नारद: Politics kamal kumar singh
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Saturday, June 14, 2014

केजरीवाल जी, नॉट योर व्यू लगाविंग -नो उल्लू बनाविंग

नोट : आपियो ने मिलके इसको स्पाम कर दिया है शायद, आप नॉट स्पाम पे क्लिक करके आगे बढ़े. 


कालीबाड़ी में हुए मोहल्ला सभा में केजरीवाल ने स्वीकार किया की उन्हें लगा की वो सरकार पूर्ण बहुत से बना लेंगे इसलिए इस्तीफा दिया. केजरीवाल राजनीति को अपने "लगने"और "न लगने" के चश्मे से ही तय करते है. 
उन्हें "लगता है" की गडकरी भ्रष्ट है, उन्हें  "लगता है की" संविधान भ्रष्ट है, उन्हें लगता है की जमानत मागने वाला "जज" गलत है. 

चुनाव से पहले उन्हें  बटाला काउंटर  पुलिस वाले पहले गलत लगते थे, चुनाव के बाद उसी पे कोर्ट का निर्णय सही लगता है.  

पहले उनको कुर्सी छोड़ के भागना राम के त्याग के बराबर लगता था, और अब उस त्याग पे माफ़ी मांगते है यानी उनकी नजर में राम गलत बना दिया.  

देल्ही विधानसभा चुनाव से पहले कोंग्रेस  भ्रष्ट लगती थी, चुनाव के बाद उसी के साथ सरकार बना ली.

पहले उन्हें लगता था की उन्हें राजनीति में नहीं आना चाहिए, फिर उन्हें लगा की आना चाहिए.

पहले किरण बेदी उन्हें ठीक लगती थी, बाद में भाजपा की एजेंट हो गयी,पहले विक्रम सिंह उन्हें ठीक लगते थे, बाद में वो भी भाजपा के एजेंट हो गए,पहले राम देव उन्हें महान लगते थे सो उन्ही के गोद से आन्दोलन शुरू किया, बाद में उन्हें लगने लगा की  रामदेव उनके राजीनीतिमें आने वाले प्लान के रास्ते के रोड़े है, सो बाद में वो भ्रष्ट हो गए. 

उन्हें लगता है की अदानी मोदी को जहाज देते है, जरुर गड़बड़, लेकिन उन्हें ये भी लगता है की आजतक वाले उन्हें चार्टर्ड में लाते है तो ठीक है. 

उन्हें लगता है की ५०० रूपये जेब कहने से बनारस की जनता मुर्ख बन जाएगी, जबकि वापसी चार्टड में हुयी तो लगता था ये बात जनता को पता नहीं चलेगी. 

लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल को  लगता था की बनारस में "सत्यमेव जयते" होगा और बनारस की जनता बुध्धिमान है, अब उन्हें लगता है की बनारस की जनता बेवकूफ है.  

पहले उन्हें लगता था की सरकार छोड़ कर जनता की सहानुभूति मिलेगी तो सरकार छोड़ने का स्टंट किया, अब उन्हें वो गलती लगती है. 

उन्हें लगा की उनकी धरना देने वाले या वैसे ही कुछ  विकट हरकत से वो मिडिया में छाये रह सकते है, और छाये भी, लेकिन अब जब मीडिया उन्हें नहीं पूछता तो उन्हें भ्रष्ट लगता है. 

पहले इनको कोंग्रेस भ्रष्ट लगती थी, बाद में इन्हें बेदाग़ मोदी भ्रष्ट लगने लगे, पहले इनको भ्रस्टाचार एक सही मुद्दा लगता था, बाद में साम्प्रदायिकता लगने लगी.  


फिर इनको लगाने लगने लगा की पुरे देश में सभी पार्टियों का जमानत जब्त करवा देंगे, लेकिन जनता फिर लगा के जूता मारा मुह पर और ४०० से जादा सीटों पर जमानत जब्त करवा दी. 

इनको लगता है की नेतावो को इनका जवाब देना चाहिए, और इनको ये भी लगता है की इनको किसी का जवाब नहीं देना चाहिए, इनको लगता है की इनसे सवाल पूछने वाला या तो भ्रष्ट है या भाजपा - कोंग्रेस का एजेंट. 

इनको लगता है सब पर इल्जाम लगाना चाहिए, लेकिन इनको ये भी लगता है की इनकी आलोचना न हो. 

केजरीवाल जी इस लगने लगाने वाले चक्कर से बाज आईये, आपके इसी लगने लगाने वाले व्यवहार से जनता ने आपको दख्खिन लगा दिया, अब कितनी बार लगवावोगे ? 

आपका और आपियो का वही हाल है "अबकी मारो  तो जाने " "अबकी देख लेना" ये "आपीए"  (चुतिया x 1000= 1 आपिया)  पहले डेल्ही के विधान सभा में सबकी जमानत जब्त करवाते थे, दुसरे नंबर पर आये तो मुह काला कोंग्रेस के साथ किया जिसको ये एड्स से पीड़ित मानते थे. अब वही कोंग्रेसी बिमारी इन आपियो को लग गयी है. जानलेवा है धीरे धीरे आपियो और आपा को खत्म कर देगी. लेकिन फिर भी रोगी जब तक मर न जाए लड़ता है, जूझता है ऐसी ही हालत इन आपियो की है. 

सब मिला के उन्हें अब भी लगता है की वो जनता को उल्लू बना सकते है, वो बात अलग है की जनता ने उन्हें उल्लू मान के बैठी है, जो रात के समय अपने हिसाब से "लगने" के  वातावरण में निकलता है. 

जनता समझ चुकी है आपीए गुलेल से जहाज मार गिराने की बात करते है - तो प्लीज नो मोर उल्लू बनाविंग. 

