नारद: India
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Tuesday, August 27, 2013

साहब जी और फ़ूड सेक्योरिटी बिल


सुबह सुबह "साहब" जी  जब खटिया से अपना पैर नीचे उतार, उनके हिसाब से "भारत डायन"  के सीने पे पाँव रखा तो खुश हुए, हलाकि यह काम वो रोज करते थे. लेकिन आज ख़ासा खुश थे.

"अजी सुनती हो,  जरा डेटाल साबुन देना, आज नहाना पड़ेगा, अमेरिका ने हमको मगाया है" -  अपनी पत्नी से कहा.

क्या हुआ जी ? सब ठीक तो है, कहीं "दिल्ली वाली मम्मी" ने आपको भी बेच तो नहीं दिया उन्हें ? - बेगम  ने कहा.

"कभी कभी ढंग की बात किया करो, तुम बेगम हमेशा हमें अंडर इस्टीमेट करती हो- तमतमाते  बोले.

"काश कुम्भ मेले वाले भी करते तो उनकी जान बच जाती., लो पकड़ो डेटाल, इससे शरीर का कीड़ा तो मार लोगे, दिमाग साफ़ तो पहले ही हो चूका है"- बेगम ने साबुन खुश होते हुए इस तरह से दिया मानो जहर दे रही हो.

डायन के सीने से टुल्लू फिट कर निकले गए पानी से जम  के नहाने के बाद कच्छे को सूरज के नजरो के इनयात कर सूरज  पे अपनी नज़ारे इनायत कर कहा, 
"दो मिनट में सुखा दो , एके है, दूसरा स्वीटजरलैंड में है.  नहीं किया तो  सांप्रदायिक बता के अंदर कर दूंगा, बड़े बड़े आई ए एस को अन्दर- बाहर  किया है, तुम क्या हो ?"
 सुरज ने मारे  डर के धुप तेज कर दी, कच्छा सूखने लगा लेकिन खान साहब को पसीना आने लगा, फिर तमतमाए, "अबे  रोना  हो तो अपने आँख से पानी निकालो, न की  मेरे "वहां" से. 

खैर ये उनकी रोज की आदत थी, इस तरह के कारनामे कई बार कर चुके हैं,  पिछली बार  कूत्तो के समूह को जो की  सामाजिक व्यक्तियों को  काटने की वजह से मुनिसिपल वाले उठा ले गए थे उनको छुड़ाने की  दलीले थी की ये तो  पागल कुत्ते है, कटना इनका स्वभाव है, अब कुत्ते नहीं काटेंगे तो कौन  काटेगा ? इनको छोड़ दो नहीं तो  कुत्ताधिकार वाले बहुत  है अपने देश में तुम्हारी नौकरी खा जाऊँगा, इंसान और जानवरों में मतभेद करते हो ? साम्प्रदायीक  कही के. कुत्ते हमारे समाज के अभिन्न हिस्सा है. ये हमारी रखवाली करते है तो किसी को काटे भी तो हमें आपत्ति क्यों ?. अब कुत्ते कुत्तई नहीं करेंगे तो क्या आप करेंगे ? 

खैर नहा धो के साहब ने अपने "कमजोर नाडे" को बड़े कसीदे के बाँधा ताकि कमर पर टिकी रहे. मुलायम हाथो द्वारा भेंट की गयी मूल्यमान इतर का छिडकाव किया ताकि किसी भी प्रकार के गन्दगी की बदबू न आये, दिमाग इन सब से मुक्त था अतः इतर से उसको भी मुक्त रखा हमेशा की तरह. इनका मानना था की दिमाग की खुशबू से प्रभावित करना खतरनाक हो सकता है, कही किसी चोर चुहाडे की नजर पड गयी तो रहा सहा भेजा भी उड़ा ले जायेगा, अतः जैसा भी है अपना है, खोपड़े में सुरक्षित तो रहेगा. 

घर से अभी कुछ दूर गए होंगे की किराने  के दूकान पर लम्बी लाइन नजर आई. आप सामाजिक  थे वहां गए, "क्यों रे इत्ती लम्बी लाइन कहे की ? खुदा की खैरात बट रही क्या ? 

"खुदा की खैरात ले के क्या करेंगे चाचा? मम्मी जी का भेजा कोटा आया है,  

 हायं ?? ये कैसे  भैया तो अपने मुलायम जबान में कुछ कुछ खिलाफत की थी, लेकिन क्या भैया और क्या गिरगिट ? चलो कोई नहीं पास हो गया तो हो गया. मन में बुदबुदाए साहब. 

"ये बताओ बिलवा में खाने के बाद पचाने का भी कुछ उपाय है,"  साहब ने धमकाने के अंदाज में पूछा. 

साहब,  जिसे दो जून का कहना न नसीब हो वो  पचाने की क्या सोचे? आप लोग खाइए, खूब  खाइए, मिल बाँट के पचाईए. यहाँ तो कब से लाइन में लगे है, पंसारी कुछ देने को तैयार नहीं होता, कहता है किसी की शिफारिश ले के आ , अब आप आ गए हो तो, तो आप ही कह दो. सुना की आपके शिफारिश से सम्परादायिक  यात्रायें रुक जाती है, साम्प्रदायिक लोग थर थर कांपते है. 

अबे ये जनता का काम है, हम ठहरे नेता, हम सिफारिश करंगे तो लोग क्या कहेंगे? साहब ने पहले से फुले हुए सीने को और फुलाने की कोशिश की. लेकिन सुनो, जितना मिलेगा उसका आधा हमारे बेगम को पंहुचा जाना बाकियों से भी यही कह दो, "अबे पंसारी, दो इन सबको, कहे तंग करते हो, माल बंद करावा दे क्या" ? साहब ने पंसारी से धमकी से लबालब शिफारिश की और चलते बने. 

गरीब बेचारा अपनी हथेली पे पड़े  उन सिक्को को जो उसने मम्मी के पोस्टरों को रद्दी के भाव बेच बेच के जमा किया  था, जमीन पर फेंकते हुए, ढेर सारा दुसित प्रवाह किया और  चलता बना, नंगा, भूखा.  

कमल कुमार सिंह. 

Sunday, December 23, 2012

बलात्कार का बलात्कार


बलात्कार शब्द जह इंसानियत पर एक धब्बा ही नहीं बल्कि गढ्ढा है वहीँ बालात्कार का बालात्कार करना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सम्मान जनक कृत्य है.  ये क्रिया कुछ खास  किस्म के बुध्दजीवियों द्वारा की जाती है. 
बाल्तकार का बालात्कार करने से बालात्कारी का कुछ बिगड़े या न बिगड़े लेकिन इन ख़ास प्रकार के बुध्ध्जिवियों की दिमागी वर्जिश तो हो ही जाती है, मानो बालात्कार या इस प्रकार की कोई दुर्घटना होना इनके लिए एक सुनहरा अवसर लाता है, दिमाग की बत्ती जलाता है,  यदि बालात्कार न हुआ होता तो हम बता नहीं पाते की हमारा धर्म कितना महान है, इसमें सजाये बहुत ही बेहतरीन,स्वादिस्ट, लाजवाब  और उम्दा किस्म है , आज के "आई एस आई" मार्क के गारंटी से भी बेहतर. मानो यदि ये धर्म होता तो बालात्कारी के अंग मे चिर काल तक की शिथिलता होती,  हद है भाई  किसी बात की, ये सज्जन लोग पीड़ित से सहानुभूति और संवेदना दिखाने की जगह, इसको सीढ़ी बना अपने "होली" प्रोडक्ट का प्रचार करते हैं, कौन जाने कहीं कुछ बिक जाए. मानो कोई दुर्घटना न हो होके, मेला या "फेस्ट" का आयोजन हुआ हो, बेच लो जितना बेचना हो, कर लो मार्केटिंग, नहीं टार्गेट पूरा नहीं होगा.  माल भले ही रेपर में लिपटा हुआ कचड़ा हो.  

एक भाई साहब ने तो  "इस्लाम में बालात्कार" पे  "दो बाई पांच"  का पूरा लेख ही लिख डाला जैसे यहाँ हमेशा बालात्कार ही होते हो. खाना - पीना सोने  की तरह ही बालात्कार भी एक जीवन का एक अभिन्न अंग हो. क्योकि जहाँ धुप हो   छाते वहीँ लगाये जाते हैं.  मेरे समझ नहीं आया की ये बड़प्पन बता रहे हैं,  दिनचर्या. 

