नारद: BHU
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Sunday, March 20, 2016

पुलिस

पुलिस एक तिपाया प्राणी होता है, तिपाया यूँ की खड़े होने के लिए अपने दो टांगो के अवाला वो अपने मल्टीपर्पज डंडे का इस्तमाल भी करता है, जिसका एक सिरा जमींन पे और दूसरा सिरा शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है. एक हाथ कमर पे और एक हाथ से डंडा पकड़ उसे पावं के समकक्ष जमीन पे टिकाते हुए बोहनी ढूढता भी पाया जाता है, बोहनी हो जाने पे दोनों हाथो को खैनी रगड़ने के लिए आजाद रखने के लिए (JNU वाली आजादी नहीं) डंडे को कुर्सी बना तशरीफ़ भी टिका लेता है बशर्ते डंडा नुकीला न हो.

पुलिस वही प्राणी है जो बकौल केजरीवाल, उनकी पार्टी की दुश्मन है जिसको केजरीवाल प्यार और आदरपूर्वक ठुल्ला भी कहते है, पुलिस भी उन्हें गाहे बगाहे ठेलती रहती है. उस पर काफी दबाव होता है, हो भी क्यों न? उसके हाथमें सुरक्षा जो होती है, कुछ लोगो का मानना है की उसके हाथो में खैनी होती है जो अक्सर रगड़ता है, लेकिन मेरा मानना है की वो उसे खैनी नहीं बल्कि देश का दुश्मन मान रगड़ता है, चबाता है, उसे उर्जा मिलती है, जिसे फिर वो थूक कर अपराधियों की माँ बहन करता है, अपराधी? जी हाँ अपराधी, मसलन लालबत्ती तोड़ कर बिना रसीद शुल्क दिए भागा हुआ लौंडा, पार्क का चक्कर लगाते समय झाडी के किसी कोने में बैठे देश के सम्स्यावों पे चिंतन मनन करते युगल में से वो लौंडा यदि उसके सीनियर का निकल आये और उनका १००-५० का हक़ मार जाए, खोमचे वाला जो रोजाड़ी देने में आनाकानी करते है. कायदे से देखा जाए तो पुलिस कायदे से ड्यूटी करता है यदि उसे उगाही, नेता के बंगले पे तैनाती, ठेले खोमचे वाले से हफ्ता वसूलने से फुर्सत मिले तो.आमतौर पे इस तरह का पुलिस प्राणी सुखी माना जाता है, जो एक्स्ट्रा करिकुलर द्वारा आपनी आमदनी बढ़ा देश का जीडीपी बढाने में योगदान देता है.

दबंग वाले चुलबुल पांडे अपवाद को छोड़ दें तो किसी किसी प्रदेश में पुलिस निरीह प्राणी माना जाता है मसलन बालात्कार, हत्या, आगजनी, दंगा आदि सामाजिक मौको पे यदि सामाजिक कार्यकर्ता सत्ताधारी पार्टी का हो, न भी हो तो आलस उसे दिन हिन् बना देती है. आगजनी हो या दंगा हो या हरियाणा के जाटों की तर्ज पर सामूहिक बालात्कार हो, वो हर प्रकार की सामाजिक सम्स्यावों में भी मुस्कराता रहता है और “भाड़ में जाएँ भैन्चो” मन्त्र का मनन करता है. ये मन्त्र उन कारपोरेट कम्पनी के कर्मचारियों को भी सिखाया जाना चाहिए जो अनावश्यक दबाव ले तनाव में रहते है. यह दीन प्राणी अतिदीन और भी हो जाता है जब किसी कारण वश उसकी ड्यूटी पुलिस लाइन में लगा दी जाती है जहान उसकी होबी और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी पे रोक लग जाती है. कायदे से आपकी सेटिंग तो पुलिस यारों का यार है. “ईमान से यारी” की शपथ खाने वाला सेटिंग होने पर “यारी है ईमान मेरा यार” तर्जुमा छेड़ता है, समय से यारी नहीं पहुचती तो पुनः ईमान से यारी कर मल्टीपर्पज लठ्ठ को तेल पिला यार को ठेल देता है.

पुलिस धार्मिक भी होता है, उसे अधिकारी चालीसा, नेता श्लोक, मंत्री स्तुति जबानी याद होते है, स्टेज वाईज समय समय पर सारे धार्मिक कर्मकांड भी करता रहता है, कब अधिकारी के कुत्ते को खुद उसी प्रकार का बन उसे बहलाना हा, कब उनके बीवी की साडी पिको कराना है, मौका मिलने पर अधिकारी, नेता तथा मंत्री के संडास साफ़ करने को अपना सौभाग्य मानता है. अपनी स्थिति यथावत बनाये रखने के हर कर्तव्यों से परचित होता है, फिर भी जब किन्ही मौको पे जब ये धार्मिक क्रियाकलाप फेल हो जाते है तो घर पे बीवी तो है ही, उसके साथ अपना तनाव अपने तरीके से बांटता है.

नोट : उपरोक्त व्यंग, व्यंग मात्र है, किसी भी जीवित या मृत पुलिस वाले से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, मेरे मित्र लिस्ट में जो भी पुलिस अधिकारी उनसे तो बिलकुल भी नहीं है, वो मेरे व्यंग की जद में नहीं आते (खुद का सर भी तो बचाना है)

कमल कुमार  सिंह 

Saturday, September 19, 2015

रविश के महाभक्त

रविश का मर्यादित ट्वीट
                                                                   
आजकल रविश का फेसबुक और सोशल मिडिया से चले जाना एक राष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है, रविश के भक्ति में वही डूबे है जो विरोधी विचारधारा को मानाने वाले को भक्त कहते है, अजीब है. 
रविश कैसे पतरकार है ये मुझे कुछ ख़ास नहीं मालुम, क्योकि उनके किसी भी रिपोर्ट या बहस से देश को कोई फायदा  नहीं हुआ है न ही उनसे कोई भी औसत बुध्धि का प्रभावित हो सकता है और विचार धारा बना सकता है,  उनसे वही प्रभावित हो सकते है जो पहले से ही भाजपा विरोधी है. टीवी रूम में बैठ के जब विभिन्न पार्टियों के लोग बहस के लिए आते है तो रविश का भाजपा और संघ विरोध साफ़ साफ़ दीखता है, ये क्यों है एक रिसर्च का सब्जेक्ट है. मै ये नहीं कह रहा है की रविश की पार्टी से सहनुभितु करते है या किसी पक्षपात करते है, लेकिन हाँ ये जरुर कहता हु या कोई भी जो उन्हें देखता है उसे मालुम है की भाजपा व संघ के अंध विरोधी जरुर है, एक अजीब किस्म की तल्खी है उनके दिल में न जाने क्यों ? और जब उन्ही के चैनल के बरखा दत्त जैसी पत्रकारों को लोग बाग़ कोंग्रेस के पार्टियों में देख चुके है तो उनके बारे मे क्या धारणाये बनायेंगे कोई भी औसत बुध्धि का ये बात समझ सकता है.
भाजपा के प्रति उनकी तल्ल्खी उनकी घृणा  देखने के बाद भी भाजपा और आर एस एस के प्रवक्तावों ने न ही NDTV का विरोध किया न ही इस चैनल का बायकाट किया बल्कि आज भी जाते है और मुस्करा के रविश की कुटिल तल्खी झेलते है, अपने प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया जानने के बाद भी. 
कुछ दिन पहले ही प्राइम टाइम पे रविश भाजपा के एक प्रवक्ता पे अमन पे इतना झल्ला गए की पुरे देश ने देखा होगा उनकी तल्खी, जब रविश जैसे संजीदा पत्रकार की भाजपा विरोधी तेवर और तल्खी इतनी साफ़ झलकती है की वो अपने आप को टीवी रूम में संयत नहीं रख पाता और मर्यादा तोड़ के चीखने चिल्लाने लगता है, जिसके विरोधी तेवर किसी से छुपे नहीं है, वही सोशल मीडिया पे विरोधियों और उनके समर्थको मर्यादित होने की अपेक्षा रख रहा है जो की उनकी तरह संजीदा पत्रकार तो क्या बहुत तो विद्यार्थी होंगे कुछ दूकानदार और प्रोफेशनल या इसी तरह के. रविश सोशल मिडिया आपका टीवी रूम नहीं है जहाँ लोग आपके हिसाब से चलेंगे, आपकी लोकप्रियता और तथाकथित उम्दा निष्पक्ष(?) पत्रकारिता किस लेवल की है देश की जनता ने आपको बता ही दिया है जिसके कारण आप भगोड़े हो गए है, सच तो ये है आप उस बदतमीज लड़की (सिर्फ बदतमीज लड़की ही) की तरह व्यवहार कर रहे जो पहले खुद जा किसी को पकड़ के झगड़ती है उकसाती है, प्रवोक करती है, काँव काँव करती है, लड़ती है, झगड़ती है, लेकिन जब लड़का उसी तरीके से उसको जवाब देना शुरू करता है तो कहती है " तुम्हे लड़की से बात करने की तमीज नहीं ? मैनर लेस, रास्कल, रुको पुलिस बुलाती हूँ ”  ब्ला ब्ला, . 

