे खुदी का मूत पि रहे है, जिन्दा रहने को मोहाल है... जो पहले आप ही लोगो की तरह आग मूतते थे किसी समय बर्मा में, और हाँ वो भी उसी देश के थे, लेकिन लगे वहां भी वहां की मूल संस्कृति को अपमानित कर अपने उस धार्मिक संस्कृति को भी पेलने की कोशिश करने लगे जो उस देश की थी ही नहीं, और खुद पेला गए कोई भी यहाँ तक की तताकथित सम-संस्कृति वाला देश भी पनाह नहीं दे रहा .
भाई जिस देश में हो उसी देश की संस्कृति की इज्जत करो, मजहब चाहे जो हो, दुसरे के धर्म की भी इज्जत करो साथ ही उस देश के “मूल संस्कृति” की. नहीं जब फसोगे त कोई आने नहीं वाला बचाने, और नहीं तुम्हारे दुनिया भर के भाई के कुछ नहीं कर पायेंगे, इसलिए पानी सर से ऊपर मत होने दीजिये. 
जैसे दुनिया टेक्नोलॉजी के लिए जापान, दूध के लिए डेनमार्क, बेहतरीन उन के लिए न्यूजीलैंड की ओर देखती है, उसी तरह बेहतरीन योग और योग टीचर के लिए दुनिया भारत की तरफ देखेगी।
मोदी की दूरदर्शिता सिर्फ भारत को स्वस्थ ही नहीं करेगी बल्कि योग के जरिये लाखो ग्लैमरस जॉब भी दिलवाएगी.. वैसी ही जैसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर.. अब नौजवान योग सीखेंगे और दुनिया भर घूमेंगे..आर्थिक रूप से भी सम्पन्न होंगे.. योग भी अब एक जरिया बनेगा भारत के आर्थिक विकास में..भारत के लोगो को एक नया अवसर मिलेगा आगे बढ़ने का..फिर भारत का का नौजवान दुनिया भर योग सीखा के आर्थिक रूप से भी.. अपने और भारत को मजबूत करने में योगदान रहा होगा। ..
भारत का नौजवान? सारे? ..कुछ लोग भी..? नहीं.. ये न कुछ सीखने के लिए बने न सिखाने के लिए..ये बस विरोध के लिए बने है..रंडी-रोना के लिए बने है....तो उस समय ये अपना फेवरेट काम करेंगे जिसमे ये स्किल्ड है ...रंडी-रोना का..ये रंडी-रोना मचाएंगे.. कि इस देश में हम पिछड़े है , गरीब है, हमारे लिए कोई मौके नहीं है.. आगे बढ़ने का अवसर नहीं..हमारे साथ भेदभाव होता है.

सादर 
कमल 

Saturday, July 26, 2014

क्या कोंग्रेस और केजरीवाल के काम्बो पैक है मोदी ??


कौवा चला हंस की चाल मोदी की तरह ही एक प्रसिद्द कहावत है, चुनाव से पहले जनता के लिए कौवा था कोंग्रेस और रंग बदलने वाला आपा, और कोंग्रेस के लिए कौवा थे नरेन्द्र मोदी जिन्हें लगता था की मोदी एक ऐसे कौवे हैं जो हंस का आवरण ओढ़े हुए जनता को बरगला रहे है. 
मामला जो भी हो, लेकिन जनता ने फैसला सुनाया और, और मोदी को भारी बहुमत से भारत का सिंहासन सौंपा जिसकी उम्मीद भारत की कोई पार्टी नहीं कर सकती थी.

सारी चीजों को समझने के लिए हमें सब कुछ दो भागो में बाटना पड़ेगा, 
१ . चुनाव पूर्व 
२. चुनाव बाद 

१. चुनाव पूर्व : 
ये चुनाव निश्चित ही भाजपा के नाम पर न होक मोदी के नाम पर था, और मोदी के वोटरों में दो तरह के लोग थे. 
१. कट्टर हिंदूवादी : ऐसे जो हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान का सपना बस हिंदुत्व धर्म के आधार पर रखते थे. इस श्रेणी के लोगो को लगता था था की मुस्लिम हिंदुवो के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे है, इनके न होने पे उन्हें उनके अधिकार जादा मिल पायेंगे, जबकि वो भूल जाते थे, की अतिक्रमण मुस्लिम नहीं बल्कि सरकार उनके सधे हुए वोट बैंक के कारन खुद पीठ सहलाई थी. यही बात इस प्रकार के हिंदुवादियों को एक होकर मोदी के पक्ष में वोट करने के लिए विवश किया क्योकि इनको भी लगता था की गुजरात दंगा मोदी के इशारो पे हुआ था. 

२ .लिबरल हिन्दू : इस वर्ग में वो लोग आते हैं, जो भारत के विकास में कोंग्रेस को एक बहुत बड़ा रोड़ा मानते थे, और गाँधी परिवार को खतरनाक, क्योकि इस परिवार के रहते कोंग्रेस में ही गैर गाँधी परिवार में ढंग का नेता पैदा ही नहीं हो सकता था. जो सिर्फ और सिर्फ समानता चाहते थे, एक कानून, एक जैसा व्यवहार, एक सामान अधिकार. मुसलमानों के बिना नहीं मुसलमानों के साथ. 
कोंग्रेस ने जो तुष्टिकरण का जो गाजर घास फैलाया था, इससे ये वर्ग अजीज आ चूका था. ये वर्ग देखता था की किस तरह से मुस्लिमो की हर जायज नाजायज बात मान ली जाती है. ये वर्ग देखता था, किस तरह मुजफ्फरनगर में दंगा होने के बाद किस बेशर्मी से सिर्फ समुदाय विशेष की पूछ परख होती थी.
मोदी ने इन दोनों वर्गों साध इनके अंगुलियों को कमल के निशाँ वाले बटन की तरफ मोड़ लिया. ध्यान रहे की इस चुनाव में भी मोदी को मुसलमानों का २% वोट भी हासिल नहीं हुआ है. हाँ हिन्दू जाती जरुर इकठ्ठी हो गयी.

२. चुनाव बाद : 
अब जबकि नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन गए है, जनता जरा भी मौका दिए बिना इनको प्रधान मंत्री न मान, अलादीन का चिराग मान रही है, जो चिराग में से बहार निकले, और जो हुक्म मेरे आका कह के कोंग्रेस के ६० सालो की इकठ्ठी की गयी, तुष्टिकरण विष्ठा, घोटाले की गन्दगी, अराजकता का माहौल ठीक कर दे. जो की बिलकुल गलत है. 
लेकिन, कुछ चींजे है जो जो बिना चिराग का जिन्न बने भी जनता में विश्वाश बनाया रखा जा सकता है. लेकिन मोदी सरकार के वो भी नहीं कर पाने में देख जनता सकते है, कम से कम वो वोटर जनता जो उन्हें चिराग का जिन्न नहीं मानता. 

जो चुनाव पूर्व ये कहता था की वो किसी भी प्रकार से तुष्टिकरण नहीं करेगा भले ही वो चुनाव हार जाए, उसका मंदिर से घन्टे उतारे जाने पर चुप रहना, इस वर्ग के वोटर को व्यथित करता है.

लॉर्ड्स में मैच जितने के तुरंत बाद ट्वीट कर बधाइयां देना, और पूर्ण बहुमत के बावजूद अमरनाथ पर सन्न मार चुप्पी इस श्रेणी के वोटरों के समझ से परे है. 

इजरायल के खिलाफ वोटिंग, वो भी तब जब संसद में बहस कराने मुकर चुके हो, यानि रात के अँधेरे में सब कुछ जैसा की कोंग्रेस के चलन में होता रहा है. 

राजनीति ऐसी हो जो आम आदमी के समझ में आये। और बात सिर्फ वोटिंग की ही नहीं है, बल्कि रोजेदार के रोटी पे भोकाल और संसद में चर्चा और अमरनाथ यात्रियों पे हमले के विरोध में मुर्दा बने रहने जैसे कई मुद्दे है जिस पर सरकार की प्रतिक्रिया का इन्तजार आम सरोकारी इंसान को था और आगे रहेगा. 

कालेधन और और कश्मीर में ३७७ पर सरकार का स्टैंड अभी पता नहीं चल रहा तो कुछ कहना उनको जिन्न मानने के बराबर ही होगा लेकिन जिन चीजो को बैलेंस किया जा सकता है उन चीजों को तुष्टिकरण के के तराजू पे चढ़ता देख मोदी का लिबरल वर्ग दुखी है. 