 मैंने एक मित्र "जेब अख्तर" जी  के लेख में पढ़ा था की बंगला देश में यदि एक किसान की बीवी और मवेशी बीमार पड़ते हैं, तो किसान मवेशी के बचने की दुआ पहले मांगता है। वजह। वहां के बाजारों में एक सेहतमंद मवेशी (गाय, बैल वगैरह) की कीमत १५ से २० हजार रुपए तक होती है। जबकि इसी बाजार में आपको एक औरत महज ५ से १० हजार में मिल जाएगी। इसलिए फायदे का सौदा मवेशी को बचाना ही है। दूसरे अगर किसान की बीवी मर जाती है, तो दोबारा विवाह में उसे दान-दहेज भी मिलता है। जो कि मवेशी के मरने के बाद मुमकिन नहीं है। वही कर्गिस्तान में औरतों का अपहरण कर बलात्कार करना एक सामाजिक रश्म से जादा कुछ नहीं वहां की सरकार भी इस अपराध को मूक रहकर सहमती देती है, यदि कोई कहीं पकड़ा भी गया, तो मामूली जुरमाना भर ही लगता है. इसी तरह एक जगह रूस के पास है चेचेनया, जहाँ विवाह के लिए औरतो का अपहरण या बलात्कार हो जाना बहुत ही आम बात है, कुछ देशों में तो औरतो का बकयादा बाजार लगता है.  और इसी तरह के हालत और भी मुल्को में हैं. ध्यान देने योग्य बात ये है की इन सभी देशो शरियत है. मैंने पहले भी कहा था हम बेहतर है कहने की बजाय कुछ बेहतर करने की कोशिश कीजिये फिर "रिलिजन मार्केटिंग" की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. 

कुछ मुसलमान भाई बहनों ने कहा की बालात्कारियो की सजा शरियत के हिसाब से हो, कड़ी से कड़ी, इसमें कोई बुराई भी नहीं, अपराधियों को कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन क्या शरियत ये गारंटी भी लेता है की अपराधी को १०० प्रतिशत शुद्ध जहन्नम ही मिलेगा? जैसे "लक्जरी जन्नत" दिलाने और "सौ प्रतिशत शुध्द इश्वर" दिलाने का लेता है.शरियत का नियम है जैसे को  तैसा या पीड़ित के परिवार के मर्जी के मुताबिक, पीड़ित या उसका परिवार चाहे तो उसे कम कर सकता है.  जो हर तरह से जायज है होना भी चाहिए ताकि अपराधियों में खौफ  हो की जो उसने पीड़ित के साथ किया है कौन जाने पीड़ित उससे भी बुरी सजा मुकर्रर करे, लेकिन यही जैसे को तैसा या पीड़ित के मर्जी के हिसाब से महाभारत में भी उल्लेख है जब द्रोपदी ने अपनी इक्षा से दुशाशन को दंड देने का संकल्प लिया था. खैर ये तो रहा एक "रिलिजन मार्केटिंग" की पालिसी. 

एक तरफ तो युवावों का एक हुजूम संवेदना, दुःख और विरोध प्रकट करने कही पर लाठिया और पानी की बौक्षारे खा रहा हैं. और ये युवा किसी संगठन से नहीं,किसी धर्म विशेष से नहीं, किसी  सवर्ण या दलित जात से नहीं, न ही किसी राजनितिक प्रेरणा से, वरन ये सिर्फ युवा हैं जो अपना आक्रोश प्रकट रहे है, वहां कोई किसी से नहीं पूछ रहा तुम किस जात से हो? किस धर्म से हो?  जिसको दबाने के लिए सरकार की तमाम धाराएं भी नाकाफी है, ये वही युवा है जिनको हम "माल्स" "मल्टीप्लेक्स" में आनंद  मानाने वाला या पार्को में आमोद प्रमोद करने वाला "कूल द्युड्स" कहते हैं.आज इन युवावो ने ये बता दिया है की "कूल द्युड्स" आनंद मानाने के लिए ही नहीं बना, बल्कि सामाजिक जेम्मेदारी लेना भी जानता है. यदि ये सडको पे आ जाए तो सरकार के "धारा" को "पसेरी" बना सरकार, के मुह पर मार सकता है. लेकिन जब सरकार बेशर्म हो जाए तो उसपर कुछ भी असर नहीं होता, आज के हालत देखने के बाद तो यही लगा की इंडियागेट "लीबिया" है और सरकार "गद्दाफी".इस स्थिति में आक्रोश प्रकट करने तक तो ठीक है लेकिन लाठी या बौछार खाना  नहीं क्योकि इनके दिल का दर्द मर चूका है वो आपका दर्द क्या जानेगा? कुछ दिन बाद सब  चुप हो जायेंगे ... बाद में फिर वही सिनेमा वही माल्स . चुनाव के समय फिर इसी सरकार को वोट दे देंगे जो लाठी चार्ज करवा रही है.  क्या फायदा  इन पर  चोट करनी हो तो इस सिस्टम और सरकार के खिलाफ वोट करो, यदि किसी चीज का हल पानी में भीगना है तो, मछलियान और मगमछ्छ दोनों ही देश के सिरमौर होते, हलाकि की आज देश में मगरमच्छ तो है, लेकिन मच्छलियों को खाने के लिए.  


 नेताओं का ये मिथक टूटना जरुरी है की भीड़ बहुत मासूम होती है,  इनको कुछ पता नहीं होता, इनके मासूमियत को ये कभी भी वोट का शक्ल दे सकतें हैं. इनको ये बताना होगा की हमारी चोट तुम्हारे लिए भगवान् के लाठी की  तरह ही होगी जिसमे कोई आवाज नहीं होती, लाठी के जगह मुहर से काम लो.  चीखने चिल्लाने या हुजूम  जुटाने से सरकार सहम तो सकती है वो भी थोड़ी देर के लिए, लेकिन न्याय नहीं मिल सकता. यदि इन सब से  कुछ होता तो भेड का भी राज  भारतीय जनता के दिल में होता,  बजाय की संसद और देश के.  इन पर चोट करो, इनके खिलाफ वोट करो. सरकार द्वारा फेके गए पानी में भीगने से अच्छा है सरकार पर ही पानी फेक के इनकी गर्मी शांत करो. पानी पिने से बेहतर है "पानी पिलाना".

जहाँ एक तरफ धर्म जाती और जात भूल युवा चीख रहा है वहीँ कुछ लोग अटकले लगा रहे हैं, की लड़की दलित थी या सवर्ण, यदि दलित होती तो  शायद इतना चीख  पुकार न मचता. भाई पीड़ित बस पीड़ित होता  है ,क्या  किसी ने उससे  पूछा था क्या ? बहन तुम सवर्ण हो या दलित?  या किसी ने सिक्का उछाल के पता किया था "हेड" आया तो सवर्ण, "तेल" आया दलित ? क्योकि उस  समय तो वह बोलने की स्थिति में ही नहीं थी. यह तो एक प्रकार जन आक्रोश  है, जो बाल्तकार के हद से ऊपर अत्याचारियों के हैवानियत से उपजा है, क्या  वो जो दरिन्दे थे उस  समय उसकी जात  पूछी होगी ? क्या उनमे से आधे से जादा दलित थे इसीलिए सवर्ण जान लड़की के साथ  बालात्कार के बाद है हैवानियत की हद कर दी, या एक दलित यदि दलित लड़की का बाल्तकार करे तो तो कुछ डिस्काउंट देगा?  

हद है किसी चीज की क्या सवर्ण जाती में पैदा होने से ही व्यक्ति "इनबिल्ट" "ऑटोमेटिक" और "बाई डीफाल्ट" 'दलित विरोधी' हो जाता है ?  आजकल  मई खुद बड़ी शंका में हूँ , दलित  मेरे कई दोस्त हैं जो मुझसे किसी भी मामले में कम नहीं है, और न ही  उनको मई अपने से कम मनाता हूँ , लेकिन पता नहीं क्यों लगता है की यदि उनके  किसी भी गलत बात का विरोध कर दूँ तो मई " दलित विरोधी" हो जाता हूँ. मई आजकल शंका में हूँ इन "तथाकथित" दलित भाईयों  की गलत बातो का विरोध करू या न करू ? इसको सही या गलत के पैमाने से देखा जायेगा या सवर्ण दलित के ? वैसे मेरी तरह ये भी "कन्फ्यूज" है,  या ये कहिये इनमे जो जितना जादा पढ़ा लिखा है वो उतना ही कन्फ्यूज होता जा रहा है. कभी ये बुध्द को सिरमौर बनाते हैं तो कभी "हरिनाकश्यप" को अपना पूरखा, यानि बुध्द और हरिनाकश्यप में कोई सम्बन्ध है, क्योकि एक इनमे  पुरखा है और एक अग्रज.  यदि आज के दलित भाईयों का मध्य माना जाय तो स्वर्ग में जरुर बुध्द जी हरिनाकश्यप के पाँव छुते होंगे, बुजुर्ग  जो ठहरे.

ये सब देख, एक खास  मानव जाती को एक ख़ास मानव जाती से मुक्त  कराने वाले अम्बेडकर  जी अपना सर धुनते होंगे की जिस सवर्णों से इनकी मुक्ति दिलाई थी ये उन्ही अनुयायी बन गए, और जिस राक्षस जिंदगी से मुक्ति दिलाने का प्रयत्न किया था उसी को पुरखा बता रहें हैं. 

