नारद: varanasi
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Saturday, March 26, 2016

वोट बैंक बनाम इंसान


जानेवालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे
एक इंसान हूँ, मैं तुम्हारी तरह.

आज मुझे लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का ये गाना याद आ रहा है. फिल्म दोस्ती में दो अपंग थे समाज से अपील करते फिरते थे, और भीख मांगते थे, कोई देता कोई न देता, चने खा के सो रहते और वो भी कभी कभी कोई छीन जाता.
वहां भी समाज था अपंग लोग अंग वालों से अपील कर रहे थे, यहाँ भी वही समाज है, लेकिन यहाँ कोई शारीरिक तौर पर अपंग नहीं लेकिन जहनी तौर पर जरुर हिन्दू समाज जरुर है. और अपंग करने वाले कौन है? निश्चित ही इसमें मिडिया और उसके बाद नेतावों का एक बड़ा हाथ है, कैसे? नीचे कुछ केस दे रहा हु, दोनों अलग अलग पक्ष के :-

केस स्टडी १.१ : दिल्ली दामिनी काण्ड :
एक लड़की का चलते बस में दुर्दांत रेप हुआ सके नाम बताये गए सिवाय एक के, यही नहीं उस समय रेप पे हल्ला मचाने वाले नेता बाद में मुख्यमंत्री बने और और उस मुस्लिम बलात्कारी को सिलाई मशीन गिफ्ट की. नया जीवन जीने के लिए.
केस स्टडी १.२ ||: अखलाख काण्ड :
एक अफवाह पे एक दुर्दांत भीड़ एक इंसान को क़त्ल कर देती है, नतीजा उसके फैमिली को ४० लाख, फ़्लैट से नवाजा जाता है.

केस स्टडी २.१ : घोडा टांग काण्ड :
जी हाँ, इसे काण्ड का ही नाम देंगे, साल में कई बार पारंपरिक रूप से बकरों के गर्दन रेतने वालो पर चूं न करने वाली मिडिया एक घोड़े की टांग पे इतना शोर मचाती है जैसे ISIS वालो ने हमला कर दिया हो जो बाद में झूठा निकला और झूठ फैलाने वाले पत्रकार मिडिया ने माफ़ी तक न मांगी. कारन यहाँ तथाकथित घोड़े की टांग तोड़ने वाले का नाम कोई हिन्दू था जो बाद में झूठ निकला.

केस स्टडी २.२ : डा नारंग मर्डर :
देश भर हुए हत्यावो की बात छोड़ देते है, छोड़ देते है प्रशांत पुजारी की हत्या जिसपे मिडिया चूं तक नहीं की. आईये डा नारंग की ही बात कर ले.
दुर्दांत भीड़ दवारा संघठित ढंग से योजना बना कर एक डा की पोश एरिया में हत्या कर दी जाती है, और मिडिया का रुख की कमुनल रूप न दें, ध्यान रहे वही मिडिया अपील कर रही जिसने अखलाख की हत्या पर पुरे देश के हिन्दुवों को हत्यारा घोषित कर दिया था, पूरी दुनिया में छवि बिगाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. डा नारंग हिन्दू थे, कोई मिलने वाला नहीं आया. न केजरीवाल न राहुल. एक बार मान ले की सभी हत्यारे हिन्दू थे, सांप्रदायिक रंग के बिना भी बात करें तो क्या कारन है की दादरी से हैदराबाद तक पीछे ग्रीस लगा कर सरपट जाने वाले केजरीवाल, राहुल यहाँ का रास्ता भूल गए ? झुग्गी झोपड़ी हटाने के समय पहुचने वाले रविश, बरखा, राजदीप और अंजुम चुप है…कोई ग्राउंड जीरो नहीं जा रहे ? बता सिर्फ ये रहे की साम्प्रदायिक नहीं है. मामला साम्प्रदायिक न होना क्या इस बात का लाइसेंस देता ही की डा नारंग के यहाँ कोई न जाए ? डा नारंग की बात कोई नहीं कर रहा. क्या डा नारंग की जान घोड़े की कपोल कल्पित टूटी टांग से भी कम है ? वो सिर्फ इसलिए की मरने वाला यहाँ हिन्दू है, यहाँ आने से भाई चारा नहीं बढेगा, साम्प्रदायिकता बढ़ेगी, इनकी हरकतों और सोंच से तो यही लगता है. दादरी में पहुचने वाले केजरीवाल कहते है की नारंग का परिवार अभी दुखी है तो क्या अखलाख के परिवार ने उन्हें डिनर पर ख़ुशी ख़ुशी बुलाया था ? की आईये जी, अखलाख जी मर गए, आईये ..कुछ लेंगे ? चाय पानी, दारु सोडा? या मफलर?

मिडिया का ये रुख क्यों हैं ?? :
अरब देशो से इन मीडियाई घरानों से पैसा आता है या नहीं मै इस पर बात नहीं करूँगा लेकिन ये सत्य है की इनका एक एजेंडा इन ऊपर के चार उदाहरानो से समझा जा सकता है. अन्यथा मरने वाला या मारने वाला मुसलमान हो तो हर तरह से बारिश, पैरवी, और मरने वाला या मारने वाला तो छोडिये सिर्फ कपोल कल्पित टांग तोड़ने वाला हिन्दू हो तो दुर्गति होती है. यही मिडिया के लोग सोशल मिडिया के लोगो को जेल में बुक अफवाह फैलाने के केस में बुक करने की पैरवी करते है जो खुद अफवाहों के मसीहा है. यही पैमाना है तो अफजल प्रेमी मिडिया गैंग के ९०% लोग जेल में होंगे.
दूसरा एक लेकिन बहुत बड़ा कारन ये भी है की हिन्दुवों का संघठित न होना, हिन्दुवों में कुछ दलितांध और स्वार्थी लोग नारंग में दलित सवर्ण मुद्दा ढूढ़ रहे. हिन्दू संघठित नहीं है. वो तो हर शुक्रवार आँ आँ आँ करने माइक पे सबको बुला लेते है, लेकिन हिन्दू हफ्ते में क्या तो सालो में कभी इकठ्ठा नहीं होता. इन अफजल प्रेमी मिडिया गैंग को शायद RSS इसीलिए बुरा लगता है की कुछ मुठ्ठी भर ही सही लेकिन RSS सुबह सबको अपने यहाँ संघठित करता है, खेल कूद करता है, एक होने को कहता है.
हिंदुवो, अभी भी समय है, एक हो, नहीं तो ४० रूपये तक नसीब न होंगे, मारे जावोगे वो अलग, घर में घुस के, फिर ये तुम्हारी मौत तक पर बहस न करने की अपील करेंगे. उनका क्या ? उम्रदराज है तो ४० लाख रुपया, जुवेनाईल है तो सिलाई मशीन का गिफ्ट तो है ही, और तुम गाते रहना,

“जानेवालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे
एक इंसान हूँ, मैं तुम्हारी तरह.”

