नारद: TEACHER
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Saturday, January 18, 2014

चिंता

बड़े बड़े  बुध्ध्जिवियो/ पत्रकारों / बड़े वालो / सेकुलरों/ आकश / पाताल/ बैताल, सभी से आग्रह है आप लोग कुछ करें, संघ से आप लोग दुखी है, संघ ने दुखी कर रखा है आपको, संघ बिल्ली है, चुपके सी आके आपके घर की दूध पि जाती है, और आप चाय से वंचित रह जाते है, संघ के लोग आपका बीडी छीन के पि जाते है, निश्चित ही ये दुःख की बात है, संघ के लोग आपके घर आके, खाना पीना भी भाभी/ माताजी जी से छीन छान  के खा जाते होंगे, निश्चित ही यह अक्षम्य पाप है.

चिड़िया जब आपके  सर पे बीट कर दे तो आप समझ ले यह पूर्व जन्म का संघी है और आपको पहचान गया है, इसलिए पको निशाना बनाया गया.  इस तरह की आपात स्थिति  से निपटने के लिए गुलेल हमेशा साथ रखे. निशाना गड़बड़ हो तो उसे गन्दी गन्दी गालिया सुना के गन्दी गन्दी गालिया देने वाला कहें, उसके कान फाड़ दे जिससे वो अपनी तरफ आने वाली प्लेन की आवाज नहीं सुन पायेगा और टकरा के मर जाएगा.

ये संघी किसी भी रूप में हो सकते है, पेड़ के रूप में, पौधे के रूप में, यदि किसी नीम से आप दातुन तोड़े और वो कड़वा हो तो समझ ले की नीम संघी है, तत्काल मुह धो के पेड़ को अपने मुख मुद्रा से अभिमंत्रित शुद्ध ५००१ गाली दे और तत्काल आरी चलवा दें.

चलते फिरते समय हमेशा ध्यान रखे की किसी संघी से न टकरा जाय, बस ट्रेन में चलत समय ख़ासा सावधान रहे, संघियों का प्रकोप यहाँ भी हो सकता है, मान लीजिये बस खराब हो जाए तो आप समझ ले की इसमें संघियों की साजिश है की आपने गंतव्य पे लेट पहुचें, या ये भी हो सकता है की अमुक गाडी किसी संघी के शो रूम की हो , नहीं तो कम से कम बेचने वाला सेल्स मनेजर जरुर संघी ही होगा, अन्यथा आपको इतना कष्ट देने की जोखिम क्यों उठाता जिससे  दुनिया दुखी है.

कुछ भी करते या लेते ससमय ध्यान रखे की उसमे संघी की साजिश न हो, मसलन पास के किराना स्टोर यदि किसी संघी का हो तो आपके पेट में अल्सर पड़ सकते है, या आपका पेट ख़राब हो सकता है, यदि एसा होता है तो आप तत्काल उसके घर के उलटे अपना मुह कर वायु शंका निवारण करें. संघी किसी भी रूप में हो सकते हैं, उनको पहचानने का सबसे सरल उपाय ये है की यदि कोई पशु पक्षी, मानव लोजिकल बात करे या आपके खिलाफ बात करे तो आप समझ लें की ये संघी हो सकता है. 

वैसे आप चाहे तो इस क्रिया से अपना व्यक्तिगत लाभ ले सकते हैं, मसलन जब चाय पीनी हो या दूध गरम करनी हो तो किसी संघ को आवाज लगा उसको छत पर बुला लें फिर उसे देख  चाय का पतीला अपने दिमाग या पीछे रख बिना गैस खर्च किये  गरम कर सकते हैं. ठण्ड के मौसम में अपमे गुसल खाने में किसी संघी की फोटो लगाए आपका शरीर जल रहा होगा, अतः पानी गर्म करने की जरुरत नहीं. ये सब उपाय मै इसलिए  बता रहा हूँ की सोते से खाते से, और बाकी सब भी करते समय आपके दिमाग से संघ का भुत वैसे भी नहीं उतर .
सच बात तो ये है आपका खाना, हसना रोना, या ये कह लें की भविष्य तक संघ और संघियों पे निर्भर है.
 तो बेहतर है कुछ ाव्यक्तिगत लाभ भी उठायें .

कृपया कुछ करें, आप जिस तरह से रुद्राक्ष की माला ले सुबह शाम संघी संघ कर वायु में उसका "कोसना" की मात्र बढ़ाते जाते हैं वह सेकुलरो, बुध्जिवियोंके लिए चिंता का विषय इसलिए है की उनका विष भरा नाम वायु में घुल इस जमात की जान ले सकता है अतः चिंता का विषय इसलिए इसलिए की आपके इस रुद्राक्ष युक्त मारक कोसने से से उनके स्वाथ्य पे कोई असर नहीं पड़ता, वो आपके तरफ देख मुस्करा देते आर आप फिर से जल भुन कर वायु  में कार्बन डाई आक्साईड की मात्रा बढ़ाते है जिससे ओजोन हर दिन अपना अंतिम दिन मानता है , इधर आप घुट रहे हो उधर आपके क्रियाकलाप से ओजोन. दोनों की चिंता समाप्त करने का उपाय खोंजे बजाय की अपना जी और ओजोन को डराने के.