देखने वाली बात ये है की आज का दलित किसी भी मामले में पुराने  शोषण करने वाल ब्राह्मणों से कम नहीं है .पहले ब्राहमण होने मात्र से दलितों का शोषण करते थे, और आज सवर्ण जाती में पैदा होने मात्र से वह  "शोषक"  हो जाता है,  हक छीनने  वाला लुटेरा, और जुल्म करने वाला आततायी हो जाता है, और अपने आप को  खुलेआम दुर्वचन कहने का लाईसेंस भी दिलवाता है. तो दलित किस तरह से अलग हुए उस  जमाने के ब्राहमणों से ??  कुछ तो खुले आम कहते हैं की हम पुराना बदला ले रहें है,  यानि यदि हम मानते है की जो हुआ वो गलत था, लेकिन ये नहीं, शायद ये यही मानते हैं की जो शोषण हुआ वो सही हुआ, तबभी हमें  मौका मिला, या शोषक होने की राह पर कोई भी अँधा हो जाता है. ?? मुझे कभी कभी ये शंका होती है कही ये जानबूझकर  तो  शोषित नहीं हुए फिक्स डिपोजिट की तरह की बाद  भविष्य में वसूल के साथ बदला लेंगे. क्योकि इने से अधिकतर  की बातों से  बराबर के अधिकार और हक़ की बाते कम, और  इतिहास को  इंगित कर बदला लेने की बाते जादा कही जाती है. इस प्रकार के दलित (?) बुध्दजीवी  किसी भी प्रकार से पुराने जमाने के ब्राह्मणों से कमतर नहीं मान सकते है, क्योकि विद्वेष ये भी फैलाते हैं . 

एक बात और गौर करने लायक है, जिन ब्राह्मणों  को मंदिरों का ठेकेदार बता कर एक सूत्रीय "कोसो कार्यक्रम" आयोजन होता है वही दूसरी तरफ उसी मंदिर से सम्बन्धित अन्य व्यवसायियों को बाईज्जत बरी बस इसलिए कर दिया जाता हैं क्योकि वो ब्राहमण नहीं है, शायद वहां भी दलित एक्ट काम करता हो . देश में  किसी भी मंदिर में चले जाओ,  ब्राह्मण १०० , या २०० मांगे तो उसको आधा दो तो जादा बकझक नहीं करता क्योकि और भी ग्राहक सम्हाल्नाने है, भीड़ जादा होती है. वही दूसरी तरफ मुंडन करने वाले नाई  को आप एक रुपया कम दें तो  वो गुस्से से आग बबूला हो जाताहै मानो बाल के बाद आपकी गर्दन तक कलम कर देगा.   उसी मंदिर में नाई होता है, उसी मंदिर में कहार भी होता है, एवं अन्य  गैर ब्राहमण लोग भी होते हैं जो मलाई बराबर खाते हैं लेकिन गाली तो सिर्फ ब्राहमण ही सुनेगा. कई गैर ब्राह्मणों को तो मैंने ब्रह्मणों के लिए एजेंटी तक करते देखा है, ख़ुशी ख़ुशी, बाद में आधा आधा. और ये मई हवाई  बाते नहीं बल्कि इसको दलित और सवर्ण दोनों ने महसूस किया होगा, यदि नहीं किया है तो अब से जब भी जाएँ गौर करें. 

वास्तव में जाती पाती का स्थान ब्राह्मणों ने क्यों बनाया कैसे बनाया पता नहीं, न ही मई इसमें जाने की जरूरत समझाता हौं , लेंकिन इसका बस एक ही पहलू है, एसा भी नहीं  है . पुराने जमाने में चमड़े के व्यवसायी को उसके  जाती की संज्ञा दी गयी, यहाँ वह विशेष वर्ग फेल हो गया, दलित हो गया,  जाती के आधार पर नहीं बल्कि "मैनेजमेंट " में, आज वही जब  सवर्ण  १००रुपये का चमडा उतार उसकी ब्रांडिग कर  १००० से १० हजार में बेचता है तो  जूते का उद्योगपति कहलाता है. अब किसने कहा था की आप एसा न करो. अब सोचिये जिस बाल्मीकि जयंती को दलित भाई मानते हैं उसी की किताब को ये मैनेज नहीं कर सके और यदि ब्राह्मणों ने इसे मैनेज  कर  व्यवसाय बना लिया ? वो जमाना आज की तरह आधुनिक तो नहीं था, लेकिन जहाँ चाह वहां राह. आज आपको कौन  रोकता है ? न उस समय कोई रोकता था, तो आपने सहा और यहि है आपका सबसे बड़ा गुनाह. मतला ये है, की इंसान किसी भी जाती में पूज्य हो सकता है, जाती कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, भीम राव अम्बेडकर का जिसने भी उनका विरोध किया उसने मुह की खाई. वो  किसी जाती के मोहताज नहीं थे.  न तो द्रोणाचार्य ठीक था जिसने जाती पाती के आधार पर एकलव्य का अंगूठा काट डाला न ही, न ही दलित के  आड़ में हत्याए करने वाला आज  के बीसियों  गिरोह.

 जब भी कोई किसी दुर्घटना में पीड़ित होता है  तो दर्द सबको होता है,  न की सवर्ण,  दलित, हिन्दू मुसलमान धर्म या मजहब देख के .   

डर लगता है मुझको सही बात कहने से!
कोई देख न ले उसको, हिन्दू या मुस्लिम के चश्मे से.(kamal)
सादर 
कमल कुमार सिंह 
२३  / दिसम्बर / २०१२ 

Thursday, December 20, 2012

ये मोदी नहीं, जनता जीती.


तमाम कयास बयानबाजी को धता बता आखिर मोदी जीत ही गए. गुजरात में विपक्षी और  देश में विपत्ति हो चुकी कोंग्रेस के दिन अब जल्द ही लदेंगे ये जनता ने दिखा दिया है.

 बाप भले ही अपने बेटी से कितना भी प्यार करे लेकिन लेकिन उसको ले जाने वाला दूल्हा ही होता है, लेकिन कोंग्रेसी बाप कुछ उन  निकृष्ट बापों में से है जो अपनी ही बेटी का सौदा करने से नहीं चुकते, ये बात कोंग्रेस ने समय समय पर खुद अपने कृत्यों द्वारा सिध्ध किया है. जो भी इनके कंधो पर अपना दारोमदार डालता है, ये उसी पर विप्पतियों का पहाड़ डाल मानो ये जताने की कोशिश करते है की तुमने हमें जेम्मेदारियां दी और हमने तुम्हे विपत्तियाँ, लो हिसाब बराबर.असम में जिन मुसलमानों ने इन्हें अपना मसीहा बनाया, वहां इतना खून खराबा हुआ जो आने वाले समय में एक इतिहास रहेगा. समय समय पर इनके सहयोगी दल सपा और अन्य भी कुछ एसा ही करते दीखाई देते हैं. जिस स्वदेशी के लिए गाँधी जी विदेशी कपड़ो की होली जलवाई  उन्ही के अगुवाओं का  विदेशी प्रेम देखते ही बनता है, चाहे वो व्यापार हो या अध्यक्षा. 

कोंग्रेस के जबरजस्त नकारत्मक प्रचार भी मोदी को  जनता से दूर तो क्या बल्कि हिला भी नहीं पाया. गुजरात ने तय कर लिया की मौत का सौदागर जो रोटी दे वो उन अमनवालों से लाख गुना बेहतर है जो रोटी छीनते है.
गुजरात ने ये  दिखा दिया की सबकी बाप बनने वाली कोंग्रेस का गुजरात पे कोई जोर नहीं, गुजरात मोदी से  प्यार से करती है.  
कोंग्रेस का यह कहना हास्यद्पद ही की  हम खुश है क्योकि मोदी उस बहुमत से नहीं जीत रहे जिसकी आशंका थी, ये कुछ वैसा ही लगता है जैसे कोई कहे की हम ताकतवर हैं क्योकि वो हमें लात घूंसों, डंडे, छड़ी से मारने वाला था, लेकिन बस एक लात ही लगाई.   

अब देखना ये है की भारत की जनता मोदी से कितना प्यार करती है. युवावों  और बुजुर्गो दोनों में ही मोदी की लोकप्रियता अब गुजरात की सीमाए तोड़ लगभग हर प्रदेश में बह चली हैं पुरे देश का बहुमत यही  चाहता है की मोदी प्रधान मंत्री बने, लेकिन क्यों ? क्या कारन है मोदी के आगे सभी नेता बौने हो  चुके हैं चाहे वो पक्ष के हों या विपक्ष के ?  क्या कारन है की कोंग्रेस के साम्प्रदायिक कुटिल चालो से भारत की जनता अब और  क्यों नहीं प्रभावित होगी ?  इस कई कारन है, बकवास की जगह विकास सबसे अहम् मुद्दा है जो मोदी ने कर दिखाया, कोंग्रेस के दांत हाथी के हैं ये पूरा देश देख रहा है. पुरे कई सालो तक कोई काम न करने वाली कोंग्रेस चुनाव  पास देखते ही डेल्ही में ६०० रूपये सीधे सबके अकाउंट में डाल, वोट के  खरीद फरोख्त को लोकतान्त्रिक बनाने का  तरीका जनता देख भी रही  है और समझ भी रही है. जनता भी कोंग्रेस को कोंग्रेस के कुटिल चालो से ही जवाब देगी, पैसा भी ले लेगी और वोट भी नहीं देगी, और इसलिए लिए कह रहा हूँ क्योकि ये बाते मैंने बहुतों के मुह से सुनी है. गुजरात चुनाव के दौरान कोंगेस के अध्यक्षा सोनिया जीका ये कहना की इंदिरा जी यहाँ  आयीं थी और आपने उनको वोट दिया और हम उनकी बहु हैं यहाँ आई हैं, हमें भी वोट दें, बड़ा ही हास्याद्पद  और राजनातिक अदुर्दार्शिता ही दिखाती है. इनके कहने का मतलब ये की देश की जनता कई सालो तक कोंग्रेस की गुलाम रही है और आज भी रहिये. 