सादर
कमल कुमार सिंह

Friday, August 29, 2014

भारत या हिन्दुस्तान

मोहन भागवत के बयान की भारत एक हिन्दुराष्ट्र है पर सभी सेकुलर(?) पार्टिया एक सुर में जिस तरह प्रतिक्रिया दे रही हैं, उसे देख कर ये माना जाना चाहिए की विभाजन के समय सिर्फ हिन्दू ही छले गए है. मुसलमानों को एक राष्ट्र भी मिल गया और यहाँ जिसे हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए उसे सेकुलर घोषित कर यहाँ भी रहने का अधिकार मिल गया. अब ऐसे में किसी भी संघठन हिन्दू राष्ट्र के लिए खड़ा हो जाय तो ये साम्प्रदायिकता कैसे? यदि ये साम्प्रदायिकता है तो  इसकी नीव श्री नेहरू और श्री मोहनचंद्र गांधी ने इस्लामी राज्य की मांग मान  पाकिस्तान का बटवारा कर १९४७ में ही डाल इस प्रकार के साम्प्रदायिकता को जायज सिद्ध कर चुके हैं.  बटवारे के समय दुसरे हिस्से के जमींन जिसे हिन्दू राष्ट्र का पेड़ होना चाहिए वहां सेकुलर जमीन घोषित कर साम्प्रदायिकता का बीज भी उसी समय से बोया जा चूका है.
अपने राष्ट्रपति काल में श्री राधा कृष्णन ने एक बार कहा था “ Here in India, unfortunately, change of religion means change of race and nationality” . – यहाँ भारत में दुर्भाग्य से धर्म परिवर्तन का अर्थ, जातीयता और राष्ट्रीयता का परिवर्तन है”. उनका ये वाक्य बहुत ही दूरदर्शी था जिसको आज हम प्रत्यक्ष रूप से देख रहे है. किस किस तरह से हिन्दुस्तान कहते ही एक जमात किलस पड़ता जैसे उनकी कोई घर की महिलाओं को छेड़ रहा है. एक श्री श्री चागला ने, जब वो शिक्षा मंत्री थे, कहा था “भारत के सभी मुसलमान हुन्दुवों में से ही धर्म परिवर्तित है, उनके नसों में हिंदुवो का ही रक्त बह रहा है”  यही बात भारतीय इसाईयों के बारे में भी है, लेकिन अफ़सोस, आज भारतीय मुसलमान अरब के गुण और इसाई यूरोपीय देशो के गुण गाता नहीं थकता. किसी भी देश का गुण गाना बुरा नहीं है, बुरा तब है जब उसे अपने देश से जादा दुसरे देशो और महापुरुषों के प्रति रुझान दिखाई देता है.
भारत सरकारे और राजनेता दिन रात रास्ट्रीय एकता का अनंत कालिक अजान देते हैं, उन्हें ये समझ नहीं आता की भारत में अभी राष्ट्र है ही कहाँ? जिस देश की हालत ये हो की यदि पाठ्य पुस्तको में उसी देश के महापुरुष राम, कृष्ण और दयानंद जैसे को शामिल किये जाने के नाम मात्र से ही श्वान रोदन शुरू हो जाता हो उस राष्ट्र की एकता के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है. इसे तत्काल से धर्म से जोड़ कर गैर हिन्दू धर्म की पुस्तको को पढ़ाने की मांग की जाती है जिनके महापुरुषों का भारत या हिन्दुस्तान से रत्ती भर भी सम्बन्ध नहीं है तो कहाँ से आएगी राष्ट्रीयता ?
हिन्दू छात्रो में तो ये उदारता है की वो सभी धर्मो की पुस्तको को पढ़ते है, सीखते हैं, मै भी उन्ही में से एक हूँ, लेकिन यही बात गैर हिंदुवो पर लागू नहीं होती क्योकि वो अपना “रेस” भी परिवर्तित मानते है. आश्चर्य की बात ये है जिस देश के संविधान की दुहाई दे के कुछ इन्द्रा गांधी द्वारा बनाई इंडियन नेशनल कोंग्रेस के नेता (ज्ञात हो की कोंग्रेस से टूट के एक दल आर एस एस बना और दूसरा इंडियन नेशनल कोंग्रेस). एक सामान धार्मिक आधार पे सामान आधिकार देने की बात करती है उन्ही की पूर्वज पार्टी ने मुसलमानों को उनका इस्लामी राष्ट्र तो दे दिया लेकिन बराबरी न दिखाते हुए हिन्दुवों का हक़ मार उसे सेकुलर राष्ट्र बना दिया, ये सच में बहुत ही आश्चर्यजनक है की न जाने कहाँ से या किस मुह से पार्टियाँ अब बराबरी की बात करती है. जबकि वास्तव में अधिकारों में भी हिंदुवो को पीछे ही रखा गया है, मुस्लिमो को उनके धार्मिक आधार पे कुछ भी करने की छुट है जबकि वहीँ हिन्दू के लिए तमाम कानून लागू होते है, ये कैसी समानता है? बिलकुल ही समझ के परे है.
इस मानसिकता का विकास देश में यूह ही नहीं हो गया, इसके पीछे कुछ कारण थे. देश के विधान की रचना क्रम में जब देश का नाम लागू होने का प्रश्न आया तो, श्री भीम ने, श्री जवाहर लाल, और मौलाना अब्दुल कलाम ने निजी तौर से उनसे परस्पर विचार विमर्श किया था. कुछ लोगो ने इसका नाम आर्यावर्त रखने का सुझाव दिया था, स्वयं श्री भीम ने देश का नाम हिन्दुस्तान अंकित करना चाहते थे, लेकिन इसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद को आपत्ति थी, उनके अनुसार इससे अहिन्दुवो के भावना को ठेस लग सकती थी जो पहले ही एक देश ले चुके थे. इस दुविधा में नेहरू जी ने भारत नाम सुझाया जिसे श्री भीम को अनिक्षा पूर्वक स्वीकार करना पड़ा.
उस समय यदि इस देश के संविधान में देश का नाम भारत की जगह हिन्दुस्तान होता तो आज ये नौबत ही नहीं आती और हिन्दू और गैर हिंदुवो में किसी भी तरह का वैमनस्य का बीज अंकुरित नहीं होता. यही एक कारन है की इस देश पर राष्ट्र निष्ठां गैर हिंदुवो में नहीं है या है भी तो अँगुलियों पे गिनी जा सकने वाली संख्या पर है क्योकि कोई भी धर्म इतना सहिष्णु नहीं जितना हिन्दू धर्म.
यदि हिन्दू धर्म भी उतन ही कट्टर रहा होता जितना की गैर हिन्दू धर्म तो पाकिस्तान की तरह ही एक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना भी उसी समय हो जानी चाहिए थी. एक पक्ष को उसका हिस्सा तो मिल गया, लेकिन दूसरा पक्ष, जिसको वो अपना हिस्सा समझता रहा है, उसके साथ इस हद तक छलावा हुआ की आज भारत को हिन्दुस्तान कह दो तो गैरहिन्दुवों की भुजाएं फड़कने लगाती है, जो की बेहद दुर्भाग्य पूर्ण है, और ये सब एक तरफ फिर से हिंदुवो को संगठित कर सकती है एक हिन्दू राष्ट्र निर्माण के आन्दोलन के लिए, और यदि एसा होता है तो ये बिकुल भी गलत नहीं.
 सादर
कमल कुमार सिंह

Tuesday, June 24, 2014

नौजवानों का चिंतात्मक शौक

नौजवानों ने अपने दिल को लुभाने के लिए नया नया शौक अपनाया, कभी सर के बाल खड़े कर झाड़ना मानो चिड़िया चुग गयी खेत, कभी सर पर भारत का नक्शा, कभी अपनी नयी मोर्डन लंगोट का ब्रांड स्ट्रिप पेंट से ऊपर दिखाना, कभी कण छिदाना मानो “नारी पुरुष सामान है” के आन्दोलन कारी, कभी कोलेज की लड़की पटाना तो कभी कोलेज की टीचर (विपरीत लिंगी अपने हिसाब से सब कुछ विपरीत कर लें), कभी सर तोडना, और मौका मिल जाय छिनैती करना.

खैर नौजावानो के के पास काफी समय है, नए नए शौक बना सकते है उसको पूरा करने के के लिए समय साधन खर्च कर सके है, दिमाग लड़ा सकते है. हैसियत हो समाज लडवा सकते है.

इसी चक्कर में एक नौजवान लगा है की उसे देश की चिंता करना जरुरी है, नहि करेगा तो देश अब बिका या तब बिका, ये नौजवान चिंता न करे तो देश किसी मंडी में बिक जाएगा, चिंता करना जरुरी है आखिर देश के नौजवान है, लेकिन ये नौजवान देश बिकने की चिंता में घुले जा रहा वो खुद बिकने की कगार है. ये नौजवान पनवाड़ी की दूकान से उधारी की सिगरेट मुह में लगा धुएं के गोल छल्ले जब ऊपर की और छोड़ता है तो उसे इस पुरे गोल पृथ्वी की भी चिंता हो जाती है. ओह्ह ये धरती, प्यारी धरती, वसुधैव कुटुम्बकम, दुसरे देशो में हुए युध्ध माहौल खराब कर रही है, इसका असर हमारे देश होगा या नहीं होगा? वो अपने जेब एक मात्र पड़े सिक्के को उछलता है, फिर तय करता है की पहले देश की चिंता की या विश्व की?

मेरा देश, हाय देश, बिक जाएगा, क्या होगा इसका, ये उधार की बीडी पि चिंता न करेंगे तो कौन करेगा? इसी चिन्तालय में वो पनवाड़ी से दूसरा उधार की सिगरेट मांगता है, पनवाड़ी मना कर देता, अब ये एक नयी चिंता ओह्ह बिना इसके देश की चिंता कैसे करू? कैसा छुद्र आदमी है, देश बिक रहा है और इसको अपने धंधे की पढ़ी है, ओह्ह्ह, क्या होगा मेरे देश का भविष्य, जब ऐसे ऐसे ग्रास रूट लेवल के पनवाड़ी न समझेंगे. फिर वो पनवाड़ी को देश के बारे में बताता है, पनवाड़ी मुस्कराता हुआ, तगादे के साथ एक और सिगरेट पकड़ता है, लो जी पार हुआ चिंता का पहला पडाव, फिलहाल देश की चिंता करने के लिए हुयी सिगरेट की चिंता का निदान हुआ, अब पनवाड़ी उसे अपना दोस्त लगता है, जो कुछ देर पहले छुद्र लग रहा था.

फिर वो उससे देश के बारे में बात करने लगता है. उफ़ देश को बिकने से कैसे रोकू, चलो उस मंडी को ख़त्म कर दें जिसमे ये देश बिकेगा, फिर वो उस मंडी को खोजने की चिंता में घुल जाता है, कहा है ये मंडी? किधर मिलगा? दिल्ली आजाद मार्केट या बनारस का चनुवा सट्टी, कौन लेके जाएगा बेचने? ये एक नयी आफत? ये कौन को कैसे ढूँढा जाय? किस रास्ते से जाएगा. कौन सी गाडी पे? या लम्बी करियर वाली सायकिल पे? ये एक नयी चिंता.