सादर 
कमल कुमार सिंह.  

Saturday, January 18, 2014

चिंता

बड़े बड़े  बुध्ध्जिवियो/ पत्रकारों / बड़े वालो / सेकुलरों/ आकश / पाताल/ बैताल, सभी से आग्रह है आप लोग कुछ करें, संघ से आप लोग दुखी है, संघ ने दुखी कर रखा है आपको, संघ बिल्ली है, चुपके सी आके आपके घर की दूध पि जाती है, और आप चाय से वंचित रह जाते है, संघ के लोग आपका बीडी छीन के पि जाते है, निश्चित ही ये दुःख की बात है, संघ के लोग आपके घर आके, खाना पीना भी भाभी/ माताजी जी से छीन छान  के खा जाते होंगे, निश्चित ही यह अक्षम्य पाप है.

चिड़िया जब आपके  सर पे बीट कर दे तो आप समझ ले यह पूर्व जन्म का संघी है और आपको पहचान गया है, इसलिए पको निशाना बनाया गया.  इस तरह की आपात स्थिति  से निपटने के लिए गुलेल हमेशा साथ रखे. निशाना गड़बड़ हो तो उसे गन्दी गन्दी गालिया सुना के गन्दी गन्दी गालिया देने वाला कहें, उसके कान फाड़ दे जिससे वो अपनी तरफ आने वाली प्लेन की आवाज नहीं सुन पायेगा और टकरा के मर जाएगा.

ये संघी किसी भी रूप में हो सकते है, पेड़ के रूप में, पौधे के रूप में, यदि किसी नीम से आप दातुन तोड़े और वो कड़वा हो तो समझ ले की नीम संघी है, तत्काल मुह धो के पेड़ को अपने मुख मुद्रा से अभिमंत्रित शुद्ध ५००१ गाली दे और तत्काल आरी चलवा दें.

चलते फिरते समय हमेशा ध्यान रखे की किसी संघी से न टकरा जाय, बस ट्रेन में चलत समय ख़ासा सावधान रहे, संघियों का प्रकोप यहाँ भी हो सकता है, मान लीजिये बस खराब हो जाए तो आप समझ ले की इसमें संघियों की साजिश है की आपने गंतव्य पे लेट पहुचें, या ये भी हो सकता है की अमुक गाडी किसी संघी के शो रूम की हो , नहीं तो कम से कम बेचने वाला सेल्स मनेजर जरुर संघी ही होगा, अन्यथा आपको इतना कष्ट देने की जोखिम क्यों उठाता जिससे  दुनिया दुखी है.

कुछ भी करते या लेते ससमय ध्यान रखे की उसमे संघी की साजिश न हो, मसलन पास के किराना स्टोर यदि किसी संघी का हो तो आपके पेट में अल्सर पड़ सकते है, या आपका पेट ख़राब हो सकता है, यदि एसा होता है तो आप तत्काल उसके घर के उलटे अपना मुह कर वायु शंका निवारण करें. संघी किसी भी रूप में हो सकते हैं, उनको पहचानने का सबसे सरल उपाय ये है की यदि कोई पशु पक्षी, मानव लोजिकल बात करे या आपके खिलाफ बात करे तो आप समझ लें की ये संघी हो सकता है. 

वैसे आप चाहे तो इस क्रिया से अपना व्यक्तिगत लाभ ले सकते हैं, मसलन जब चाय पीनी हो या दूध गरम करनी हो तो किसी संघ को आवाज लगा उसको छत पर बुला लें फिर उसे देख  चाय का पतीला अपने दिमाग या पीछे रख बिना गैस खर्च किये  गरम कर सकते हैं. ठण्ड के मौसम में अपमे गुसल खाने में किसी संघी की फोटो लगाए आपका शरीर जल रहा होगा, अतः पानी गर्म करने की जरुरत नहीं. ये सब उपाय मै इसलिए  बता रहा हूँ की सोते से खाते से, और बाकी सब भी करते समय आपके दिमाग से संघ का भुत वैसे भी नहीं उतर .
सच बात तो ये है आपका खाना, हसना रोना, या ये कह लें की भविष्य तक संघ और संघियों पे निर्भर है.
 तो बेहतर है कुछ ाव्यक्तिगत लाभ भी उठायें .

कृपया कुछ करें, आप जिस तरह से रुद्राक्ष की माला ले सुबह शाम संघी संघ कर वायु में उसका "कोसना" की मात्र बढ़ाते जाते हैं वह सेकुलरो, बुध्जिवियोंके लिए चिंता का विषय इसलिए है की उनका विष भरा नाम वायु में घुल इस जमात की जान ले सकता है अतः चिंता का विषय इसलिए इसलिए की आपके इस रुद्राक्ष युक्त मारक कोसने से से उनके स्वाथ्य पे कोई असर नहीं पड़ता, वो आपके तरफ देख मुस्करा देते आर आप फिर से जल भुन कर वायु  में कार्बन डाई आक्साईड की मात्रा बढ़ाते है जिससे ओजोन हर दिन अपना अंतिम दिन मानता है , इधर आप घुट रहे हो उधर आपके क्रियाकलाप से ओजोन. दोनों की चिंता समाप्त करने का उपाय खोंजे बजाय की अपना जी और ओजोन को डराने के.