एक "संघ निवारण संघ" बना के भी इनसे निपटा जा सकता है, इसके लिए मुलायम, माया, या नवजोत "आपा" का सहारा ले सकते है. कुछ काम और कियें जा सकतें है मसलन उनके पीछे कुत्ते छोड़ दें लेकिन उसका कोई फायदा नहीं वो दिन रात आप लोगो को तो देखते ही है, प्लेन चिट चलवा दें, अंडा कटवा दें, जिन्न छोड्वा दें, या बाबा बंगाली से के पास उन संघीयों की फोटो ले के चले जाए या सामूहिक आहुति यग्य करावा दें, कुछ न कुछ तो होगा ही.
पीपल के पेड़ में "सुबह का"  पानी  डालने से भी लाभ होगा, कर के जरुर देखें, यदि लाभ न हुआ तो समझ लें की संघियों की साजिश है.


आप जिस तरह से दिन ब दिन दुबले होते जा रहे हैं वो खासा चिंताजनक है, इससे आपका मानसिक संतुलन खराब हो सकता है, पेट दर्द, सिरद, निमोनिया इत्यादि आप पर हमला कर अपना नुक्सान करवा सकते है.  बिना संघियों को ठिकाने लगाये इस तरह से दिन रात हुक्के की तरह गुड्गुडाने से आपका कोई फायदा होता नहीं दिखता. कृपया कुछ करें. 

आपका एक संघी शुभचिंतक 

सादर 
कमल कुमार सिंह
१८ जन २०१४ 

Wednesday, October 30, 2013

बपौती



बपौती काई प्रकार कि होती है, एक तो  बाप का माल, हलाकि जो ये समझता है वो खुद भी अपने बाप का माल ही होता है भले वो अपने आपको बाप का माल समझे या नहीं या अपने बाप को ही घुड़क दे, लेकिन बाकी वस्तुवो को बाप का माल समझने वाला एक खास किस्म का दिमागी योध्धा होता है, जो बिना किसी से लड़े ही सबको अपने बाप का माल मानता है। 

जैसे किसी ज़माने सवर्ण दलित को अपने बाप का माल समझता था, मुसलमान कुरआन और मोहम्मद को अपने बाप का माल समझता है, आशाराम अपने महिला  भक्तो को अपने बाप का माल समझते है, बोस अपने मातहत को अपने बाप का माल समझता है, पुरुष स्त्री को अपने बाप का माल समझता है, स्त्री पुरुष  के माँ बाप को अपने बाप का माल समझती है,  दलित वाल्मीकि जी  को अपने  बाप का माल समझता है, सवर्ण परशुराम को अपने बाप का माल समझता है, कुत्ता तक दूसरों के जूठन को अपने बाप का माल समझता है। यानि सबके बाप के माल केटेगराईज्ड है। 

इसी कड़ी में नेता सबको धता बना अपना प्रथम स्थान बार बार लगातार कायम किये रखे हुए है, नेता मुसलमान के वोट को अपने बाप का माल समझते है। इसी परम्परा को को आगे  बढ़ाते हुए अपने प्रधान मंत्री मनमोहन जी मंद गति से  व्याख्यान दिया कि सरदार पटेल कोंग्रेस के थे, पहली बात मनमोहन जी जिस जनता को आप और आपके कोंग्रेस "आई" पिछले 40  सालो से बेवकूफ बना रहे है कि आप कोंग्रेसी हो  तो यही पे आपकी जबान लड़खड़ा जानी चाहिए थी . जिस कोंग्रेस का होने का दम आप भरते हो तो इंद्रा जी ने सिंडिकेट के खिलाफ हो कोंग्रेस से अलग हो कोंग्रेस आई बना डाली थी, यानि तलाक ले के एलुमनी लेने के बाद भी दौलत पे बारबरा नजर बनाये हैं आप जो गैर कानूनी है, इसी प्रकार से कोंग्रेस से अलग हो श्यामा  प्रसाद मुखर्जी ने इंद्रा से पहले ही आर एस एस बनाया था, तो सरदार पटेल, कोंग्रेस "आई" अर्थात आपके कैसे हुए ?  ? ये तो हुयी ओछी बात का जवाब ओछी बात से . 

अब आगे बढ़ते है, प्रधान मंत्री जी कुछ दिनों पहले मोदी ने अपने मंच से कहा था , आप से विचारो कि लड़ाई हो सकती है लेकिन आप अभी हमारे प्रधान मंत्री है, तो क्या आपने ये साबित नहीं  कर दिया कि आपका कद और दिल भी प्रधान मंत्री हो के भी मोदी से बहुत छोटा है जो कि महापुरुषो को खेमे में बाँट रहे है। क्या आप ये कह रहे है कि आपको प्रधान मंत्री इस देश का नहीं बल्कि कोंग्रेस का माना जाना चाहिए ? क्या आप ये कहना चाहते है  कि भाजपा, और गैर कोंग्रेस दल आपको प्रधान मंत्री मानने से इंकार दे ? 

आप इस देश के प्रधानमंत्री है, टी वी पे आके रात के अंधेरो के मालिक  सिंघवी ब्रांड टाइप का ओछा बयांन  देना कौन सा बड्डप्प्न है? 