रविश आपके ट्वीट,  या टी वी पे सादगी के पीछे छुपा कुटिल मुस्कान देख कोई बच्चा भी समझ सकता है की आप  भाजपाईयों और संघियों से कितना चिढ़े हुए है, कितना जहर भर के रखते है, और आपके ट्वीट ये भी बताते हैं की प्रधान मंत्री यदि भाजपा का हो तो उसे हत्यारा और लुटेरा भी कहने से नहीं चुकते और आप को ये भी चाह है की उनके समर्थक आपको दलाल भी न कहे, क्या आप देश के संविधान या देश के प्रधानमन्त्री से बड़ा समझते है? आपको अपने द्वारा प्रधानमन्त्री के लिए इस्तमाल किया गया शब्द संयत और मर्यादित लगता है जबकि आप एक जिम्मेदार पत्रकार है, और एक आम नागरिक जो आपके विचारों, मंशावों को को अपनी समझ के हिसाब से जो की जाहिर है की आपकी तरह बड़ा फिगर नहीं, जो आपकी तरह पढ़ा लिखे होंगे भी या नहीं, की भाषा गुंडई भरी लगाती है?  वास्तव में आपको भी पता है की आप दोहरे है, मानसिकता से, तर्क से, सच तो ये है की कोई आपका चरित्र भी आपको बताये तो आपको गाली ही लगेगी, तो बेहतर है की दूसरों को कोसने या गाली देने से बेहतर है की आप अपना चरित्र सुधारें ताकि आपका चरित्र आपको गाली न लगे यदि कोई आपकी ही भाषा में अपने हिसाब से बताये तो. 
आ जाईये वापिस, आपके जाने से बहुत लोग दुखी है, लोग “रविश के साथ खड़ा हु” टाइप का मुहीम चलाये है,  रविश भक्त उनके संग खड़े है, कहाँ खड़े है ? बिस्तर में, टायलेट में या बाथरूम में? ये नहीं पता बस खड़े हैं, एक टांग पे. और इनमे जो भी उनमे  आपके हुनर से प्रभावित भक्त लोग कम बल्कि वो लोग जादा है जो संघ या भाजपा के अंध विरोधी है, आपीए हैं, कोंग्रेसी है, छुपे हुए नक्सली या यों कह ले एनजीओ कुछ तथाकथित समाज सेवक है,  जिनका दिल तोड़ दिया है आपने है, इनके समर्थन को अपनी लोकप्रियता मानते है तो आपका भ्रम है, जबकि आपके पक्ष में खड़ा रहने वालो की सबसे बड़ी जमात भाजपा विरोधी होना है न की आपके भक्तो की संख्या, बात जो भी हो, आपके भक्त आपका इन्तजार कर रहे है, और आपके विरोधी के भक्त भी , कम बैक प्लीज. 

आपका के भक्त तो नहीं पर अभिलाषी 

कमल कुमार सिंह. 

Saturday, July 26, 2014

क्या कोंग्रेस और केजरीवाल के काम्बो पैक है मोदी ??


कौवा चला हंस की चाल मोदी की तरह ही एक प्रसिद्द कहावत है, चुनाव से पहले जनता के लिए कौवा था कोंग्रेस और रंग बदलने वाला आपा, और कोंग्रेस के लिए कौवा थे नरेन्द्र मोदी जिन्हें लगता था की मोदी एक ऐसे कौवे हैं जो हंस का आवरण ओढ़े हुए जनता को बरगला रहे है. 
मामला जो भी हो, लेकिन जनता ने फैसला सुनाया और, और मोदी को भारी बहुमत से भारत का सिंहासन सौंपा जिसकी उम्मीद भारत की कोई पार्टी नहीं कर सकती थी.

सारी चीजों को समझने के लिए हमें सब कुछ दो भागो में बाटना पड़ेगा, 
१ . चुनाव पूर्व 
२. चुनाव बाद 

१. चुनाव पूर्व : 
ये चुनाव निश्चित ही भाजपा के नाम पर न होक मोदी के नाम पर था, और मोदी के वोटरों में दो तरह के लोग थे. 
१. कट्टर हिंदूवादी : ऐसे जो हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान का सपना बस हिंदुत्व धर्म के आधार पर रखते थे. इस श्रेणी के लोगो को लगता था था की मुस्लिम हिंदुवो के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे है, इनके न होने पे उन्हें उनके अधिकार जादा मिल पायेंगे, जबकि वो भूल जाते थे, की अतिक्रमण मुस्लिम नहीं बल्कि सरकार उनके सधे हुए वोट बैंक के कारन खुद पीठ सहलाई थी. यही बात इस प्रकार के हिंदुवादियों को एक होकर मोदी के पक्ष में वोट करने के लिए विवश किया क्योकि इनको भी लगता था की गुजरात दंगा मोदी के इशारो पे हुआ था. 

२ .लिबरल हिन्दू : इस वर्ग में वो लोग आते हैं, जो भारत के विकास में कोंग्रेस को एक बहुत बड़ा रोड़ा मानते थे, और गाँधी परिवार को खतरनाक, क्योकि इस परिवार के रहते कोंग्रेस में ही गैर गाँधी परिवार में ढंग का नेता पैदा ही नहीं हो सकता था. जो सिर्फ और सिर्फ समानता चाहते थे, एक कानून, एक जैसा व्यवहार, एक सामान अधिकार. मुसलमानों के बिना नहीं मुसलमानों के साथ. 
कोंग्रेस ने जो तुष्टिकरण का जो गाजर घास फैलाया था, इससे ये वर्ग अजीज आ चूका था. ये वर्ग देखता था की किस तरह से मुस्लिमो की हर जायज नाजायज बात मान ली जाती है. ये वर्ग देखता था, किस तरह मुजफ्फरनगर में दंगा होने के बाद किस बेशर्मी से सिर्फ समुदाय विशेष की पूछ परख होती थी.
मोदी ने इन दोनों वर्गों साध इनके अंगुलियों को कमल के निशाँ वाले बटन की तरफ मोड़ लिया. ध्यान रहे की इस चुनाव में भी मोदी को मुसलमानों का २% वोट भी हासिल नहीं हुआ है. हाँ हिन्दू जाती जरुर इकठ्ठी हो गयी.

२. चुनाव बाद : 
अब जबकि नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन गए है, जनता जरा भी मौका दिए बिना इनको प्रधान मंत्री न मान, अलादीन का चिराग मान रही है, जो चिराग में से बहार निकले, और जो हुक्म मेरे आका कह के कोंग्रेस के ६० सालो की इकठ्ठी की गयी, तुष्टिकरण विष्ठा, घोटाले की गन्दगी, अराजकता का माहौल ठीक कर दे. जो की बिलकुल गलत है. 
लेकिन, कुछ चींजे है जो जो बिना चिराग का जिन्न बने भी जनता में विश्वाश बनाया रखा जा सकता है. लेकिन मोदी सरकार के वो भी नहीं कर पाने में देख जनता सकते है, कम से कम वो वोटर जनता जो उन्हें चिराग का जिन्न नहीं मानता. 

जो चुनाव पूर्व ये कहता था की वो किसी भी प्रकार से तुष्टिकरण नहीं करेगा भले ही वो चुनाव हार जाए, उसका मंदिर से घन्टे उतारे जाने पर चुप रहना, इस वर्ग के वोटर को व्यथित करता है.

लॉर्ड्स में मैच जितने के तुरंत बाद ट्वीट कर बधाइयां देना, और पूर्ण बहुमत के बावजूद अमरनाथ पर सन्न मार चुप्पी इस श्रेणी के वोटरों के समझ से परे है. 

इजरायल के खिलाफ वोटिंग, वो भी तब जब संसद में बहस कराने मुकर चुके हो, यानि रात के अँधेरे में सब कुछ जैसा की कोंग्रेस के चलन में होता रहा है. 

राजनीति ऐसी हो जो आम आदमी के समझ में आये। और बात सिर्फ वोटिंग की ही नहीं है, बल्कि रोजेदार के रोटी पे भोकाल और संसद में चर्चा और अमरनाथ यात्रियों पे हमले के विरोध में मुर्दा बने रहने जैसे कई मुद्दे है जिस पर सरकार की प्रतिक्रिया का इन्तजार आम सरोकारी इंसान को था और आगे रहेगा. 

कालेधन और और कश्मीर में ३७७ पर सरकार का स्टैंड अभी पता नहीं चल रहा तो कुछ कहना उनको जिन्न मानने के बराबर ही होगा लेकिन जिन चीजो को बैलेंस किया जा सकता है उन चीजों को तुष्टिकरण के के तराजू पे चढ़ता देख मोदी का लिबरल वर्ग दुखी है. 

