नारद: सेना KAMAL मुस्लिम
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Sunday, June 22, 2014

ईराकी -इस्लामी आतंकवाद और भारत पे प्रभाव


ईराक में जो खुनी खेल चल रहा है उसका तो अल्लाह ही मालिक है, वो मालिक इसलिए की सारा खेल ही उसी के नाम पर हो रहा है, इस्लाम.जिसकी वजह से लिबरल मुस्लिम पूरी दुनिया में शर्मशार होते है, और दुसरे सम्प्रदाय के कट्टरपंथियों का निशाना.
  
पहले ये जान ले की ईराक में क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है?  तो सीधा सीधा वो कह रहे है की "इस्लामिक राज्य" पत्रकार या मिडिया इसके पीछे अमेरिका का हाथ बताते नहीं थकते, अगला जोर जोर पुरे गले फाड़ कर कह रहा की वो ये सब इस्लाम के लिए कर रहा लेकिन कमाल है किस वहाशियाने ढंग से "अमेरका छाप" दलील द्वारा डिफेंड किया जा रहा है की दिमाग फेल हो जाए. लेकिन ध्यान दें अमेरका क्या सरोकार, सद्दाम को ख़त्म कर उसने अपनी ताकत दिखा दी थी, ईराक में वर्तमान सरकार रहे या इन सुन्नियो की फिर भी अमेरिका को तेल की की कोई चिंता नहीं उसके लिए तो सब बराबर है यदि हम इस "अमेरिका छाप" दलील माने तो. इसलिए उसने दखल देने से फिलहाल हाथ खड़ा कर लिया है, उसे अच्छी तरह मालुम है की दो बंदरो के बीच के लड़ाई में उसे नहीं पड़ना है बल्कि फायदा उठाना है. कुछ मुस्लिम ये भी दम भरते है की बराक हुसैन मुस्लिमान है, फिर जब भी कहीं विश्व में कुछ भी मुस्लिम में खिलाफ हो तब भी बड़ी चालाकी से अमेरिका के मथ्थे चढ़ा दिया जाता है. मुस्लिमान अपने फेवर में ओबामा का चरित्र (मुस्लिम होंना) जैसे चाहे बताते है, मुस्लिम ताकत दिखानी हो तो वो भी मुसलमान है, और जब बिना कारन इस्लाम के नाम पर लड़ाई हो तो तो वो इस्लाम का दुश्मन है.

चलो मान लेता हु इसके पीछे अमेरिका का हाथ है, तो फिर बर्मा में क्या हो रहा है? श्रीलंका? वहां अमेरिका का क्या हित हो सकता है? ये तो छोडिये जनाब पकिस्तान और अफगानिस्तान पर नज़ारे इन्यायत कीजिये. हिन्दुस्तान में मोदी और विश्व में अमेरिका को मीडिया/पत्रकार? ने कुछ इस तरह का गढ़ा है मानो मोम के हो, जहाँ चाहे थोडा सा गरम कर फिट कर दो.शुक्र मनाईये दोनों ही अपनी अपनी जगह मजबूत है नहीं तो पता नहीं दोनों का इस्लामिस्ट क्या कर बैठते.

भारत में भी मुलमानो का पर्सनल ला अलग है? तो जरा ये बताएं की ये इस्लाम के नाम पर है की इसके पीछे भी अमेरिका का हाथ है? जब इसके पीछे अमेरिका नहीं तो कहीं भी कुछ भी हो मुह उठा के अमेरिका वाले दिशा में थूक देने से सच्चाई तो नहीं बदलेगी न? कुछ अधिकार चाहिए किसी भे देश के कानून से अलग तो इस्लाम की वजह से, और इस्लामी कहीं कुछ उत्पात करे तो अमेरिका की गोद है न, फेंक दो गलती? गजब का तर्क है यार.

चलो मान लिया की इसके पीछे अमेरिका है, तो उसका सिक्का बस इस्लामी देशो में ही क्यों चलता है ? सोवयत के पास भी अब तेल के बड़े भण्डार है, साथ कुछ अन्य यूरोपियन देशो के पास भी उनके तेलों में क्या कीड़े पड़े है?  नहीं, अमेरिका को अच्छी तरह मालुम है की कौन से धर्म के नाम पर किसको आसानी से भडकाया जा सकता है.

चलो जी अब कुछ कह रहे है ये सत्ता की लड़ाई है. जी हाँ, इस्लाम का उद्देश्य ही क्या है फिर?मोहम्मद साहब के बाद इस्लाम का दुरुपुयोग बस सत्ता के लिए ही किया गया, यहाँ तक की इस्लाम के नाम पर उनके पुरे परिवार की हत्या कर दी गयी ताकि सत्ता हथियाया जा सके. हर जगह हर तरफ, पुरे विश्व में.

बेवजह अमेरिका, सऊदी अरब या ईराक के सुन्नियों को दोष क्यूँ दें, सीरिया में तो 2 लाख से ज्यादा मुसलमान मरा है , वहां इस नरसंहार का दोष शियाओं पर था. जहाँ जिसका दाव लगा उसने सामने वाले को  मार दिया पर एक बात पक्की है , जिसने भी मारा मारा इस्लाम के नाम पर, जेहाद के नाम पर,  न सुन्नी, न शिया और न वहाबी, इन सभी हत्याओं का दोष जिहाद पर है, इस्लाम पर है.