कौन सी कृतघ्न कम्पनी ऐसे वाहन बना सकती है? दुष्ट कम्पनी? कम से कम ऐसे लोगो के हाथो में अपना वाहन तो न देती, पहचान करना भी जरुरी नहीं समझती? उफ्फ्फ ये दुष्ट कम्पनिया, क्या किया जाय इनका? ये एक नयी चिंता.

सुनो इस कम्पनी को ही जला दिया जाय, फिर देखते है वो कैसे बेचता ऐसे लोगो को अपना साधन जो देश बेचते है. उसका दूसरा सिगरेट भी खतम होने वाला है. वो वापिस अपने जड़ चिंता में लौटता है, अबकी उसको पता है की पनवाड़ी जादा कृतघ्न है, देश की चिंता के लिए उसे सामन भी मुहैया न करवाएगा.

कहाँ मर गया ये दिनेश, आज पैसे देने वाला था? साले ये एन टाइम पे धोखा दे जाते है, इनको नहीं मालुम की देश की चिंता के लिए कितने साधन की जरुरत होती है, सीने में आग जलानी पड़ती है, गला तर करना पड़ता है, साले ये आजकल के नौजवान भी न बस यु ही है, ठीक टाइम पे उधार भी नहीं दे सकते, लानत है इनकी जिंदगी पर जो एक देश भक्त को उधार देने की भी हैसियत नहीं रखते.

तभी उसके मोबाईल की घंटी बजती है.वो ख़ुशी से हकलाता हुआ “एस डार्लिंग कहा हो? हाँ मिलते हैं न, अरे वही कालेज वाले गार्डन में”. 
अब उसके पास एक नयी चिंता है, गार्डेन में एक सहूलियत वाली जगह ढूढने की.


सादर 
कमल कुमार सिंह 

Sunday, June 22, 2014

ईराकी -इस्लामी आतंकवाद और भारत पे प्रभाव


ईराक में जो खुनी खेल चल रहा है उसका तो अल्लाह ही मालिक है, वो मालिक इसलिए की सारा खेल ही उसी के नाम पर हो रहा है, इस्लाम.जिसकी वजह से लिबरल मुस्लिम पूरी दुनिया में शर्मशार होते है, और दुसरे सम्प्रदाय के कट्टरपंथियों का निशाना.
  
पहले ये जान ले की ईराक में क्या हो रहा है और क्यों हो रहा हैतो सीधा सीधा वो कह रहे है की "इस्लामिक राज्य" पत्रकार या मिडिया इसके पीछे अमेरिका का हाथ बताते नहीं थकते, अगला जोर जोर पुरे गले फाड़ कर कह रहा की वो ये सब इस्लाम के लिए कर रहा लेकिन कमाल है किस वहाशियाने ढंग से "अमेरका छाप" दलील द्वारा डिफेंड किया जा रहा है की दिमाग फेल हो जाए. लेकिन ध्यान दें अमेरका क्या सरोकारसद्दाम को ख़त्म कर उसने अपनी ताकत दिखा दी थीईराक में वर्तमान सरकार रहे या इन सुन्नियो की फिर भी अमेरिका को तेल की की कोई चिंता नहीं उसके लिए तो सब बराबर है यदि हम इस "अमेरिका छाप" दलील माने तो. इसलिए उसने दखल देने से फिलहाल हाथ खड़ा कर लिया है, उसे अच्छी तरह मालुम है की दो बंदरो के बीच के लड़ाई में उसे नहीं पड़ना है बल्कि फायदा उठाना है. कुछ मुस्लिम ये भी दम भरते है की बराक हुसैन मुस्लिमान है, फिर जब भी कहीं विश्व में कुछ भी मुस्लिम में खिलाफ हो तब भी बड़ी चालाकी से अमेरिका के मथ्थे चढ़ा दिया जाता है. मुस्लिमान अपने फेवर में ओबामा का चरित्र (मुस्लिम होंना) जैसे चाहे बताते है, मुस्लिम ताकत दिखानी हो तो वो भी मुसलमान है, और जब बिना कारन इस्लाम के नाम पर लड़ाई हो तो तो वो इस्लाम का दुश्मन है.

चलो मान लेता हु इसके पीछे अमेरिका का हाथ है, तो फिर बर्मा में क्या हो रहा है? श्रीलंका? वहां अमेरिका का क्या हित हो सकता है? ये तो छोडिये जनाब पकिस्तान और अफगानिस्तान पर नज़ारे इन्यायत कीजिये. हिन्दुस्तान में मोदी और विश्व में अमेरिका को मीडिया/पत्रकार? ने कुछ इस तरह का गढ़ा है मानो मोम के हो, जहाँ चाहे थोडा सा गरम कर फिट कर दो.शुक्र मनाईये दोनों ही अपनी अपनी जगह मजबूत है नहीं तो पता नहीं दोनों का इस्लामिस्ट क्या कर बैठते.

भारत में भी मुलमानो का पर्सनल ला अलग है? तो जरा ये बताएं की ये इस्लाम के नाम पर है की इसके पीछे भी अमेरिका का हाथ हैजब इसके पीछे अमेरिका नहीं तो कहीं भी कुछ भी हो मुह उठा के अमेरिका वाले दिशा में थूक देने से सच्चाई तो नहीं बदलेगी न? कुछ अधिकार चाहिए किसी भे देश के कानून से अलग तो इस्लाम की वजह से, और इस्लामी कहीं कुछ उत्पात करे तो अमेरिका की गोद है न, फेंक दो गलती? गजब का तर्क है यार.

चलो मान लिया की इसके पीछे अमेरिका है, तो उसका सिक्का बस इस्लामी देशो में ही क्यों चलता है ? सोवयत के पास भी अब तेल के बड़े भण्डार है, साथ कुछ अन्य यूरोपियन देशो के पास भी उनके तेलों में क्या कीड़े पड़े हैनहीं, अमेरिका को अच्छी तरह मालुम है की कौन से धर्म के नाम पर किसको आसानी से भडकाया जा सकता है.

चलो जी अब कुछ कह रहे है ये सत्ता की लड़ाई है. जी हाँ, इस्लाम का उद्देश्य ही क्या है फिर?मोहम्मद साहब के बाद इस्लाम का दुरुपुयोग बस सत्ता के लिए ही किया गयायहाँ तक की इस्लाम के नाम पर उनके पुरे परिवार की हत्या कर दी गयी ताकि सत्ता हथियाया जा सके. हर जगह हर तरफ, पुरे विश्व में.

बेवजह अमेरिका, सऊदी अरब या ईराक के सुन्नियों को दोष क्यूँ दें, सीरिया में तो 2 लाख से ज्यादा मुसलमान मरा है , वहां इस नरसंहार का दोष शियाओं पर था. जहाँ जिसका दाव लगा उसने सामने वाले को  मार दिया पर एक बात पक्की है , जिसने भी मारा मारा इस्लाम के नाम पर, जेहाद के नाम पर,  न सुन्नी, न शिया और न वहाबी, इन सभी हत्याओं का दोष जिहाद पर है, इस्लाम पर है.

क्या इन सब का भारत पर प्रभाव पढ़ेगा? क्या यहाँ भी कुछ सुगबुगाहट होगीजबकि आई एस ई एस के लोगो ने विडिओ बना भारत के मुसलमानों का भी आव्हाहन किया है. क्या यहाँ कोई/ कोई संघटन उनके साथ हो के भारत के खिलाफ जेहाद छेड़ने की तयारी कर सकता हैध्यान रहे हमारे यहाँ सिमी जैसे प्रतिबंधित संघठन भी है, और एक पुराना  तथा वर्तमान इतिहास भी.

क्यों की इस्लाम को मानने वाले पुरे विश्व में है जैसा की हर मुस्लिम ८६ इंच का सीना तान के कहता है लेकिन पुरे विश्व को देखिये क्या हो रहा है वहां. मुझे बड़ा अजीब लगता है जब भारत में भी मुस्लिम कहते हैं "हम पुरे विश्व में है"  तो जब भी कहीं पुरे विश्व में इराकी घटना हो तो आपसे क्यों न जोड़ा जाए ? फिर ये कहाँ कहाँ तक जायज है की ये हिन्दुस्तान है यहाँ ऐसा कुछ नहीं हो सकता ? जबकि हुआ है, कश्मीर में कश्मीरी सेना बस इसीलिए पाकिस्तानियों से मिल गयी थी की वो मुसलमान थे, और ठीक यही ईराक मे हो रहा है, सुन्नी समुदाय इन इस्लामी आतंकियों के साथ इसलिए हो गया है की ये इस्लामी आतंकवादी सुन्नी है. चलिए जी माना सत्ता की लड़ाई है, तो ये जो आम इराकी सुन्नी इन इस्लामी आतंकियों के साथ मिल रहे उन्हें तो सत्ता का भागीदार बनाने से रहे ये इस्लामी आक्रमणकारी ? तो फिर ?? तो जाहिर ये बस इस एहसास के उनके साथ है की वो इनके जमात के हैं. नहीं तो १० -२० हजार के इस्लामी दहशत गर्द किसी भी देश को बंदी बना लें ये असम्भव है, जब तक वहां की अवाम साथ न हो. 