खैर  इससे जादा आपसे जादा आशा कि भी नहीं जा सकती थी, क्योकि जिस राजीनीतिक दल से आप हो वहाँ सिक्का (खोटा  ही सही ) बस एक परिवार का चलता है, नकली गांधी परिवार का असली महात्मा गांधी के अभी जीवित चिराग तुसार गांधी किस चिड़िया का नाम है देश का अस्सी प्रतिशत युवा नहीं जानता होगा. नकली गांधी  पुरे देश को अपने बाप का माल मानता है, तभी इंद्रा देश कि बेटी हो गयी और राजिव देश का बेटा , सोनिया देश कि बहु हो गयी (कोंग्रेसियो कि नजर में ) और राहुल देश का पप्पू, राहुल को पता है कि वो पप्पू है फिर भी देश पे अपने अधिकार जताने से नहीं चुक रहे, मुसलमान तो उनके बाप के नौकर के  माल है
माना कि कोंग्रेस देश को अपनी बपौती मान  खूब ,कोयला , जमीं आसमान हवा सब बेच रही है,  आप लोग आपने राजीनीति के लिए कुछ भी करते रहिये कोई आपत्ति नहीं, कम से कम अब महापुरुषो पे एकाध्किार तो छोड़िये महाराज, नहीं तो गैर कोंग्रेसी दल आपको अपना प्रधान मंत्री मनाने से खारिज कर देंगे तब मत रोइएगा और न ही डुबियेगा,  चुल्लू भर पानी में। 

मेरा इस तरह का कुछ भी लिखने का रत्ती भर मन  नहीं था मनमोहन जी, लेकिन आप अपने आपको शायद देश का प्रधान मंत्री बाद, पहले कोंग्रेसी मानते हो, तो इस तरह का कुछ तो बनता ही था. 

आज सादर भी लिखने का मन नहीं कर रहा, यूँ ही लिख देता हूँ नीचे अपना नाम .

कमल कुमार सिंह 

Saturday, September 28, 2013

देहाती औरत न्यूयार्क मे


मनमोहन जी न देश कि जनता का मन मोह पाए न ही अपने युवराज का. एक तरफ जहाँ वो यू एन ओ मे अपने रोबोटिक्समय अंदाज मे अटलजी का पुराना भाषण दोहरा कर कुछ नया करने कि जहमत उठाने कि कोशिश नहीं कि, वहीँ दूसरी तरफ भारत मे  राहुल जी उनके मसौदो को नोंसेंस कह के कह उनका सम्मान बढ़ाया. जी हाँ सम्मान ही है, क्योकि कोंग्रेस मे "राहुल सत्य और सब मिथ्या"  है.
  • राहुल जी अब "दोनों हो गए है" पक्ष - विपक्ष दोनों" अभी तक पब्लिक इनको बीच का समझती थी. राहुल जी मस्त मौला आदमी है, उनकी पार्टी है उनकी सरकार है और उनकी सरकार क्या करती उससे उन्हें सरोकार नहीं रहता, अब उन्हें अपने चुटकुलों से फुर्सत मिले तब न. उनकी हरकते देख लगता है वह एक  जल्द ही "फाडू गैंग बनायेंगे" जगह जगह जा के फाडते रहते हैं, लेकिन इस बार के बयां से उन्होंने कोंग्रेस कि ही फाड़ दी है लेकिन कोंग्रेसी खी खी खी कर के मस्त हैं, कोइ नहीं अपने मालिक है, फाड़े या चीथे उससे क्या, लेकिन बेशर्मी कि हद तब हो जाती है जब  इस "फाडू एक्शन" को लोकतंत्र का नाम दिया जाता है. 

    खैर कोंग्रेस मे कुछ भी हो सकता है. एक तरफ जहाँ राघव जी जैसे लोग बी जे पि से भगाए जाते हैं, वही  दूसरी तरफ अपने संवैधानिक पदका दुरूपयोग कर  ग्रांड मस्ती फिल्म बनाने वाले मनु सिंघवी को प्रवक्ता बना दिया जाता है. कोंग्रेस अनन्त, कोंग्रेस कथा अनन्ता. 

    युवराज के इन हरकतों से मनमोहन जी का छोटा सा कद और लिलिपुटमय हो गया है , यहाँ तक इंटरनेशनल मिडिया भी उन्हें झंडू समझ कर कुछ भी कह रही है. और ये गलत भी नहीं, क्योकि  जिस लुगाई का घर मे ही न इज्जत हो उसको बाहर वाले क्या समझेंगे आप लोग ही बता सकते है. 

    मनमोहन जी जब  यू एन ओ मे पूर्व प्रधान मंत्री अटल जी का पक्ष रखने के बाद पाकिस्तान के  प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ ने मनमोहन को "देहाती औरत" कहा. जो काना फूसी करने कि आदत रखती है. निश्चित ही नवाज को पता है कि मनमोहन कि इज्जत भारत कि जनता मे ही नहीं बल्कि उनके पार्टी मे भी दियो कौड़ी कि है जिसका एक्शन नॉन सेन्स कह के कूड़े मे डालने का सुझाव उन्ही के पार्टी के मालिक कहते हैं. ये देहाती औरत वाली बात  इंटर नॅशनल मीडिया मे उछला है ये इनदिन मिडिया नहीं दिखाने वाली, क्यों ? आप समझदार है समझ जाईये, हाँ सोशल मिडिया जरूर बता रही, शायद इसीलिए सरकार  शोशल मिडिया पे इतना भन्नाती रहती है. 