इन सब के विपरीत मोदी ने सिर्फ और सिर्फ  विकास को मुदा ही नहीं बनाया बल्कि उसको क्रियान्वित कर पुरे देश के लिए गुजरात को रोल माडल बनाया. मोदी ने अपने राज में कभी हिन्दू मुस्लिम की बाते नहीं की कही बल्कि हमेशा ६ करोड़ गुजरातियों की बाते कर हमेशा सबका दिल जीता. इसके विपरीत प्रधान मंत्री जी का ये कहना की देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यको का है, एक तरफा  साम्प्रदायिक सोच के अलावा  कुछ नहीं दिखाता और ये बात अल्पसंख्यक समुदाय भी बेहतरी के साथ समझता है, दिखाने को लोलीपोप खिलाने को नफरत का जहर. जाती पाती  और धर्म को परे रखना भी मोदी की जीत में एक बहुत बड़ी भूमिका बनाते हैं. चुनाव से पहले कुछ धार्मिक  संगठनो का  लालच स्वीकार न कर उन्होंने ये साबित कर दिया की चुनाव धर्म और साम्रदायिकता के आधार पर नहीं बल्कि कार्य से जीते जाते हैं. बहुसंख्यक जनता ने बहुत ही सूझ बुझ का परिचय दिया है और ये बता दिया है. 

मोदी की जीत से राजीनीतिक गलियारे में फिर से सुगबुगाहट जागेगी. अब देखना ये है की गुजरात के लिए बडबोली कोंग्रेस का मुह तो देखने लायक होगा ही हालकी इतने बडबोलेपण के बाद शायद ही उसको दिखाना चाहिए लेकिन फिर भी मान लेना चाहिए की बेशर्मता की हद को पार कर दिखाती भी है, जिसके लिए वो जानी जाती है तो चेहरा कैसा होगा ? साथ ही भाजपा के सीने में जादा दर्द होगा. भाजपा चाहती तो थी की मोदी जीते लेकिन  इसके साथ की उन्हें प्रधानमन्त्री पद की उम्मेदवारी से वंचित रखा जाये. यानी एक उस पुरुष की तरह जो किसी महिला को उसकी खूबसूरती और व्यक्तित्व से  प्यार तो करता है लेकिन अधिकार नहीं देना चाहता, बल्कि इस्तमाल कर संतावना देने की फिराक में है. लेकिन भाजपा को यह समझना चाहिए की उसके हिंदुत्व के एजेंडे में अब कोई दम नहीं है, बल्कि मोदी मैजिक है भाजपा को आगे ले जा सकती है. मोदी ही वह मैजिक है जो हिंदुत्व का ध्यान रखने के साथ मुसलमान, पारसी और अन्य धर्मो को उनको पूरा हुकुक, इज्जत दे सकती  है, न का भाजपा का थोथा चना बाजे घना.भाजपा को मोदी का प्रधानमन्त्री पद से दरकिनार करना भाजपा को निश्चित ही भारी पड़ेगा क्योकि मोदी जितना मजबूत कन्धा भाजपा के किसी नेता का नहीं जिस पर  पर वह अपना चुनावी  बन्दुक रख विपक्षी को निशाना बना सके.   

मोदी जी को बधाई, भाजपा को नसीहत, और कोंग्रेस को मेरी तरफ से गुजरात के लिए हार्दिक श्र्न्धांजलि और संतावना. 

सादर
कमल कुमार सिंह 
२० दिसम्बर २०१२ 



Tuesday, November 27, 2012

प्रगतिवादी मुस्लिम की व्यथा


कट्टरता से भला भी हो सकता है बुरा भी, यदि कट्टरता सकारत्मक हो तो परिवेश बदल सकता है, नकारात्मक  हो तो विध्वंशक हो जाता है. 

बाबरी मस्जिद काण्ड नकारत्मक कट्टरता का ही एक नमूना है, उसका इतिहास चाहे जो भी रहा हो, भले ही वह हमारे धर्म से सम्बन्धित न रहा हो, लेकिन फिर भी वह हमारी धरोहर है, क्योकि भारत में है, हमारे देश में है और हिन्दू मुसलमान सबका है. लेकिन इसी तर्ज पे कट्टरवादी मुसलमान चार हाथ और आगे है, हाल में ही शांति के प्रतिक बुध्ध्द जी की प्रतिमा का लखनऊ में तोड़े जाना इसी  बात का प्रतिक है, मुसलमान दशको पहले बाबरी का रोना तो रोते हैं लेकिन ठीक वही काम वो आजतक करते आ रहे हैं. 

इन सब के पीछे क्या कारण है ? कुरआन ? क्योकि मुल्ले (मुसलमान नहीं ) हर बात पे ईश्वरीय वाणी का हवाला दे हर बात पे बरगलाते हैं. ये हर मुसलमान के मन में भर दिया जाता है की कुरआन ईश्वरीय वाणी है. सारी जड बस यहीं से शुरू होती है. 

जिस समय कुरआन की रचना हुयी उसका उद्देश्य बड़ा स्पष्ट था, मानव जाती को सुधारना न की बिगड़ना. इसी सोच के साथ उन्होंने कुरआन की रचना की. उन दिनों अरब में शिखर तक लुट मार और पापाचार फैला हुआ था, औरतो का बिकना, हत्या, लूटमार, वहां का लोकाचार था. जिससे मोहम्मद दुखी रहा करते थे, शायद  वो एक सदात्मा थे .. तब उन्होंने अरब वासियों को सुधारने के लिए कुरआन लिखा (लिखवाया). 

और अपने विचारो से सबको अवगत करने की सोची.लेकिन बदलाव किसको पसंद है ? लोगो ने विरोध किया, यहाँ तक की लोग मोहम्मद के दुश्मन भी हो गए, मोहम्मद भागे भागेफिरने लगे, फिर उन्हें एक उपाय सुझा, क्यों न इश्वर  का सहारा ले कर इनको इंसान बनाया जाए, कहते हैं न की हिम्मते मरदा मददे खुदा, फिर उन्होंने अपनी बातो को इश्वर वाणी बताई ताकि कम से लोग उनको सुने, यदि  मन मात्र के भले के लिए कोई झूठ बोले तो उसे पाप नहीं माना जा सकता.जिससे लोगो में बदलाव हुआ, लोग रस्ते पे आना शुरू हुए. उनको ये नहीं पता था की  मानव इतना नीच है की उनके जाने के बाद कालांतर में ये मानव अपने कुकर्मो का बिल भी उन्ही के नाम पे फाडेगा. बाद में स्वार्थी मुल्ले मौलवी मोहमद के नाम पर ही उल जलूल व्याख्या कर लोगो को कट्टर बनाने का काम शुरू किया सिर्फ अपने फायदे के लिए, बिना ये समझे की मोहम्मद ने इसको इश वाणी का नाम क्यों दिया. किसी भी चीज के दो पहलू होते है, इश्वर के नाम पे सुधार की शुरुवात मोहम्मद ने  की और बिगाड़ की शुरुवात इनके स्वार्थी अनुयायियों ने. 

कुरआन पढ़ने से स्पष्ट मालूम पड़ता  है की वो सिर्फ अरब वासियों को ध्यान में रख कर बनाया गया था. अब आप ही सोचिये यदि कुरआन भगवान्/परमेश्वर का होता तो सिर्फ अरब आधारित क्यों लिखा जता ?? सारे तथ्यों का आधार अरब ही क्यों होता ? या तो उसमे पूरी दुनिया के बन्दों को मुसलमान मानना चाहिए क्योकि इश्वर ने सारे दुनिया के हर इंसान, जीव को बनाया है.  लेकिन उसमे गैर मुसलमान का जिक्र क्यों ?? क्या बाकी भगवान् के पुत्र/या उनके बनाये नहीं है ? क्या इश्वर कभी ये कह सकता है की तुम मेरे बेटे हो और वो नहीं ? क्या इश्वर भी धर्मांध हो सकता है. हाँ  चाहे तो वो ये कह सकता था की अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान, बुरे मुसलमान अपने पे ईमान लाये, न की इश्वर "गैर मुसलमान" शब्द का प्रयोग करता. क्या इश्वर मानव को दो भागो में विभक्त करना चाहता था ?  भाई धर्म अच्छी चीज है, उसका उपयोग गलत और सही हो सकता है. धरम ग्रन्थ हमारे लिए हैं हम धर्म ग्रंथो के लिए नहीं,  ठीक वैसे ही जैसे ताला चाभी घर के लिए बनाया जाता है, किसी घर को ताला चाभी के लिए नहीं बनाया जाता, क्योकि यदि हम धर्म के नाम पर धर्मांध हो गए तो हमारा फायदा, मुल्ले/पंडित/ पादरी और इन सबके पिता जी - नेता लोग उठा ले जाते है..और हमारे दिमाग में भी ये बाते बस इसीलिए भरी जाती है की हम इनके लगाम में रहे है. 