पूर्वांचल में एक कहावत है, "ननदिया के बोला ता पतोहिया के कान होला", कोंग्रेस के बुरी तरह से ख़ारिज हो जाने के बाद भाजपा को इसका संज्ञान लेना चाहिए क्यों की जल्द ही बैलेंस करने योग्य चीजो को बैलेंस नहीं किया गया तो नतीजा आने वाले विधानसभा चुनावों में जरुर दिखने लगेगा.

सादर 

कमल कुमार सिंह 

Thursday, May 22, 2014

स्वर्ग में धरना



स्वर्ग के विश्वशनीय एकाउंटेन्ट चित्रगुप्त व्हाट्स एप पे इंद्रा से कुछ निर्देश ले रहे थे, तभी मै नारायण नारायण करते हुए प्रकट हुआ. 

"कैसे आना हुआ मुनिवर? प इस बार के पृथ्वी लोक का टूर कैसा रहा? क्या क्या किया? कहाँ कहाँ घुमे? अब आगे का क्या प्लान है, और ये आपके सर पे टोपी कैसी है? अपने जूड़े को कैसे एडजस्ट किया." चित्रगुप्त ने एक ही सांस में सारे सवाल कर डाले. 

"क्या यार मरदे तुम भी धरनामैन की स्टाईल में एक साथ सवाल करते हो? थोडा पानी पि लिया करो, जवाब तो हम देंगे ही. रही टोपी की बात तो अभी भारत में इसी का चलन है, ये नहीं पहना तो चाहे तुम दानव हो देवता, दानव की श्रेणी में ही आओगे, इज्जत भी कोई चीज है की नहीं? गुंडों से बचना है तो गुंडों जैसे बन जाओ" - आई  रिप्लाईड.. 

लेकिन मुनिवर आपको इसी क्या जरुरत ? चित्रगुप्त शंकाषित पूछे . 

पहले तो मुझे भी जरुरत नहीं समझ आया, पर जिस कोन्फीडेंस से धरनावाल सिर्फ सवाल पूछने के लिए मुह खोलते है, उनका मुह माफिया लेन की तरह है, वन वे, सिर्फ प्रश्न के लिए खुलता है, जवाब के टाईम पे फेविकोल पी के उस कम्पनी से भी चंदा वसूल लेते है की देखि तेरा पिया तो तू धन्य है, मै समझ गया की ब्रम्हा की जी ने कोई गोची किया है, बिना किसी से बताये दसवें अवतार बना के विष्णु जी को ही भेजा है, सो मारे डर के मै मोफ्ल्रावातारा के सिर्फ प्रश्न पूछने के लिए खुलते मुह के सामने मैंने कुछ पूछने के लिए अपना मुह नहीं खोला, हलाकि एसा नहीं था, की मैंने कोशिश नहीं की, एक बार की थी, लेकिन मोफ्ल्रावातर के साथ शव बम की भुत प्रेत मंडली भी है उन्होंने मुझे खूब कूटा, मेरे बाल बिखेर दिए, मेरा सारंगी तोड़ दिया. मुह से फेचकुर फेक्वा दिया, लेकिन अब वो ठहरे प्रभु, मै क्या करता? सो टोपी पहन ली. 

तो आप ब्रम्हा जी से शिकायत क्यों नहीं करते? 

गया था उनके पास, लेकिन उन्होंने इस घटना में अपना हाथ होने से साफ़ इनकार कर दिया. 

फिर ? 

फिर विष्णु जी के पास गया, उन्होंने भी कहा की वो  मै नहीं हु . 

फिर ?

फिर मै दुबारा ब्रम्हा जी के पास गया? तो वो मुझे अपने कार्यशाला ले गए, और एक आलमारी पट को दिखा बोले" जानते हो ये क्या है? ये है दिमाग? शरीर बना हि था की वो बिना दिमाग के भाग लिया, मैंने उसे पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन वो भागता रहा, कभी अमरावती, कभी स्वर्ग, वहां जा के  सबको अंट शंट सुनाया. लक्ष्मी को कहा, की आपके पास जो नोट है वो बिना लेखा जोखा का है. 

दूतगण पकड़ने को हुए तो वहां से फिर भगा, नरक में जा के वहां के लोगो को भी डराया, बोले देवतावों के खिलाफ मेरा साथ न दिया तो बिजली पानी बंद कर दूंगा, वो उसके साथ हो लिए, एक बार फिर देव्तावो और असुरो में युध्ध हुआ, एक समय एसा भी आया की जब वो हारने लगा, लेकिन एक बार फिर वह दानव सहित प्रथ्वी पे कुंच कर गया, बाकी तो तुम वही से आ रहे हो, बाकी का तुम बताओ.


हे परम पिताआपका बनाया वो डैमेज पिस अत्यंत आतुर है कुर्सी के लिएलेकिन समस्या ये है की जो यहाँ थीकही एक जगह टिकता नहींकिसी एक कुर्सी पे तशरीफ़ नहीं धरताएसा नहीं की कुर्सियों में किल गड़े पड़े हैंबस भागता रहता है अलग अलग कुर्सियों के लिए मानो म्यूजिकल चेयर खेल रहा हो.  - आई उवाच.

भागना, धरना देना और प्रश्न पूछना उसका अन्तराष्ट्रीय होबी है, खुद कुर्सी पे न हो तो कुर्सी धारक के बजाय विपक्ष से प्रश्न पूछता हैकुर्सी पे हो तो जनता से प्रश्न पूछता है, खुद जनता रहे या नेता रहे या शाशक, वो सदाबहार धरनामुग्ध है, यदि उससे गलती से भी जनता ने प्रश्न पूछ लिया तो उसे अम्बानी का बिकाऊ आइटम कहता है, और दबा के खांसता है हर बात पे, कुछ तो कहते है वो बलगम से पैदा हुआ है इसलिए स्वभावतः खांसता है.  

ओह्ह्ह ऐसा ?? तब अब यमराज ही मदद कर सकते है पृथ्वी वासियों की - ब्रम्हा उवाच . 

फिर क्या हुआ मुनिवर - चित्रगुप्त आस्क्ड.

फिर क्या ब्रम्हज्ञान से यमराज चल दिए अपना सोटा ले के उसको सोटने.

फिर ??

फिर क्या, फिर धरनामैंन गुस्से में आ गया, जिससे मलेशिया वाला विमान गायब हो गया, उसे समुद्र निगल गयी, बोला तू क्या मुझे मारेगा? मुझे कूटने के लिए क्या मेरे ससंदीय क्षेत्र के लोग क्या कम है ? देख यामुवा, ये कूट काट कर हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो तुम्हरी क्या औकात है? हम लात - मार -प्रूफ है. और सुनो मै समझ समझ रहा हु, तुम मोदी से मिले हुए हो, इस काम के लिए अदानी ने तुम्हे  भैंसा दिया है, 

फिर क्या ? 

फिर महाराज, उसे तड़ तड़ अपने गुर्गो से उनके गुर्गो को मैसेज करवाया है, अब यहाँ स्वर्ग में आ रहा धरना देने, इसीलिए मै भागा भागा आया ताकि सुचना दे दु.

इतना सुनते है चित्रगुप्त बेहोश हो गए, और मै उनके इलाज के लिए अश्विनी बंधुवो को लाने जा रहा हु . 

सादर 

कमल कुमार सिंह - नारद .

Wednesday, February 19, 2014

नेता या नंगा


हमारे समाज ने हमें एक हमाम दिया है जिसमे सब नंगे होते है, ज्ञान चतुर्वेदी जी के भाषा में कहें तो नंगा होना बहुत जरुरी है इसीलिए हमाम का निर्माण हुआ. 

लेकिन नेता अपवाद है, वो कहीं भी नंगे या नंगेपन पे उतारू हो सकते हैं, समय पर नंगे होते है, नंगापन दो प्रकार का होता है श-शरीर और दूसरा आध्यात्मिक, मसलन जिसतरह से "उत्तर" प्रदेश के नेता अपने कपडे को बेटी की तरह बोझ मान कर अपने शरीर से अलविदा कर देते हैं वो श -शरीर नंगई है. और दूसरा मीडिया का मोफ्ल्रावातार के  जूठ को  प्याज के छिलके की तरह उतारना, वो अध्यात्मिक कटेगरी का नंगई है, हालाकि की ये आध्यात्मिक सुख स्यवं मोफ्ल्रावातार नहीं लेना चाहते फिर भी पब्लिक और मिडिया उन्हें ये सुख देने पे उतारू है. हाँ हलाकि कुछ दिन पहले जिस प्रकार के धरना प्रदर्शन सहित छोटे बच्चों सी नगई करी वो उनकी इक्छा के मनमाफिक था. 

 ये नंगा क्यों है ये तो नेता ही जाने या नंगे जाने या नंगे नेता जाने, नेता नंगे जाने हलाकि नेता और नंगा में आप चाहे तो कोई फर्क न करे, हमें कोई आपत्ति नहीं होगी.  