    मनमोहन कि  स्थिति उस लडकी कि तरह हो गयी है, जो अपने प्रेमी के साथ मा बाप के खिलाफ  घर से भाग चुकी है लेकिन प्रेमी भी दगाबाज निकला और  नॉनसेन्स कह उसे करनी को दुत्कार दिया. 

    अब देखना है इंटरनेशनल देहाती औरत भारत के एक पार्टी के "रखैल" बनते है या  या गरिमा बचाने के लिए अपने मर्द के मुह पे एक जोरदार तमाचा मार अपना गौरव वापिस लाते है. हालाकि  मुश्किल ही दीखता है. 

    सादर 

    कमल कुमार  सिंह 

Sunday, June 16, 2013

संघ और हिन्दू महासभा


१९२१ ई. में अंग्रेजो ने तुर्की को परास्त कर, वहां के सुल्तान को गद्दी से उतार दिया था, वही सुल्तान मुसलमानों के खलीफा/मुखिया भी कहलाते थे, ये बात भारत व अन्य मुस्लिम देशों के मुसलमानों को नागवार गुजरी जिससे जगह-जगह आन्दोलन हुए l हिन्दुस्थान में खासकर केरल के मालाबार जिले में आन्दोलन ने उग्र रूप ले लिया l मुसलमानों को शिकायत तो थी ब्रिटिश सरकार से, पर उसके सामने तो मुसलमानों की चली नहीं, परन्तु उनका कहर टूटा केरल की निर्दोष और असहाय हिंदू जनता पर, इस हिंसक बबाल में बड़ी संख्या में हिंदुओं का कत्ल हुआ, स्त्रियों की इज्जत लूटी गई तथा बड़े पैमाने पर बल पूर्वक हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बनाया गया l (संदर्भ पुस्तक- “राष्ट्रपिता वीर सावरकर”)

१९२२ ई. में भारत के राजनीतिक पटल पर गांधी के आने के पश्चात ही मुस्लिम सांप्रदायिकता ने अपना सिर उठाना प्रारंभ कर दिया। खिलाफत आंदोलन को गांधी जी का सहयोग प्राप्त था - तत्पश्चात नागपुर व अन्य कई स्थानों पर हिन्दू, मुस्लिम दंगे प्रारंभ हो गये तथा नागपुर के कुछ हिन्दू नेताओं ने समझ लिया कि हिन्दू एकता ही उनकी सुरक्षा कर सकती है। ऐसी स्थिति में कई हिंदू नेता केरल की स्थिती जानने एवं वहां के लूटे पिटे हिंदुओं की सहायता के लिए मालाबार-केरल गये, इनमें नागपुर के प्रमुख हिंदू महासभाई नेता डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे, डॉ. हेडगेवार, आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद जी आदि थे, उसके थोड़े समय बाद नागपुर तथा अन्य कई शहरों में भी हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए l ऐसी घटनाओं से विचलित होकर नागपुर में डॉ. मुंजे ने कुछ प्रसिद्ध हिंदू नेताओं की बैठक बुलाई, जिनमें डॉ. हेडगेवार एवं डॉ. परांजपे भी थे, इस बैठक में उन्होंने एक हिंदू-मिलीशिया बनाने का निर्णय लिया, उद्देश्य था “हिंदुओं की रक्षा करनाएवं हिन्दुस्थान को एक सशक्त हिंदू राष्ट्र बनाना”l इस मिलीशिया को खड़े करने की जिम्मेवारी धर्मवीर डॉ. मुंजे ने डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार को दी l

डॉ.साहब ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने व्यक्ति की क्षमताओं को उभारने के लिये नये-नये तौर-तरीके विकसित किये। हालांकि प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असफल क्रान्ति और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक अर्ध-सैनिक संगठन की नींव रखी। इस प्रकार 28/9/1925 (विजयदशमी दिवस) को अपने पिता-तुल्य गुरु डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे , उनके शिष्य डॉ. हेडगेवार, श्री परांजपे और बापू साहिब सोनी ने एक हिन्दू युवक क्लब की नींव डाली, जिसका नाम कालांतर में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ दिया गया l
यहाँ पर उल्लेखनीय है कि इस मिलीशिया का आधार बना - वीर सावरकर का राष्ट्र दर्शन ग्रन्थ(हिंदुत्व) जिसमे हिंदू की परिभाषा यह की गई थी- आ सिंधु-सिंधु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका l पितृभू-पुण्यभू भुश्चेव सा वै हिंदू रीती स्मृता ll