एक "संघ निवारण संघ" बना के भी इनसे निपटा जा सकता है, इसके लिए मुलायम, माया, या नवजोत "आपा" का सहारा ले सकते है. कुछ काम और कियें जा सकतें है मसलन उनके पीछे कुत्ते छोड़ दें लेकिन उसका कोई फायदा नहीं वो दिन रात आप लोगो को तो देखते ही है, प्लेन चिट चलवा दें, अंडा कटवा दें, जिन्न छोड्वा दें, या बाबा बंगाली से के पास उन संघीयों की फोटो ले के चले जाए या सामूहिक आहुति यग्य करावा दें, कुछ न कुछ तो होगा ही.
पीपल के पेड़ में "सुबह का"  पानी  डालने से भी लाभ होगा, कर के जरुर देखें, यदि लाभ न हुआ तो समझ लें की संघियों की साजिश है.


आप जिस तरह से दिन ब दिन दुबले होते जा रहे हैं वो खासा चिंताजनक है, इससे आपका मानसिक संतुलन खराब हो सकता है, पेट दर्द, सिरद, निमोनिया इत्यादि आप पर हमला कर अपना नुक्सान करवा सकते है.  बिना संघियों को ठिकाने लगाये इस तरह से दिन रात हुक्के की तरह गुड्गुडाने से आपका कोई फायदा होता नहीं दिखता. कृपया कुछ करें. 

आपका एक संघी शुभचिंतक 

सादर 
कमल कुमार सिंह
१८ जन २०१४ 

Sunday, November 4, 2012

सत्ता ब्यूटी पार्लर है



आयरलैंड में एक प्रसिध्द व्यक्ति  और लेखक हुआ, जार्ज बनार्ड शा,  वह "लन्दन स्कुल आफ इकोनोमिक्स" के संस्थापको में से एक था.वह इंग्लैंड के साम्राज्यवाद निति से बड़ा दुखी रहता था, वह इंग्लैंड "कु-निति "का आलोचक था. उसका कहना था  इंग्लैंड वाले बनाने में बड़े निपुण हैं, सामान और लोगो को भी. नया सामान जब खपत न होता तो इंग्लैंड वाले अपने पादरी दुसरे देशो में भेज देते, बाद में उस देश में पादरियों पे उत्पीड़नका आरोप लगा जहाजो में अपने सैनिक भेज उसपे कब्ज़ा जमा अपना नया बाजार  तैयार कर लेते.

पादरी, इश्वर ही नहीं बल्कि नया बाजार भी उपलब्ध करवाता है. सन १६०० के आस पास उसने भारत के लिए भी यही रननिति  अपनाई. १९४७ में आजादी के बाद उसके सीने पे सांप लोटने लगा, क्योकि यहाँ स्वदेशी की आग लग गयी थी. वह दुखी था क्योकि वह दयालु है, परमेश्वर और बाजार का "कम्बो पैक" सदाचार में  मुफ्त में उपलब्ध करवाता है.

स्वदेशी ज्वाला में कही भारत जनता कहीं जल न जाएँ यह सोच के इंग्लैण्ड की आँखों में आंसू आने लगे. उसने अपनी रणनीति बदली अबकी पादरी न हो के महिलाओं का सहारा लिया गया. उसे पता था भारत में नारियो को माता, देवी शक्ति माना जाता है. नारी को अपनानाने में भारतवासी भी पीछे नहीं है. भारत ने  लेडी गोगो के गानों से लेकर वस्त्रो के आतंक से मुक्त रहने वाली "लीयोनी" जी तक को अपना लिया. उसने एक महिला को चुनकर भारत के उस समय के शक्तिशाली राजनैतिक परिवार के पुत्र के पास भेजा. उसने शायद भारतीय पुस्तके पढ़ी थी, उसे पता था की अप्सरावों को भेज किसी भी विश्वामित्र का तप भंग किया जा सकता है तो ये तो बस एक भारतीय राजनैतिक पुत्र है, यदि ये अपने झांसे में आ गया तो अपना धन्धा पहले से भी बढ़िया. हुआ भी यही, अंग्रेजी इन्द्र अपने अप्सरा को भारत में भेजने में सफल रहा. उसने प्रेममय "हवाले" से स्त्री को भारत में "इम्पोर्ट" किया, आप इसको "इम्पोज" भी कह सकते हैं. वह अप्सरा भारत आई और इस आधुनीक विश्वामित्र से कहा तुमने मुझे भारत लाके इस देश का और यूरोप का भला किया है, अब तुम्हारा काम पूरा हुआ, तुम्हारे जीवन का उद्देश्य सफल हुआ, अब तुम जाओ तुम्हारा काम बस इतना ही था, तुम्हारे इस पुन्य कार्य लिए हमारे पादरियों  ने स्वर्ग में एक स्पेशल " होलीडे सेल" का निर्माण किया है. वही मौज मनाओ, यहाँ  का काम हम देख लेंगी, अब आप आराम करो.  और इस देश की जनता का क्या ? वसुधैव कुटुम्बकम सभी अपने है बस अपना उल्लू सीधा होना चाहिए.
सेर भर कबाब हो

एक अद्धा शराब हो

नूरजहाँ का राज हो

ख़ूब हो--

                                         भले ही ख़राब हो  ------- (स्व श्री सुदामा पांडे)

भारत की  नारिन्मोख जनता ने इनको भी स्वीकार कर लिया, भारत के लिए असली  ग्लोबलाईजेशन का दौर यहीं से शुरू हुआ.  "वसुधैव  कुटुम्बकम" का इससे बड़ा नमूना क्या होगा जहा भारतवासी किसी भी देश के नारी को अपना मान लेते हैं, पहले भी उन्होंने अंग्रेजो को अपना भाई माना था, क्या हुआ जो कुछ  हिस्सा ले के भाग लिए, अब भाई है तो जाय्दादा में बटवारा भी होगा ही. ये तो उनका हक़ था. नाहक ही उन्हें लोग विदेशी लुटेरे कहते हैं.  