एक अच्छा खासा इंसान पहले तो न जाने क्यों नेता बनता है अथवा नंगा बनाने की और अग्रसर होता है, क्या मिलता है नंगा बनने में ?? माल पूवा??  नहीं, वो सेवा करना चाहता है,सर्वोत्तम सेवा,  भयंकर सेवा, विकट सेवा, वो सेवा करने की पिछले सभी वर्जनाओं को तोड़ना चाहता है. वो देश को एक नया नेतृत्व देना चाहता है. 

दुनिया भर के तिकड़मों को क्या वो खुद के लिए करता है ? किसे अच्छा लगता है किसी के तलवे चाटना ? किसी की दलाली करनी? अपने सीनियर सेवामय नेता के जूते उठाना, जूठे चबाना ? आपको क्या लगता है वो अपने लिए करता है ? यदि आप ऐसा सोचते है तो आपसे जादा कृतघ्न पुरे इस धरा पर नहीं. वो करता है तो बस आपके लिए, वो पूरा जीवन ही बस जनता की सेवा के लिए बना होता है, उसको ब्रम्हा जी ब्लैक में स्पेशल कोटे से सेवा करने का लाईसेंस के साथ हाथ में सेवा का घनघोर रेखा खिंच कर पृथ्वी पे भेजते है.

अब इतनी मशक्कत के साथ  पृथ्वी पे आने के बाद इस निरीह प्राणी के पास कोई रास्ता नहीं बचता सिवाय की वो जनता की सेवा करे. आपने काभी इस बात पे ध्यान  दिया की जब वह नेहरूटोपी लगा (जिस  टोपी को वो गांधी का  हर्फ़ दे के  पहनते है उन्हें ये वही जानकार नेता है जिन्हें नहीं  की गांधी ने आज तक कभी टोपी पहनी ही नहीं सिवाय एक बार के जब वो साउथ अफ्रीका में कुछ दिनों के कैदी थे) हाथ जोड़ आपके समक्ष कहता है की वो राजनीति करने नहीं बल्कि बदलने आया है, वो आप जैसा ही है, तो आप बस समझ लेते की यही है हमारे तारण हार, और समझना बुरा भी नहीं है, अब आप जैसे लोग नहीं समझेंगे तो उसके सेवा करने का कोटा अधुरा रह जायेगा. 

वह जनता की सेवा करने का कोई भी अवसर नहीं चूकना चाहता, चाहे जो करना पड़े, क्या आपके लिए अपने सगे ने  कभी किसी की हत्या की है ? बाल्तकार किया है ? लूट की है ? उत्पात मचाया है ?? नहीं न, आपके अपने और आप खुद  जिसे जघन्य मानते वह ये नेता, बस आपके लिए कुछ भी करने पे उतारू रहता है, वह आपकी सेवा में किसी भी हद तक जा सकता है.  लात मार सकता, लात खा सकता है,  पारस्परिक रूप से गालीयों का आदान प्रदान भी कर सकता है या करता है, सामने वाले सेवक को निपटा खुद पूरा भार वो अपने सर मढना चाहता है तो किसके लिए ?? बस जनता के लिए. 

ये सेवा भाव का ही असर है की संसद से प्रसारण बंद कर दिया जाता है, क्योकि वह सेवा भी करना चाहता और एहसान भी नहीं जताना चाहता, इससे जादा सच्चरित तो स्वयं सोलह कला संपन्न कृष्ण भी नहीं हो सकते. 

उत्तर प्रदेश के नेता इस मामले में आगे है, कोई "लैला लैला चिल्लाता था कपडे फाड़ के"  इसी परम्परा में उन्होंने सेवा सेवा चिल्लाया कपडे फाड़ के तो कौन सी आफत आ गयी ?? 

जनता का क्या वो तो कुछ भी बोलती है, वो एहसानफरोश होती है, कोई कितनी भी सेवा कर ले लेकिन उसे नेता सुहाता ही नहीं, वो बात अलग है की वो नेतावों से सेवा लेने पे मजबूर है, विकट सेवा, भयंकर सेवा, अथाह सेवा, अनंत सेवा, नंगी सेवा. 

सादर 
कमल कुमार सिंह 
१९ फरवरी २०१४ 

Saturday, January 18, 2014

चिंता

बड़े बड़े  बुध्ध्जिवियो/ पत्रकारों / बड़े वालो / सेकुलरों/ आकश / पाताल/ बैताल, सभी से आग्रह है आप लोग कुछ करें, संघ से आप लोग दुखी है, संघ ने दुखी कर रखा है आपको, संघ बिल्ली है, चुपके सी आके आपके घर की दूध पि जाती है, और आप चाय से वंचित रह जाते है, संघ के लोग आपका बीडी छीन के पि जाते है, निश्चित ही ये दुःख की बात है, संघ के लोग आपके घर आके, खाना पीना भी भाभी/ माताजी जी से छीन छान  के खा जाते होंगे, निश्चित ही यह अक्षम्य पाप है.

चिड़िया जब आपके  सर पे बीट कर दे तो आप समझ ले यह पूर्व जन्म का संघी है और आपको पहचान गया है, इसलिए पको निशाना बनाया गया.  इस तरह की आपात स्थिति  से निपटने के लिए गुलेल हमेशा साथ रखे. निशाना गड़बड़ हो तो उसे गन्दी गन्दी गालिया सुना के गन्दी गन्दी गालिया देने वाला कहें, उसके कान फाड़ दे जिससे वो अपनी तरफ आने वाली प्लेन की आवाज नहीं सुन पायेगा और टकरा के मर जाएगा.

ये संघी किसी भी रूप में हो सकते है, पेड़ के रूप में, पौधे के रूप में, यदि किसी नीम से आप दातुन तोड़े और वो कड़वा हो तो समझ ले की नीम संघी है, तत्काल मुह धो के पेड़ को अपने मुख मुद्रा से अभिमंत्रित शुद्ध ५००१ गाली दे और तत्काल आरी चलवा दें.

चलते फिरते समय हमेशा ध्यान रखे की किसी संघी से न टकरा जाय, बस ट्रेन में चलत समय ख़ासा सावधान रहे, संघियों का प्रकोप यहाँ भी हो सकता है, मान लीजिये बस खराब हो जाए तो आप समझ ले की इसमें संघियों की साजिश है की आपने गंतव्य पे लेट पहुचें, या ये भी हो सकता है की अमुक गाडी किसी संघी के शो रूम की हो , नहीं तो कम से कम बेचने वाला सेल्स मनेजर जरुर संघी ही होगा, अन्यथा आपको इतना कष्ट देने की जोखिम क्यों उठाता जिससे  दुनिया दुखी है.

कुछ भी करते या लेते ससमय ध्यान रखे की उसमे संघी की साजिश न हो, मसलन पास के किराना स्टोर यदि किसी संघी का हो तो आपके पेट में अल्सर पड़ सकते है, या आपका पेट ख़राब हो सकता है, यदि एसा होता है तो आप तत्काल उसके घर के उलटे अपना मुह कर वायु शंका निवारण करें. संघी किसी भी रूप में हो सकते हैं, उनको पहचानने का सबसे सरल उपाय ये है की यदि कोई पशु पक्षी, मानव लोजिकल बात करे या आपके खिलाफ बात करे तो आप समझ लें की ये संघी हो सकता है. 

वैसे आप चाहे तो इस क्रिया से अपना व्यक्तिगत लाभ ले सकते हैं, मसलन जब चाय पीनी हो या दूध गरम करनी हो तो किसी संघ को आवाज लगा उसको छत पर बुला लें फिर उसे देख  चाय का पतीला अपने दिमाग या पीछे रख बिना गैस खर्च किये  गरम कर सकते हैं. ठण्ड के मौसम में अपमे गुसल खाने में किसी संघी की फोटो लगाए आपका शरीर जल रहा होगा, अतः पानी गर्म करने की जरुरत नहीं. ये सब उपाय मै इसलिए  बता रहा हूँ की सोते से खाते से, और बाकी सब भी करते समय आपके दिमाग से संघ का भुत वैसे भी नहीं उतर .
सच बात तो ये है आपका खाना, हसना रोना, या ये कह लें की भविष्य तक संघ और संघियों पे निर्भर है.
 तो बेहतर है कुछ ाव्यक्तिगत लाभ भी उठायें .