इस श्लोक के अनुसार “भारत के वह सभी लोग हिंदू हैं जो इस देश को पितृभूमि-पुण्यभूमि मानते हैं”l इनमे सनातनी, आर्यसमाजी, जैन , बौद्ध, सिख आदि पंथों एवं धर्म विचार को मानने वाले व उनका आचरण करने वाले समस्त जन को हिंदू के व्यापक दायरे में रखा गया था l मुसलमान व ईसाई इस परिभाषा में नहीं आते थे अतः उनको इस मिलीशिया में ना लेने का निर्णय लिया गया और केवल हिंदुओं को ही लिया जाना तय हुआ, मुख्य मन्त्र था “अस्पष्टता निवारण एवं हिंदुओं का सैनिकी कारण”l

ऐसी मिलीशिया को खड़ा करने के लिए स्वंयसेवको की भर्ती की जाने लगी, सुबह व शाम एक-एक घंटे की शाखायें लगाई जाने लगी| इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए शिक्षक, मुख्य शिक्षक, घटनायक आदि पदों का सृजन किया गया l इन शाखायों में व्यायाम, शरारिक श्रम, हिंदू राष्ट्रवाद की शिक्षा के साथ- साथ वरिष्ठ स्वंयसेवकों को सैनिक शिक्षा भी दी जानी तय हुई l बाद में यदा कदा रात के समय स्वंयसेवकों की गोष्ठीयां भी होती थी, जिनमें महराणा प्रताप, वीर शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, बंदा बैरागी, वीर सावरकर, मंगल पांडे, तांत्या टोपे आदि की जीवनियाँ भी पढ़ी जाती थीं l वीर सावरकर द्वारा रचित पुस्तक(हिंदुत्व) के अंश भी पढ़ कर सुनाये जाते थे l
थोड़े समय बाद इस मिलीशिया को नाम दिया गया राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ- जो आर.एस.एस. के नाम से प्रसिद्ध हुआ l प्रार्थना भी मराठी की बजाय संस्कृत भाषा में होने लगी l वरिष्ठ स्वंय सेवकों के लिए ओ.टी.सी. कैम्प लगाये जाने लगे, जहाँ उन्हें अर्धसैनिक शिक्षा भी दी जाने लगी l इन सब कार्यों के लिए एक अवकाश प्राप्त सैनिक अधिकारी श्री मारतंडे राव जोग की सेवाएं ली गईं l 


सन् १९३५-३६ तक ऐसी शाखाएं केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित थी और इसके स्वंयसेवकों की संख्या कुछ हज़ार तक ही थी, पर सरसंघचालक और स्वंयसेवकों का उत्साह देखने लायक था l स्वयं डॉ. हेडगेवार इतने उत्साहित थे कि अपने एक उदबोधन में उन्होंने कहा की:-
“संघ के जन्मकाल के समय की परिस्थिति बड़ी विचित्र सी थी, हिंदुओं का हिन्दुस्थान कहना उस समय निरा पागलपन समझा जाता था और किसी संगठन को हिंदू संगठन कहना देश द्रोह तक घोषित कर दिया जाता था” l (राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ तत्व और व्यवहार पृष्ठ ६४ )
डॉ. हेडगेवार ने जिस दुखद स्थिति को व्यक्त किया, उसमें नवसर्जित राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिंदू महासभा के नेतृत्व के प्रयास से- हिंदू युवाओं में साहस के साथ यह नारा गूंजने लगा “हिन्दुस्थान हिंदुओं का- नहीं किसी के बाप का” इस कथन की विवेचना डॉ. हेडगेवार ने इन शब्दों में की:-
“कई सज्जन यह कहते हुए भी नहीं हिचकिचाते की हिन्दुस्थान केवल हिन्दुओ का ही कैसे? यह तो उन सभी लोगों का है जो यहाँ बसते हैं l खेद है की इस प्रकार का कथन/आक्षेप करने वाले सज्जनों को राष्ट्र शब्द का अर्थ ही ज्ञात नहीं l केवल भूमि के किसी टुकड़े को राष्ट्र नहीं कहते l एक विचार-एक आचार-एक सभ्यता एवं परम्परा में जो लोग पुरातन काल से रहते चले आए हैं उन्हीं लोगों की संस्कृति से राष्ट्र बनता है l इस देश को हमारे ही कारण हिन्दुस्थान नाम दिया गया है l दूसरे लोग यदि समोपचार से इस देश में बसना चाहते हैं तो अवश्य बस सकते हैं l हमने उन्हें न कभी मना किया है न करेंगे l किंतु जो हमारे घर अतिथि बन कर आते हैं और हमारे ही गले पर छुरी फेरने पर उतारू हो जाते हैं उनके लिए यहाँ रत्ती भर भी स्थान नहीं मिलेगा l संघ की इस विचारधारा को पहले आप ठीक ठाक समझ लीजिए l” (राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पृष्ठ १४)

एक अन्य अवसर पर डॉ. हेडगेवार ने कहा था “संघ तो केवल, हिन्दुस्थान हिंदुओं का- इस ध्येय वाक्य को सच्चा कर दिखाना चाहता है l” दूसरे देशों के सामान, “यह हिंदुओं का होने के कारण”- इस देश में हिंदू जो कहेंगे वही पूर्व दिशा होगी ( अर्थात वही सही माना जाएगा) l यही एक बात है जो संघ जानता है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के लिए किसी भी अन्य पचड़े में पड़ने की आवश्कता नहीं है l”(तदैव पृष्ठ ३८)