सत्ता मिलते ही सत्ताधीन  पहले कई साल तक सत्ता को समझने की कोशिश करता है, क्योकि वह अपने को सत्ता का पति और सत्ता को  अपने हरम की एक बंदी समझता है जिसका कन्यादान  मुर्ख जनता खुद करती है.  शुरुवात में  थोडा प्यार मनुहार करता है, फिर भोगता है,  फिर बांदियो सा व्यवहार करता है, वह भूल जाता  है की जागरूकता के इस समय में दुल्हन भी तलाक ले कहीं और जा सकती है.  अपने कर्म को बताने कुकर्म को छुपाने के लिए लालची "पड़ोस के देवरों" को लगा देता है जो जनता को ये बताते है की तुमने ठीक जगह कन्यादान किया वो सुखी है तुम भी खुश रहो.   देवर भी कैमरा ले के बड़े भईया को नीचा नहीं होने देते. दुल्हन  है भी तो एकदम सीधी भारतीय ब्रांड, एक हद तक सहने को तैयार, सामने वाला  चाहे कितना भी कुकर्मी हो उसे सहना ही पड़ता है, वो बात अलग है को वो सिसकती है, रोतीहै, आजाद होना चाहती है, लेकिन उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता, अंततोगत्वा वह दुल्हे को तलाक का नोटिस दे इन्तजार करती है. नोटिस मिलने पर "यह"  चिंतित होता है. हाय ये क्या हुआ, क्या मेरा अब तलाक हो जायेगा? और यह कहीं और चली जाएगी ?कैसे रह पाउँगा मै इसके बिना ?  हमने सात जन्मो तक साथ जीने मरने की कसम खायी थी, इतनी जल्दी साथ छुट गया तो परमात्मा को क्या मुह दिखलाऊंगा.  नहीं नहीं यह नहीं हो सकता, ये मेरी है सिर्फ मेरी है, मेरे पुरखो ने न जाने कितनो का खून बहा के इसे छीना है, एसे न जाने दूंगा.और "यह" मुर्ख "बाबुल" से  अपनी मजबूत दावेदारी सीध्ह करने को मजमा करता है , जलसा करता है, सारे  उपक्रम  फिर से करता है.  इनके लिए सत्ता का मतलब बस इतना ही है.

हाल में रामलीला मैदान में हुए एक रैली के "त्रिफला चूर्ण" (माता -पुत्र और चचा) का भाषण रख रहा हु  जिससे  पता चलता है की ये जनता के हाजमा का कितना ख्याल करते हैं.  नेतावों की जनसेवा का अमरत्व भाव पता चलता है :-
जिसको आधी रोटी मिलती है वो पूरी खायेगा, जो आधा पेट खाता है वो पूरा पेट खायेगा, (भाई बिना सत्ता के मै भी आधा था, पहले अपना पूरा करूँ, पहले मै खाऊ, आखिर मै भी जनता हूँ. मै ठीक रहूँगा तो आप लोगो की भी सेवा होगी).
भारत एक बार फिर से खड़ा होगा पूरी दुनिया उसको एक बार फिर पहचानेगी, (यानि अभी तक ६० सालो में हमने उसे लंगड़ा कर रखा है, ताकि पहले हम खड़े हो सके, हम अपनी पहचान बना लें फेर बाकी का भी हो जायेगा).
मै बहुत आभारी हूँ आप दूर दूर आधे पेट हमारी रैली में आये आशा है आगे भी आधे पेट या खाली पेट अपनी हालत की परवाह किये बगैर हमारी रैली में आ देश को तरक्की के रास्ते पे ले जायेंगे. हमारी रैलियों में आईये  हमारे भाषण को सुनिए, आधा पेट तो आप वैसे ही भर जायेगा.

हमने इस देश में इन्फ्रास्टकचर पे ख़ास ध्यान दिया है आदर्श जैसी बिल्डिंगे बनायीं है जिससे जनता और नेता दोनों का पेट भरा है, बिल्डिंग देखिये और पेट भरिये, इतने पर भी खाली रहे तो हमारा क्या दोष ?  भ्रष्टाचारियों को दंड मिलेगा वो बात अलग है की हम उस दायरे में अपने आपको नहीं लायेंगे, हम अगर इन कानूनी लफडो में पद गए तो देश की तरक्की कौन करेगा ?..
हमारी पार्टी पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे है, उसमे सच क्या है , झूठ क्या है , ये आपके विवेक पे निर्भर करता है , लेकिन एक बात आपको समझना होगा की जो शाशन में होता है वही सत्य है , वही शाश्वत है, नहीं तो है सत्ता की ताकत से बना लेंगे आप चिंता न करे आप बस सच के साथ रहें, बाकी आपके विवेक पे निर्भर है.
हमने ही सुचना का अधिकार लाया है, जिसके तहत कोई भी जानकारी आप ले सकते हैं, बशर्ते सरकार के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में न हो, हम पैदायशी साफ़ पाक है, और आपको भी "साफ़" कर के रहेंगे.
 हमारे विरोधी हमारे बारे में उलटी बाते करते रहें, लेकिन हम उनके बारे में कोई उलटी बात नहीं कहेंगे (क्योकि हम करने में विश्वाश रखते हैं) तभी एक लोकल महिला उठती है. अपना भाषण पद्धति है और साथ वाले नेतावों को "माननीय", "सम्माननीय" जैसे प्रमाण पत्रों से नवाजती है.