कालांतर में कुरआन में गुपचुप तरीके से न जाने कितने बदलाव हुए लेकिन ये बाहर नहीं आने दिया जाता की हमने कुछ बदलाव किया है, वो बदलाव नकारात्मक है.इन मुल्लो की परेशानी ये थी कुरआन को पूरी तरह से बदल भी नहीं सकते थे, क्योकि कुरआन आते ही कुछ अच्छे आलिम लोगो के हाथ में भी पहुची, वो इन मुल्लो का पोल खोल देते, इसलिए इन मुल्लो ने बड़े सुनियोजित ढंग से कुरआन में चुपके चुपके बदलाव किया. कई पीदियो तक.... मेरी बात की सत्यता जाचना चाहते हैं तो कुरआन की ही कई लेखको द्वारा टीका पढ़िए, सबने अपने अपने हिसाब से टिका  लिखा है. ये हाल सिर्फ कुरआन के साथ ही नहीं बाकी सारे धर्म ग्रंथो के साथ भी है . तो जब बदलाव हो ही रहा है तो सकारत्मक क्यों न हो. क्यों हम इश्वर के पाँव में जंजीर जंजीर बाध् उनको भी अपने बुरे कामो में घसीटते रहे ? 

कुरआन बस एक साहित्य है, किसी के अपने निजी विचार, जो मानव मात्र के भलाई के लिए बनायीं गयी और असरदार ढंग से काम करे इसलिए इश्वर का सहारा लिया गया. इससे जादा और कुछ नहीं ये कोई इश्वर की किताब नहीं. अब मुसलमान भाई कहते हैं, की कुरआन जैसी एक आयत लाओ जो "डिफरेंट" हो. भाई हर लेखक  अपना विचार होता है. अब मई ये कहूँ की तुम प्रेमचंद्र जैसी जैसे कोई एक कहानी लाओ, बिलकुल डिफरेंट, माने लोचा , कुरआन जैसी भी हो और डिफरेंट भी हो. अजब दिल्लगी है भाई.

फिर कहते हैं हिन्दू को धर्म नहीं, रामायण या गीता में कहीं भी इस शब्द का कोई उपयोग नहीं. बिलकुल सत्य वचन. हमारे परिवेश के कारन  हमें हिन्दू कहा गया. और रामायण और गीता में हिन्दू या किसी धर्म का नाम न होना ही उसका बड़प्पन है. क्योकि ये साहित्य मानव मात्र के कल्याण  के लिए है न की किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए.और इसके विपरीत कुरआन में मुसलमान का जिक्र आया है क्योकि उस जगह की परिस्थितिया और अरब जगह मुसलमान ही थे. मोहम्मद साहब ने बस इस शब्द का उपयोग न कर "बुरे" या "अच्छा"  मानव का शब्द इजाद किया होता तो शायद ही आज कोई वैमनस्यता होती. मुसलमान भाई भी कहते है की कुरआन किसी धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बजाय इसके की यही सबसे उच्च धर्म है,और मुसलमान सबसे बेहतर है.

 हम बेहतर है" वाला ऐटीटयूट भी गलत नहीं है, बशर्ते इसी को कर्मो द्वरा पूरा किया जाये बजाय की दुसरे धर्मो और उनके प्रतीक चिन्हों पे आघात करना, जरा सोचिये किसी की भावनावो पे चोट कर क्या आप इश्वर को खुश कर सकते हैं ? जरा सोचिये दुनिया की तस्वीर क्या होगी जब "हम बेहतर है" दिखाने के लिए सारे धर्म वाले आपस में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बेहतर से बेहतर कार्य के लिए करे. मुसलमान कहे हम बेहतर है  हमने १० को सहारा दिया, हिन्दू कहे की नहीं भाई हम भी है, हमने भी ५ को सामर्थ्यनुसार तो सहारा दिया है, इसाई कहे की हम ३ का पालन पोषण करते है. बुराई तब आ जाती है जब हम बिना कुछ किये दुसरे को कहने लगते है की तुम खराब हो.

एक प्रगतिवादी मुसलमान भाई के दिल की कसक ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ :- 
एक बात जो इस्लाम में बहस का मुद्दा हो सकती है या कहुं की सरे मज़हब का सुधर कर सकती है की क्या कुरआन और शरियत के बहार जाया जा सकता है क्या आज के समय के हिसाब से चला जा सकता है , तो में यही कहूँगा ( चाहे इसके बाद मेरे खिलाफ फतवों की बारिश भी हो जाये ) हाँ बिलकुल जाना चाहिए , और ये मुहम्मद सल्लालाहू अ.व ने भी कहा था की जब किसी नतीजे पर न जा सको तो अपने दिमाग से काम लेना हो सकता है हर बात का जवाब कुरान या हदीस न दे पाए. एक समय जो इस्लाम का सुनहरा दौर कहा जाता है उस वक्त तब एक शब्द का ज्यादा इस्तेमाल होता था एवं उसे ‘इज्तीहाद कहा जाता था। इस शब्द का अर्थ है स्वतंत्र चिन्तन। व्यवहार में यह शब्द हर आदमी औरत को यह आज़ादी देता था कि वे महजबी सीखों को आज के दौर की कसौटी पर कसें एवं फिर उन पर अमल करें। किन्तु जैसे-जैसे मुस्लिम साम्राज्य स्पेन से बगदाद तक फैला मुफ्तियों ने इस सल्तनत की रक्षा के लिए स्वतंत्र चिन्तन के द्वार बन्द कर दिये। इस तर्क एवं चिन्तन का स्थान फतवों ने ले लिया एवं मुसलमानों को सिखाया गया कि वे खुद सोचने की जगह इन फतवों पर अमल करें। इस्लाम के वर्तमान युग की त्रासदी यही है कि मुसलमान अपने दिमाग में उठने वाले सवालों को खुले में उठाने से डरते हैं एवं मुल्ला मौलवियों द्वारा जो कुछ भी कहा जाता है उस पर अमल करते हैं। और यही सरे फसाद की जड़ है ,
मेरा सभी मुसलमान भाई और बहनों से निवेदन है की ज़रा इस बात पर ज़रूर गौर करें.

अगर हम अपने उलेमा, राजनीतिज्ञों एवं मुल्लावों की तकरीरों को सुने तो वे हमेशा पश्चिमी सभ्यता के खोट गिनाते दिखेंगे किन्तु वही मुल्ला एवं पालिटीशियन अपने बच्चों को अमेरिका के स्कूल एवं कॉलेजों में दाखिले के लिए जमीन आसमान एक किये रहते हैं। तमाम अमीर मुसलमान परिवार पश्चिम में छुट्टियाँ मनाते नजर आते हैं। यहाँ तक कि धन से भरपूर खाड़ी के देशों में भी वहाँ की अवाम अपने को सोने के पिंजरे में बन्द महसूस करती है। आखिर क्या वजह है कि इस्लाम रचनात्मकता, नई सोच और मानवाधिकारों का गला घोटने वाला मजहब बन गया है। पाकिस्तान १९४७ में वजूद में आया था लेकिन एक साल बाद जन्म लेने वाले इजराइल से कहीं पीछे रह गया है।इस्लाम के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस मजहब का जन्म अरब में हुआ जहाँ घुमन्तु रेगिस्तानी कबीले रहा करते थे। कबीलों की एक विशेष संस्कृति होती है। उनका अस्तित्व किसी शेख का हुकुम मानने पर निर्भर करता है। वहाँ मर्द राज करता है एवं औरत की कोई अहमियत नहीं होती।
आज भी अरब लोग खुद को असली मुसलमान और बाकी इस्लामी दुनिया को धर्मान्तरित मुसलमान समझते हैं। बाकी दुनिया के मुसलमान भी इसी अरबी मानसिकता को पालने एवं रीति रिवाजों की नकल करना चाहते हैं। मांजी का मत है कि मुस्लिम जगत पर औरतों की यह पकड़ दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशवाद है। इक्कीसवीं सदी में जरूरत इस बात की है कि दुनिया के बाकी मुसलमान अरबों की इस कबीलाई सोच एवं रीति रिवाजों से छुटकारा पायें।
आप अरबी मुसलमान नहीं हैं आप हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं और हमको चाहिए की जो रिवाज हमारे हैं अगर हम गोर करें तो कहीं भी इस्लाम के खिलाफ नहीं हैं बल्कि अरब मुल्कों से कहीं ज्यादा बेहतर हमारे मुल्क के रिवाज हैं हमको खुद को अपने मज़हबी दायरे में रहकर खुद में बदलाव लाना चाहिए जो आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है.
अगर किसी को मेरी बात से दुःख या टेस लगे तो माफ़ करना लेकिन हकीकत से मुहं छुपाना कायरता होती है.