पूर्वांचल में एक कहावत है, "ननदिया के बोला ता पतोहिया के कान होला", कोंग्रेस के बुरी तरह से ख़ारिज हो जाने के बाद भाजपा को इसका संज्ञान लेना चाहिए क्यों की जल्द ही बैलेंस करने योग्य चीजो को बैलेंस नहीं किया गया तो नतीजा आने वाले विधानसभा चुनावों में जरुर दिखने लगेगा.

सादर 

कमल कुमार सिंह 

Wednesday, June 25, 2014

वर्कशॉप


स्वर्ग का अमरावती, कर्नाटक का हम्प्पी, और और ज्ञान का केंद्र ब एच यू को मिला के जो स्पेसिमेन कोपी बनेगा वो है गंगा के किनारे स्थित स्थित सामने घाट पर “ज्ञान प्रवाह”. 
भारत के इतिहास, कला का का औटोनमस् रिसर्च सेंटर. बेहद खूबसूरत. ओह्ह्ह, इतना खूबसूरत मुझे बी एच यु भी कभी नहीं लगा. 

नाथद्वारा पेंटिंग मे उदयपुर के प्रसिध्द चित्रकार राजाराम जी का वर्कशॉप था, और मै उत्सुक था. खड़ा था ब एच यू के गेट पर सुबह ९ बजे से, उन दिनों मैंने हॉस्टल मे ही रुकना सीख लिया था, हलाकि मै डे स्कालर था. गाडी ठीक समय पर आई सारे अनजान लड़के लड़किया बैठ गए. सभी के नजर चोर थे. एक बात खास थी की वो सारे ललित कला संकाय से थे और मै पर्यटन प्रबंधन का एकलौता छात्र. 

इस वर्क शॉप को करने के लिए मैंने बी एफ ए के प्रोफ़ेसर की स्पेशल सिफारिश की थी, नाम याद नहीं आ रहा उनका. वो भी पता नहीं क्या समझके मेरा नाम दे दिया “हम्म्म्म, पता नहीं क्यों मुझे लगता है की तुम्हे इस वर्क शॉप मे जाना दिया जाना चाहिए” कह कर मेरे फार्म पर साइन कर दिया.
तरह तरह के चित्रकार थे वहाँ जो नाथ्दारा स्टाईल सीखना चाहते थे, मै उनमे अपने आप को कही नहीं पा रहा था. वहाँ सभी एक दूसरे को जानते थे, सिर्फ मै था जिसे बस उसके ब्रश जानते थे.

“आप बी एफ ए के तो नहीं हो” एक लड़की ने मुझसे सवाल किया. 

मैंने सर हिला दिया, गजब का शर्मीला था मै उन दिनों, काँटा (असलि नाम- कांता) मुझे आज देख ले तो शायद वो विश्वाश न करे की ये मै ही हू. हालाकि आज भी मै खूब बोलता हू तो बस खास लोगो के साथ. 

“वोकल कार्ड खराब है क्या” – उसने कमेन्ट किया. 

मै फिर मुस्करा दिया बिना जवाब दिय्ये, जिससे शायद वो जल भून गयी होगी. 

कई दिन तक मै यू ही चुप रहा- स्वभावत: , बस गुरु राजा राम की अगुआई मे सीखता रहा. 
हाँ कभी कभी डाईरेक्टर प्रोफेसर आर सी शर्मा हमलोगों का हाल चाल ले जाते ( वो एक मूर्धन्य ग्यानी माने जाते है आज भी कला और इतिहास के, भारत कला भवन के डाईरेक्टर भी रहे वो- आज हमारे बीच नहीं है).

“यार तुम्हारा चेहरा जाना पहचाना सा लगता है”, अचानक एक दिन मैंने एक लड़के से मैंने पूछा, और शायद उस दिन पहली बार मेरी आवाज किसी ने उस वर्क शॉप मे किसी ने सुनी थी.

“पिछले जन्म मे तुम्हारा जीजा था” कह के वो हसने लगा, और मै कुढ़ गया. बेटा अब तो तू गया , पिटेगा तू ( मै शरीफ और शर्मीला था – कमजोर नहीं, और मै बनारस का ही हू तो जादा समस्या नहीं थी मुझे ये सब सांस्कृतिक कार्यकर्म का आयोजन करवाने मे) . 

ज्ञान प्रवाह की गाडी बी एच यू गेट पर छोड़ गयी. और मेरे दोस्त आ चुके थे, उनमे कुछ इंजीनयर थे, कुछ डाक्टर (सब आधा – यानी छात्र), कुछ उबन्तु शुध्ध बिरलाइट्स उस तथाकतित जीजा को पकड लिया, तो वो घबरा गया, उसे सपने मे भी गुमान नहीं था, की मेरे जैसा लौंडा की कोई बात भी सुनेगा. 

“महाराज जरा मटन बनाना” एक मटन को धोने के बाद दूसरा खायेंगे. बिरला होस्टल के मेस मे उसको पटक के किसी ने खानसामा से आवाज लगाई थी. उसका चेहरा फक पड़ चूका था, उसे नहीं समझ आ रहा था की उसे क्या क्या करना चाहिए या कहना चाहिए, क्योकि गलत तो वो कह चूका था. 
“भोसड़ी के तुम्हारा नाम क्या है ? “ एक एम् बी बी एस ३र्द इयर के लौंडे ने पूछा, जाहिर सी बात है की मेरे टोली का था.

“रामधनी” उसने रोवासा चेहरा बना के कहा. अब सच मे मुझे भी उस पर दया आने लगी थी. कलाकार का दिल कोमल होता है. . 

“कहा के रहने वाले हो ?” फिलोसफी के लड़के ने कुहनी मारी. 

“खमरिया – भदोही” – अब तक वो रो चूका था बस आँख मे आसूं नहीं थे. 
इतना सुनते ही मेरा पारा ठंडा हो गया.

वो इसलिए की वहाँ के ही कोलेज से मैंने दसवी की थी. रामधनी मेरे कान मे ये नाम दुबारा कौंधा, इस लडके के बारे मे ये कहा जाता था, की उस उम्र मे (जब वो ८ वि मे था) किसी का भी चेहरा देख कर दिन भर का कोमिक्स बना डालता था, ये नाम मैंने सुना था. 

अबे क्या हुआ ? – मेरे एक दोस्त ने मुझे सर पे हाथ रखे देख पूछा,

छोड़ यार इसको तुमलोग, मै बात करता हू. मैंने कहा. पता नहीं क्यों मुझे लगा की ये वही है जिसके बारे मे मै उस समय सुन चूका हू. 

अभी तक श्योर नहीं था मै, - कहा से पढे हो ? 

शहीद नरेश विद्या मंदिर . उसने जवाब दिया. 
हाँ ये पक्का वही है, बी एफ ए मे भी है, खमरिया का है, शाहिद नरेश से भी पढ़ा है. ये वही है. 

राहुल को जानते हो ? अमरनाथ को , मैंने एक साथ पूछा .

हाँ – उसने कहा . 

हाँ ये वही था . 

यार तुम चित्रकार आदमी ऐसी बदतमीजी करते है ? मैंने कहा . तब तक हमारा मटन आ चूका था, 

अरे यार इसका भी प्लेट लगवावो , हमारा गुरु भाई है . मेरे सारे दोस्त मेरा चेहरा देखने लगे थे. 

दूसरे दिन से हम ज्ञान प्रवाह साथ जाने लगे थे. अब हम अच्छे दोस्त थे. काई सालो तक दोस्ती रही. 

मै देल्ही आ गया, बनारस जाता रहा जब तक ओ डिपार्टमेंट मे रहा, मै जब भी बनारस जाता फैकल्टी आफ विजुअल आर्ट मेरा अड्डा रहा, हलाकि अपने डिपार्टमेंट कभी नहीं गया. जब भी जाता उसके साथ एक पेंटिंग जरूर बनाता . उसके बाद वो पुणे चला गया. 

अंतिम, समय मेरी उससे बात सन २०११ मे हुई, हाय हेल्लो हुआ , फिर उसने एक लड़की से भी बात कराई संभवतः वो उसकी गर्लफ्रेंड होगी. 

फिर मै अपने कामो मे व्यस्त हो गया. एक बार उसके नम्बर पर फोन किया तो “सेवा मे नहीं है “ की आवाज आई. मुझे लगा वो खुद मुझसे संपर्क करेगा. लेकिन उसने नहीं किया. 

कुछ दिनों बाद फेसबुक पे मुझे श्याम मिला, अब वो एन आई डी- अहमदाबाद मे था, “यार रामधनी का नंबर नहीं मिल रहा” मैंने उसे मसेज किया. 

“HE IS NO MORE” FLU ATTACKED HIM “ – उसने जवाब दिया और मेरी साँस अटक गयी. हाथ से ग्लास छूट गया. जितना पिया था अब वो आँख से बाहर आ रहा था,. ओह्ह . 

आज बरबस सब कुछ याद आ गया, जब मकान शिफ्ट करने के चक्कर मे उस वर्कशॉप का सर्टिफिकेट हाथ आया. 

और दोस्त तुम याद आ गए, ये फोटो मुझे कभी नहीं भूलती, तुमने जबरजस्ती करके मेरी ये एक्शिबिशन लगवायी थी. 