कृपया कुछ करें, आप जिस तरह से रुद्राक्ष की माला ले सुबह शाम संघी संघ कर वायु में उसका "कोसना" की मात्र बढ़ाते जाते हैं वह सेकुलरो, बुध्जिवियोंके लिए चिंता का विषय इसलिए है की उनका विष भरा नाम वायु में घुल इस जमात की जान ले सकता है अतः चिंता का विषय इसलिए इसलिए की आपके इस रुद्राक्ष युक्त मारक कोसने से से उनके स्वाथ्य पे कोई असर नहीं पड़ता, वो आपके तरफ देख मुस्करा देते आर आप फिर से जल भुन कर वायु  में कार्बन डाई आक्साईड की मात्रा बढ़ाते है जिससे ओजोन हर दिन अपना अंतिम दिन मानता है , इधर आप घुट रहे हो उधर आपके क्रियाकलाप से ओजोन. दोनों की चिंता समाप्त करने का उपाय खोंजे बजाय की अपना जी और ओजोन को डराने के.

एक "संघ निवारण संघ" बना के भी इनसे निपटा जा सकता है, इसके लिए मुलायम, माया, या नवजोत "आपा" का सहारा ले सकते है. कुछ काम और कियें जा सकतें है मसलन उनके पीछे कुत्ते छोड़ दें लेकिन उसका कोई फायदा नहीं वो दिन रात आप लोगो को तो देखते ही है, प्लेन चिट चलवा दें, अंडा कटवा दें, जिन्न छोड्वा दें, या बाबा बंगाली से के पास उन संघीयों की फोटो ले के चले जाए या सामूहिक आहुति यग्य करावा दें, कुछ न कुछ तो होगा ही.
पीपल के पेड़ में "सुबह का"  पानी  डालने से भी लाभ होगा, कर के जरुर देखें, यदि लाभ न हुआ तो समझ लें की संघियों की साजिश है.


आप जिस तरह से दिन ब दिन दुबले होते जा रहे हैं वो खासा चिंताजनक है, इससे आपका मानसिक संतुलन खराब हो सकता है, पेट दर्द, सिरद, निमोनिया इत्यादि आप पर हमला कर अपना नुक्सान करवा सकते है.  बिना संघियों को ठिकाने लगाये इस तरह से दिन रात हुक्के की तरह गुड्गुडाने से आपका कोई फायदा होता नहीं दिखता. कृपया कुछ करें. 

आपका एक संघी शुभचिंतक 

सादर 
कमल कुमार सिंह
१८ जन २०१४ 

Saturday, September 28, 2013

देहाती औरत न्यूयार्क मे


मनमोहन जी न देश कि जनता का मन मोह पाए न ही अपने युवराज का. एक तरफ जहाँ वो यू एन ओ मे अपने रोबोटिक्समय अंदाज मे अटलजी का पुराना भाषण दोहरा कर कुछ नया करने कि जहमत उठाने कि कोशिश नहीं कि, वहीँ दूसरी तरफ भारत मे  राहुल जी उनके मसौदो को नोंसेंस कह के कह उनका सम्मान बढ़ाया. जी हाँ सम्मान ही है, क्योकि कोंग्रेस मे "राहुल सत्य और सब मिथ्या"  है.
  • राहुल जी अब "दोनों हो गए है" पक्ष - विपक्ष दोनों" अभी तक पब्लिक इनको बीच का समझती थी. राहुल जी मस्त मौला आदमी है, उनकी पार्टी है उनकी सरकार है और उनकी सरकार क्या करती उससे उन्हें सरोकार नहीं रहता, अब उन्हें अपने चुटकुलों से फुर्सत मिले तब न. उनकी हरकते देख लगता है वह एक  जल्द ही "फाडू गैंग बनायेंगे" जगह जगह जा के फाडते रहते हैं, लेकिन इस बार के बयां से उन्होंने कोंग्रेस कि ही फाड़ दी है लेकिन कोंग्रेसी खी खी खी कर के मस्त हैं, कोइ नहीं अपने मालिक है, फाड़े या चीथे उससे क्या, लेकिन बेशर्मी कि हद तब हो जाती है जब  इस "फाडू एक्शन" को लोकतंत्र का नाम दिया जाता है. 

    खैर कोंग्रेस मे कुछ भी हो सकता है. एक तरफ जहाँ राघव जी जैसे लोग बी जे पि से भगाए जाते हैं, वही  दूसरी तरफ अपने संवैधानिक पदका दुरूपयोग कर  ग्रांड मस्ती फिल्म बनाने वाले मनु सिंघवी को प्रवक्ता बना दिया जाता है. कोंग्रेस अनन्त, कोंग्रेस कथा अनन्ता. 

    युवराज के इन हरकतों से मनमोहन जी का छोटा सा कद और लिलिपुटमय हो गया है , यहाँ तक इंटरनेशनल मिडिया भी उन्हें झंडू समझ कर कुछ भी कह रही है. और ये गलत भी नहीं, क्योकि  जिस लुगाई का घर मे ही न इज्जत हो उसको बाहर वाले क्या समझेंगे आप लोग ही बता सकते है. 

    मनमोहन जी जब  यू एन ओ मे पूर्व प्रधान मंत्री अटल जी का पक्ष रखने के बाद पाकिस्तान के  प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ ने मनमोहन को "देहाती औरत" कहा. जो काना फूसी करने कि आदत रखती है. निश्चित ही नवाज को पता है कि मनमोहन कि इज्जत भारत कि जनता मे ही नहीं बल्कि उनके पार्टी मे भी दियो कौड़ी कि है जिसका एक्शन नॉन सेन्स कह के कूड़े मे डालने का सुझाव उन्ही के पार्टी के मालिक कहते हैं. ये देहाती औरत वाली बात  इंटर नॅशनल मीडिया मे उछला है ये इनदिन मिडिया नहीं दिखाने वाली, क्यों ? आप समझदार है समझ जाईये, हाँ सोशल मिडिया जरूर बता रही, शायद इसीलिए सरकार  शोशल मिडिया पे इतना भन्नाती रहती है. 


    मनमोहन कि  स्थिति उस लडकी कि तरह हो गयी है, जो अपने प्रेमी के साथ मा बाप के खिलाफ  घर से भाग चुकी है लेकिन प्रेमी भी दगाबाज निकला और  नॉनसेन्स कह उसे करनी को दुत्कार दिया. 

    अब देखना है इंटरनेशनल देहाती औरत भारत के एक पार्टी के "रखैल" बनते है या  या गरिमा बचाने के लिए अपने मर्द के मुह पे एक जोरदार तमाचा मार अपना गौरव वापिस लाते है. हालाकि  मुश्किल ही दीखता है. 

    सादर 

    कमल कुमार  सिंह 

Tuesday, August 27, 2013

साहब जी और फ़ूड सेक्योरिटी बिल


सुबह सुबह "साहब" जी  जब खटिया से अपना पैर नीचे उतार, उनके हिसाब से "भारत डायन"  के सीने पे पाँव रखा तो खुश हुए, हलाकि यह काम वो रोज करते थे. लेकिन आज ख़ासा खुश थे.

"अजी सुनती हो,  जरा डेटाल साबुन देना, आज नहाना पड़ेगा, अमेरिका ने हमको मगाया है" -  अपनी पत्नी से कहा.

क्या हुआ जी ? सब ठीक तो है, कहीं "दिल्ली वाली मम्मी" ने आपको भी बेच तो नहीं दिया उन्हें ? - बेगम  ने कहा.

"कभी कभी ढंग की बात किया करो, तुम बेगम हमेशा हमें अंडर इस्टीमेट करती हो- तमतमाते  बोले.

"काश कुम्भ मेले वाले भी करते तो उनकी जान बच जाती., लो पकड़ो डेटाल, इससे शरीर का कीड़ा तो मार लोगे, दिमाग साफ़ तो पहले ही हो चूका है"- बेगम ने साबुन खुश होते हुए इस तरह से दिया मानो जहर दे रही हो.

डायन के सीने से टुल्लू फिट कर निकले गए पानी से जम  के नहाने के बाद कच्छे को सूरज के नजरो के इनयात कर सूरज  पे अपनी नज़ारे इनायत कर कहा, 
"दो मिनट में सुखा दो , एके है, दूसरा स्वीटजरलैंड में है.  नहीं किया तो  सांप्रदायिक बता के अंदर कर दूंगा, बड़े बड़े आई ए एस को अन्दर- बाहर  किया है, तुम क्या हो ?"
 सुरज ने मारे  डर के धुप तेज कर दी, कच्छा सूखने लगा लेकिन खान साहब को पसीना आने लगा, फिर तमतमाए, "अबे  रोना  हो तो अपने आँख से पानी निकालो, न की  मेरे "वहां" से. 