एक नेता को दुसरे नेतावों को  "आदरनीय" और  "सम्मानानीय" शब्द  से नवाजना एसा लगता है जैसे एसा लगता है एक चोर दुसरे चोर को बड़े से बड़ा बताना चाहता हो ताकि उसकी बारी आये तो सामने वाला चोर भी उसे बड़ा बताये. आजादी के बाद जिन नेतावो ने चोरो को पकड़ने के लिए कड़े कानून बनाये आज उसी परिवार या दल के नेता चोरों को सर्टिफाईडी बनाने के कानून बना रहें हैं .सर्टिफाईडी चोर यानी जिनके लिए चोरी करना वैध है. इन चोर, डाकुवो को सम्मत बनाने के लिए, जनता के बीच पचाने के लिए त्रिफलाओ की पाचनपूर्ण  रैली का मख्हन से लपेटा "पाचक भाषण" परोसा जाता है. जिसको  जनता अभी समझ नहीं पा रही है. शायद जनता का जन्तत्व ख़त्म हो गया है.


''पता नहीं हम कहां से चल कर, कहां पहुंच कर ठहर गए हैं, 
हमारे सीनों पे पांव रखकर, गधों के लश्कर गुजर गए हैं, 
हमारी टूटन, तुम्हारे वादे, फना हुए कहां तेरे इरादे 
जिन चेहरों पे है निगाह डाली, कई लबादे उतर गए हैं।''


नेता अपने चोर, डाकुवों वाले वीभत्स चहरे को छुपाने के लिए सत्ता का ब्यूटीपार्लर की तरह इस्तेमाल कर रहा है. और सत्ता के तंत्र इसके प्रसाधन है(मिडिया वगैरह) जिससे अपने चहरे मोहरे चाल चलन का ट्रिमिंग, फेशियल करा खुबसूरत चेहरा जनता के सामने रख रहा है. सच ही है, सत्ता में बहुत शक्ति है, चुड़ैल को देवी और राक्षस को देवता बना सकती है, लेकिन जनता को जनता के रूप में नहि बल्कि अपने साधन के लिए इस्तमाल कर रही है.


न कोई प्रजा है

न कोई तंत्र है

यह आदमी के खिलाफ़

आदमी का खुला सा

                                             षड़यन्त्र है .---------(स्व श्री सुदामा पांडे)



सादर

कमल कुमार सिंह

४ नवम्बर २०१२

Wednesday, September 12, 2012

असीम कार्टून मत बनाओ, शहीद समाधी स्थल तोड़ो


अबे असीम,  हत्यारे को हत्यारा कहोगे तो तो हत्यारा तुम्हारी हत्या तो करेगा ही, खासकर उस हाल में जब हत्यारा  गुप्त रूप से सुपारी लेता हो ...वो "सार्वजानिक गुप्त"  मामले को सार्वजनिक करने की क्या  जरुरत थी ?? 

ख्वामखाह फस गया न ??  कोई कुछ नहीं बोलेगा, कोई निंदा नहीं , कोई बहस नहीं. अरे कान के कच्चे आँख के अंधे, मुंबई "हमला सांस्कृतिक कार्यक्रम " से नहीं सीखा क्या ?? ले रहा है  कोई उसका नाम जिसने शहीदों के सीने पे लात  मारी थी ?? मरे हुए को प्रताड़ित करने पे कोई बवेला नहीं है, बस थोड़ी बहुत डिटेंशन, थोडा बहुत अटेंशन. कोई टी वी वाला दिखा रहा है ?? उसका क्या  हुआ ?? जेल गया की नहीं गया ?? सजा क्या होगी ?? हो रही है कोई बहस ??  होगी भी नहीं. कहावत है "गड़े मुर्दे उखाड़ने  से क्या  फायदा ??" अरे मुर्दों के स्थल पर लात मारने वाले के बारे में बहस करने से क्या फायदा ? भले ही वो हमें जिन्दा रखने के लिए मुर्दे हो गए.  

एक तो तेरे नाम के साथ सरनेम है "त्रिवेदी" ऊपर से कार्टूनों का कार्टून बनाने का अपराध ?अबे  गधे को गधा कहोगे तो गधा तो दुलात्तिये  न मारेगा जी?? 

अबे अज्ञानी, विरोध प्रकट करने के और भी कई तरीके है, सुन अगली बार जब विरोध प्रकट करने का मन करे तो  देवी देवताओं के कार्टून बना, बुध्दजीवी भाई चारा में आयेंगे तुझे बचा ले जायेंगे, मिडिया भी बदनाम न कर पायेगी. उलटे तुमको भाई चारा का वाहक घोषित कर दिया जायेगा. लेकिन ध्यान रहे वो भी सिर्फ हिन्दुवों की, गलती से इस्लाम  का बना दिया तो पकिस्तान से घोषित सजा का भी  भारत में वेलकम हो जायेगा.

जब विरोध और जादा उबाल मारने लगे तो शहीदों के स्थल को ध्वस्त कर, और जादा बेहतर है की क्रोसिया वाली टोपी पहन कर, कर . कोई कुछ नहीं बोलेगा, थोड़ी बहुत भाग दौड़ और मामला साफ़, अबू आजमी और बुखारी  भी तेरे सहयोग में आ  जाएगा. 

चल बीति ताहि भुला के आगे की सुध ले. 

Friday, August 17, 2012

कही ये सरकार की चाल तो नहीं ???