कमल

Sunday, June 22, 2014

ईराकी -इस्लामी आतंकवाद और भारत पे प्रभाव


ईराक में जो खुनी खेल चल रहा है उसका तो अल्लाह ही मालिक है, वो मालिक इसलिए की सारा खेल ही उसी के नाम पर हो रहा है, इस्लाम.जिसकी वजह से लिबरल मुस्लिम पूरी दुनिया में शर्मशार होते है, और दुसरे सम्प्रदाय के कट्टरपंथियों का निशाना.
  
पहले ये जान ले की ईराक में क्या हो रहा है और क्यों हो रहा हैतो सीधा सीधा वो कह रहे है की "इस्लामिक राज्य" पत्रकार या मिडिया इसके पीछे अमेरिका का हाथ बताते नहीं थकते, अगला जोर जोर पुरे गले फाड़ कर कह रहा की वो ये सब इस्लाम के लिए कर रहा लेकिन कमाल है किस वहाशियाने ढंग से "अमेरका छाप" दलील द्वारा डिफेंड किया जा रहा है की दिमाग फेल हो जाए. लेकिन ध्यान दें अमेरका क्या सरोकारसद्दाम को ख़त्म कर उसने अपनी ताकत दिखा दी थीईराक में वर्तमान सरकार रहे या इन सुन्नियो की फिर भी अमेरिका को तेल की की कोई चिंता नहीं उसके लिए तो सब बराबर है यदि हम इस "अमेरिका छाप" दलील माने तो. इसलिए उसने दखल देने से फिलहाल हाथ खड़ा कर लिया है, उसे अच्छी तरह मालुम है की दो बंदरो के बीच के लड़ाई में उसे नहीं पड़ना है बल्कि फायदा उठाना है. कुछ मुस्लिम ये भी दम भरते है की बराक हुसैन मुस्लिमान है, फिर जब भी कहीं विश्व में कुछ भी मुस्लिम में खिलाफ हो तब भी बड़ी चालाकी से अमेरिका के मथ्थे चढ़ा दिया जाता है. मुस्लिमान अपने फेवर में ओबामा का चरित्र (मुस्लिम होंना) जैसे चाहे बताते है, मुस्लिम ताकत दिखानी हो तो वो भी मुसलमान है, और जब बिना कारन इस्लाम के नाम पर लड़ाई हो तो तो वो इस्लाम का दुश्मन है.

चलो मान लेता हु इसके पीछे अमेरिका का हाथ है, तो फिर बर्मा में क्या हो रहा है? श्रीलंका? वहां अमेरिका का क्या हित हो सकता है? ये तो छोडिये जनाब पकिस्तान और अफगानिस्तान पर नज़ारे इन्यायत कीजिये. हिन्दुस्तान में मोदी और विश्व में अमेरिका को मीडिया/पत्रकार? ने कुछ इस तरह का गढ़ा है मानो मोम के हो, जहाँ चाहे थोडा सा गरम कर फिट कर दो.शुक्र मनाईये दोनों ही अपनी अपनी जगह मजबूत है नहीं तो पता नहीं दोनों का इस्लामिस्ट क्या कर बैठते.

भारत में भी मुलमानो का पर्सनल ला अलग है? तो जरा ये बताएं की ये इस्लाम के नाम पर है की इसके पीछे भी अमेरिका का हाथ हैजब इसके पीछे अमेरिका नहीं तो कहीं भी कुछ भी हो मुह उठा के अमेरिका वाले दिशा में थूक देने से सच्चाई तो नहीं बदलेगी न? कुछ अधिकार चाहिए किसी भे देश के कानून से अलग तो इस्लाम की वजह से, और इस्लामी कहीं कुछ उत्पात करे तो अमेरिका की गोद है न, फेंक दो गलती? गजब का तर्क है यार.

चलो मान लिया की इसके पीछे अमेरिका है, तो उसका सिक्का बस इस्लामी देशो में ही क्यों चलता है ? सोवयत के पास भी अब तेल के बड़े भण्डार है, साथ कुछ अन्य यूरोपियन देशो के पास भी उनके तेलों में क्या कीड़े पड़े हैनहीं, अमेरिका को अच्छी तरह मालुम है की कौन से धर्म के नाम पर किसको आसानी से भडकाया जा सकता है.

चलो जी अब कुछ कह रहे है ये सत्ता की लड़ाई है. जी हाँ, इस्लाम का उद्देश्य ही क्या है फिर?मोहम्मद साहब के बाद इस्लाम का दुरुपुयोग बस सत्ता के लिए ही किया गयायहाँ तक की इस्लाम के नाम पर उनके पुरे परिवार की हत्या कर दी गयी ताकि सत्ता हथियाया जा सके. हर जगह हर तरफ, पुरे विश्व में.

बेवजह अमेरिका, सऊदी अरब या ईराक के सुन्नियों को दोष क्यूँ दें, सीरिया में तो 2 लाख से ज्यादा मुसलमान मरा है , वहां इस नरसंहार का दोष शियाओं पर था. जहाँ जिसका दाव लगा उसने सामने वाले को  मार दिया पर एक बात पक्की है , जिसने भी मारा मारा इस्लाम के नाम पर, जेहाद के नाम पर,  न सुन्नी, न शिया और न वहाबी, इन सभी हत्याओं का दोष जिहाद पर है, इस्लाम पर है.

क्या इन सब का भारत पर प्रभाव पढ़ेगा? क्या यहाँ भी कुछ सुगबुगाहट होगीजबकि आई एस ई एस के लोगो ने विडिओ बना भारत के मुसलमानों का भी आव्हाहन किया है. क्या यहाँ कोई/ कोई संघटन उनके साथ हो के भारत के खिलाफ जेहाद छेड़ने की तयारी कर सकता हैध्यान रहे हमारे यहाँ सिमी जैसे प्रतिबंधित संघठन भी है, और एक पुराना  तथा वर्तमान इतिहास भी.

क्यों की इस्लाम को मानने वाले पुरे विश्व में है जैसा की हर मुस्लिम ८६ इंच का सीना तान के कहता है लेकिन पुरे विश्व को देखिये क्या हो रहा है वहां. मुझे बड़ा अजीब लगता है जब भारत में भी मुस्लिम कहते हैं "हम पुरे विश्व में है"  तो जब भी कहीं पुरे विश्व में इराकी घटना हो तो आपसे क्यों न जोड़ा जाए ? फिर ये कहाँ कहाँ तक जायज है की ये हिन्दुस्तान है यहाँ ऐसा कुछ नहीं हो सकता ? जबकि हुआ है, कश्मीर में कश्मीरी सेना बस इसीलिए पाकिस्तानियों से मिल गयी थी की वो मुसलमान थे, और ठीक यही ईराक मे हो रहा है, सुन्नी समुदाय इन इस्लामी आतंकियों के साथ इसलिए हो गया है की ये इस्लामी आतंकवादी सुन्नी है. चलिए जी माना सत्ता की लड़ाई है, तो ये जो आम इराकी सुन्नी इन इस्लामी आतंकियों के साथ मिल रहे उन्हें तो सत्ता का भागीदार बनाने से रहे ये इस्लामी आक्रमणकारी ? तो फिर ?? तो जाहिर ये बस इस एहसास के उनके साथ है की वो इनके जमात के हैं. नहीं तो १० -२० हजार के इस्लामी दहशत गर्द किसी भी देश को बंदी बना लें ये असम्भव है, जब तक वहां की अवाम साथ न हो. 

जब भी कहा जाता है भारत में इस्लाम तलवार के बल पर फैला तो मुस्लिम तिलमिला जाते है अरे मानिए न की सत्ता की लड़ाई थी मुस्लिमो दवारा न की इस्लाम के लिए, तो साहब खरबूजा चाक़ू पे गिरे या चाक़ू खरबूजे पर कटता खरबूजा ही है. इस्लाम को कुछ इसी तरह का हथियार बना गया.  

विश्व में कहीं कुछ भी हो  तो भारतीय मुसलमान ये आशा करते है की उन्हें उसमे न घसीटा जाय, और ये उनकी आशा वाजिब  भी जिसका हमें सम्मान करना चाहिए, लेकिन तभी याद आता है, इस्लाम ब्रदरहुड के नाम पर मुंबई में तोड़ फॉर जो की कही दूर बर्मा में हुआ था, कही श्रीलंका में हुआ था, अब ईराक के लिए भी पर्चे साइन कराये जा रहे है तो भाई अब सोचो की आपकी आशा जायज है या ना जायज. मुझे नहीं याद है की पाकिस्तान में हुए हिन्दू उत्पीडन के मामले में किसी भारतीय मुलिम को कोप झेलना पडा हो, किसी बंगलादेशी मुस्लिम की सजा यहाँ हिन्दुस्तान में मिली हो, अफगानिस्तान में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ने पर किसी बुद्धिस्ट का कोप भाजन किसी देश में कोई मुस्लिम हुआ होजबकि बाबरी गिरने के ठीक बाद हर इस्लामी मुल्को पर हिंदुवो के उपर भयंकर गाज गिरी, खून के आंसू रुलाया गया, उनको पाकिस्तानी, बांग्लादेशी नहीं बल्कि हिन्दू माना गया. भारत के मुसलमान भी अमेरिका को गरियाते है लेकिन याद है की इन्ही लोगो ने अमेरिका को मोदी के लिए वीसा ना देने का पत्र लिखा था, और यदि आज भी बस चले तो मोदी को कुचलने के लिए किसी दुसरे देश की सेना माँगा ले. 