जब वीर सावरकर रत्नागिरी में दृष्टि बंद (नजरबंद) थे, तब डा. हेडगेवार वहां उनसे मिलने गये। तब तक वह वीर सावरकर रचित पुस्तक हिन्दुत्व भी पढ़ चुके थे। डा. हेडगेवार उस पुस्तक के विचारों से बहुत प्रभावित हुए और उसकी सराहना करते हुए बोले कि “वीर सावरकर एक आदर्श व्यक्ति है”।

दोनों (सावरकर एवं हेडगेवार) का विश्वास था कि जब तक हिन्दू अंध विश्वास, पुरानी रूढ़िवादी सोच, धार्मिक आडम्बरों को नहीं छोडेंगे तब तक हिन्दू-जातीवाद , छूत-अछूत, शहरी-बनवासी और छेत्रवाद इत्यादि में बंटा रहेगा, और जब तक वह संगठित एवं एक जुट नही होगा, तब तक वह संसार में अपना उचित स्थान नही ले सकेगा।

सन् 1937 में वीर सावरकर की दृष्टिबंदी (नजरबंदी) समाप्त हो गयी, और उसके बाद वे राजनीति में भाग ले सकते थे। उसी वर्ष वे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये जिसके उपाध्यक्ष डा. हेडगेवार थे। 1937 में हिन्दू महासभा का अधिवेशन कर्णावती (अहमदाबाद) में हुआ। इस अधिवेशन में वीर सावरकर के अध्यक्षीय भाषण को “हिन्दू राष्ट्र दर्शन” के नाम से जाना जाता है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापकों में से दो मुख्य व्यक्ति डा. मुंजे एवं डा. हेडगेवार हिन्दू महासभाई थे, और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने वीर सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिन्दू एवं हिन्दू राष्ट्रवाद की व्याख्या को ही अपना आधार बनाया था, साथ ही वीर सावरकर के मूलमंत्र- अस्पर्श्यता निवारण और हिन्दुओं के सैनिकीकरण आदि सिद्धांत को मान्य किया था l

इसी परिपेक्ष्य में हिन्दू महासभा ने भी उस समय एक प्रस्ताव पास कर अपने कार्यकर्ताओ एवं सदस्यों को निर्देश दिया कि वे अपने बच्चों को संघ की शाखा में भेजें एवं संघ के विस्तार में सहयोग दें। आर.एस.एस. की विस्तार योजना के अनुसार उसके नागपुर कार्यालय से बड़ी संख्या में युवक, दो जोड़ी धोती एवं कुर्ता ले कर संघ शाखाओ की स्थापना हेतु दिल्ली, लाहौर, पेशावर, क्वेटा, मद्रास, गुवाहाटी आदि विभिन्न शहरों में भेजे गये।

दिल्ली में पहली शाखा हिन्दू महासभा भवन, मंदिर मार्ग नयी दिल्ली के प्रांगण में हिन्दू सभाई नेता प्राध्यापक राम सिंह की देख रेख में श्री बसंत राव ओक द्वारा संचालित की गयी। लाहौर में शाखा हिन्दू महासभा के प्रसिद्द नेता डा. गोकुल चंद नारंग की कोठी में लगायी जाती थी, जिसका संचालन श्री मुले जी एवं धर्मवीर जी (जो महान हिन्दू सभाई नेता देवता स्वरुप भाई परमानन्द जी के दामाद थे ) द्वारा किया जाता था। पेशावर में आर.एस.एस. की शाखा सदर बाजार से सटी गली के अंदर हिन्दू महासभा कार्यालय में लगायी जाती थी जिसकी देख रेख श्री मेहर चंद जी खन्ना- तत्कालिक सचिव हिन्दू महासभा करते थे।

वीर सावरकर के बड़े भाई श्री बाबाराव सावरकर ने अपने युवा संघ जिसके उस समय लगभग 8,000 सदस्य थे ने, उस संगठन को आर.एस.एस. में विलय कर दिया। वीर सावरकर के मित्र एवं हजारों ईसाईयों को शुद्धि द्वारा दोबारा हिन्दू धर्म में लाने वाले संत पान्च्लेगॉंवकर ने उस समय अपने 5,000 सदस्यों वाले संगठन “मुक्तेश्वर दल” को भी आर.एस.एस. में विलय करा दिया। उद्देश्य था कि हिन्दुओ का एक ही युवा शक्तिशाली संगठन हो। इस प्रकार संघ की नीतियों, पर हिंदू महासभा व वीर सावरकर के हिन्दुवाद का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था l

इस तरह डा. हेडगेवार के कुशल निर्देशन, हिन्दू महासभा के सहयोग एवं नागपुर से भेजे गये प्रचारकों के अथक परिश्रम एवं तपस्या के कारण संघ का विस्तार होता गया और 1946 के आते-आते संघ के युवा स्वयंसेवकों की संख्या करीब सात लाख हो गयी। उन प्रचारको की लगन सराहनीय थी। इनके पास महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, बन्दा बैरागी की जीवनी की छोटी छोटी पुस्तके एवं वीर सावरकर द्वारा रचित पुस्तक हिंदुत्व रहती थी।