जब भी कहा जाता है भारत में इस्लाम तलवार के बल पर फैला तो मुस्लिम तिलमिला जाते है अरे मानिए न की सत्ता की लड़ाई थी मुस्लिमो दवारा न की इस्लाम के लिए, तो साहब खरबूजा चाक़ू पे गिरे या चाक़ू खरबूजे पर कटता खरबूजा ही है. इस्लाम को कुछ इसी तरह का हथियार बना गया.  

विश्व में कहीं कुछ भी हो  तो भारतीय मुसलमान ये आशा करते है की उन्हें उसमे न घसीटा जाय, और ये उनकी आशा वाजिब  भी जिसका हमें सम्मान करना चाहिए, लेकिन तभी याद आता है, इस्लाम ब्रदरहुड के नाम पर मुंबई में तोड़ फॉर जो की कही दूर बर्मा में हुआ था, कही श्रीलंका में हुआ था, अब ईराक के लिए भी पर्चे साइन कराये जा रहे है तो भाई अब सोचो की आपकी आशा जायज है या ना जायज. मुझे नहीं याद है की पाकिस्तान में हुए हिन्दू उत्पीडन के मामले में किसी भारतीय मुलिम को कोप झेलना पडा हो, किसी बंगलादेशी मुस्लिम की सजा यहाँ हिन्दुस्तान में मिली हो, अफगानिस्तान में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ने पर किसी बुद्धिस्ट का कोप भाजन किसी देश में कोई मुस्लिम हुआ होजबकि बाबरी गिरने के ठीक बाद हर इस्लामी मुल्को पर हिंदुवो के उपर भयंकर गाज गिरी, खून के आंसू रुलाया गया, उनको पाकिस्तानी, बांग्लादेशी नहीं बल्कि हिन्दू माना गया. भारत के मुसलमान भी अमेरिका को गरियाते है लेकिन याद है की इन्ही लोगो ने अमेरिका को मोदी के लिए वीसा ना देने का पत्र लिखा था, और यदि आज भी बस चले तो मोदी को कुचलने के लिए किसी दुसरे देश की सेना माँगा ले. 


इस इराकी इस्लामी आतंकवाद में भी भारत के मुसलमान पर्चे साइन करा रहे है"शहादत" के लिए, जिनका उस अरब कंट्री से कुछ लेना देना भी नहीं है, तो जरा सोचिये, किसी खुरापाती तत्व की वजह से इश्वर न करे उंच नीच हो गयी या मुस्लिम और गैरमुस्लिम में जरा सा भी तनाव हुआ तो क्या यही पत्र इस्लामी देशी में नहीं जाएगा की भारत आओ हमारी मदद करो, गैर मुस्लिमो को ख़त्म करो. और वो तो तैयार बैठे हैं, विडियो भी बनवा के भिजवा दी की करो भाईयो हम बैक अप देते है. सरकार को तत्काल ऐसे लोगो पर लगाम लगनी चाहिए जो इंसानियत नहीं बल्कि मुसलमानियत के नाम पे ऐसी हरकत कर रहे है, यदि ये इंसानियत के नाम पे पहल करते तो सबसे आव्हाह्वाहन करते, मुस्लिम गैर मुस्लिम सभी से और सबको मिलकर सरकार पर दबाव बनाते की ईराक में कुछ करो इंसानियत के लिए, ये पर्चे साइन करा शहादत के लिए आह्वाहन करना "डाइरेक्ट एक्शन" जैसा कुछ नहीं लगता ? किसी देश में कुछ भी हो तो वो वैश्विक स्तर और राजनैतिक स्तर पर बात चित होती नहीं की इस्लामी विचार धारा के अनुरूप. 


होना तो ये चाहिए की इस्लाम के नाम पर होना विश्व में कहीं भी कुछ गलत हो आप मुस्लिम आगे आयें और सबका साथ मांगे, सोचिये हम भारतीयों का सर गर्व से कितना ऊँचा उठेगा, हम सीना ठोक के दुसरे मुल्को के ऊपर लानत भेज सकते है की हमारे मुल्क का मुस्लिम पहले इंसान है उसे विधर्मियो से भी परहेज नहीं मानवता के लिए काम करने को, लेकिन नहीं, आप तभी एक्टिव होते है जब विश्व में कही मुस्लिमो पे गाज गिरी हो और एक्टिव भी बस मुस्लिम ही होते है, क्या मुस्ल्मानियत इंसानियत से ऊपर है ? क्या इस्लाम ये सिखाता है की जब मुलमान परेशान है तभी आप परेशान हो, क्या इस्लाम ये सिखाता है की कोई गैर मुस्लिम चाहे कितना भी जहीन हो और वो परेशान हो तो आप इन्तजार करो की कब मुस्लिम परेशान होता है ?  क्या आप लोग लगता है की गैरमुस्लिम आपका साथ नहीं देगा तो, लानत है आपके सोच पर. भारत की बहुसंख्यक जनता इस इन्तजार में बैठी है की वो कब अपने को भारतीय माने और हमारे गले लगे बजाय की काफिर कहने के. हम ये मानते है की मस्जिद का गिरना गलत था, मस्जिद हो या मंदिर हो, चर्च हो गुरुद्वारा जो भी चींजे भारत में है वो हर भारतीय की विरासत हैउसे सम्हालने की जिम्मेदारी सभी भारतियों की है, न  की किसी हिन्दू, मुस्लिम सिख्ह इसाई की. 

विश्वाश कीजिये मेरा इरादा किसी का दिल दुखाना नहीं है, लेकिन मेरे मुआज्जिज दोस्त इस पर कुछ बोल नहीं रहे तो लिखना पढ़ रहा है, इसकी वजह से किसी का दिल दुखे तो मै माफ़ी मांगता हु, क्यों की कोई मेरे  लिए हिन्दू - मुस्लिम इसाई सिख्ख बाद में है पहले वो मेरे लिए इंसान है.

सादर 
कमल कुमार सिंह 

Tuesday, August 27, 2013

साहब जी और फ़ूड सेक्योरिटी बिल


सुबह सुबह "साहब" जी  जब खटिया से अपना पैर नीचे उतार, उनके हिसाब से "भारत डायन"  के सीने पे पाँव रखा तो खुश हुए, हलाकि यह काम वो रोज करते थे. लेकिन आज ख़ासा खुश थे.

"अजी सुनती हो,  जरा डेटाल साबुन देना, आज नहाना पड़ेगा, अमेरिका ने हमको मगाया है" -  अपनी पत्नी से कहा.

क्या हुआ जी ? सब ठीक तो है, कहीं "दिल्ली वाली मम्मी" ने आपको भी बेच तो नहीं दिया उन्हें ? - बेगम  ने कहा.

"कभी कभी ढंग की बात किया करो, तुम बेगम हमेशा हमें अंडर इस्टीमेट करती हो- तमतमाते  बोले.

"काश कुम्भ मेले वाले भी करते तो उनकी जान बच जाती., लो पकड़ो डेटाल, इससे शरीर का कीड़ा तो मार लोगे, दिमाग साफ़ तो पहले ही हो चूका है"- बेगम ने साबुन खुश होते हुए इस तरह से दिया मानो जहर दे रही हो.

डायन के सीने से टुल्लू फिट कर निकले गए पानी से जम  के नहाने के बाद कच्छे को सूरज के नजरो के इनयात कर सूरज  पे अपनी नज़ारे इनायत कर कहा, 
"दो मिनट में सुखा दो , एके है, दूसरा स्वीटजरलैंड में है.  नहीं किया तो  सांप्रदायिक बता के अंदर कर दूंगा, बड़े बड़े आई ए एस को अन्दर- बाहर  किया है, तुम क्या हो ?"
 सुरज ने मारे  डर के धुप तेज कर दी, कच्छा सूखने लगा लेकिन खान साहब को पसीना आने लगा, फिर तमतमाए, "अबे  रोना  हो तो अपने आँख से पानी निकालो, न की  मेरे "वहां" से. 

खैर ये उनकी रोज की आदत थी, इस तरह के कारनामे कई बार कर चुके हैं,  पिछली बार  कूत्तो के समूह को जो की  सामाजिक व्यक्तियों को  काटने की वजह से मुनिसिपल वाले उठा ले गए थे उनको छुड़ाने की  दलीले थी की ये तो  पागल कुत्ते है, कटना इनका स्वभाव है, अब कुत्ते नहीं काटेंगे तो कौन  काटेगा ? इनको छोड़ दो नहीं तो  कुत्ताधिकार वाले बहुत  है अपने देश में तुम्हारी नौकरी खा जाऊँगा, इंसान और जानवरों में मतभेद करते हो ? साम्प्रदायीक  कही के. कुत्ते हमारे समाज के अभिन्न हिस्सा है. ये हमारी रखवाली करते है तो किसी को काटे भी तो हमें आपत्ति क्यों ?. अब कुत्ते कुत्तई नहीं करेंगे तो क्या आप करेंगे ? 