इस इराकी इस्लामी आतंकवाद में भी भारत के मुसलमान पर्चे साइन करा रहे है"शहादत" के लिए, जिनका उस अरब कंट्री से कुछ लेना देना भी नहीं है, तो जरा सोचिये, किसी खुरापाती तत्व की वजह से इश्वर न करे उंच नीच हो गयी या मुस्लिम और गैरमुस्लिम में जरा सा भी तनाव हुआ तो क्या यही पत्र इस्लामी देशी में नहीं जाएगा की भारत आओ हमारी मदद करो, गैर मुस्लिमो को ख़त्म करो. और वो तो तैयार बैठे हैं, विडियो भी बनवा के भिजवा दी की करो भाईयो हम बैक अप देते है. सरकार को तत्काल ऐसे लोगो पर लगाम लगनी चाहिए जो इंसानियत नहीं बल्कि मुसलमानियत के नाम पे ऐसी हरकत कर रहे है, यदि ये इंसानियत के नाम पे पहल करते तो सबसे आव्हाह्वाहन करते, मुस्लिम गैर मुस्लिम सभी से और सबको मिलकर सरकार पर दबाव बनाते की ईराक में कुछ करो इंसानियत के लिए, ये पर्चे साइन करा शहादत के लिए आह्वाहन करना "डाइरेक्ट एक्शन" जैसा कुछ नहीं लगता ? किसी देश में कुछ भी हो तो वो वैश्विक स्तर और राजनैतिक स्तर पर बात चित होती नहीं की इस्लामी विचार धारा के अनुरूप. 


होना तो ये चाहिए की इस्लाम के नाम पर होना विश्व में कहीं भी कुछ गलत हो आप मुस्लिम आगे आयें और सबका साथ मांगे, सोचिये हम भारतीयों का सर गर्व से कितना ऊँचा उठेगा, हम सीना ठोक के दुसरे मुल्को के ऊपर लानत भेज सकते है की हमारे मुल्क का मुस्लिम पहले इंसान है उसे विधर्मियो से भी परहेज नहीं मानवता के लिए काम करने को, लेकिन नहीं, आप तभी एक्टिव होते है जब विश्व में कही मुस्लिमो पे गाज गिरी हो और एक्टिव भी बस मुस्लिम ही होते है, क्या मुस्ल्मानियत इंसानियत से ऊपर है ? क्या इस्लाम ये सिखाता है की जब मुलमान परेशान है तभी आप परेशान हो, क्या इस्लाम ये सिखाता है की कोई गैर मुस्लिम चाहे कितना भी जहीन हो और वो परेशान हो तो आप इन्तजार करो की कब मुस्लिम परेशान होता है ?  क्या आप लोग लगता है की गैरमुस्लिम आपका साथ नहीं देगा तो, लानत है आपके सोच पर. भारत की बहुसंख्यक जनता इस इन्तजार में बैठी है की वो कब अपने को भारतीय माने और हमारे गले लगे बजाय की काफिर कहने के. हम ये मानते है की मस्जिद का गिरना गलत था, मस्जिद हो या मंदिर हो, चर्च हो गुरुद्वारा जो भी चींजे भारत में है वो हर भारतीय की विरासत हैउसे सम्हालने की जिम्मेदारी सभी भारतियों की है, न  की किसी हिन्दू, मुस्लिम सिख्ह इसाई की. 

विश्वाश कीजिये मेरा इरादा किसी का दिल दुखाना नहीं है, लेकिन मेरे मुआज्जिज दोस्त इस पर कुछ बोल नहीं रहे तो लिखना पढ़ रहा है, इसकी वजह से किसी का दिल दुखे तो मै माफ़ी मांगता हु, क्यों की कोई मेरे  लिए हिन्दू - मुस्लिम इसाई सिख्ख बाद में है पहले वो मेरे लिए इंसान है.

सादर 
कमल कुमार सिंह 

Saturday, June 14, 2014

केजरीवाल जी, नॉट योर व्यू लगाविंग -नो उल्लू बनाविंग

नोट : आपियो ने मिलके इसको स्पाम कर दिया है शायद, आप नॉट स्पाम पे क्लिक करके आगे बढ़े. 


कालीबाड़ी में हुए मोहल्ला सभा में केजरीवाल ने स्वीकार किया की उन्हें लगा की वो सरकार पूर्ण बहुत से बना लेंगे इसलिए इस्तीफा दिया. केजरीवाल राजनीति को अपने "लगने"और "न लगने" के चश्मे से ही तय करते है. 
उन्हें "लगता है" की गडकरी भ्रष्ट है, उन्हें  "लगता है की" संविधान भ्रष्ट है, उन्हें लगता है की जमानत मागने वाला "जज" गलत है. 

चुनाव से पहले उन्हें  बटाला काउंटर  पुलिस वाले पहले गलत लगते थे, चुनाव के बाद उसी पे कोर्ट का निर्णय सही लगता है.  

पहले उनको कुर्सी छोड़ के भागना राम के त्याग के बराबर लगता था, और अब उस त्याग पे माफ़ी मांगते है यानी उनकी नजर में राम गलत बना दिया.  

देल्ही विधानसभा चुनाव से पहले कोंग्रेस  भ्रष्ट लगती थी, चुनाव के बाद उसी के साथ सरकार बना ली.

पहले उन्हें लगता था की उन्हें राजनीति में नहीं आना चाहिए, फिर उन्हें लगा की आना चाहिए.

पहले किरण बेदी उन्हें ठीक लगती थी, बाद में भाजपा की एजेंट हो गयी,पहले विक्रम सिंह उन्हें ठीक लगते थे, बाद में वो भी भाजपा के एजेंट हो गए,पहले राम देव उन्हें महान लगते थे सो उन्ही के गोद से आन्दोलन शुरू किया, बाद में उन्हें लगने लगा की  रामदेव उनके राजीनीतिमें आने वाले प्लान के रास्ते के रोड़े है, सो बाद में वो भ्रष्ट हो गए. 

उन्हें लगता है की अदानी मोदी को जहाज देते है, जरुर गड़बड़, लेकिन उन्हें ये भी लगता है की आजतक वाले उन्हें चार्टर्ड में लाते है तो ठीक है. 

उन्हें लगता है की ५०० रूपये जेब कहने से बनारस की जनता मुर्ख बन जाएगी, जबकि वापसी चार्टड में हुयी तो लगता था ये बात जनता को पता नहीं चलेगी. 

लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल को  लगता था की बनारस में "सत्यमेव जयते" होगा और बनारस की जनता बुध्धिमान है, अब उन्हें लगता है की बनारस की जनता बेवकूफ है.  

पहले उन्हें लगता था की सरकार छोड़ कर जनता की सहानुभूति मिलेगी तो सरकार छोड़ने का स्टंट किया, अब उन्हें वो गलती लगती है. 

उन्हें लगा की उनकी धरना देने वाले या वैसे ही कुछ  विकट हरकत से वो मिडिया में छाये रह सकते है, और छाये भी, लेकिन अब जब मीडिया उन्हें नहीं पूछता तो उन्हें भ्रष्ट लगता है. 

पहले इनको कोंग्रेस भ्रष्ट लगती थी, बाद में इन्हें बेदाग़ मोदी भ्रष्ट लगने लगे, पहले इनको भ्रस्टाचार एक सही मुद्दा लगता था, बाद में साम्प्रदायिकता लगने लगी.  


फिर इनको लगाने लगने लगा की पुरे देश में सभी पार्टियों का जमानत जब्त करवा देंगे, लेकिन जनता फिर लगा के जूता मारा मुह पर और ४०० से जादा सीटों पर जमानत जब्त करवा दी. 

इनको लगता है की नेतावो को इनका जवाब देना चाहिए, और इनको ये भी लगता है की इनको किसी का जवाब नहीं देना चाहिए, इनको लगता है की इनसे सवाल पूछने वाला या तो भ्रष्ट है या भाजपा - कोंग्रेस का एजेंट. 

इनको लगता है सब पर इल्जाम लगाना चाहिए, लेकिन इनको ये भी लगता है की इनकी आलोचना न हो. 

केजरीवाल जी इस लगने लगाने वाले चक्कर से बाज आईये, आपके इसी लगने लगाने वाले व्यवहार से जनता ने आपको दख्खिन लगा दिया, अब कितनी बार लगवावोगे ? 