भ्रष्टाचार के मामले मे आज सरकार और उसके गठबंधन हर तरफ से घिरे जा रहे है, धन के चक्कर मे ये सरकार और उसके मंत्री भूल गए की इमानदारी ही नैतिकता रूपी कपडे को मजबूत बनाती है और भ्रस्टाचार चूहा स्टाईल मे इस इमानदारी कुतर डालती है.  धन के लालच मे ये सरकार खुद चूहा टाइप भ्रस्टाचार से अपने कपडे कुतरवा के इमानदारी को कमजोर चुकी है जहाँ से इनके मन के काले धब्बे और कारनामे दिखने शुरू हो गए है, इमानदारी  का कपडा एक जगह से फटता है तो दूसरे जगह से ढकने की कोशिश कर रही सरकार अपने कारनामे छुपाने मे असफल है तो देल्ही की कुर्सी भी इन्हें पतिता मान तलाक देने का मन बना चूका है.  अब ये क्या करे ??  कमासुत खसम चला जायेगा तो फिर इन्हें पूछने वाला कौन ?? ये क्योकि कुर्सी को धर्म नहीं बल्कि खसम से जादा कुछ मानते भी नहीं. ये शायद भूल गए है जो खसम आपकी तीमारीदारी, परवाह  इनकी पवित्रता पे करता था, जिसको अब इनके अपवित्र होने का सबूत मिल चुका है, शायद तलाक भी दे सकता है. 

साम्प्रदायिकता का कार्ड खेल कोंग्रेस ने सरकार तो बना ली, (अनावश्यक तुष्टिकरण साम्प्रदायिकता का एक निम्नतम रूप है जिससे अलग अलग धर्मो के बीच दूरियाँ बढती है). लेकिन जब मुसलमान  भी समझने लगे  की हमें तो बेवकूफ बनाया गया, हमारा तो कोई विकास नहीं हुआ, भाषणों सिर्फ आरक्षण, और सुरक्षा के दावे खोखले पड़ने लगे, ऊपर से इनके रोज रोज के घतोत्कछ्छी, डायनासोर टाइप के घोटाले देख जनता पूरी तरह से  टूट गयी , पक गयी और पूरा मन २०१४ मे इनके तलाक दिलवाने के वकील भूमिका मे आने लगी तो इनके माथे पे पसीना आने लगा. 

और ये पुख्ता जानकारी दिलाई शोशल मिडिया ने, मेंन  मिडिया कितना भी चिल्ला ले की वो बिकी हुयी नहीं है लेकिन असलियत सबको मालूम है, कोठे पे बैठी हुयी वेश्या पवित्रता का चाहे जितना दंभ भर ले लेकिन संस्कार से अछूता नहीं रह सकती. 

अब ये क्या करें ? तो इन्होने एक तीर से दो निशाना साधा, पहला अपना वोट बैंक साधने का और दूसरा शोशल मिडिया पे लगाम लगाने का. मजे की बात ये है की वोट साधने का काम भी शोशल मिडिया से ही करवाया. 

हर पतिता को मालूम होता है की उसका भांडा एक दिन फूट जायेगा, सो वो पहले ही आपातकालीन परिस्थिति मे एक विश्वशनीय गवाह तैयार कर लेती है, अब गवाह किसको बनाए जिससे खसम को एहसास कराया जा सके की ये अभी भी विश्वनीय और पवित्र है ?? जिस साम्प्रदायिकता का कार्ड खेल एक खास कौम को अपना गवाह बनाया था वो समझदार हो चला था, इनको पता था अबकी बार ये साथ न देंगे, सो बंगलादेशियो को पहले ही तैयार कर रखा था. 

नियत समय पर शुरू कर दिया अपना खेल, करवा दिया दंगा आसाम मे, जिसमे लाखो लोग बेघर हो गए, इनको पता था की जनता हमारे मिडिया पे भरोसा करे या न करे लेकिन शोशल मिडिया तक ये बाते  हर जगह पहुच जायेगी, जिससे देश मे अशंतोस  फैलेगा, और फैला भी.. आखिर विदेशियों को अपने जमीन पे खुरापात करते कौन देखना चाहेगा ??  इससे होगा ये जो मुसलमान समझदार हो इनका साथ छोड़ इनके साथ हो गए थे वो एक बार फिर से भयभीत हो जायेंगे, और उनका ध्रुवीकरण एक बार फिर से इनकी तरफ हो सकता है, दूसरे ये शोशल मिडिया को आड़े हाथ ले सकते है. 

फिर असम, म्यामार और बर्मा के समर्थन मे मुंबई मे रैली निकलवा फिर हिंसा करवाई क्योकि सिरफिरे लोग हर कौम मे होते है और जब हजारों नेता ही पैसो के लिए कुछ भी करने को तैयार है तो २० -२५ हजार भाड़े के टट्टू जुटा के ये सब करना कौन सी बड़ी बात  है ?? और ये जरुरी तो नहीं की मुंबई दंगे मे हर टोपी पहनने वाला मुसलमान ही रहा हो या हो भी सकता है, जिसका जिम्मेदार मै सीधे सीधे सरकार को मानता हूँ नहीं तो कोई कारण नहीं था शहीद स्मारक तोडने वाले आतंकी को जब  मुंबई के "डी सी पी" ने पकड़ा तो कमिश्नर ने उनको भी धमका दिया जैसे वो "डी सी पि" नहीं बल्कि कोई चपरासी हो.  और ये भी ध्यान देने योग्य बात है की दोनों ही दंगा कोंग्रेस शासित प्रदेशो मे हुए जिससे ये  पुख्ता हो जाता है की "सरकार का हाथ इन आतंकियों के साथ". फिर  मुसलमान सोचने लगेंगे की ये सरकार हमारे गुनाहों पे कितना पर्दा डालती है, इनसे अच्छा हमारे  लिए कोई हो ही नहीं सकता.(मुसलमान भाईयो सावधान ये सब आपको बरगलाने के लिए किया जा रहा है और हिन्दुओ को भड़काने के लिए). 