1938 में वीर सावरकर दूसरी बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये और यह अधिवेशन नागपुर में रखा गया। इस अधिवेशन का उत्तरदायित्व पूरी तरह से आर.एस.एस. के स्वयं सेवको द्वारा उठाया गया। इसका नेतृत्व उनके मुखिया डा. हेडगेवार ने किया था। उन्होंने उस अवसर पर वीर सावरकर के लिए असीम श्रद्धा जताई। पूरे नागपुर शहर में एक विशाल जलूस निकाला गया, जिसमे आगे-आगे श्री भाऊराव देवरस जो आर.एस.एस. के उच्चतम श्रेणी के स्वयं सेवक थे, वे हाथी पर अपने हाथ में भगवा ध्वज ले कर चल रहे थे।
हैदराबाद( दक्षिण) के मुस्लिम शासक निजाम ने वहाँ के हिन्दुओ का जीना दूभर कर रखा था। यहाँ तक कि कोई हिन्दू मंदिर नहीं बना सकता था और यज्ञ आदि करने पर भी प्रतिबन्ध था। 1938 में आर्य समाज ने निजाम हैदराबाद के जिहादी आदेशो के विरुद्ध आन्दोलन करने की ठानी। गाँधीजी ने आर्य समाज को आन्दोलन ना करने की सलाह दी। वीर सावरकर ने कहा कि अगर आर्य समाज आन्दोलन छेड़ता है तो हिन्दू महासभा उसे पूरा-पूरा समर्थन देगी।

आंदोलन चला, लगभग 25,000 सत्याग्रही देश के विभिन्न भागों से आये| निजाम की पुलिस और वहाँ के रजाकारो द्वारा उन सत्याग्रहियों की जेल में बेदर्दी से पिटाई की जाती थी। बीसियों सत्याग्रहियों की रजाकारों की निर्मम पिटाई से मृत्यु तक हो गयी। इन सत्याग्रहियों में लगभग 12,000 हिन्दू महासभाई थे। वीर सावरकर ने स्वयं पूना जा कर कई जत्थे हैदराबाद भिजवाये। पूना से सबसे बड़ा जत्था हुतात्मा नाथूराम गोडसे के नेतृत्व में हैदराबाद भिजवाया, इनमे हिन्दू महासभा कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त संघ के भी कई स्वयं सेवक थे। इस तरह 1940 तक- जब तक डा. हेडगेवार जीवित थे, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को हिन्दू महासभा का युवा संगठन ही माना जाता था।- विभिन्न स्रोत 

Tuesday, September 4, 2012

शिक्षा का स्वरुप और शिक्षक का योगदान


पुराने समय मे हर बच्चा गुरुकुल जाता था, २५ वर्षों तक हर प्रकार की विद्द्यायें सीखता था जिससे उसका जीवन सुखमय बन सके. वेद सीखता था जिससे धर्म के राह मे चलने की ललक पैदा होती थी, शाश्त्र सीखता था जिससे उसे समाज के अनुसार चलने मे परेशानी न हो, शस्त्र सीखता था जिससे वह अपने समाज और सीमा की रक्षा कर सके. आचार विचार सीखता था जिससे उसे भाई चारा बढ़ाने और निभाने मे कोई दिक्कत नहीं आती थी. वह गुरु का सम्मान करता था, गुरु भी ऐसे शिष्य बना देते की खुद गुरु भी अपने शिष्य का सम्मान करता.  

ये उस समय की परिस्थितियां थीं और उसी के अनुसार गुरुवों ने शिक्षा का स्वरुप तय किया था, उनमे इतनी शक्ति और दूरदर्शिता होती थी और उन्हें पता था किस तरह की शिक्षा से समाज का विकास हो सकेगा. आज परिस्थितियां और जरूरते दोनों ही बदल चुके है, साथ ही गुरु भी. आज अध्यापक होना बस जीविका का साधन मात्र है , शायद १ % गुरु ऐसे होते हैं जो अपने छात्रों को प्रभावित कर एक मानक स्थापित करते है, 

यदि हम कालेज पूर्व स्कूलों पे ध्यान दें तो एक अध्यापक अपनी कक्षा मे आ जाये उसके लिए वही बहुत है. किसी तरह कक्षा पूरी कर जल्दी जल्दी कैसे अपने कोचिंग पहुचे पूरा ध्यान  इसी योजना मे निकाल देता है. उसका ध्यान अपने कक्षा के छात्रों पे कम और कोचिंग के  छात्रों के पे जादा होता है, आखिर असली कमाई वहीँ से होती है. जो अध्यापक थोड़ा अपने स्कूल के छात्रों पे धायं रखते भी हैं तो वो पक्षपात पे आ जाते है, वो छात्रों का निर्धारण उसके अंको के आधार पर करने लगते है, अर्थात जो जादा अंक लाये  वो उनका चहेता. वो भूल जाते है छात्र मतलब भविष्य का छत्र. अंक लाना अति आवश्यक है लेकिन साथ मे उसका सर्वागीण विकास भी एक आवश्यक तत्व है, और  ये काम अध्यापक है की यदि उसके अंदर कोई अन्य प्रतिभा  है तो उसे आकर देने की पूरी कोशिश करे. लेकिन सामान्य तौर पे ऐसा नहीं होता. कई अध्यापक तो बस महीने के अंत मे तनख्वाह लेने ही पहुचता है. 