खैर ये उनकी रोज की आदत थी, इस तरह के कारनामे कई बार कर चुके हैं,  पिछली बार  कूत्तो के समूह को जो की  सामाजिक व्यक्तियों को  काटने की वजह से मुनिसिपल वाले उठा ले गए थे उनको छुड़ाने की  दलीले थी की ये तो  पागल कुत्ते है, कटना इनका स्वभाव है, अब कुत्ते नहीं काटेंगे तो कौन  काटेगा ? इनको छोड़ दो नहीं तो  कुत्ताधिकार वाले बहुत  है अपने देश में तुम्हारी नौकरी खा जाऊँगा, इंसान और जानवरों में मतभेद करते हो ? साम्प्रदायीक  कही के. कुत्ते हमारे समाज के अभिन्न हिस्सा है. ये हमारी रखवाली करते है तो किसी को काटे भी तो हमें आपत्ति क्यों ?. अब कुत्ते कुत्तई नहीं करेंगे तो क्या आप करेंगे ? 

खैर नहा धो के साहब ने अपने "कमजोर नाडे" को बड़े कसीदे के बाँधा ताकि कमर पर टिकी रहे. मुलायम हाथो द्वारा भेंट की गयी मूल्यमान इतर का छिडकाव किया ताकि किसी भी प्रकार के गन्दगी की बदबू न आये, दिमाग इन सब से मुक्त था अतः इतर से उसको भी मुक्त रखा हमेशा की तरह. इनका मानना था की दिमाग की खुशबू से प्रभावित करना खतरनाक हो सकता है, कही किसी चोर चुहाडे की नजर पड गयी तो रहा सहा भेजा भी उड़ा ले जायेगा, अतः जैसा भी है अपना है, खोपड़े में सुरक्षित तो रहेगा. 

घर से अभी कुछ दूर गए होंगे की किराने  के दूकान पर लम्बी लाइन नजर आई. आप सामाजिक  थे वहां गए, "क्यों रे इत्ती लम्बी लाइन कहे की ? खुदा की खैरात बट रही क्या ? 

"खुदा की खैरात ले के क्या करेंगे चाचा? मम्मी जी का भेजा कोटा आया है,  

 हायं ?? ये कैसे  भैया तो अपने मुलायम जबान में कुछ कुछ खिलाफत की थी, लेकिन क्या भैया और क्या गिरगिट ? चलो कोई नहीं पास हो गया तो हो गया. मन में बुदबुदाए साहब. 

"ये बताओ बिलवा में खाने के बाद पचाने का भी कुछ उपाय है,"  साहब ने धमकाने के अंदाज में पूछा. 

साहब,  जिसे दो जून का कहना न नसीब हो वो  पचाने की क्या सोचे? आप लोग खाइए, खूब  खाइए, मिल बाँट के पचाईए. यहाँ तो कब से लाइन में लगे है, पंसारी कुछ देने को तैयार नहीं होता, कहता है किसी की शिफारिश ले के आ , अब आप आ गए हो तो, तो आप ही कह दो. सुना की आपके शिफारिश से सम्परादायिक  यात्रायें रुक जाती है, साम्प्रदायिक लोग थर थर कांपते है. 

अबे ये जनता का काम है, हम ठहरे नेता, हम सिफारिश करंगे तो लोग क्या कहेंगे? साहब ने पहले से फुले हुए सीने को और फुलाने की कोशिश की. लेकिन सुनो, जितना मिलेगा उसका आधा हमारे बेगम को पंहुचा जाना बाकियों से भी यही कह दो, "अबे पंसारी, दो इन सबको, कहे तंग करते हो, माल बंद करावा दे क्या" ? साहब ने पंसारी से धमकी से लबालब शिफारिश की और चलते बने. 

गरीब बेचारा अपनी हथेली पे पड़े  उन सिक्को को जो उसने मम्मी के पोस्टरों को रद्दी के भाव बेच बेच के जमा किया  था, जमीन पर फेंकते हुए, ढेर सारा दुसित प्रवाह किया और  चलता बना, नंगा, भूखा.  

कमल कुमार सिंह. 

Sunday, October 14, 2012

अंडे का फंडा


अंडा स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है, बहुपयोगी पदार्थ है, खाने के अलावा भी कई सुंदरी इसको बालो में लगाती है ताकि उनके बाल स्वास्थ्य रहे जिसे देख उनके  बॉय फ्रेंड का दिल स्वस्थ रहे, कुछ को तो चेहरे पे रगड़ते देखा है. इन सब के अलावा भी भी इसका एक उपयोग है, किसी को उपहार देना, जी हाँ अंडा लोग उपहार में भी देते हैं, कुछ लोग सर पे फेंक के देते है कुछ  चहरे पर. 

चहरे  से याद आया की कुछ दिन पहले रेणुका जी ने बाबा रामदेव को शक्ल ठीक करने की सलाह दी थी, उनका  मानना है की शक्ल ठीक तो सब ठीक, लेकिन मेरे समझ में ये नहीं आता की  इतनी ढलती उम्र में भी रेणुका जी की शक्ल भी ठीक है,खंडहरे बताते हैं की ईमारत बुलंद होगी, लेकिन अक्ल का क्या करें ?? अब शकल से ही कुछ होना होता तो कोंग्रेस में एक से एक सुदर्शन लोग है, लेकिन शकल का कवच उनकी रक्षा नहीं कर पा रहा.क्या कोंग्रेस में इन्होने अपनी जगह शकल से बनायीं है.

एक बात तो तय है की शकल का अकल से कोई सम्बन्ध नहीं है,एसा होता तो अपने राहुल भाई के पास क्या कम सुन्दर शकल है ? हाँ एक समानता हो सकती है, लोग अक्ल लगा के शक्ल सुधार सकते हैं, लेकिन फिर भी शकल लगा अकल का कुछ नहीं किया जा सकता.   बाबा रामदेव हो या केजरीवाल दोनों के पास सुन्दर शकल न सही ?? लेकिन इनलोगो ने  सुन्दर शकल वालो के चहरे बुरी  तरह काले  कर रखे है, अब इनका गोरा अक्ल, काले हुए शकल को सुधारने में चला जाता है. 

शीला दीक्षित जी के समारोह में कुछ अंड बंड लोगो ने अंडाबाजी की,  सुन के दुःख प्रकट करू या ख़ुशी ..कोंग्रेसी कह रहे हैं है कबूतर का बीट था, बीट , वो भी इतना?? की पुरे चेहरे पे कान्ति फैला दे ?? तब उस कबूतर का नाम गिनीज बुक में जरुर दर्ज होना होना  चाहिए, वैसे भी  आम को इमली कहना कोंग्रेस की ये पुरानी आदत है. खैर जो भी हो इतना है की इस घटना को शीला दीक्षित जी को सकारात्मक  लेना चाहिए जैसे कोंग्रेस अपने घोटालो, महगाई के लिए सकारात्मक पक्ष प्रस्तुत करती है.  


लोग उस अंडाबाज  को अंड बंड कह रहे हैं लेकिन एसा नहीं है, निश्चित ही वह अंडाबाज  कोंग्रेस का शुभचिंतक  है, उसके अंडा फेकने  में एक फिलोसफी है,  वह चाहता है की कोंग्रेस की सरकार आगे भी देल्ही में रहे और शीला जी उसकी अगुवाई करे, अब चुकी महगाई , और घोटाले के कालिख ने कोंग्रेसियों का मुह काला कर दिया जिससे इनके चहरे की कान्ति घटने लगी, सो वह शुभचिंतक बस सन्देश देना चाह रहा था की अंडा इस्तमाल कीजिये, चेहरे की कालिख  दूर भगाईये  और चेहरे को कांतिमय बनाईये. शायद वह "शीला , शीला की जवानी" गाने से प्रभावित था, किरदार समझने में उससे चुक हो गयी, अरे अंडाबाज भाई, वो शीला दूसरी है और ये वाली दूसरी,..

जनता से इनकी अपेक्षाएं है की इनके सलाहे हुए महगाई को जनता आत्मसात कर सराहना करे लेकिन क्या ये जनता के सलाह को स्वीकारेंगे ?  सराहेंगे ??

सम्बंधित लेख :-

एक था राहुल

कोंग्रेस की नीचता

मै ब्रह्मण हूँ

कोंग्फेसियो का एक और वीर

राष्ट्रपति चुनाव : सट्टा बाजार का नया आयाम



Monday, September 3, 2012

शांति की राह मे एक और कदम

(ये लगाया गया फोटो घटना स्थल का है -शान्ति के लिए शांति वाहको का यग्य) 

दो सितम्बर  २०१२ , शाम का वक्त, पुलिस वाले बैरिकेडिंग पे खैनी दबाते हुए  मुर्गा  ढूंढ रहे थे, लेकिन बदकिस्मती की शांति का वाहक मुल्ला मिल गया, भाई कमरुद्दीन जी, मस्ती से गाना आते हुए आ रहे थे, पुलिस वालो ने रूटीन चेकिं के तहत उनको रोकने की कोशिश की, लेकिन महाशय शान्ति अर्थात इस्लाम से होने के कारण लोक्तान्त्र्यीय व्यवस्था को अनसुना कर दिया, शायद  कोई खलीफा होता तो जरुर अदब से  रुक गए होते.  आपने न पुलिस की सुनी न कानून की, शायद अल्लाह की यही मर्ज़ी थी. 