खैर नहा धो के साहब ने अपने "कमजोर नाडे" को बड़े कसीदे के बाँधा ताकि कमर पर टिकी रहे. मुलायम हाथो द्वारा भेंट की गयी मूल्यमान इतर का छिडकाव किया ताकि किसी भी प्रकार के गन्दगी की बदबू न आये, दिमाग इन सब से मुक्त था अतः इतर से उसको भी मुक्त रखा हमेशा की तरह. इनका मानना था की दिमाग की खुशबू से प्रभावित करना खतरनाक हो सकता है, कही किसी चोर चुहाडे की नजर पड गयी तो रहा सहा भेजा भी उड़ा ले जायेगा, अतः जैसा भी है अपना है, खोपड़े में सुरक्षित तो रहेगा. 

घर से अभी कुछ दूर गए होंगे की किराने  के दूकान पर लम्बी लाइन नजर आई. आप सामाजिक  थे वहां गए, "क्यों रे इत्ती लम्बी लाइन कहे की ? खुदा की खैरात बट रही क्या ? 

"खुदा की खैरात ले के क्या करेंगे चाचा? मम्मी जी का भेजा कोटा आया है,  

 हायं ?? ये कैसे  भैया तो अपने मुलायम जबान में कुछ कुछ खिलाफत की थी, लेकिन क्या भैया और क्या गिरगिट ? चलो कोई नहीं पास हो गया तो हो गया. मन में बुदबुदाए साहब. 

"ये बताओ बिलवा में खाने के बाद पचाने का भी कुछ उपाय है,"  साहब ने धमकाने के अंदाज में पूछा. 

साहब,  जिसे दो जून का कहना न नसीब हो वो  पचाने की क्या सोचे? आप लोग खाइए, खूब  खाइए, मिल बाँट के पचाईए. यहाँ तो कब से लाइन में लगे है, पंसारी कुछ देने को तैयार नहीं होता, कहता है किसी की शिफारिश ले के आ , अब आप आ गए हो तो, तो आप ही कह दो. सुना की आपके शिफारिश से सम्परादायिक  यात्रायें रुक जाती है, साम्प्रदायिक लोग थर थर कांपते है. 

अबे ये जनता का काम है, हम ठहरे नेता, हम सिफारिश करंगे तो लोग क्या कहेंगे? साहब ने पहले से फुले हुए सीने को और फुलाने की कोशिश की. लेकिन सुनो, जितना मिलेगा उसका आधा हमारे बेगम को पंहुचा जाना बाकियों से भी यही कह दो, "अबे पंसारी, दो इन सबको, कहे तंग करते हो, माल बंद करावा दे क्या" ? साहब ने पंसारी से धमकी से लबालब शिफारिश की और चलते बने. 

गरीब बेचारा अपनी हथेली पे पड़े  उन सिक्को को जो उसने मम्मी के पोस्टरों को रद्दी के भाव बेच बेच के जमा किया  था, जमीन पर फेंकते हुए, ढेर सारा दुसित प्रवाह किया और  चलता बना, नंगा, भूखा.  

कमल कुमार सिंह. 

Friday, July 12, 2013

मलाला जैसे हो इस्लामिस्ट


अंग्रेजी में एक  कहावत है "Action speaks louder than words" जो सत्  प्रतिशत सही है. जिस  किशोरावस्था में स्कुल में दुनिया भर के सपने सजाते हैं, बगल वाले से जलते हैं किस उसका नंबर उससे जादा क्यों? उस छोटी उम्र मलाला जैसी किशोरी किसी आम हमउम्र से अलग हट कुछ एसा करती दिखाई देती है जो इस्लामिस्टो की नजर में चुभती है, यहाँ तक इस लड़की के ऊपर हमले भी हुए. जान बचने के बाद भी यह किशोरी बिना किसी दबाव में आये अपने धुन में लगी है. मलाल डे पे सयुंक्त राष्ट्र संघ ने इन्हें आमंत्रित भी किया है. 

अब सोचने वाली बात है की इस्लाम इस्लाम चिल्लाने वाले एक तरफ तो अफगान में दुसरे कि संस्कृति नष्ट करते हैं, गया में बम फोड़ते हैं  जो इस्लाम के चहरे पर चेचक  नुमा कभी न जाने वाले धब्बे हैं, वही दूसरी तरफ मलाला जैसे लोग भी हैं जो इन सब कट्टरवादिता से  आगे बढ़ इस्लाम  को दिए गए दाग को अनजाने में सही लेकिन चेहरा दरुस्त कर रही है. अनजाने में इसलिए कहाँ की वो कोई काम अपने दिल में इस्लाम को आगे बढाने के उदेश्य से नहीं कर रहीं, पूरी मानवता के लिए कर रही हैं, उनके कार्यो से हर किसी के दिल मीठा सा अहसास होता है, कि काश ये बम फोडू जो अपने आप को इस्लाम के लिए समर्पित कहतें हैं, एसा कुछ क्यों नहीं करते जिससे वास्तव में लगे की वास्तव में इस्लाम बेहतर है.  क्या इतने सारे नकारात्मक संगठनों के बावजूद भी मलाल एक सकारात्मक पहचान रहीं है तो इस पर इस्लाम को क्या एतराज या नुक्सान हो सकता है. 

जो लोग इंटरनेट पर इस्लाम का बखान करते नहीं चुकते उनके लिए भी ये बड़ा सबक है, जो इस्लाम इस्लाम चिल्लाते हैं, ख़ासकर भारत में इन्हें भोपाल के लोग नहीं दीखते जिन्हें कोंग्रेस सरकार ने एक करारा लेकिन गहरा जख्म दिया है, ८० के दशक में भोपाल गैस काण्ड जिस क्षेत्र में हुआ वहां अधिकतर मुस्लिम  बस्तियां ही है, जो आज बस इसलिए जिन्दा ताकि अगले दिन अस्तपाल जा सके. वहां उस क्षेत्र में आप जायेंगे तो आप की रूह काप जाएगी जब आप जिन्दगी को कराहते घसीटते हुए देखेंगे, और आप अपने आप को  दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान मानेंगे की आप भोपाल के उस दशक में पैदा नहीं हुए जहाँ कोंग्रेस ने मौत का हाहाकार मचा दिया. लेकिन उनके लिए यहाँ के किसी भी इस्लाम परस्तो का हाथ आगे नहीं बढ़ता. कोंग्रेस को बार बार निशाने पे इसलिए ले रहा हूँ, क्योकि उस समय अर्जुन  सिंह वहां के मुख्यमंत्री थे, भोपाल गैस काण्ड के अभ्युक्त "एंडरसन" काण्ड के बाद शाही व्यवस्था में अमेरिका विदा करने में उनका बड़ा हाथ था. हलाकि खबर राजिव गांधी को भी थी. इसके बाद सबसे बड़ा मजाक ये की  मुस्लिम जज "अहमदी" जी ने पूरी जी जान लगा दी की अभियुक्तों को कम से कम सजा मिले. 

जो लोग इस्लाम का झंडरबरदार बनते है, उनकी नजर बस इंटरनेट पे प्लास्टिक पीटने तक ही सिमित रहती है, बजाय  मलाला जैसे लोगो से कुछ सकारात्मक उर्जा लें,  एक मलाल जब मुझे मजबूर कर सकती है उनके बारे में लिखने के लिए तो जरा सोचिये यहाँ का १% मुसलमान इस तरह का कमान हाथ में लेले तो उसे नेट पर प्लास्टिक पीटने की कोई जरुरत नहीं रह जाएगी. 

हमें मलाला चाहिए, प्लास्टिक पिटवा नहीं . 

Thursday, July 11, 2013

मुसलमानो का मोदी विरोध


एसा नहीं है २००२ से पहले या बाद में कोई दंगे नहीं हुए, कब हुए, कितने हुए, कहाँ हुए, किसके सरकार में हुए  ये सब नहीं लिखूंगा, सभी जानते है. लेकिन २००२ के दंगो को ही निशाना जादा बनाया जाता रहा है. साथ उसको "स्टेट स्पोंसर्ड" का दर्जा राजनीतिज्ञों  द्वारा बताया जाना इस बात का  सबुत है की उन्हें अपनी करनी पे विश्वाश नहीं बल्कि दंगो का की राजनीति का ही सहारा है , नहीं तो "स्टेट स्पोंसर्ड" दंगा क्या होता है ??  क्या बाकी के दंगे सहमती से गोलमेज मीटिंग टाइप के बाद हुए  है ? ख़ासकर  उस  केस में जब तक किसी भी कोर्ट ने मोदी पे कोई टिप्पड़ी भी न की हो. असंम  में कोंग्रेसियों (कोंग्रेस - आई )  द्वारा  बांगला देशियों का बसाया जाना फिर दंगा होना क्या एक सुनियोजित  "स्टेट स्पोंसर्ड" दंगा  नहीं है ? ये वही पार्टियाँ हैं  जो  पीछे से दंगे करा के फिर आगे इन्साफ मांगती है खासकर मुस्लिमो के लिए. 