आपका और आपियो का वही हाल है "अबकी मारो  तो जाने " "अबकी देख लेना" ये "आपीए"  (चुतिया x 1000= 1 आपिया)  पहले डेल्ही के विधान सभा में सबकी जमानत जब्त करवाते थे, दुसरे नंबर पर आये तो मुह काला कोंग्रेस के साथ किया जिसको ये एड्स से पीड़ित मानते थे. अब वही कोंग्रेसी बिमारी इन आपियो को लग गयी है. जानलेवा है धीरे धीरे आपियो और आपा को खत्म कर देगी. लेकिन फिर भी रोगी जब तक मर न जाए लड़ता है, जूझता है ऐसी ही हालत इन आपियो की है. 

सब मिला के उन्हें अब भी लगता है की वो जनता को उल्लू बना सकते है, वो बात अलग है की जनता ने उन्हें उल्लू मान के बैठी है, जो रात के समय अपने हिसाब से "लगने" के  वातावरण में निकलता है. 

जनता समझ चुकी है आपीए गुलेल से जहाज मार गिराने की बात करते है - तो प्लीज नो मोर उल्लू बनाविंग. 

सादर 
कमल कुमार सिंह.  

Wednesday, February 19, 2014

नेता या नंगा


हमारे समाज ने हमें एक हमाम दिया है जिसमे सब नंगे होते है, ज्ञान चतुर्वेदी जी के भाषा में कहें तो नंगा होना बहुत जरुरी है इसीलिए हमाम का निर्माण हुआ. 

लेकिन नेता अपवाद है, वो कहीं भी नंगे या नंगेपन पे उतारू हो सकते हैं, समय पर नंगे होते है, नंगापन दो प्रकार का होता है श-शरीर और दूसरा आध्यात्मिक, मसलन जिसतरह से "उत्तर" प्रदेश के नेता अपने कपडे को बेटी की तरह बोझ मान कर अपने शरीर से अलविदा कर देते हैं वो श -शरीर नंगई है. और दूसरा मीडिया का मोफ्ल्रावातार के  जूठ को  प्याज के छिलके की तरह उतारना, वो अध्यात्मिक कटेगरी का नंगई है, हालाकि की ये आध्यात्मिक सुख स्यवं मोफ्ल्रावातार नहीं लेना चाहते फिर भी पब्लिक और मिडिया उन्हें ये सुख देने पे उतारू है. हाँ हलाकि कुछ दिन पहले जिस प्रकार के धरना प्रदर्शन सहित छोटे बच्चों सी नगई करी वो उनकी इक्छा के मनमाफिक था. 

 ये नंगा क्यों है ये तो नेता ही जाने या नंगे जाने या नंगे नेता जाने, नेता नंगे जाने हलाकि नेता और नंगा में आप चाहे तो कोई फर्क न करे, हमें कोई आपत्ति नहीं होगी.  

एक अच्छा खासा इंसान पहले तो न जाने क्यों नेता बनता है अथवा नंगा बनाने की और अग्रसर होता है, क्या मिलता है नंगा बनने में ?? माल पूवा??  नहीं, वो सेवा करना चाहता है,सर्वोत्तम सेवा,  भयंकर सेवा, विकट सेवा, वो सेवा करने की पिछले सभी वर्जनाओं को तोड़ना चाहता है. वो देश को एक नया नेतृत्व देना चाहता है. 

दुनिया भर के तिकड़मों को क्या वो खुद के लिए करता है ? किसे अच्छा लगता है किसी के तलवे चाटना ? किसी की दलाली करनी? अपने सीनियर सेवामय नेता के जूते उठाना, जूठे चबाना ? आपको क्या लगता है वो अपने लिए करता है ? यदि आप ऐसा सोचते है तो आपसे जादा कृतघ्न पुरे इस धरा पर नहीं. वो करता है तो बस आपके लिए, वो पूरा जीवन ही बस जनता की सेवा के लिए बना होता है, उसको ब्रम्हा जी ब्लैक में स्पेशल कोटे से सेवा करने का लाईसेंस के साथ हाथ में सेवा का घनघोर रेखा खिंच कर पृथ्वी पे भेजते है.

अब इतनी मशक्कत के साथ  पृथ्वी पे आने के बाद इस निरीह प्राणी के पास कोई रास्ता नहीं बचता सिवाय की वो जनता की सेवा करे. आपने काभी इस बात पे ध्यान  दिया की जब वह नेहरूटोपी लगा (जिस  टोपी को वो गांधी का  हर्फ़ दे के  पहनते है उन्हें ये वही जानकार नेता है जिन्हें नहीं  की गांधी ने आज तक कभी टोपी पहनी ही नहीं सिवाय एक बार के जब वो साउथ अफ्रीका में कुछ दिनों के कैदी थे) हाथ जोड़ आपके समक्ष कहता है की वो राजनीति करने नहीं बल्कि बदलने आया है, वो आप जैसा ही है, तो आप बस समझ लेते की यही है हमारे तारण हार, और समझना बुरा भी नहीं है, अब आप जैसे लोग नहीं समझेंगे तो उसके सेवा करने का कोटा अधुरा रह जायेगा. 

वह जनता की सेवा करने का कोई भी अवसर नहीं चूकना चाहता, चाहे जो करना पड़े, क्या आपके लिए अपने सगे ने  कभी किसी की हत्या की है ? बाल्तकार किया है ? लूट की है ? उत्पात मचाया है ?? नहीं न, आपके अपने और आप खुद  जिसे जघन्य मानते वह ये नेता, बस आपके लिए कुछ भी करने पे उतारू रहता है, वह आपकी सेवा में किसी भी हद तक जा सकता है.  लात मार सकता, लात खा सकता है,  पारस्परिक रूप से गालीयों का आदान प्रदान भी कर सकता है या करता है, सामने वाले सेवक को निपटा खुद पूरा भार वो अपने सर मढना चाहता है तो किसके लिए ?? बस जनता के लिए. 

ये सेवा भाव का ही असर है की संसद से प्रसारण बंद कर दिया जाता है, क्योकि वह सेवा भी करना चाहता और एहसान भी नहीं जताना चाहता, इससे जादा सच्चरित तो स्वयं सोलह कला संपन्न कृष्ण भी नहीं हो सकते. 

उत्तर प्रदेश के नेता इस मामले में आगे है, कोई "लैला लैला चिल्लाता था कपडे फाड़ के"  इसी परम्परा में उन्होंने सेवा सेवा चिल्लाया कपडे फाड़ के तो कौन सी आफत आ गयी ?? 

जनता का क्या वो तो कुछ भी बोलती है, वो एहसानफरोश होती है, कोई कितनी भी सेवा कर ले लेकिन उसे नेता सुहाता ही नहीं, वो बात अलग है की वो नेतावों से सेवा लेने पे मजबूर है, विकट सेवा, भयंकर सेवा, अथाह सेवा, अनंत सेवा, नंगी सेवा. 

सादर 
कमल कुमार सिंह 
१९ फरवरी २०१४ 

Sunday, February 16, 2014

असली नकली

"असली नकली" ये किसी बोलीवूड निर्देशक द्वारा निर्देशित कोई फिल्म नहीं है, बल्कि आजकल जनता, नेता, आमिर, गरीब, सजीव निर्जीव सब निर्देशक बन एक दुसरे को असली नकली का प्रमाण पत्र देने पे उतारू है, बस कंडीशन ये है की कंडीशन क्या क्या हो?  

आपके  पाले में  है तो असली है, दुसरे के पाले में है तो नकली है, या कुछ  यों कह ले की रूपये आपके जेब में है तो असली यदि दुसरे  के जेब में तो नकली, हम रईस तो व्हाईट मनी, वो रईस तो पक्का आपके  मन से भी काला  ब्लैक मनी,  असलियत चाहे जो कुछ भी हो उसमे आपना कीमती दिमाग जाया करने की जहमत कोई करना चाहता. दिमाग भी भला चलने की चीज है? अरे चलाना है व्यंग बाण चलिए, गाली चलाईये, धरना चलाईये, धरना के दौरान पुलिस पे पत्थर  चलाईये, और जब  पुलिस प्रतिक्रिया स्वरुप आप पे लाठी चलाये  तो आप पुनः अपने मूल रूप पे आके  पुरे जोश ए खरोश से, मुह से, दिल से, यहाँ से वहां से, जहाँ जहाँ से मन करे वहां वहां वहां से गाली चलाईये.  

आपका समर्थक है  तो असली देश भक्त, उनका है तो नकली वाला देश भक्त, नकली देशभक्त ?? नकली आदमी ? ये क्या होता है,  ये क्या कागज का होता है ? प्लास्टिक का होता है ? जुट का होता है ?  पटसन का होता है ? आदमी ही होता है ?? खैर भगवान् वो आपके हिसाब से जाने क्या होता है लेकिन इतना  तय है की वो आपके साथ नहीं तो आम आदमी नहीं, और आप आपके साथ है, आप आप है, गधे के भी बाप है लेकिन फिर भी असली है.