खालिफाई क़ानून को ध्यान मे रख भाई कमरुद्दीन ने पुलिस की बिना सुने भागने लगे, कौन जाने कोई खालिफाई हथियार भी साथ हो, और पुलिस वाले खलीफा मे विश्वाश नहीं करते, सो शांति और संतुलन बनाने के लिए भागे होंगे. 

 पुलिस ने पीछे से इस शांति वाहक को डंडा मार जो अनर्गल किया उसे तो शायद ही खुदा माफ करे . फिर  घायल हुए भाई के साथी  जी तैश मे आये और फोन उठा अपने दूसरे इस्लामी शांति के वाहक  साथियो .... सलीम भाई, ज़ाहिद भाई, अज़हर भाई, इक़बाल भाई, अनवर भाई, शाहरुख भाई, अकरम भाई, शौकत भाई, शकील भाई, आफताब भाई,मोईन भाई, ज़ाकिर भाई, ज़ावेद भाई, सलमान भाई, शोइब भाई, लियाक़त भाई, बिलाल भाई, उस्मानभाई, मोहसिन भाई, ज़ब्बार भाई आदि आदि को बुलवा कर कई घंटे तक उस पुलिस की कारस्तानी का बदला लिया.  लगे हाथ शांति हेतु यग्य भी किया जिसमे आसपास की गाडियों की आहुति दी गयी, जो की एक अल्लाह वाहको का एक परम्परागत तरीका है, ठीक वैसे ही जैसे , मुंबई , लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, असम मे आहुति की गयी. 

मामला बढ़ गया , सुना है दो दर्जन पुलिस वाले घायल भी  हुए हैं, और होना भी चाहिए, जो भी शांति और अल्लाह के शांति वाहको के रास्ते मे आएगा वो जायेगा.  अल्लाह हू अकबर 

Tuesday, July 31, 2012

परेशानी मे ही एकता


इस दुनिया मे सभी परेशान है, क्या छोटा क्या बड़ा, वास्तव मे परेशानी भाई चारा का सन्देश देता है, एक दम उम्दा वाला, मुस्लिम हिंदू दोनों पे आता है, नेता जनता दोनों पे आता है, कुवारो विवाहित दोनों पे आता है इस  मामले मे मै "परेशानी" का फैन हूँ , कम से कम अन्ना टीम की तरह अकले खुद पे क्रेडिट लादने की कोई कोशिश नहीं करती. 

बाबा-मोदी और मिडिया, अन्ना टीम के फ़ालतू बयांन  बाजियों से परेशान है, बयानों के बाद अन्ना टीम जनता न आने को ले के परेशान है, अरविन्द चंदे और राजनितिक माहौल तैयार करने को लिए परेशान है, सरकार बाबा से  परेशान है और सरकार से जनता है परेशान है, अर्थात "परेशान" ही वह कड़ी है जो सबको आपस मे जोड़े रख रही है. 

मै तो कहता हूँ भाई चारा और सद्भावना लाने के लिए "परेशानी" को रास्ट्रीय धर्म घोषित कर देना चाहिए. इसमें सरकार सहयोग कर सकती  है, सरकार तो इसके लिए वैसे भी वचनवद्ध है. कोई ऐसा कानून बनाये, की सभी परेशानी को इज्जत की नजर से देखे, भारतीय नारी की तरह. सब परेशान होना चाहे, "अबे वो बड़ा नकारा और खतरनाक है, परेशान ही नहीं है" "वो सांप्रदायिक है, परेशान ही नहीं है". 

अब विवाद न करिये की परेशानी को धर्म का दर्जा दिया जाए या भारतीय  नारी का, वास्तव मे दोनों एक ही है, सिवाय एक के की धर्म किसी भी परिस्थिति मे किसी को परेशान नहीं करता और भारतीय नारी विशेष, अन्वाशेष परिस्थिति मे  किसी को भी परेशानी कर सकती है, अर्थात परेशानी को धर्म की संज्ञा देना जादा तर्क संगत है.  

जिसको देखो वही परेशानी को कोसने मे लगा है, अरे भाईयों, जरा अकबर दूरदर्शी से सबक लो. अकबर ने एक धर्म चलाया था "दीन -ए इलाही " .. दीन - अर्थात परेशान  आत्मा, निश्चय ही अकबर महान था, उसका पता था, सारे परेशान लोग एक हो सकते है, सद्भावना के लिए पहले सबको परेशान युक्त  बनाओ , फिर उनके लिए पैकेज निकालो , "दीन - परेशान " टाइप का , खुद बा खुद सब एक होने लगेंगे .  शायद इसी कारण वो महान कहलाया होगा. 

ब्रम्हा एवं अन्य देवता ने मिल कर राम के लिए "परेशान विव्युह" की रचना की, जिससे राम को पर्यटन का अवसर प्राप्त हुआ, सीता से कुछ दिन दूर होकर स्वंत्रता का अनुभव भी लिया. अंततोगत्वा रावन जैसे पापी को निर्वाण दिया, और वाल्मीकि तुलसी को लिखने के लिए नया मैटर दिया.  

मोहम्मद भी तडीपार हुए, खुदा को भी अंगुल कर कुरआन लिखवाया, जेहादी पाठ डलवाया, अरब मे जिहाद करवाया, जो पुरे दुनिया मे फ़ैल गया, अब देखिये कैसे सारे आतंकवादी एक होकर एक दूसरे से प्रेम पूर्वक आपस मे रहते है, जिससे दुनिया की सरकारे परेशान होती है, और वहाँ के देशवासी एक होते जाते है. 

अंग्रेजो ने पुरे भारतीय जनता को नाको चना चबवा रखा था, सिवाय कोंग्रेसियों के, जिससे वो एक न हो पाए, जिन्ना और नेहरू अलग अलग खेमे मे हो गए, और पकिस्तान बन गया. जबकि पूरी जनता परेशान हो कर एक हो गयी. 

अकबर, राम मोहम्मद से किसी ने सीख ली हो या न ली हो, लेकिन सरकार ने "ले ली", सबको परेशान करके एक करने की शपथ. लेना भी चाहिए, आखिर देश की एकता का सवाल है. कभी टैक्स लगा के जनता को एक कर सड़क पर उतरवा देती है, तो कभी पेट्रोल मे आग लगा के,  आज सरकार जनता को परेशान करने के लिए  बैठके करती है, सभाएं करती है, करोडो के प्रोजेक्ट लाती है, सवाल आखिर एकता का है. 

जो काला धन या लोकपाल दे दिया तो जनता  क्यों परेशान होगी ?? सो रोक के रखा है, सवाल आखिर एकता का है.  जनता को भी इस बात को समझना चाहिए, देश की एकता,अस्मिता बनाए रखने के लिए, परेशानी एक आवश्यक तत्व है. परेशानी खत्म होते ही नेता की आयु छोटी होने लगती है, जनता के एकता के कण बिखरने लगते है, तो भाइयो परेशान रहो और एक रहो, सरकार हमारे साथ है. 

Saturday, June 30, 2012

पुलिस कि कृपा और हमारा अन्याय


रविवार का दिन था जिसको मै अफसर डे कहता हूँ, बस सोते रहो, न काम की चिंता न दुनिया कि फिक्र, फरवरी का महीना वास्तव मे मैंने इस महीने का नाम "प्रधानमन्त्री"  रख दिया था.  दिन मे तेज धूप के साथ हलकी,  नम्र ठण्ड का मिश्रण बिल्कुल अपने प्रधानमन्त्री कि तरह सुहाना लगता है. दिन मे धूप तेज है तो क्या, खुशनुमा ठण्ड भी तो है गर्मी को कवर करने के लिए. इसी महीने मे नवयुवक नवयुवतिया भी नए खोज कि  तयारी मे रहते हैं. "बीती ताहि बिसार दे, आगे कि सुध ले" कि तर्ज मे नए पैतरे अपनाने मे कोई कसर नहीं छोड़ते, शायद इस कारण भी  मुझे इस महीने को प्रधान मंत्री कहना ठीक लगा.

सुबह उठा तो याद आया कि आज बहुत से कार्य करने हैं, प्रधानमंत्री महीना खत्म होने है,  कूलर कि व्यवस्था करनी,  गर्मी वाले कुछ कपडे लेने हैं जिसपे लिखा हो लुक मी  / "सी मी", या हिट मी . 