असली बात वोट बैंक है, सभी जानते हैं. आज जबकि मोदी  किसी भी पार्टी के किसी भी नेता से जादा लोकप्रियता लिए हुए हिन्दू मुस्लिम किये बिना चुनाव जीतते है, तो बाकी पार्टी के  राजनितिज्ञो  का तिलमिलाना समझ में आता है.  मोदी को का भुत उन्हें जगाने सोने नहीं देता, एसा लगता है जैसे दंगो  ने उनके राजीनीति को भी खा लिया है.  उन्हें लगता है २००२ का दंगा उनके जितने की रेसिपी है हलाकि वो मुगालते में हैं जबकि वही मोदी तीसरी पारी खेल चुके हैं.  और २००२ के बाद जहाँ कोई दंगा नहीं हुआ तो दूसरी तरफ पुरे देश में न जाने कितने  दंगे हुए तो फिर मुसलमान मोदी से क्यों भड़कते हैं ?? 

 राजनीतिज्ञों का मोदी से भडकना समझ आता है, जलन कह लीजिये या दुर्भावना या राजनैतिक  प्रतिद्वंदता जो भी दूसरी पार्टियो का भडकना समझ में आता है, लेकिन साथ साथ ही  मुस्लिमो  मोदी का नाम से भडकना बड़ा गोल गोल घुमाता है,  क्या मोदी मुसलमान विरोधी है ? यदि एसा है तो गुजरात में कैसे जीतते ? या  मान लीजिये  मोदी देश के प्रधान मंत्री बन जाते है तो क्या देश से मुसलमानों का खात्मा कर देंगे ? तब ये सोचना चाहिए की क्या गुजरात में मुसलमान खतम हो गए ? बड़ी हास्यपद बात है, तो फिर मुसलमान मोदी से क्यों भड़कते हैं ?? 

अब आईये दुसरे पहलू पे सोंचे, आज तक मैंने किसी नेता को नहीं देखा जो अपने भाषणों में मुसलमानों की पैरवी न करते देखा गया हो, चाहे हो लालू  का  परिवर्तन रैली हो, या टोपीबाज नितीश की रैली, या मुलायम की "उत्तर प्रदेश के मुस्लिम को लडकियों वजीफा देना हो,  अरविन्द केजरीवाल का बुखारी वंदन हो (वो बात अलग है भगा दिए गए थे वहां से ) या अन्य कोई नेता, उनका पलड़ा एक तरफ इस मुसलमान "वोट बैंक" कि तरफ झुका होता है,  पलड़ा कभी बराबर  होते नहीं देखा गया.  नहीं तो क्या उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के अतिरिक्त और कोई लड़की उस योग्य नहीं है जिसको सहायता की दरकार है ?  वही कोंग्रेस के भारत विकास में एक मुस्लिम लड़की को एड में दिखाना क्या दिखता है ? 

ठीक  इसके उलट मोदी के भाषणों  में आजतक किसी ने हिन्दू मुसलमान की बात नहीं सुनी होगी. उन्होंने हमेशा बराबरी की बात की,  गुजरात मे हो तो ६ करोड़ गुजरात और  यदि देश में हो तो भारतीय कह के संबोधित करने वाले मोदी शायद यहीं चुक कर गए, उन्हें बराबरी और समानता की बात  न करके  बल्कि मनमोहन सिंह की तरह "देश में पहला हक़ अल्पसंख्यको का है" टाइप का कोई जुमला बोलते  तो शायद मुसलमान उने कभी नहीं भड़कता, क्योकि दंगे तो और भी कई  कोंग्रसी नेतावो ने करवाए हैं, सो दंगा उनके लिए ख़ास मुद्दा नहीं है क्योकि वो भी जानते हैं की वाजिब से ऊपर किस आशा रखना  उनकी आदत बन चुकी है, मिले न मिले वो बात अलग है. असली मुद्दा मोदी विरोध का है उनका "कान", जो नेतावो से " मुस्लिम मुस्लिम" सुनने का आदि हो चूका है , अभ्यस्त हो चूका है, एसे में मोदी यदि "मेरे प्यारे  भारतीय भाईयों और बहनों"  टाइप का एक सामानता की बात करेंगे  तो निश्चित और लाजिमी  है मुसलमानों का मोदी से भडकना.

Sunday, June 16, 2013

संघ और हिन्दू महासभा


१९२१ ई. में अंग्रेजो ने तुर्की को परास्त कर, वहां के सुल्तान को गद्दी से उतार दिया था, वही सुल्तान मुसलमानों के खलीफा/मुखिया भी कहलाते थे, ये बात भारत व अन्य मुस्लिम देशों के मुसलमानों को नागवार गुजरी जिससे जगह-जगह आन्दोलन हुए l हिन्दुस्थान में खासकर केरल के मालाबार जिले में आन्दोलन ने उग्र रूप ले लिया l मुसलमानों को शिकायत तो थी ब्रिटिश सरकार से, पर उसके सामने तो मुसलमानों की चली नहीं, परन्तु उनका कहर टूटा केरल की निर्दोष और असहाय हिंदू जनता पर, इस हिंसक बबाल में बड़ी संख्या में हिंदुओं का कत्ल हुआ, स्त्रियों की इज्जत लूटी गई तथा बड़े पैमाने पर बल पूर्वक हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बनाया गया l (संदर्भ पुस्तक- “राष्ट्रपिता वीर सावरकर”)

१९२२ ई. में भारत के राजनीतिक पटल पर गांधी के आने के पश्चात ही मुस्लिम सांप्रदायिकता ने अपना सिर उठाना प्रारंभ कर दिया। खिलाफत आंदोलन को गांधी जी का सहयोग प्राप्त था - तत्पश्चात नागपुर व अन्य कई स्थानों पर हिन्दू, मुस्लिम दंगे प्रारंभ हो गये तथा नागपुर के कुछ हिन्दू नेताओं ने समझ लिया कि हिन्दू एकता ही उनकी सुरक्षा कर सकती है। ऐसी स्थिति में कई हिंदू नेता केरल की स्थिती जानने एवं वहां के लूटे पिटे हिंदुओं की सहायता के लिए मालाबार-केरल गये, इनमें नागपुर के प्रमुख हिंदू महासभाई नेता डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे, डॉ. हेडगेवार, आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद जी आदि थे, उसके थोड़े समय बाद नागपुर तथा अन्य कई शहरों में भी हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए l ऐसी घटनाओं से विचलित होकर नागपुर में डॉ. मुंजे ने कुछ प्रसिद्ध हिंदू नेताओं की बैठक बुलाई, जिनमें डॉ. हेडगेवार एवं डॉ. परांजपे भी थे, इस बैठक में उन्होंने एक हिंदू-मिलीशिया बनाने का निर्णय लिया, उद्देश्य था “हिंदुओं की रक्षा करनाएवं हिन्दुस्थान को एक सशक्त हिंदू राष्ट्र बनाना”l इस मिलीशिया को खड़े करने की जिम्मेवारी धर्मवीर डॉ. मुंजे ने डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार को दी l

डॉ.साहब ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने व्यक्ति की क्षमताओं को उभारने के लिये नये-नये तौर-तरीके विकसित किये। हालांकि प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असफल क्रान्ति और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक अर्ध-सैनिक संगठन की नींव रखी। इस प्रकार 28/9/1925 (विजयदशमी दिवस) को अपने पिता-तुल्य गुरु डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे , उनके शिष्य डॉ. हेडगेवार, श्री परांजपे और बापू साहिब सोनी ने एक हिन्दू युवक क्लब की नींव डाली, जिसका नाम कालांतर में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ दिया गया l
यहाँ पर उल्लेखनीय है कि इस मिलीशिया का आधार बना - वीर सावरकर का राष्ट्र दर्शन ग्रन्थ(हिंदुत्व) जिसमे हिंदू की परिभाषा यह की गई थी- आ सिंधु-सिंधु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका l पितृभू-पुण्यभू भुश्चेव सा वै हिंदू रीती स्मृता ll

इस श्लोक के अनुसार “भारत के वह सभी लोग हिंदू हैं जो इस देश को पितृभूमि-पुण्यभूमि मानते हैं”l इनमे सनातनी, आर्यसमाजी, जैन , बौद्ध, सिख आदि पंथों एवं धर्म विचार को मानने वाले व उनका आचरण करने वाले समस्त जन को हिंदू के व्यापक दायरे में रखा गया था l मुसलमान व ईसाई इस परिभाषा में नहीं आते थे अतः उनको इस मिलीशिया में ना लेने का निर्णय लिया गया और केवल हिंदुओं को ही लिया जाना तय हुआ, मुख्य मन्त्र था “अस्पष्टता निवारण एवं हिंदुओं का सैनिकी कारण”l