ध्यान देने योग्य बात ये है की कुछ भी मेंन मिडिया मे जानबूझकर नहीं दिखाया जा रहा था ताकि हिन्दुओ मे अशंतोश फैले जिससे इनका आधा काम हो गया दूसरा की फिर ये बाते शोशल मिडिया से जन जन तक पहुचेंगी  जिससे ये बहाना ले के शोशल मिडिया पे नकेल कस सकेंगे जो आज इनकी सबसे  बड़ी दुश्मन है. 

अब इनका अगला पड़ाव था विपक्ष पे निशाना साधना, सो कर्णाटक मे कौन जाने अफवाह भी इन्ही के गुर्गो ने फैलाई हो ??ताकि हिंदू भी भडके की ये सरकार भी ठीक नहीं ताकि कुछ हिन्दुवो का भी ध्रुवीकरण इनकी तरफ हो सके. यहाँ गौर काने लायक बात ये है राज्य सरकार के (जो की केन्द्रीय सरकार की विपक्षी पार्टी है ) कोई कदम उठाने से पूर्व ही कोंग्रेस सरकार ने बैंलोर से कई ट्रेने चलवा दी, ताकि बंगलौर मे इन्ही के द्वारा फैलाई अफवाह पुख्ता हो जाये, लोग दहशत मे आ जाये. बजाय की शांति बहाल करने मे राज्य सरकार का साथ देने इन्होने अफवाहों को पुख्ता ट्रेने चला अफवाहों को पुख्ता करना जरुरी समझा.  

फिर हैदराबाद के संसद मे एक सांप्रदायिक सांसद का  साम्प्रदायिक बयांन, यहाँ भी ध्यान देने योग्य बात ये है की यहाँ भी कोंग्रेस की ही सरकार है. 

इसका परिणाम ये हुआ की देश भर मे असमिस भाईयो के मन मे असुरक्षा की भावना पैदा हो गयी और वो पलायन करने लगे, 

इन सब कांडो से देश भर के मुसलमानों मे भी अशंतोश आ गया की शायद अब गाज उनपे भी गिरने वाली है या कौन जाने वहाँ भी किसी ने उनको भडकाया हो, क्योकि आज देश मे मुसलमानों को गलत राह पे ले जाने वाले इनके धर्म गुरु ही है, जब इनके धर्मगुरु गुस्से मे अपनी एक आँख बंद और मुह टेढा करके ये कहते है की अब तुम एक हो जाओ तुम सुरक्षित नहीं तो जाहिराना तौर पर इनपर दिमागी असर तो होता ही है. क्योकि जिसको हम अपना बड़ा मानते  है , पथ प्रदर्शक मानते है उस पर विश्वाश भी करते है, अब ये तो उस पथ प्रदर्शक पे निर्भर करता है की वो पथभ्रष्ट न हो, लेकिन आज के ९९% मौलवी नेतावो के चंगुल मे है और उनके लिए कार्य करते दिखाई पड़ते है, ये सब बाते तब पुख्ता हो जाती है जब इमाम भुखारी जैसे लोग मुलायम के पास अपने दामाद के लिए टिकट लेने पहुच जाते है.  अब आज दिनांक १७ अगस्त २०१२ को लखनऊ मे भी उसी खास समुदाय द्वारा हिंसा करवाई गयी, फिर कानपुर मे, फिर अलाहाबाद मे कर्फुयु और मजे की बात ये की ये भी टी वी पे नहीं दिखाया जा रहा, जाहिर सी बात है की बाते भी शोशल मिडिया द्वरा ही जनता मै फैलेगी और फिर ये सरकार  योजनानुसार इस सूचना साधन को भडकाऊ घोषित कर लगाम लगाने की कोशिश करेगी. 

इन सारी बातो से अलग एक आबत प और ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा की उत्तर प्रदेश मे भी कोंग्रेस समर्थक की ही सरकार है, अब आप खुद विश्लेषण कर लीजिए, और मान भी लीजिए की अब  आगे जहाँ जहाँ भी दंगे होंगे वो कोंग्रेस शाषित राज्य ही होंगे ताकि मुसलमानों के वोटो का ध्रुवीकरण हो सके, शायद ही अपने दिमाग पे किसी ने जोर दे के सोचा हो की, मध्यप्रदेश, गोवा, कर्नाटक, बंगाल, और गैर कोंग्रेसी राज्यों मे क्यों नहीं हो रहे ? हाँ अब यदि आगे होते है तो ये भी इन्ही की कोई चाल होगी.

सरकार एक तीर से कई निशाने साध रही है.. वोटो का ध्रुवीकरण, शोशल मिडिया पे लगाम, और घोटालों पर से जनता ध्यान हटा साम्प्रदायिकता की आग झोकना. लेकिन इसकी सबसे जादा त्रासदी कौन झेलेगा ?? सिर्फ और सिर्फ मुसलमान, उनको एक बार फिर से शक कि नजरो से देखे जाने लायक बना सरकार मन ही मन खूब खुश होगी क्योकि धार्मिक विभाजन के खाई मे ही ये अपने दुश्मनों को धकेल सकते है, खाई के बीच यदि कोई पुल बनायेंगे तो नुक्सान सरकार का ही है.. 
हिंदू एक बार फिर से किसी आशंका से ग्रस्त हो इनसे नफरत करने लगेंगे, और भगवान न करे कुछ हुआ तो एक बार फिर पूरा देश असम की आग मे जलने लगेगा. 

अतः मुसलमानों से निवेदन है धैर्य बनाए रखे गलत को गलत कहने की ताकत लाईये चाहे वो कोई भी हो,  किसी भी मुल्ले मौलवी के बहकावे मे न आये, क्योकि टारगेट आप ही है, और साधक सरकार के "साधन" भी, सरकार भी यही चाहती है की कुसूरवार भी आप ही को बनाया जाये लेकिन साधक के साधना के बाद जब सिध्धि प्राप्त हो जाए. 