यदि हम कॉलेज स्तर पे नजर डाले तो जादा से जादा  पैसा और पद कैसे बनाए, पे काग दृष्टि लगा के रखते है. उनका ध्यान छात्रों पर कम पद्दोंन्न्ती पे जादा रहता है. विभागीय गुटबंदी, एक दूसरे पे छींटाकशी आम बात है. यदि उनकी पद्दोंनती नहीं भी होती है तो दूसरा वाला सुपरसीड न करे, इसकी योजना बनाते है, इसका एक प्रतिशत भाग भी छात्रों के ऊपर लगाए तो उन्हें व्यक्तिगत पद मिले या न मिले लेकिन छात्रों के  ह्रदय मे आजीवान बस जाते है. 

कालेज और विश्वविद्द्लय स्तर पर आते आते छात्र परिपक्व हो जाते हैं, वो नफा नुक्सान समझने के लायक हो जाते है, उनमे से कुछ भटक भी जाते हैं, कुछ आशानुरूप परिणाम नहीं दे पाते.  मान लीजिए कोई छात्र किसी विषय मे फेल हो जाता है या उसकी पढाई छूट जाती  है तो  घोर निराशा मे चला जाता है, कभी कभी नौबत तो आत्महत्या तक आ जाती है या कुछ अपराध के रास्ते  पर  चले जाते है. 

एक शिक्षक चाहे तो शिक्षा मे स्वरुप भी निर्धारित कर सकता है. आज के समय मे छात्र किस तरह से समाज और देश के छत्र बन सकते है इस पर चिंतन कर सकते है, लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं होता. 


पढाई चाहे किसी भी विषय की हो प्रबंधन, चिकित्सा, अभियांत्रिकी या अन्य कला, वाणिज्य या विज्ञान के साथ साथ, एक कक्षा समाज और देश की राजनीती के बारे मे होना चाहिए एक अनिवार्य विषय के रूप मे, ताकि वो समझ सके वास्तविकता है, जिसके लिए किसी अथिति वक्ता का भी सहारा अलिया जा सकता है जो उस विषय की अच्छी समझ रखता हो. अन्यथा छात्र १८ साल का होके वोटर तो बन जाता है और किसी डकैत को वोट दे डालता है क्योकि तब तक वो जाती पाती के चक्कर मे फस होता है अतः दूरगामी परिणामों का भान उसे नहीं होता. 

साथ हो थोड़ी बहुत रोजमर्रा के काम आने वाले कानून के बारे मे भी शिक्षित किया जाना चाहिए. पुलिस बात बात पे आम जन को क़ानून को धता बता विभिन्न रास्तो से धमकाती पायी जाती है जिनमे से अधिकतर तो उनके अधिकार मे भी नहीं होता. 

आम तौर छात्रों को जो बाते किताबो मे पढ़ा दी जाती है छात्र वही मान लेते है, जैसे कई छात्रों के मन मे बचपन से ही भर दिया जाता है की अमुक आदमी महापुरुष है, अमुक धर्म मे इस प्रक्कर के शाशन के परिकल्पना है आदि आदि , इस मिथ्या को भी तोडने के लिए छात्रों मे वाद विवाद पर्तियोगिता नियमित तौर पे कराई जानी चाहिए. क्योकि यही सही समय होता है जब छात्रों के ह्रदय मे बसे मिथक को तोड़ा जा सकता है और उसे सामाजिक और सही राह दिखाई जा सकती है. 

लेकिन ये सब चीजें तब तक संभव नहीं जब तक शिक्षक अपना कर्तव्य सिर्फ वेतन लेने से ऊपर नहीं समझेगा, जब तक वह अपने छात्रों को व्यग्तिगत रूप से न समझ पाए. आजकल तो शिक्षक को पता भी नहीं होता की उसकर कक्षा मे कितने छात्र है और उनकी रूचि क्या है. एक शिक्षक को समझना होगा की वही है जो समाज के लिए एक मजबूत छत्र का निर्माण कर सकता है. 

एक गुरु ही था जिसने एक चरवाहे को मगध का मालिक बना दिया, और एक गुरु जो  खुद इर्ष्या और पक्षपात , जातिपात, प्रिय-अप्रिय और स्तर मे पड़  एकलव्य जैसे धनुर्धर का अंगूठा काट लिया जिसके लिए छात्र समाज आज भी उन्हें आदर्श नहीं मानता, यदि इसी प्रकार गुरु पक्षपात और द्वेष मे रहे तो किसी भी देश और समाज का गर्त मे जाना एक स्वाभाविक सी बात होगी.  एक गुरु मालवीय  जी थे जिन्होंने एक महान विश्वविद्द्यालय की रचना कर दी, और लाखो छात्रों के हृदय मे बस गए और एक गुरु और हैं जो जिनसे शिक्षा पा खास समुदाय जेहाद की तरफ बढ़ बम फोड रहा है, दंगा कर रहा है. 

गुरु एक नाव का पतहार होता है जो कईयों की नाव खे रहा होता है, अब ये उसके हाथ मे है की उन्हें पार लगाये या बीच मजधार मे डूबा दे. 

कमल सिंह