ऐसी मिलीशिया को खड़ा करने के लिए स्वंयसेवको की भर्ती की जाने लगी, सुबह व शाम एक-एक घंटे की शाखायें लगाई जाने लगी| इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए शिक्षक, मुख्य शिक्षक, घटनायक आदि पदों का सृजन किया गया l इन शाखायों में व्यायाम, शरारिक श्रम, हिंदू राष्ट्रवाद की शिक्षा के साथ- साथ वरिष्ठ स्वंयसेवकों को सैनिक शिक्षा भी दी जानी तय हुई l बाद में यदा कदा रात के समय स्वंयसेवकों की गोष्ठीयां भी होती थी, जिनमें महराणा प्रताप, वीर शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, बंदा बैरागी, वीर सावरकर, मंगल पांडे, तांत्या टोपे आदि की जीवनियाँ भी पढ़ी जाती थीं l वीर सावरकर द्वारा रचित पुस्तक(हिंदुत्व) के अंश भी पढ़ कर सुनाये जाते थे l
थोड़े समय बाद इस मिलीशिया को नाम दिया गया राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ- जो आर.एस.एस. के नाम से प्रसिद्ध हुआ l प्रार्थना भी मराठी की बजाय संस्कृत भाषा में होने लगी l वरिष्ठ स्वंय सेवकों के लिए ओ.टी.सी. कैम्प लगाये जाने लगे, जहाँ उन्हें अर्धसैनिक शिक्षा भी दी जाने लगी l इन सब कार्यों के लिए एक अवकाश प्राप्त सैनिक अधिकारी श्री मारतंडे राव जोग की सेवाएं ली गईं l 


सन् १९३५-३६ तक ऐसी शाखाएं केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित थी और इसके स्वंयसेवकों की संख्या कुछ हज़ार तक ही थी, पर सरसंघचालक और स्वंयसेवकों का उत्साह देखने लायक था l स्वयं डॉ. हेडगेवार इतने उत्साहित थे कि अपने एक उदबोधन में उन्होंने कहा की:-
“संघ के जन्मकाल के समय की परिस्थिति बड़ी विचित्र सी थी, हिंदुओं का हिन्दुस्थान कहना उस समय निरा पागलपन समझा जाता था और किसी संगठन को हिंदू संगठन कहना देश द्रोह तक घोषित कर दिया जाता था” l (राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ तत्व और व्यवहार पृष्ठ ६४ )
डॉ. हेडगेवार ने जिस दुखद स्थिति को व्यक्त किया, उसमें नवसर्जित राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिंदू महासभा के नेतृत्व के प्रयास से- हिंदू युवाओं में साहस के साथ यह नारा गूंजने लगा “हिन्दुस्थान हिंदुओं का- नहीं किसी के बाप का” इस कथन की विवेचना डॉ. हेडगेवार ने इन शब्दों में की:-
“कई सज्जन यह कहते हुए भी नहीं हिचकिचाते की हिन्दुस्थान केवल हिन्दुओ का ही कैसे? यह तो उन सभी लोगों का है जो यहाँ बसते हैं l खेद है की इस प्रकार का कथन/आक्षेप करने वाले सज्जनों को राष्ट्र शब्द का अर्थ ही ज्ञात नहीं l केवल भूमि के किसी टुकड़े को राष्ट्र नहीं कहते l एक विचार-एक आचार-एक सभ्यता एवं परम्परा में जो लोग पुरातन काल से रहते चले आए हैं उन्हीं लोगों की संस्कृति से राष्ट्र बनता है l इस देश को हमारे ही कारण हिन्दुस्थान नाम दिया गया है l दूसरे लोग यदि समोपचार से इस देश में बसना चाहते हैं तो अवश्य बस सकते हैं l हमने उन्हें न कभी मना किया है न करेंगे l किंतु जो हमारे घर अतिथि बन कर आते हैं और हमारे ही गले पर छुरी फेरने पर उतारू हो जाते हैं उनके लिए यहाँ रत्ती भर भी स्थान नहीं मिलेगा l संघ की इस विचारधारा को पहले आप ठीक ठाक समझ लीजिए l” (राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पृष्ठ १४)

एक अन्य अवसर पर डॉ. हेडगेवार ने कहा था “संघ तो केवल, हिन्दुस्थान हिंदुओं का- इस ध्येय वाक्य को सच्चा कर दिखाना चाहता है l” दूसरे देशों के सामान, “यह हिंदुओं का होने के कारण”- इस देश में हिंदू जो कहेंगे वही पूर्व दिशा होगी ( अर्थात वही सही माना जाएगा) l यही एक बात है जो संघ जानता है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के लिए किसी भी अन्य पचड़े में पड़ने की आवश्कता नहीं है l”(तदैव पृष्ठ ३८)

जब वीर सावरकर रत्नागिरी में दृष्टि बंद (नजरबंद) थे, तब डा. हेडगेवार वहां उनसे मिलने गये। तब तक वह वीर सावरकर रचित पुस्तक हिन्दुत्व भी पढ़ चुके थे। डा. हेडगेवार उस पुस्तक के विचारों से बहुत प्रभावित हुए और उसकी सराहना करते हुए बोले कि “वीर सावरकर एक आदर्श व्यक्ति है”।

दोनों (सावरकर एवं हेडगेवार) का विश्वास था कि जब तक हिन्दू अंध विश्वास, पुरानी रूढ़िवादी सोच, धार्मिक आडम्बरों को नहीं छोडेंगे तब तक हिन्दू-जातीवाद , छूत-अछूत, शहरी-बनवासी और छेत्रवाद इत्यादि में बंटा रहेगा, और जब तक वह संगठित एवं एक जुट नही होगा, तब तक वह संसार में अपना उचित स्थान नही ले सकेगा।

सन् 1937 में वीर सावरकर की दृष्टिबंदी (नजरबंदी) समाप्त हो गयी, और उसके बाद वे राजनीति में भाग ले सकते थे। उसी वर्ष वे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये जिसके उपाध्यक्ष डा. हेडगेवार थे। 1937 में हिन्दू महासभा का अधिवेशन कर्णावती (अहमदाबाद) में हुआ। इस अधिवेशन में वीर सावरकर के अध्यक्षीय भाषण को “हिन्दू राष्ट्र दर्शन” के नाम से जाना जाता है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापकों में से दो मुख्य व्यक्ति डा. मुंजे एवं डा. हेडगेवार हिन्दू महासभाई थे, और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने वीर सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिन्दू एवं हिन्दू राष्ट्रवाद की व्याख्या को ही अपना आधार बनाया था, साथ ही वीर सावरकर के मूलमंत्र- अस्पर्श्यता निवारण और हिन्दुओं के सैनिकीकरण आदि सिद्धांत को मान्य किया था l

इसी परिपेक्ष्य में हिन्दू महासभा ने भी उस समय एक प्रस्ताव पास कर अपने कार्यकर्ताओ एवं सदस्यों को निर्देश दिया कि वे अपने बच्चों को संघ की शाखा में भेजें एवं संघ के विस्तार में सहयोग दें। आर.एस.एस. की विस्तार योजना के अनुसार उसके नागपुर कार्यालय से बड़ी संख्या में युवक, दो जोड़ी धोती एवं कुर्ता ले कर संघ शाखाओ की स्थापना हेतु दिल्ली, लाहौर, पेशावर, क्वेटा, मद्रास, गुवाहाटी आदि विभिन्न शहरों में भेजे गये।

दिल्ली में पहली शाखा हिन्दू महासभा भवन, मंदिर मार्ग नयी दिल्ली के प्रांगण में हिन्दू सभाई नेता प्राध्यापक राम सिंह की देख रेख में श्री बसंत राव ओक द्वारा संचालित की गयी। लाहौर में शाखा हिन्दू महासभा के प्रसिद्द नेता डा. गोकुल चंद नारंग की कोठी में लगायी जाती थी, जिसका संचालन श्री मुले जी एवं धर्मवीर जी (जो महान हिन्दू सभाई नेता देवता स्वरुप भाई परमानन्द जी के दामाद थे ) द्वारा किया जाता था। पेशावर में आर.एस.एस. की शाखा सदर बाजार से सटी गली के अंदर हिन्दू महासभा कार्यालय में लगायी जाती थी जिसकी देख रेख श्री मेहर चंद जी खन्ना- तत्कालिक सचिव हिन्दू महासभा करते थे।

वीर सावरकर के बड़े भाई श्री बाबाराव सावरकर ने अपने युवा संघ जिसके उस समय लगभग 8,000 सदस्य थे ने, उस संगठन को आर.एस.एस. में विलय कर दिया। वीर सावरकर के मित्र एवं हजारों ईसाईयों को शुद्धि द्वारा दोबारा हिन्दू धर्म में लाने वाले संत पान्च्लेगॉंवकर ने उस समय अपने 5,000 सदस्यों वाले संगठन “मुक्तेश्वर दल” को भी आर.एस.एस. में विलय करा दिया। उद्देश्य था कि हिन्दुओ का एक ही युवा शक्तिशाली संगठन हो। इस प्रकार संघ की नीतियों, पर हिंदू महासभा व वीर सावरकर के हिन्दुवाद का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था l