सादर 

कमल कुमर सिंह 
१७/ अगस्त २०१२ . 

Sunday, June 24, 2012

सरकारी होलिका



भारत बड़ा अनोखा देश है, सैकड़ो धर्म /पंथ और  हजारो त्योहार हैं, और हर त्यौहार का एकवैज्ञानिक  कारन   है, जैसे दिवाली के बाद कीड़े मकोड़े मर जाते हैं, नाग पंचमी के दिन सांप को दूध पिलाया जाता है इसका ये मतलब नहीं की हिन्दू धर्म वाले सांप को बड़ा इज्जत देते हैं इसका मतलब ये भी हो सकता है की ले भाई अपना साल भर का कोटा पूरा कर और जान छोड़, ठीक वैसे ही जैसे जैसे चुनाव वाले दिन जनता वोट देके  इन नागो को देल्ही भेज देती की, जा भाई वहीँ से जहर फैला बार बार यहाँ आएगा तो हम पर असर जादा होगा. या इसका एक कारन और भी हो सकता है, कौन जाने इन सांपो वोट रूपी ढूध न दें तो डस ले , तीसरा कारन की जनता भी जानती है यदि अपना काम निकलवाना है इन नेतावों और अफसर शाहों को समय समय पे रिश्वत देना होगा.  मै तो कहता हूँ भाई वोट दिनाक को भी नाग पंचमी को घोषित कर देना चाहिए इससे नेतावों में भी अच्छी फिलिंग आएगी,  या नाग पंचमी को आधिकारिक तौर पर रिश्वत दे घोषित किया जाए, भारत परमपराओ का देश है एक दो नयी परम्परा और जोड़ी जाए तो भारत की जनता को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक बात और है की इन नाना प्रकार के मीठे और सुगन्धित दूध पिने के बाद कोई गारंटी नहीं की सांप आपको न डसे. 
सांप तो सांप होता है भाई उसका  दोष  क्या ?? आपका खा पी के आपको दंश मारे तो क्या आश्चर्य ?? जब मन किया गठबंधित हो गए, जम मूड किया पलट के डस लिया, एकदम सापोचित व्यवहार कर नेता अफसर ये सिध्ध कर चुके हैं की इनके पूर्वज बन्दर नहीं हो सकते.   शोध करने वालो ने  बड़ा पक्ष पात किया है, शोध किया की सभी मानव बन्दर है, जबकि शोध से पहले मानवों का वर्गीकरण होना चाहिए था,पहला जनता और दूसरा नेता. तब निश्चय ही ये सामने आता की मानवों में जनता की प्रजाति बन्दर की संतति है और नेता सांपो के अथक परिश्रम का फल है.  वैज्ञानिको को इस दिशा में अभी भी शोध करने की आवश्यकता है.  

अब आते हैं एक नए परम्परा की और जो इन नेतावों के द्वारा अपनाई जा चुकी है, होलिका परम्परा.  


हमारा भारत सदियों से होलिका के पवन पर्व को मनाता आ रहा है, हरिनाकश्यप के पुत्र प्रहलाद  को जब पता चला की उसका पिता जनता रूपी ब्रम्हा  (ब्रह्मा इस इक्वल टू  आल जनता )से वोट रूपी वोट ले के असुर  बन और अब अब उन्ही वर देने वालो तक को छोड़ने को तैयार  नहीं उन्ही के रक्त से नहाना चाहता है , वरदान  का दुरपयोग कर रहा है तो बड़ा दुखी हुआ.  उसे  मरवाने की कोशिश की  लाठियां  बरसायीं, उसे भी अपने जैसा भ्रस्ताचारी बनाने का अथक प्रयास किया, लेकिन सब व्यर्थ, वह रहा इंसान ही राक्षस बनाने को  तैयार था. फिर हरिनाकश्यप को याद आया की उसकी बहिन बड़ी प्रतापी है उससे सहायता मांगी जाए, मांगी भी और तय हुआ की समस्या के जड़ को की समाप्त कर दिया जाय, जला दिया जाये, अग्नि तो वैसे ही पवित्र होती है जहाँ सब कुछ स्वाहा हो के पवित्र हो जाता है. उपाय अपनाया गया लेकिन प्रहलाद बच गया और होलिका निपट गयी. 


लेकिन आज के नेता  हरिनाकश्यप  के भी बाप है, वो किसी सद्चारी को जलना चाहते थे, जिसको उसने गलती से पैदा कर दिया था लेकिन आज की ये सरकार अपनी पापो को को पवित्र करने में लगी हुई है, भारत के राजा परम्परा को तो भूल गयी लेकिन होली परम्परा को याद रखा. जब पापों की फाईल बढ़ जाए किसी अच्छे युक्ति से उसको पाप मुक्त कर पवित्र बना दो, उस समय तो हरिनाकश्यप को मारने के लिए इश्वर ने खुद नरसिंह अवतार लिया, क्या आज के परिपेक्ष्य में कुछ एसा होने वाला है??? उस समय तो केवल एक राक्षस और आज गिनो एक तो निकेलंगे  दस जनपथ पे जन पथिको के के लिए,  कलियुग में इश्वर तो आने से रहे और यदि आ भी गए तो उनपे भी सैकड़ो फर्जी मुकदमे डाल किसी काल कोठरी में भेज के उनके कृष्ण अवतार परम्परा को फिर से जीवित कर देंगे, या गंगा नहान  परम्परा अपना लेंगे, जो अपनाना अभी बाकी है.