 गधे  के बाप यों की  आप नेता है, और नेता के लिए जनता बाई डिफाल्ट गधा ही होता है,  वास्तव में गधे जब प्रमोट हो जाए तो नेता होते है. आजकल कुछ गधे समूह बना कर नेता बन गए सो फाइनली वो प्रमोट हो के नेता है लेकिन वही ढाक के तीन पात गधो  के भले के नाम पर गधो को गधा बनाकर खुद गधे  से नेता बन बैठे, गधे बिचारे  फिर छले जा चुके है. ता अपने आप को सबका बाप समझते है की कोई गधा जब आपके पास आ जाता आप उसके सामने तत्काल दो मुठ्ठी अपना चारा छेंट देते है और यदि वो खा ले तो  टनाटन बुध्धिमान हो जाता है और तत्काल आपकी तरफ से बुध्धिमान का प्रमाण पत्र उसके गले में लटका दिया जाता है. वो गधा आपके सामान पवित्र और बुध्दिमान बन चूका है, वह कुछ भी ढेंचू ढेंचू करे पब्लिक को वाह वाह कहना ही  चाहिए अन्यथा पब्लिक अथवा गधा आटोमेटिक बाईडिफाल्ट  गधा है, भ्रष्टाचारी है, कमीना है,  कल को वही गधा आपके बड़े मुह या  आपके छोटे दिमाग के स्थान (सर )  पर दुल्लती मार दे तो आप तत्काल उसे अपनी रूहानी शक्तियों उसे उसका असली रूप बता देते हैं, तब गधा गधा देंछु ढेंचू करने लगते है और वो भी आपको गधा गधा ढेंचू  करते हैं. खैर वो आपका आपस का भाई चारा है, होता रहता है . 

यही बात आजकल धर्म बनाम पार्टी पे लागू है, आजकल कुच्छ अतिवादी (आप इन्हें अन्मैचोर भी कह सकते है) लोग किसी को सच्चा या झूठा मुसलमान का सर्टिफिकेट बाँट रहे है, सिर्फ़ इस आधार पर की वो किसको सपोर्ट करता है? वो किस पार्टी का है ? (हर जगह इस तरह एक लोग है) नक़वी जी और शाहनवाज़ को कॉंग्रेस समर्थक मुसलमान नकली कहते है, जबकि भाजपा समर्थक कॉंग्रेस मुस्लिम नेताओ को च्छद्म सेकुलर (कुच्छ हद ये सही भी है ) लेकिन असली नकली का स्रटिफिकेट कैसे देते हैं वो... मुझे समझ नही आता ?? कोई आपके पाले मे है तो असली, उनके पाले मे है तो नकली ? भाई पाला / पार्टी नही आदमी देखो . 
मै असदूद्दीन ओवैसी (बड़े वाले का छोटे का नही ) का भी उतना ही फ़ैन हू जितना मोदी का. 

मै कोंग्रेस के मदीनी जी का भी फैन हूँ , किसी मै सिर्फ इसलिए देश द्रोही या नकली नहीं कह सकता क्योकि वो मोदी विरोधी है .. मोदी विरोधी होना देश विरोधी नहीं है भाई , हो सकता है एक समय मे वो मोदी के नजदीक भी आ जाये तब अब आप क्या उनका नकली वाला सर्टिफिकेट सरेंडर करवा दुबारा असली इस्सु करेंगे ?? अरे ये पोलिटिक्स है भाई, भाजपा निश्चित रूप से आज के समय मे धर्म निरपेक्ष है बाकी पार्टियों की अपेक्षा लेकिन दूसरी पार्टी के लोगो को इस तरह का प्रमाणपत्र दे के अपना कागज़ और दिमाग न खराब करे|

मै मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध करता हू, मुस्लिम का नहीं

और अंत मे सबसे बड़ी बात इन फर्जी सर्टिफिकेट बाटने वालो फर्जी लोगो को तत्काल "असली" १००% या २४ कैरेट संघी होने का सर्टिफिकेट तथाकथित "फर्जी बुद्धजीवियों" से भी मिल जाता है - फ्री मे. 

इस प्रकार के नेतावो/ लोगो से आग्रह है की "आप" कुछ "उस" प्रकार के सिनेमा को "यू" सर्टिफिकेट दे के देखे, काम करता है या नहीं ? 

इती श्री प्रणाम पत्रं अथ कथा:
सादर

कमल कुमार सिंह
१६ फरवरी २०१४ 

Saturday, September 28, 2013

देहाती औरत न्यूयार्क मे


मनमोहन जी न देश कि जनता का मन मोह पाए न ही अपने युवराज का. एक तरफ जहाँ वो यू एन ओ मे अपने रोबोटिक्समय अंदाज मे अटलजी का पुराना भाषण दोहरा कर कुछ नया करने कि जहमत उठाने कि कोशिश नहीं कि, वहीँ दूसरी तरफ भारत मे  राहुल जी उनके मसौदो को नोंसेंस कह के कह उनका सम्मान बढ़ाया. जी हाँ सम्मान ही है, क्योकि कोंग्रेस मे "राहुल सत्य और सब मिथ्या"  है.
  • राहुल जी अब "दोनों हो गए है" पक्ष - विपक्ष दोनों" अभी तक पब्लिक इनको बीच का समझती थी. राहुल जी मस्त मौला आदमी है, उनकी पार्टी है उनकी सरकार है और उनकी सरकार क्या करती उससे उन्हें सरोकार नहीं रहता, अब उन्हें अपने चुटकुलों से फुर्सत मिले तब न. उनकी हरकते देख लगता है वह एक  जल्द ही "फाडू गैंग बनायेंगे" जगह जगह जा के फाडते रहते हैं, लेकिन इस बार के बयां से उन्होंने कोंग्रेस कि ही फाड़ दी है लेकिन कोंग्रेसी खी खी खी कर के मस्त हैं, कोइ नहीं अपने मालिक है, फाड़े या चीथे उससे क्या, लेकिन बेशर्मी कि हद तब हो जाती है जब  इस "फाडू एक्शन" को लोकतंत्र का नाम दिया जाता है. 

    खैर कोंग्रेस मे कुछ भी हो सकता है. एक तरफ जहाँ राघव जी जैसे लोग बी जे पि से भगाए जाते हैं, वही  दूसरी तरफ अपने संवैधानिक पदका दुरूपयोग कर  ग्रांड मस्ती फिल्म बनाने वाले मनु सिंघवी को प्रवक्ता बना दिया जाता है. कोंग्रेस अनन्त, कोंग्रेस कथा अनन्ता. 

    युवराज के इन हरकतों से मनमोहन जी का छोटा सा कद और लिलिपुटमय हो गया है , यहाँ तक इंटरनेशनल मिडिया भी उन्हें झंडू समझ कर कुछ भी कह रही है. और ये गलत भी नहीं, क्योकि  जिस लुगाई का घर मे ही न इज्जत हो उसको बाहर वाले क्या समझेंगे आप लोग ही बता सकते है. 

    मनमोहन जी जब  यू एन ओ मे पूर्व प्रधान मंत्री अटल जी का पक्ष रखने के बाद पाकिस्तान के  प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ ने मनमोहन को "देहाती औरत" कहा. जो काना फूसी करने कि आदत रखती है. निश्चित ही नवाज को पता है कि मनमोहन कि इज्जत भारत कि जनता मे ही नहीं बल्कि उनके पार्टी मे भी दियो कौड़ी कि है जिसका एक्शन नॉन सेन्स कह के कूड़े मे डालने का सुझाव उन्ही के पार्टी के मालिक कहते हैं. ये देहाती औरत वाली बात  इंटर नॅशनल मीडिया मे उछला है ये इनदिन मिडिया नहीं दिखाने वाली, क्यों ? आप समझदार है समझ जाईये, हाँ सोशल मिडिया जरूर बता रही, शायद इसीलिए सरकार  शोशल मिडिया पे इतना भन्नाती रहती है. 


    मनमोहन कि  स्थिति उस लडकी कि तरह हो गयी है, जो अपने प्रेमी के साथ मा बाप के खिलाफ  घर से भाग चुकी है लेकिन प्रेमी भी दगाबाज निकला और  नॉनसेन्स कह उसे करनी को दुत्कार दिया. 

    अब देखना है इंटरनेशनल देहाती औरत भारत के एक पार्टी के "रखैल" बनते है या  या गरिमा बचाने के लिए अपने मर्द के मुह पे एक जोरदार तमाचा मार अपना गौरव वापिस लाते है. हालाकि  मुश्किल ही दीखता है. 