इस तरह डा. हेडगेवार के कुशल निर्देशन, हिन्दू महासभा के सहयोग एवं नागपुर से भेजे गये प्रचारकों के अथक परिश्रम एवं तपस्या के कारण संघ का विस्तार होता गया और 1946 के आते-आते संघ के युवा स्वयंसेवकों की संख्या करीब सात लाख हो गयी। उन प्रचारको की लगन सराहनीय थी। इनके पास महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, बन्दा बैरागी की जीवनी की छोटी छोटी पुस्तके एवं वीर सावरकर द्वारा रचित पुस्तक हिंदुत्व रहती थी।

1938 में वीर सावरकर दूसरी बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये और यह अधिवेशन नागपुर में रखा गया। इस अधिवेशन का उत्तरदायित्व पूरी तरह से आर.एस.एस. के स्वयं सेवको द्वारा उठाया गया। इसका नेतृत्व उनके मुखिया डा. हेडगेवार ने किया था। उन्होंने उस अवसर पर वीर सावरकर के लिए असीम श्रद्धा जताई। पूरे नागपुर शहर में एक विशाल जलूस निकाला गया, जिसमे आगे-आगे श्री भाऊराव देवरस जो आर.एस.एस. के उच्चतम श्रेणी के स्वयं सेवक थे, वे हाथी पर अपने हाथ में भगवा ध्वज ले कर चल रहे थे।
हैदराबाद( दक्षिण) के मुस्लिम शासक निजाम ने वहाँ के हिन्दुओ का जीना दूभर कर रखा था। यहाँ तक कि कोई हिन्दू मंदिर नहीं बना सकता था और यज्ञ आदि करने पर भी प्रतिबन्ध था। 1938 में आर्य समाज ने निजाम हैदराबाद के जिहादी आदेशो के विरुद्ध आन्दोलन करने की ठानी। गाँधीजी ने आर्य समाज को आन्दोलन ना करने की सलाह दी। वीर सावरकर ने कहा कि अगर आर्य समाज आन्दोलन छेड़ता है तो हिन्दू महासभा उसे पूरा-पूरा समर्थन देगी।

आंदोलन चला, लगभग 25,000 सत्याग्रही देश के विभिन्न भागों से आये| निजाम की पुलिस और वहाँ के रजाकारो द्वारा उन सत्याग्रहियों की जेल में बेदर्दी से पिटाई की जाती थी। बीसियों सत्याग्रहियों की रजाकारों की निर्मम पिटाई से मृत्यु तक हो गयी। इन सत्याग्रहियों में लगभग 12,000 हिन्दू महासभाई थे। वीर सावरकर ने स्वयं पूना जा कर कई जत्थे हैदराबाद भिजवाये। पूना से सबसे बड़ा जत्था हुतात्मा नाथूराम गोडसे के नेतृत्व में हैदराबाद भिजवाया, इनमे हिन्दू महासभा कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त संघ के भी कई स्वयं सेवक थे। इस तरह 1940 तक- जब तक डा. हेडगेवार जीवित थे, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को हिन्दू महासभा का युवा संगठन ही माना जाता था।- विभिन्न स्रोत 

Monday, April 1, 2013

भारत में मुस्लिम्स लाचार, बिना अधिकार


"मुस्लिमो को भारत में सच में अधिकार नहीं" ..­

क्यों ?

"अरे क्योकि हम कह रहे है." 

आप कौन ?

"अरे हमें नहीं जानते, लो स्टैण्डर्ड पीपल, हम  हिन्दू मुस्लिम एकता कार्यकर्त्ता के सदस्य, तुम  हमें सेकुलर भी कह सकते हैं."

आप ये कैसे कह सकते की यहाँ उनको कोई अधिकार नहीं है ? कोई वजह ? 

"कैसे नहीं है का क्या मतलब ? अरे नहीं है ? आप बता दो की कैसे है ? "

अरे सबकी तरह उनको वोट डालने का अधिकार है , अभिव्यक्ति का अधिकार है , देश सभी सुविधावो का अधिकार है , कुछ धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का कहना है की उन्ही का पहला हक़ है , और आप कहते हैं उनको अधिकार नहीं है .

"आपको  पता नहीं है मेरे साम्प्रदायिक भाई , ये जो उनको मिल रहा है देश के सविधान के अधिकार है, जो सबके लिए हैं, लेकिन उनका अधिकार कहाँ है ?ये उनका अधिकार तो नहीं, ये तो वो है, जो यहाँ सबको मिलता है ?"

तो उनका क्या अधिकार है, और उनके लिए क्या किया जाए या उनको और क्या दिया जाना चाहिए  जिससे आपको लगे की उनके भी भारत में अधिकार है, वो भी भारतीय है.

"तुम कुछ नहीं समझते, शायद तुम आजकल सांप्रदायिक लोगो के साथ रहते हो, कही आर एस एस के तो नहीं ? जरुर संघी होगे जो जरा भी बात भी नहीं समझ में आती. मेरे साम्प्रदायिक भाई, देखो  हर मुस्लिम बहुल  देशो में सिर्फ उनके ही अधिकार होते, या मुस्लिम बहुल देश तो छोडो, मुस्लिम बहुल भारत  क्षत्रो तक में सिर्फ उनके ही अधिकार होते हैं ?   बाकी जगह नहीं, पुरे देश में नहीं, है की नहीं अन्याय ? जब वो हमारे भारत के नागरिक है तो उनके ईस्लामिक अधिकारों की रक्षा का हमारा कर्तव्य बनता है, उनको ये छुट  होनी चाहिए की वो किसी का जबरजस्ती  धर्म परिवर्तन करवाए,  लेकिन यहाँ भारत में, गैरमुस्लिम का क़त्ल भी इस्लाम का  हवाला  दे करवा दे तो ये गुनाह हो जाता है, क्या ये  है मुस्लिमो के साथ न्याय ? नहीं हरगिज नहीं ? वो भारत में इस्लाम में नाम पर गैर मुस्लिमो का घर नहीं  फूंक सकते ? उनको क़त्ल नहीं कर सकते ? आखिर भारत कर क्या रहा है उनके लिए ? कुछ भी तो नहीं , भाई चारा बढ़ाना है तो उनके अधिकार हमें देने ही  होंगे ?"

क्या आपको लगता है की  भारत के मुस्लिमो को इस तरह के अधिकारों की आवश्यकता है ? क्या वो एसा चाहते हैं,  क्या आपने उनसे या उनके किसी प्रतिनिधि से बात की है ? क्या उन्होंने  ऐसी  कोई इक्षा व्यक्त की है ?

"आ गए न अपने साम्प्रदायिक  रंग  वाले  औकात पे, उनके अधिकारों की बात सुनते ही जल भुन जाते हो तुम सांप्रदायिक लोग, वो चाहे या न चाहे, वो दबे कुचले हैं, उन्हें उनके अधिकारों को याद दिलवाना होगा, तब न चाहेंगे, तुम जैसे साम्प्रदायिक लोग किसी का भला कहाँ होने देते है , क्या  अब ये  हरित क्रांति वाले क्या गेहू से पूछ के क्रांति करते हैं, सुन्दरलाल बहुगुणा ने  पेड़ से पूछ के क्रांति किया था ? मुर्ख कही के," 

और भाई जी हिन्दू ?

"ये  क्या होता है ?"

अरे माने बाकी के यहाँ के गैरमुस्लिम ?

"क्या हुआ उनको ?" 

माने उनके कोई अधिकार नहीं ?

"तुम फिर लगे सांप्रदायिक बात करने, साले भगवा, तुम लोग मुर्ख हो, तुमसे बात ही करना बेकार है. सालों तुममे न कोई तमीज है न संस्कार, बस आ जाते हो खाकी चढढही पहिन के, तमीज से बात करने की भी अक्ल नहीं, मुर्ख कहीं के, ब्लडी नॉन सेकुलर ."
  

एसा कहने वाले आप कौन ?

"उफ्फ्हो, तुम भगवो  और गैर मुस्लिमो को कौन समझाए, तुम लोगो से बात ही करना बेकार है, यू पीपुल आर कम्युनल, नाट स्टैण्डर्ड पीपल टू टाक,  कितनी बार बताये,  वी आर द सेकुलर, वर्किंग फार हिन्दू मुस्लिम्स ब्रदर हुड. यू फूल नेवर अंडरस्टैंड, सेन्स लेस गाइज,  पहले जाओ कुछ पढो लिखो, ज्ञान सीखो, और सबसे पहले मूर्खो बात करने की तमीज सीख के आओ, बेवकूफ ,बेहूदा कहिं के पता नहीं कहाँ कहाँ से आ जाते है खाकी  पहिन के ." 

ह्म्म्म जी, वी फूल पीपल ....