सम्बंधित लेख (क्लिक करें)  :- ये जाहिल है, मुसलमान नहीं
सादर

कमल कुमार सिंह
२७ नवम्बर २०१२

Tuesday, October 2, 2012

गिरगिट गैंग के गिरगिट समर्थक

कोंग्रेस का हाथ अन्ना के साथ 

गिरगिट (Chameleons) एक प्रकार की छिपकली है। तोते की तरह के उनके पैर; अलग-अलग नियंत्रित हो स्कने वाली उनकी स्टिरियोटाइप आँखें; उनकी बहुत लम्बी, तेजी से निकलने वाली जीभ; सिर पर चोटी (क्रेस्ट); तथा कुछ द्वारा अपना रंग बदलने की क्षमता इनकी कुछ विशिष्टताएँ हैं। इनकी लगभ्ग १६० जातियाँ "हैं " जो अफ्रीका, मडागास्कर, स्पेन पुर्तगाल, दक्षिण एशिया आदि में पायी जातीं हैं।

 लेकिन सन २०११-१२  के दौरान भारत में एक और १६१वें किस्म के  एक अनोखे और आश्चर्यजनक गिरगिट का पता चला जिसका चाल ढाल तो इंसानी था लेकिन बाकी विशेषताएं जैसे तेजी से निकलने वाली जीभ,  सिर पर चोटी (क्रेस्ट= अर्थात कोंग्रेस का हाथ); और अन्य विशेस्तावों से युक्त  पल पल रंग बदलने की अदभुद क्षमता, एसा माना जा रहा है की यह सबसे उन्नत किस्म का गिरगिट है जिसने  बाकि के १६० प्रजातियों को पछाड़ दिया है.

मेरा ये कहना गिरगिट और गिरगिट समर्थको को बुरा जरुर लगेगा, वो मुहे गालियाँ दे सकते हैं, या कुतरक, लेकिन हाँ तर्क सहित वो मेरी बात को गलत साबित नहीं कर सकते और इतना तो गिरगिट और गिरगिट समर्थक भी जानते  हैं.

जिस केजरीवाल और अन्ना  को दो साल पहले तक उसका खुद का मोहल्ला न जानता हो उसे आज पूरा देश जनता है. कैसे ??  सिर्फ और सिर्फ गिरगिट विकास के अध्याय में एक नयी  कड़ी जोड़ने के कारन मात्र, अब ध्यान देने योग्य बात ये है की इस नयी प्रजाति को विकसित करने की जरुरत क्या आन पड़ी ??


कई साल तक  पहले जमीनी कार्य और जनता  में अलख जगाने के बाद बाबा रामदेव ने काली सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने की तिथि की घोषणा जून २०११ निर्धारित कर दी तो महीनो पहले से जनता उस दिन का इन्तजार बेसब्री से करने लगी, क्योकि जनता सरकार के काली करतूतों से अजीज आ चुकी थी इसके कई कारन थे, पहला,  वेश्यावों के को रखने वालो, ब्लू फिल्म बनाने  वालो और अवैध बच्चो के पिता जी, और घोटाले उत्पादक सरकार से जनता तंग आ चुकी थी.. परेशांन थी, हैरान थी, उसको चाहिए था तो किसी का नेतृत्व, ये कमी बाबा राम देव ने पूरी कर दी तिथि  घोषणा के साथ.

जमीनी तौर से कई वर्षों से हर प्रकार के देश सेवा करने वाले बाबा रामदेव्  ने आन्दोलन से पहले जमीनी  रूप से ढेर सारे कार्य कर चाहे वो  स्वदेशी  हो, योग हो, आयुर्वेद  हो, या व्यापार हो शीर्षता हासिल कर  जनता मे परबा विश्वाश बना लिया था. जिससे कोंग्रेस  के पेट में बल पड़ने लगने, जरूरत थी एन केंन  प्रकारेंन  किसी भी तरह  योग गुरु बाबा रामदेव को नीचे दिखाना, लेकिन ये आसन काम नहीं था और न ही है. तो क्या किया जाए ?? अकबर  बीरबल के "रेखा छोटी करो" का सिध्धांत अपना बाबा के बराबर किसी भी इंसान को उस  स्तर तक लाया जा सके  चाहे  वो उस योग्य हो  या न हो, इसके लिए मिडिया का खूब इस्तमाल हुआ.

अब देखिये घटना क्रम कितनी तेजी से बदलता है.

बाबा के तिथि घोषणा के बाद है एक ऐसे गुमनाम शक्श को रातो रात भारत की जनता का मसीहा बनाया जाता है जिसको पिछली सुबह तक कोई जानता तक न था, जो शायद किसी महारष्ट्र के अनाम गाँव से था... वास्तव मैंने खुद भी इनका नाम कभी नहीं सुना था, और मेरी ही तह करोड़ो युवावों ने भी, जो महारष्ट्र से नहीं थे.

एक सभा बुलाई, बाबा राम देव को बुलाया, बाबा ने उसका परिचय अन्ना हजारे के नाम से इस देश को कराया. शायद ये सब पहले से सोची समझी योजना थी. शायद इसके पीछे केजरीवाल का दिमाग रहा हो.. केजरीवाल का इतिहास खंगाला  जाए तो केजरीवाल वास्तव में बहुत ही महत्वाकाक्षी व्यक्ति रहें है, एक बार इनसे  किसी टी वी वाले ने पूछा की अपने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ दी, तो इनका जवाब था, यहाँ न नाम है न इज्जत, मुझे और जादा चाहिए ... यानि ये दिल मांगे मोर...

अब अन्ना के लांचिंग के लिए  किस पैड का इस्तमाल हों ?? तो  इस्तमाल बाबा का किया जो इन   के मनसूबे से अनजान थे. उन्होंने सोचा काम देश का है तो एक से भले दो... उन्हें नहीं पता था की जिस भर्ष्टाचार को मिटने के लिए बाबा रामदेव,  इन  गिरगीटो  को अपना आशीर्वाद दे रहे हैं वही दोनों आगे चल के इनके लिए भस्मासुर साबित होंगे.  वास्तव में बाबा आज इस देश में  किसी भी व्यक्ति से लोकप्रिय  है, भारत ही नहीं वरन विदेशो में भी.. चाहे वो गूंगा प्रधान मंत्री हो या भ्रष्ट का कलंक लेने वाला राष्ट्रपति. तो अरविन्द अन्ना को खड़ा आगे कर बाबा को लांचिंग पैड बनाया, और अन्ना हजारे  को लांच कराया,

बाबा के द्वारा लांचिंग के बाद अन्ना और टीम को आम जनता जानने लगी तभी आना को जंतर मन्त्र पर बिठा दिया गया, और माया से  उनको भारत का हीरो, डुप्लिकेट गाँधी, और न जाने क्या क्या  बता दिया गया, जनता भी खुश, की चलो अब क्रांति हो के रहेगी, उधर बाबा और इधर अन्ना..

जब इन गिरगिट  को लगा की अब सरकार द्वारा प्रायोजित मिडिया से ये मजबूत हो चुके हैं तो बाबा को हाशिये पे डालने के काम शुरू किया, अप्रत्याशित ज्वार भाटीय जनता के समर्थन से इन गिर्गितो का रंग इतना बदला की माहात्व्कंक्षा वश मौके का फायदा उठाने को स्वयं कोंग्रेस के लिए भस्मासुर बन बैठे जो की इनके पोषक थे.

लेकिन बाबा कोई झूट के पुलिंदे पे तो थे नहीं , न ही पूर्ण रूप से मिडिया प्रायोजित . सो सफल न हो सके और जनता भी ये समझने लगी .

अभी हाल में जब अन्ना ने जंतर मंतर पे बाबा को नेयोता दिया तो बाबा अपना समर्थन ले के गए लेकिन जब मामा ने दुबारा रामलीला मैदान में बुलाता तो अन्ना पल्टू उर्फ़ गिरगिट अपने ही वायदे से मुकर गए.

वो जनता जो सरकार  के खिलाफ थी वो रे धीरे जनता दो भागो में  बंट गयी एक अन्ना समर्थक दूसरा बाबा समर्थक.लेकिन  धीरे -धीरे इन दोनों गिरगीटो का सच जनता के सामने आने लगा, तो इन गिरगीटो का जनाधार खोने लगा, तो अरविन्द एक बार फिर अपने पोषक कोंग्रेस से माफ़ी मांगी होगी, और उनके लिए दुबारा भश्मासुर न बनने की कसम खायी होगी.. यानि थूक  के चाटा होगा, कोंग्रेस के प्रति अपनी स्वामी भक्ति दुबारा सिध्ध करने के लिए ये इन गिरगीटो ने एक और  रंग बदल घोटालाबाज कोंग्रेस को छोड़ हर मामले में बी जे पी को कोसना शुरू कर दिया. लेकिन इन गिर्गितो को ये नहीं समझ आता की जनता सब देखती है.