बाईक कि ओर बढ़ा तो जूते ने कहा, "भाई कदम थोडा सम्हाल के कदम डालो, दूसरों को दो हजार का बताने से मै उस लायक थोड़े न हो जाऊंगा मुझे अपनी औकात मालुम है, दीदी कि तरह जादा प्रेशर मत डालो नहीं तो अभी टे बोल् दूँगा, आसपास कोई प्रणव जैसा दक्ष मोची भी नहीं जो हमारा गठबंधन कर दें" मै चौंका, जूता वास्तव मे ज्ञानी था, जिस दुनिया मे लोग बढ़ा चढा के कुछ भी बोलते हैं वहाँ इस प्रकार के सत्यवादी जूते कि सत्यता कुछ सोचने को मजबूर करती है.  

खैर मैंने कदम सम्हालते हुए बाईक पे बैठा ही था, कि आवाज आई "मर गया "  मै फिर चौका, अब क्या हुआ तुझको ?? बाईक के दिल से आवाज आई थी.
"तुम बहुत वजनी हो गए हो, एक तुम्हारा वजन दूसरा  मेरे स्टालमेंट  का" - बाईक ने बोला  ,
तुझे उससे क्या स्टालमेंट  का बोझ तो मेरे ऊपर है तू क्यों चिल्लाता है ?? 
तभी तो दुगुना वजन हो गया है तुम्हारा, आजकल आदमी अपने वजन से कम और  स्टालमेंट के वजह से जादा वजनी हो गया है. 

कैसे दिन आ गए हैं मेरे आजकल निर्जीव भी आँखे दिखाते हैं, 

अभी थोड़े देर गया ही था कि रेड लाईट आ गया, मैंने गाडी रोक दी, चौराहे  के आसपास का दृश्य देखने लगा, रोड के दूसरे छोर पर बने पार्क मे चार छह जवान लडके लड़किया एक लाइन से बैठे हुए सन्यासीयों से विचार मग्न थे, जैसे देश के किसी गंभीर मुद्दे पे चर्चा करने वाले हों. उनको देख  मेरा भी मन होता कि काश मुझे भी देश कि सम्स्यायो पे गंभीर होने का मौका मिले, लेकिन अकेला चना कभी भाड़ फोडता है ?? 

थोड़ी दूर गया  हूँगा कि सफेदपोश ने मुझे रुकने का इशारा दिया, मैंने गाडी रोक दी, 
लाईसेंस दिखाओ : ट्रैफिक  वाले ने कहा , 
सीट के नीचे से निकाल  दे दिया, 
रजिस्ट्रेशन दिखाओ कह के मेरे पीछे वाले जेब कि तरफ देखने लगा ,वो भी मैंने सीट से निकाल के दे दिया, वो थोडा मायूस हुआ, 
आजकल के लडके रजिस्ट्रेशन तक सीट के नीचे रखते हैं, कही खसक वासक गया तो, अरे पर्स मे रखना चाहिए ."जी "  मैंने समर्थन कर दिया. 
चलो अब इन्सुरेंस दिखाओ, 
मैंने देदिया , 
ये तो परसों ही खत्म हो गया है,:  ट्राफिक वाला 
मै घबराया, हाय रे बुध्धि परसों तुझे याद क्यों आया, साले जूते अपनी औकात बता देते हैं, बाईक अपना रोना रो देता है तू ये तो भविष्य वाली है , इसके कंठ क्यों न फूटे ??? 
तू जूते का ख्याल रखता है, गाडी भी रोज साफ़ करता है, और मुझे पुरे साल मे  आज दूसरी बार आजाद किया अछ्छा है, फस जा तू, "इन्सुरेंस बोला " 
सफेदपोश मानो कह रहा है, अब फसें बच्चू , अब कहाँ जाओगे ? हमसे तो अछ्छे अच्छे नहीं बचे, तुम तो अभी बच्चे हो . 
ध्यान नहीं था सर, कल कि रीन्यू कर लूँगा : मैंने ट्रैफिक वाले को सफाई दी. 
काल करे सो आज कर आज करे अब होय, उसने कहा 
लेकिन आज इतवार है ओफ्फिस बंद रहता है, आज जाने दीजिएगा, कल चाहें तो मै आपके पास हाजिरी लगा जाऊंगा इन्सुरेंश के साथ. 
ये जुर्म पता है, पता है कितने का जुरमाना है ???  जाना है तो जाओ, लाईसेंस और रजिस्ट्रेशन छोड़ जाओ,  बस ये चालान लेते जाओ.
मैंने कहा ठीक है, कल आता हूँ, आप चालान काट दो.
उसने तिरछी नजर देखा "चालान सच मे कटवाओगे " ???
और कोई चारा भी तो नहीं है, मैंने कातर शब्दों कहा.

भाई देख चालान होगा, मामला कोर्ट मे जायेगा, तुझे वहाँ आना होना, ढेर सारा झंझट है, जो भी हो हम आखिर हैं समाज सेवक, सरकार हमें इसी बात के पैसे देती. एक काम कर थोड़ी कृपा कर और मामला यही रफा दफा कराते हैं. अच्छे घर के बच्चे कोर्ट कचहरी के चक्कर मे नहीं फसते .
दिखने मे तो अछ्छे घर से दीखते हो .

मेरा दिल धडका , जब कोई बडाई करे तब समझ लीजिए कि कुछ गडबड है , इनके अच्छी घर  से दिखने का मतलब  मोटा बकरा होता  है , जैसे मुल्ले साल भर पाल पास के बड़ा करते है , उसे पुचकारते हैं , बहुत बढ़िया है कहते हैं  उसे बकरीद को कट देते हैं , फिर कहते हैं बकरा बड़ा स्वादिस्ट था , बकरा बिचारा भी बहत्तर बकरियों के चक्कर खुशी खुशी  कट जाता है. 

"मतलब ??"  मै चौंका,
मतलब सरकारी परम्परा का निर्वाह करो, और झंझट से दूर रहो, परम्परा का निवाह करो , कुछ करो !.
लेकिन सर ये गलत है,आप रिश्वत कि बात कर रहे हो, ये तो सरकारी खजाने को नुक्सान पहुचाना है, मै अच्छे घर से हू नियम कानून जानता हूँ. आप चालान काटो खाने के चक्कर मे मत रहो. 

अच्छे घर से हो तो देल्ही क्या करने आये हो ?? वही रहते , खैर एसी भाषा का मै यहाँ अभ्यस्त हो चूका था, इन बातो पे मै बस एक ही बात समझाता, भाई देल्ही का इतिहास इतनी बार बदला गया है कि दो  प्रतिशत  के बाद यहाँ का कोई है या फिर फी जो ये कहता है तो मान लिया जाए कि वो मुगलों कि संतति है या अंग्रेजो का फल, मेरी दूसरी दलील इससे भी जादा खतरनाक वाली होती: माँ कि कोंख तो स्वर्ग होती है, न कोई चिंता, न फिक्र, माँ जो खाए चुप चाप उसी मे से मिल जाता है, फिर क्यों नहीं वही पड़ा रहता ?? क्यों बाहर  आ गया, अब जो तुझसे बचता है वो माँ खाती है. यही दोनों दलील मैंने पोलिस वाले को सुना दी . 

ट्रैफिक वाला भडका : अरे भाई खिलाया है तब खाते हैं, कही पुन्य किया, जिसको पैसे दे के पुलिस मे भरती हुआ उसने उस पैसे से गाँव मे मकान बनवा लिया, मैंने पुन्य किया, उस बिचारे के पुरे परिवार को छत दी है, इसी पुन्य के प्रताप स्वरुप मुझे ये नौकरी, नौकरी मिलने के बाद अपने वरिष्ठ के हित मे किया, पुन्य किया, उन्होंने मेरे पुन्य से नयी कार ली, तब यहाँ हूँ, जीवन मे तरना चाहते हो कि नहीं ?? तब तुम् भी कुछ पुन्य करो और परम्परा का निर्वाह करो. आज दुनिया पूजा और पुन्य पे तो टिकी है, नहीं तो तुम जैसे अधर्मियोंम के कारण पृथ्वी २००५ मे ही खतम हो गयी होती.. जिसको हम जैसे धर्मात्मा लोग अभी तक खींचते चले आते हैं.

इसने पुन्य कि परिभाषा ही बदल ही थी,  मुझसे पुन्य करवाने के लिए  अथक परिश्रम किया लेकिन, लेकिन मै ठहरा अधर्मी अन्यायी, चालान कटवाया घर आ गया.