    सादर 

    कमल कुमार  सिंह 

Wednesday, September 18, 2013

नक्सलियों की तरह घात लगा के हमला किया

जगह : मुजफ्फर नगर का एक गाँव, 

आयोजन , एक महापंचायत , 

कारन ? : एक शोहदे ने एक लड़की को छेड़  दिया था,हालाकि  ये उसका रोज का काम था. लड़की ने ये घटना  अपने भाईयों को  बताया, भाईयो की उन शोहदों से कुछ कहा सुनी हुयी, मार पिट हुयी. नतीजन, उन शोहदों ने उन दोनों लड़को सचिन और गौरव की पिट पिट कर हत्या कर दी.  पीड़ित के माँ बाप पुलिस स्टेशन जाते हैं,  पुलिस कोई एक्शन नहीं लेती, वो सिर्फ इसलिए इस शोहदे मुसलमान थे. फिर एक पीड़ित की की तरफ से एक पंचायत करने का विचार हुआ, जिसको प्रशाशन ने रोक दिया. वही जुम्मे की नमाज के बाद मुसलमानों ने पंचायत का आयोजन किया ( ध्यान  रहे सारे दंगे जुम्मे की नमाज के बाद ही होते है, क्योकि वह एक उपयुक्त समय होता है एक साथ "अड्डे " पर जुटने का ), जिसमे सरकार के लोग भी शामिल थे . पीड़ित पक्ष को नाराजगी  हुयी, फिर उन्होंने भी पंचायत करने की ठानी, अब चुकी प्रशाशन ने "दंगाईयो की पंचायत होने दी थी ,सो वो इसको नहीं रोक पाए. 


 पंचायत से वापसी के समय , जुम्मे वाली पंचायत ने रंग दिखाया, निहत्थे पीड़ित पक्ष के पंचायती जब लौट रहे थे, तब उन पर अल्लाह के बन्दों ने मस्जिदी आदेश  की तामिलो के तौर पर, हमला बोल दिया, हमला ठीक वैसा ही जैसा  किसी ज़माने में कह्स्मिर में हुआ था, इस हमले में एके ४७ तक का इस्तमाल हुआ, हिंदुवो को काटकर नाहर में फेका जाने लगा, उस दिन उस नहर में पानी की जगह हिन्दुवों का खून बहा. शायद ये खून अल्लाह के काम आये या न आये लेकिन आजम खान इसी ताक में थे की अपने वोट की खेती इन्ही हिंदुवो के खून से सींचेंगे, मुसलमानों के गुस्से की खाद डालेंगे, फिर फल पकेंगे, और वही चक्र. 

लेकिन आजतक वालो ने गुड गोबर कर दिया. अब आजमखान साहब अपना सा मुह ले के कालिख से बचाने की कोशिस कर रह है. 

लेकिन इसमें गलती किसकी ? मुसलमानों की ? तो हाँ है, लेकिन इसमें आश्चर्य क्या ? ये उनका स्वभाव है.  इसलिए मई उनका कोई दोष नहीं देता. 

प्रशाशन की : बिलकुल, लेकिन आश्चर्य होता है, की एसा क्यों ? क्यों कोई प्रह्सश्निक अधिकारी इस तरह की बात मान सकता है , लें शायद उनके भी हाथ में कुछ नहीं रहा होगा, ट्रान्सफर होने के बाद कोई कुछ नहीं कर सकता कम से कम उस स्थान पे . 

मिडिया की : सबसे जादा और १००% ,  मुल्ला- यम की पूत्र की सरकार  जब से पुत्तर प्रदेश में आई, तब से कोई छोटे बड़े ५० से भी जादा दंगे हो चुके है. लेकिन  मिडिया इसको खाती रही. चुप रही, भगवान् जाने किस सौहार्द्य बिगड़ने के डर से ?  और इससे कुरानी फरिश्तो की  हिमाकत बड़ी , नतीजा सामने है. 

मीडिया आज भी यह नहीं बता रही की की  वह ए के ४७ का क्या हुआ ? कहा से बरामद हुआ ? उस पर कोई कार्यवाही हुयी या नहीं ? या मिडिया भी मानती  है की समुदाय विशेष के घर में ए के ४७ पाया जाना मामूली घटना है ठीक वैसे है जैसे किसी के घर में चमच्च, कढाई या पौना -कलछुल पाया जाना, यदि मानती तो शायद बताती. लेकिन मिडिया को अछ्छी तरह से मालुम है. 

हमें नहीं  चाहिए  एसा सामजिक सौहार्द्य, नहीं चाहिए हमें भाई चारा जब कीमत सिर्फ एक तरफ़ा चुकानी  हो, हर जगह , हर तरह से और हमेशा. क्योकि  भाई चारा इंसानों में की जाती है, डाकुवों और आतंकवादियों से नहीं, 

पागल कुत्तों  ने घात लगा कर शेर को काट लिया है,  देखते हैं शेर के पंजे से कब तक बाहर  रहता है. 

 कुछ जादा पढने के लिए डी एन ए का लिंक क्लिक करे .
http://www.dnaindia.com/india/1888043/report-dna-special-jolly-canal-killings-triggered-the-muzaffarnagar-riots

सादर
कमल कुमार सिंह 

Friday, July 12, 2013

मलाला जैसे हो इस्लामिस्ट


अंग्रेजी में एक  कहावत है "Action speaks louder than words" जो सत्  प्रतिशत सही है. जिस  किशोरावस्था में स्कुल में दुनिया भर के सपने सजाते हैं, बगल वाले से जलते हैं किस उसका नंबर उससे जादा क्यों? उस छोटी उम्र मलाला जैसी किशोरी किसी आम हमउम्र से अलग हट कुछ एसा करती दिखाई देती है जो इस्लामिस्टो की नजर में चुभती है, यहाँ तक इस लड़की के ऊपर हमले भी हुए. जान बचने के बाद भी यह किशोरी बिना किसी दबाव में आये अपने धुन में लगी है. मलाल डे पे सयुंक्त राष्ट्र संघ ने इन्हें आमंत्रित भी किया है. 

अब सोचने वाली बात है की इस्लाम इस्लाम चिल्लाने वाले एक तरफ तो अफगान में दुसरे कि संस्कृति नष्ट करते हैं, गया में बम फोड़ते हैं  जो इस्लाम के चहरे पर चेचक  नुमा कभी न जाने वाले धब्बे हैं, वही दूसरी तरफ मलाला जैसे लोग भी हैं जो इन सब कट्टरवादिता से  आगे बढ़ इस्लाम  को दिए गए दाग को अनजाने में सही लेकिन चेहरा दरुस्त कर रही है. अनजाने में इसलिए कहाँ की वो कोई काम अपने दिल में इस्लाम को आगे बढाने के उदेश्य से नहीं कर रहीं, पूरी मानवता के लिए कर रही हैं, उनके कार्यो से हर किसी के दिल मीठा सा अहसास होता है, कि काश ये बम फोडू जो अपने आप को इस्लाम के लिए समर्पित कहतें हैं, एसा कुछ क्यों नहीं करते जिससे वास्तव में लगे की वास्तव में इस्लाम बेहतर है.  क्या इतने सारे नकारात्मक संगठनों के बावजूद भी मलाल एक सकारात्मक पहचान रहीं है तो इस पर इस्लाम को क्या एतराज या नुक्सान हो सकता है. 

जो लोग इंटरनेट पर इस्लाम का बखान करते नहीं चुकते उनके लिए भी ये बड़ा सबक है, जो इस्लाम इस्लाम चिल्लाते हैं, ख़ासकर भारत में इन्हें भोपाल के लोग नहीं दीखते जिन्हें कोंग्रेस सरकार ने एक करारा लेकिन गहरा जख्म दिया है, ८० के दशक में भोपाल गैस काण्ड जिस क्षेत्र में हुआ वहां अधिकतर मुस्लिम  बस्तियां ही है, जो आज बस इसलिए जिन्दा ताकि अगले दिन अस्तपाल जा सके. वहां उस क्षेत्र में आप जायेंगे तो आप की रूह काप जाएगी जब आप जिन्दगी को कराहते घसीटते हुए देखेंगे, और आप अपने आप को  दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान मानेंगे की आप भोपाल के उस दशक में पैदा नहीं हुए जहाँ कोंग्रेस ने मौत का हाहाकार मचा दिया. लेकिन उनके लिए यहाँ के किसी भी इस्लाम परस्तो का हाथ आगे नहीं बढ़ता. कोंग्रेस को बार बार निशाने पे इसलिए ले रहा हूँ, क्योकि उस समय अर्जुन  सिंह वहां के मुख्यमंत्री थे, भोपाल गैस काण्ड के अभ्युक्त "एंडरसन" काण्ड के बाद शाही व्यवस्था में अमेरिका विदा करने में उनका बड़ा हाथ था. हलाकि खबर राजिव गांधी को भी थी. इसके बाद सबसे बड़ा मजाक ये की  मुस्लिम जज "अहमदी" जी ने पूरी जी जान लगा दी की अभियुक्तों को कम से कम सजा मिले. 

जो लोग इस्लाम का झंडरबरदार बनते है, उनकी नजर बस इंटरनेट पे प्लास्टिक पीटने तक ही सिमित रहती है, बजाय  मलाला जैसे लोगो से कुछ सकारात्मक उर्जा लें,  एक मलाल जब मुझे मजबूर कर सकती है उनके बारे में लिखने के लिए तो जरा सोचिये यहाँ का १% मुसलमान इस तरह का कमान हाथ में लेले तो उसे नेट पर प्लास्टिक पीटने की कोई जरुरत नहीं रह जाएगी. 

हमें मलाला चाहिए, प्लास्टिक पिटवा नहीं .