इससे फिर इनका जनधार खोना शुरू हो गया. और बाबा के समर्थक यथावत उतने ही है बल्कि इन गिरगीटो को देख और बढ़ गए. जब गिरगिट गैंग को लगा की वो अब बाबा को पछाड़  नहीं सकते तो एक और नाटक खेला, आपसी सर फुट्टवल  का.. क्यों ??क्योकि एक बड़ी संख्या  में गिरगिट समर्थक इन गिरगीटो का साथ छोड़  समझदारी दिखाते हुए बाबा के पाले में चले गए जिसके कारन था अरविन्द ये जनता अब भी अन्ना को साफ़ सुथरा मानती है, अनजाने में ही सही . तो बचा खुचा जनाधार रोकने के लिए ये एक और रंग  बदल  आपसी समझौते के तहत खुद ही दो भागो में बंट गए  ताकि पल्टू अन्ना  के समर्थक कम से बाबा के पाले न जाए जो गिरगिट अरविन्द से खफा है, यानि घर का माल घर में रखने के लिए ये सब नाटक हो रहा है.

अब आईये इनके गिरगिट समर्थको पे, कहा जाता है "संगत से गुण होत है संगत से गुण जात" . गिरगिट गैंग का जिन समर्थको पर जबरजस्त प्रभाव पड़ा वो उनके अन्दर भी गिरगिट वाले गुण आ गए हैं. वास्तव में मानसिक रूप से असहाय हैं, इन बिचारो को ये पता नहीं की दोनों ही कोंग्रेस के लिए काम कर रहे हैं, जिनके समझ में आया वो मेरी तरह इनसे भाग खड़े हुए और जो नहीं समझ पाए वो आज गिरगिट समर्थक बन चुके है  जो अपने गिरगिट सरदारों को देखते हुए अपना रंग बदलने पे मजबूर है.


अन्ना और उनकी भूतपूर्व टीम का गिरगीटीया सवभाव उसके अंध समर्थको पर भी पड़ा है.जो कल कहते है मै भी अन्ना, वही आज कह रहे है कौन अन्ना नेता तो अरविन्द है, और जो कल तक जो अरविन्द को बाप मानते थे वो अन्ना के साथ है .  इस प्रकार के गुट और उनके समर्थको का मनाना है की देश बहुत सादा है , रंगहीन है, इसलिए हमलोगों ने गिरगिट बन देश के माहौल में रंग भरने की  एक छोटी सी कोशिश की  है .

अन्ना अरविन्द दोनों की साठ- गाँठ था बाबा के आन्दोलन  को दबाने की और इसी योजना नुसार अन्ना का नाटक और दिखावा है अरविन्द से अलग होने के लिए, दोनों अलग हो के सारे देश वासियों के ऊपर काबिज हो कोंग्रेस को सत्ता दिलवाना चाहते है और कुछ नहीं. एक बहुत  बड़ा तबका अन्ना गैंग के खिलाफ हो चूका था खासकर अरविन्द को ले के, जिससे इनका आन्दोलन असफल हुआ, उस तबके को अन्ना गैंग अपने व पास वापिस लाने का तय एक षड्यंत्र रच है, ताकि  रामदेव से जुड़े लोग अन्ना के बारे में फिर से सकारत्मक सोच सके.   एक बात निश्चित है , की आने वाले दिनों में यदि इनका षड्यंत्र सफल हो गया, तो अन्ना अरविन्द फिर एक हो जायेंगे , वैसे आजतक का मेरा कोई भी विश्लेषण गलत नहीं  हुआ है ( इक्छुक लोग मेरे पुराने लेख पढ़ ले जो  गिरगिट गैंग के ऊपर था ). कभी अन्ना कहता है की की उसका नाम इस्तमाल न किया जाए कभी कहता है वो अरविन्द का प्रचार करता है , यानि गिरगिट प्रवृत्ति  अभी उछाल पे है.

टोपी पहनने के लिए बार बार टोपी का "कैप्शन" बदला गया .. कभी मै अन्ना हूँ , कभी मै अरविन्द हूँ , और आज , मै आम आदमी हूँ, अरे भाईओं आपसे एक छोटी सी टोपी तो सम्हलती नहीं ,आप देश कैसे सम्हालोगे ??

 अंत में बस एक बात कहना चाहूँगा  सच के कड़वाहट को कितना भी झूट के चाशनी में डुबो के रखा जाए कड़वाहट नहीं जाती.


सादर

कमल कुमार सिंह  

Saturday, September 8, 2012

लेकिन ये तो नेता है






लोग कहते है इंसान इतिहास से सीखता है,  लेकिन "इंसान", नेता या हुक्मरान नहीं. अब आप कहोगे की क्या नेता इंसान नहीं ? इनके भी तो दो  हाथ  दो पावँ होते है.  तो भाई दो हाथ और पाँव बंदरों के  नहीं  होते क्या ??? मानव मानता है की उसके पूर्वज  बंदर थे, लेकिन आजकल के नेतावों को देख, शायद बन्दर उन्हें अपना पूर्वज मान रहा होगा.  

लेकिन कही मेरे इस वाक्य पे बन्दर  नाराज न हो जाए, क्योकि जिस तरह से ये संसद मे मारपीट, गाली गलौज करते हैं उससे बन्दर बिना इत्तेफाक रखे मेरे ऊपर मानहानि का दावा कर सकता है.  भाई हम कौन सा संसद मे बैठते है ?? न ही हम अपने जात बंदरों का ठेका ले रखा है, सब कुंद फांद मेहनत करते है और अपना अपना  खाते है , बल्कि ये कहो की तुम इंसानों जैसी इंसानियत दिखा अपने बच्चो और साथियो का भी ख्याल कर लेते है बिना अपनी जमात का नुक्सान किये . लेकिन तुम्हारे नेता तो अपना कम देश का जादा खाते हैं , खबर दार जो हमारी  तुलना उनसे की तो. 

तुम्हारे नेतावो मे थोड़ा सा भी "बंदरियत" होती तो पेट भर खा के आराम कर रहे होते, हमें देखो , एक बार पेट गर गया तो आपस मे एक दूसरे की जुएँ ढूढते है, एक तुम्हारे नेता, पेट भरते ही दूसरे देश का बैंक भरने लगते है. हम जानवर जरुर है लेकिन इतने गए गुजरे भी नहीं की हमरी तुलना नेताओ से करो.  

खैर, जब बन्दर नहीं तैयार  तो तुलना किससे की जाए ?? भेडिया ?? नहीं इससे भी नहीं की जा सकती, क्योकि भेडिया तो भेडिया है ये साफ़ साफ़  दिखता है, जानवर दूर से ही देख के पहचान सकते है, भाग सकते है, इनकी नेतावो की प्रजाति तो ये भी नहीं है, जो दीखते है वो निकल जाए तो "एक" के नहीं, जरुर सामूहिक परिश्रम का परिणाम है. 

जानवर एक बार जो गलती करे उसका फल उसे मिल जाए तो दुबारा नहीं करता .यहाँ तक की कुत्ता भी , "क्या कुत्तों की तरह बार बार चल्ला आता है" इस तरह की कहावते सर्वथा गलत है,  मान लो किसी कुत्ते को आप रोटी  दिखा के एक बार बुला लो और एक डंडा जड़ दो , दुबारा बुलाओ, फिर जड़ दो , तो तीसरी बार वो नहीं आयेगा. आप भी कर के देखना. कुत्ते का भी स्वाभिमान एक बिंदु पे पहुच जाग जाता है. 

लेकिन ये तो नेता है. इनकी गलतियाँ ठीक वैसी है जैसे पुराने ज़माने की नगरवधू (पतिता) बार बार धन ले और पतित होती जाती है, क्योकि ये उसका व्यापार होता है, वह जितना पतित होती जाती है उतनी गर्वित भी, की उसका बोला बाला है , उसे पतित करने के लिए तो लोग लाइन लगा के रखते है उसकी बोली लगते है. वो भी भला क्यों सीखे क्यों जाने की ये गलत है ऐसा  नहीं होना चाहिए. 

लेकिन ये तो नेता है , समर्थ है, तुलसीदास जी ने भी कहा है "समरथ को नहीं दोष गोसाईं" अतः जो समर्थ है उसे सीखने कि कोई जरुरत नहीं,  क्योकि वो समर्थ इसलिए है की जनता जिसे जानवर भी अस्वीकार कर देते है उसे मसीहा बना संसद भेज देती है. 

अस्तु, अब मूल बात पे आते है, रामायण मे  भगवान राम ने न जाने कितनी कोशिशे की की सीता बिना युध्द के वापिस आ जाये, हनुमान भेजा अंगद भेजा, लेकिन सब व्यर्थ, " होईहे वही जो राम रूचि राखा" यानि ये सब राम की ही प्लानिंग थी. आगे क्या हुआ आप सभी जानते है.  लेकिन उसमे राम का स्वार्थ बस इतना ही था की उन्होंने ने रक्तपात को टालना चाह था. 