इस बात को पुरे चार हो गए, तब से मैंने अपनी गाडी को हाथ नहीं लगाया, धीरे धीरे पेट्रोल के दाम बढ़ाने लगे, अब मै उस पुलिस वाले को धन्यवाद देता हूँ, नहीं तो न जाने अब तक कितने रूपये फूंक चुका होता, अनजाने मे ही ट्रैफिक वाले ने मेरा ऊपर बड़ा उपकार किया और मुझे अपराधबोध होता है उस अन्याय का जो मैंने उस ट्रैफिक वाले के साथ किया.
सादर ,
कमल कुमार सिंह . 

Tuesday, November 22, 2011

मौनी बाबा


"बाबा" बड़ा विचित्र शब्द है ये, सुनते तमाम किस्म के चहरे मष्तिस्क पटल पे आतें है. बाबाओं के कई प्रकार हमारे सभ्य समाज ने निर्धारित कियें हैं कुछ उदहारण इस प्रकार से हैं :-राहुल बाबा, रामदेव बाबा, नित्यानंद बाबा, और हम लोग अपने दादा जी को भी बाबा ही कहते थे, आजकल जिसकी मानसिकता जैसी होती है वो उस वाले  बाबा को मार्केट से चुन लेता है  .

हमारे खुनी रिश्ते ( ब्लड रिलेशन ) वाले बाबा का चेहरा आज के अन्ना जी से काफी मिलता था, आज हम अन्ना को देख के वशीभूत हो जाते है, लेकिन  अन्ना से विचारधारा इनकी अलग थी, शायद चलने फिरने में तकलीफ के कारण उन्होंने हिंसा का रास्ता अपना लिया था, दिन में दस बार लाठी फेंक के मारते थे यदि एक मिनट भी देर हो जाए तो, वो बात अलग है हमेशा हुक हो जाती थी. फिर वही लाठी उनको दूर से दे के भागना पडता था.

उनको रोज शाम मंदिर ले जाने कि जिम्मेदारी मेरी होती थी, वो बात अलग है कि सुबह सुबह मै अपने आप जाता था, मंदिर  कि सारी मिठाइयां चट  करने. मुझे लगता था इससे भगवान शंकर खूब खुश होते होंगे, आखिर उनके प्रसाद का पहला पात्र मै और मेरी टोली जो होती थी. शाम को पंडित आग लगाता था. "आपका पोता शिवलिंग रोज जूठा कर जाता है "

एक शाम जब हम और दादा जब मंदिर पहुंचे तो देखा पुजारी जी के बगल में एक और बाबा बैठे हैं, जिनके हाथ में सुन्दर सी चांदी कि चिलम थी, जिससे वो ऊर्जा ग्रहण कर भीड़ को भी उर्जावान बनने का प्रवचन रहे थे. उनकी  लंबी दाड़ी देख मुझे एक बार नोचने का भी मन किया, शकल से तो चोर दिख रहे थे, लेकिन स्वभवतः दादा जी उनके श्रधा के पात्र थे.  उनके साथ साथ  गाँव के मुखिया जी और मुंशी जी भी  बगल में आ के बैठ गए .

मुखिया जी ने कहा  "ये तो हमारे भाग्य कि आप इस गाँव में पधारे"
मै डर गया, कि बाबा के जाते ही मुखिया जी का भाग्य भी चला जायेगा और इस बार पक्का प्रधानी का चुनाव हारेंगे.

अस्तु, बाबा के रहने का इंतजाम मंदिर प्रांगण में ही बने एक कमरे को साफ़ कराया गया और अगले दिन  शाम को कीर्तन मंडल का कार्यक्रम रखा गया, बाबा उसके अगले दिन मौन व्रत पे जाने वाले थे.

जम के तैयारियां कि गयी, गांव समाजी ढोलक, मजीरा, हरमुनिया  मंदिर पर पहले से ही था, लेकिन जो बजाने वाला था वो एक हफ्ते पहले पड़ोस कि लडकी साथ भागा हुआ था, सो तय हुआ कि  पास के गाँव से बजवैया  आएंगे. खाने पीने का इंतजाम मुंशी जी ने सम्हाल लिया. बच गया बाबा जी का गांजा भांग सो उसकी भी कोई चिंता न थी, जोखू चाचा चलते फिरते दूकान थे, उनको निशुल्क दान के लिए भी तैयार कराया गया लेकिन शर्त थी कि "उतारे" के पैसे  से हिस्सा चाहिए.

आसपास के गाँव में मुनादी करा दी गयी कि, एक तेजस्वी बाबा गाँव में पधारे हैं, कल मौन व्रत पे आके उनके दर्शन का लाभ लें, यों लग रहा था जैसे १० साल बाद पुरे गाँव में किसी के घर लड्का पैदा हुआ था.

महिलाए आपस में बात करने लगी   "  ललिता  के माई , चलना है न " ??
दूसरी महिला   "हाँ, काहे नहीं , बाबा से बेबी के ब्याह का योग पूछना है"
पहली वाली  "कल के वास्ते  साडी  न कोई ढंग का , तुम्हरे पास हो तो तनिक इस्तरी करा लेना"
दूसरी वाली  "पिछली बार तुमने  बीडी फूंक के झौंस दिया, अबकी  ऐसा किया तो दंड लुंगी"

सबका तय हो गया, कौन सा चप्पल, कौन सा जूता, कौन धोती, कौन सा कुर्ता  कल के शुभ अवसर पे जंचेगा .सब दोपहरी बाद से लग गए तैयारी मे.  इतना तो हम पन्द्रह अगस्त के एक दिन पहले मिलने वाले आधा रेसस में भी न करते, उतने में  गिल्ली डंडा के तीन पदान निपटा देते थे.  सुबह पहुँच जाते थे गन्दा वर्दी पहिन के, अलबत्ता जलेबी मिल जाती थी.

सुबह शुरू हुआ मेला,  मौनी बाबा आसन जमाए हुए थे, उनके हाथ में स्लेट थी, सबकी शंका का समाधान दुधिया से लिख लिख के देते थे, समस्याए थी भी अपरम्पार, किसी को बच्चे कि, किसी को पत्नी कि, तो कोई पूछता, मेरी लडकी कब वापिस आयेगी जो अमुक लडके के साथ भाग गयी. बीच में बाबा कि दुधिया खत्म हो गयी पता चला एक सुन्दर बच्चा उनके बगल में रखा सारा दुधिया चबा गया.   बाबा ने हमको भी झूठा दिलासा दिलाया कि सम्मान पूर्वक पास होगे, उसके बाद तो मैंने पढना लिखना ही छोड़ दिया था, परिणाम आने पे जम के मार पड़ी थी. शाम को कीर्तन कम रंगा - रंग कार्यक्रम का आयोजन भी किया, बाबा मदमस्त थे, जवान लम्पट लडके- लड़कियों ने भी जम के चिठ्ठी -पत्री का आदान प्रदान किया. शाम तक अच्छा चढावा आ गया था, सब अपने घर लौटे, बाबा का मौन लंबा चलना था.

आदतन अगली सुबह पहुँच के हमारी बन्दर  टोली पहले मंदिर में न जाकर बाबा के कमरे कि ओर रुख किया. बाबा अनुपस्थित थे, शायद खेत कि ओर गएँ होंगे.  छक  के फल फुल उड़ाने के बाद पीछे मुड़े तो काटो तो खून नहीं, बाबा पीछे खड़े थे,  चिल्ला के कहा , "शर्म नहीं आती, बाबा का भोजन झूठा करते हो".  बबलू , भद्दू तो  भाग लिए फसां रह गया मै, कहा "आप ने अपना मौन व्रत तोड़ दिया, जाने देते हो कि गाँव में बताऊ कि पोंगा  आदमी हो"  बाबा ने कान पकड़ के बाहर निकाल दिया.

गाँव में जिसको भी बताया कि बाबा बोला, सबने डाट पिलाई, "अभी तो मौन व्रत पे है , भाग बन्दर कहीं का "
मन मसोस के रह गया. सब  हमारा  दूध भात मान के भगा दिए, कोई बात ही नहीं सुनता था.
मैंने अब वहाँ जाना ही छोड़ दिया, जब भी कीर्तन शुरू होता मै गन्दी गन्दी गालियाँ  सुनाना शुरू कर देता.

 चार दिन बाद स्कूल से लौटा तो पड़ोस में रोना पीटना मचा था .

लोग आपस में काना फूसी कर रहे थे .. "आजकल बाबा -बूबी, मौनी -सौनी  का कोई भरोसा नहीं, किसी को शक भी न हुआ कि सरीता कि माई को भगा ले जाएगा, राम बचाएं ऐसे मौनी से " . सब मुखिया और मुंशी जी को कोंस रहे थे, जोखू चाचा अलग सिर धुन रहे थे.

लेकिन अब पछताए का होत जब चिड़िया चुग गयी खेत.

कमल  २२ नोव २०११