महाभारत मे ने भी पांडवो ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, लेकिन कौरवो को पांच गाव भी देख मरोड़ उठने लगा, हुआ वही जो राम के अग्रज अवतार ने  चाहा था. 

लेकिन ये तो नेता है, अब पाकिस्तान से मैत्रीभाव बढ़ाना चाहते है, वीजा नियम सरलतम बनाना चाहते हैं. दोनों मुल्को के इंसानों के बीच संवाद स्थापित करना चाहते है, इससे एक्सपोर्ट इम्पोर्ट बढ़ेगा,  वैसे भी भारत एक्सपोर्ट इम्पोर्ट के मामले मे बहुत खराब है, सानिया दे के वीणा  मंगवाता है, यहाँ के टेक्नोकार्ट विदेश भेजता है, और विदेश से महेश भठ तारिणी "लीयोनी" बुलवाता है. 

रे नेता जी, संवाद स्थापित हो के क्या होगा ?? रोटी बेटी  का रिश्ता तो नहीं करना ?? एक दामाद कसाब जो बैठा  है उससे संतोष नहीं हो रहा ?? और कितने रखोगे ?? आतंकवादी दामाद जो इतने ही चाहिए तो वही क्यों नहीं चले जाते बीटीयावों के साथ?? किसने रोका है ?? क्यों भूल जाते हो  सैकडो कोशिशे बाद भी रामायण मे रावन नहीं सुधरा था, महाभारत मे कौरव नहीं सुधरा था. 

इतनी छोटी सी बात  कुत्ते जैसा जानवर तक समझता  है , लेकिन ये तो नेता है. 

सादर
कमल कुमार  सिंह 



Tuesday, August 14, 2012

स्किल डेवलपमेंट योजना : प्रधान मंत्री


अभी अभी मै प्रधानमन्त्री जी का भाषण सुन रहा था , हमारे आदरणीय प्रधानमन्त्री, जो बुध्धि और व्यक्तित्व मे अतिविकसित रोबोट को पीछे कर रखा है, ने घोषणा की, कि पुरे देश मे स्किल डेवलपमेंट योजना चलाई जायेगी, ताकि वो अपने पैरों पर खड़ा हो सके और यह योजना बहुत बड़ी और भव्य होगी. 

पहली बात ये स्किल डेवलपमेंट योजना  का असली फायदा कौन उठाएगा ??? जनता या मंत्री ??? 

यदि योजना बड़ी होगी तो स्किल जनता का कम मंत्रियो का जादा बढेगा, मंत्रियो का "परम्परागत स्किल" जनता भी "इन्तजार धैर्य और अगले वादे " सुनने की स्किल मे इजाफा  जरुर कर लेगी .

तब इस योजना का फायदा  क्या??जनता तो वैसे भी धैर्य और इन्तजार के स्किल मे परफेक्ट है, और मंत्री,नेता का भी परम्परागत स्किल का फिगर भी  फिट है, जो की संसद रूपी जिम जाने से हुआ है. 

हाँ एक फायदा होगा, अगले साल फिर इस  योजना लागू करने के श्रेय लाल किले से खुद ले सकते हैं अपने "परम्परागत मौलिक  मौन स्किल " को कम करते हुए.   

जनता सुनना चाहती थी की असम के दंगे, और मुंबई के पचास हजार मुसलमानों को क्या सन्देश देंगे ?? या देश को शेखुलर से सेकुलर बनाने के लिए क्या कदम होगा ?? कम कम से मैंने तो यही सोच के टी वी खोला था ?? क्योकि एक आदमी जिसके पास जरा भी बुध्धि है उसे पता है की ये सारी योजनाये मंत्रियो के स्किल का निर्माण करती है, और इसी स्किल से वो शेखुलारिज्म (सेकुलर्जिम नहीं) फैलाते हैं. 

लेकिन वास्तव मे एसी चीजों की आशा रखना हम जैसो की गलती है, क्योकि वो गलतियाँ मुसलमानों ने की है हिन्दुवो ने नहीं.,. जो उनके मुखांगो से इसके बारे मे निकले. यही  जो  ५० हजार तो छोड़ा जनाब सिर्फ सौ पचास हिंदू ऐसा कुछ करता तो तो जरा अंदाजा लगाईये क्या क्या हो सकता था ??  सारे संघटन एक होके भगवा आतंकवाद का नारा दे देते, सारे हिन्दुओ को आतंकवादी और नफरत बढ़ाने वाला घोषित कर दिया जाता ," कट्टर हिंदू " होने का तमगा दे दिया जाता, अब इनको कौन समझाए हिंदू जब भी कट्टर होगा उसकी सहिष्णुता बढाती जायेगी क्योकि हिंदू धर्म यही कहता है "सर्व धर्म सामान " यानि जो हिंदू जितना कट्टर होगा होगा वो उतना ही सहिष्णु होगा, मुसलमान तो बाद मे  पहले अपने ही "शेखुलर" सीना पिटने आ जाते ... और मजे की बात ये है आज भी मुंबई और  असम पे ये शेकुलर लेखक कुछ नहीं बोलते न लिखते बल्कि जो निंदा करता  या लिखता मिल रहा है उसकी निंदा कारते हुए दलीले दे रहे हैं की नफरत न फैलाओ .. समझ नहीं आता इनकी सोच पे हँसू या रोऊ ?? ...वैसे भी कहा जाता है जहाँ प्यार होता है वहाँ नफरत भी होती है, और जहाँ नफरत वहाँ प्यार. शायद उनकी भी सोच यही हो.

 अपने प्रधान मंत्री इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है, की दंगा हो रहा है, तो सद्भावना के लिए, क्योकि चक्र पलटता है,  सद्भावना  फैलाने के लिए तो देश मे तो काफी दंगे हो ही रहे थे, चाहे कोसीकला का मुसलमानों द्वारा बाल्त्कार से शुरी की हो  या प्रताप गढ़  या बरेली के शिव  कावरियो पे मुसलमाओ का हमला, कोई टेंशन नहीं जहाँ नफरत होती है प्यार भी अपने आप हो जायेगा, लेकिन अपनी सरकार भारत के अलावा दूसरे देशो से भी अच्छे सम्बन्ध  रखना चाहती है, पडोसी बंगला देश था तो सोचा इन्ही  से संबंध सुधार की शुरुवात की  जाय, सो बुला बुला के दंगा करना शुरू किया, आखिर जहाँ नफरत है प्यार भी वही होगा..तो असम का दंगा पड़ोसी देशो से संबंध सुधार के एक अंग है.  पाकिस्तान से तो पहले ही शुरुवात कर दी गयी है. 

भ्रस्टाचार का भी मुद्दा गायब ही रखा, पिछले सालो मे कई बड़े आन्दोलन हुए बाबा के नेतृत्व मे, लेकिन ये भी मनमोहन जी की स्किल बड़ा गया, "मौलिक मौन स्किल". 
या कौन जाने ये सोचा हो की "भ्रष्टाचार" तो अपने घर की बात है, इसको पब्लिक मे उछलना ठीक नहीं , कोई भी अपने घर की इज्जत बाहर नहीं उछलता. 

काला धन पर भी चुप रहे, काला धन ?? ये क्या होता है ? अरे धन भी कही काला होता है ? धन तो बस धन होता है, अबला के पास हो तो काला और सबला के पास हो तो सफ़ेद.. और ये ध्यान रखे की नोटों पे गांधी जी का चित्र होता है  जिन्होंने अफ्रीका के कालो के लिए लड़ाई लड़ी थी, जिसका कुछ प्रभाव भारतीय नोटों पे उनका चित्र छपने की वहज से  आ ही गया तो  इतना हल्ला क्यों ??, उलटे  कलाधन को कालों के लिए संघर्ष का धन मानना चाहिए, आखिर यही संघर्ष धन तो चुनावो के समय  संघर्ष करने के काम आता  है.  

अब आईये प्रधान मंत्री के स्किल डेवलपमेंट पे, किस तरह का स्किल  बढ़ाएंगे ?? कहीं पॉकेटमार भी न आन्दोलन कर दे की हमारे  लिए उन्नत यंत्र  मंगवाओ,  आजादी के पैंसठ सालो बाद भी हमें पाकेट मारने चोरी करने मे दिक्कत आती है,  डाकू समूह मांगो को पूरा करेंगे?? वैसे काफी हद तक कर दिया है, डाकुओ मओवादियो को मुख्य धारा मे लाया जा रहा है , नौकरिया दी जा रही है, और देश का रिटायर्ड बुजुर्ग पेंशन तक के लिए दर दर की ठोकर खा रहा है. ऐसे बुजुर्गो को पैरागोन के चप्पल दे के शायद चक्कर लगवाने की स्किल डेवलप करवाई जाए या इमानदारी लाने के लिए देश का टाटा नमक सबको खिलवाया जाए.. कम से कम संसद कैंटीन के भोजनो मे तो इसका इस्तमाल जरुरी करवाया जाए. 

अब इन्तजार है लाल किले से अगले साल के भाषण का... 

नमस्कार . 

सादर कमल