क्या इन सब का भारत पर प्रभाव पढ़ेगा? क्या यहाँ भी कुछ सुगबुगाहट होगी?  जबकि आई एस ई एस के लोगो ने विडिओ बना भारत के मुसलमानों का भी आव्हाहन किया है. क्या यहाँ कोई/ कोई संघटन उनके साथ हो के भारत के खिलाफ जेहाद छेड़ने की तयारी कर सकता है?  ध्यान रहे हमारे यहाँ सिमी जैसे प्रतिबंधित संघठन भी है, और एक पुराना  तथा वर्तमान इतिहास भी.

क्यों की इस्लाम को मानने वाले पुरे विश्व में है जैसा की हर मुस्लिम ८६ इंच का सीना तान के कहता है लेकिन पुरे विश्व को देखिये क्या हो रहा है वहां. मुझे बड़ा अजीब लगता है जब भारत में भी मुस्लिम कहते हैं "हम पुरे विश्व में है"  तो जब भी कहीं पुरे विश्व में इराकी घटना हो तो आपसे क्यों न जोड़ा जाए ? फिर ये कहाँ कहाँ तक जायज है की ये हिन्दुस्तान है ?  यहाँ ऐसा कुछ नहीं हो सकता ? जबकि हुआ है, कश्मीर में कश्मीरी सेना बस इसीलिए पाकिस्तानियों से मिल गयी थी की वो मुसलमान थे, और ठीक यही ईराक मे हो रहा है, सुन्नी समुदाय इन इस्लामी आतंकियों के साथ इसलिए हो गया है की ये इस्लामी आतंकवादी सुन्नी है. चलिए जी माना सत्ता की लड़ाई है, तो ये जो आम इराकी सुन्नी इन इस्लामी आतंकियों के साथ मिल रहे उन्हें तो सत्ता का भागीदार बनाने से रहे ये इस्लामी आक्रमणकारी ? तो फिर ?? तो जाहिर ये बस इस एहसास के उनके साथ है की वो इनके जमात के हैं. नहीं तो १० -२० हजार के इस्लामी दहशत गर्द किसी भी देश को बंदी बना लें ये असम्भव है, जब तक वहां की अवाम साथ न हो. 

जब भी कहा जाता है भारत में इस्लाम तलवार के बल पर फैला तो मुस्लिम तिलमिला जाते है अरे मानिए न की सत्ता की लड़ाई थी मुस्लिमो दवारा न की इस्लाम के लिए, तो साहब खरबूजा चाक़ू पे गिरे या चाक़ू खरबूजे पर कटता खरबूजा ही है. इस्लाम को कुछ इसी तरह का हथियार बना गया.  

विश्व में कहीं कुछ भी हो  तो भारतीय मुसलमान ये आशा करते है की उन्हें उसमे न घसीटा जाय, और ये उनकी आशा वाजिब  भी जिसका हमें सम्मान करना चाहिए, लेकिन तभी याद आता है, इस्लाम ब्रदरहुड के नाम पर मुंबई में तोड़ फॉर जो की कही दूर बर्मा में हुआ था, कही श्रीलंका में हुआ था, अब ईराक के लिए भी पर्चे साइन कराये जा रहे है तो भाई अब सोचो की आपकी आशा जायज है या ना जायज. मुझे नहीं याद है की पाकिस्तान में हुए हिन्दू उत्पीडन के मामले में किसी भारतीय मुलिम को कोप झेलना पडा हो, किसी बंगलादेशी मुस्लिम की सजा यहाँ हिन्दुस्तान में मिली हो, अफगानिस्तान में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ने पर किसी बुद्धिस्ट का कोप भाजन किसी देश में कोई मुस्लिम हुआ हो,  जबकि बाबरी गिरने के ठीक बाद हर इस्लामी मुल्को पर हिंदुवो के उपर भयंकर गाज गिरी, खून के आंसू रुलाया गया, उनको पाकिस्तानी, बांग्लादेशी नहीं बल्कि हिन्दू माना गया. भारत के मुसलमान भी अमेरिका को गरियाते है लेकिन याद है की इन्ही लोगो ने अमेरिका को मोदी के लिए वीसा ना देने का पत्र लिखा था, और यदि आज भी बस चले तो मोदी को कुचलने के लिए किसी दुसरे देश की सेना माँगा ले. 


इस इराकी इस्लामी आतंकवाद में भी भारत के मुसलमान पर्चे साइन करा रहे है"शहादत" के लिए, जिनका उस अरब कंट्री से कुछ लेना देना भी नहीं है, तो जरा सोचिये, किसी खुरापाती तत्व की वजह से इश्वर न करे उंच नीच हो गयी या मुस्लिम और गैरमुस्लिम में जरा सा भी तनाव हुआ तो क्या यही पत्र इस्लामी देशी में नहीं जाएगा की भारत आओ हमारी मदद करो, गैर मुस्लिमो को ख़त्म करो. और वो तो तैयार बैठे हैं, विडियो भी बनवा के भिजवा दी की करो भाईयो हम बैक अप देते है. सरकार को तत्काल ऐसे लोगो पर लगाम लगनी चाहिए जो इंसानियत नहीं बल्कि मुसलमानियत के नाम पे ऐसी हरकत कर रहे है, यदि ये इंसानियत के नाम पे पहल करते तो सबसे आव्हाह्वाहन करते, मुस्लिम गैर मुस्लिम सभी से और सबको मिलकर सरकार पर दबाव बनाते की ईराक में कुछ करो इंसानियत के लिए, ये पर्चे साइन करा शहादत के लिए आह्वाहन करना "डाइरेक्ट एक्शन" जैसा कुछ नहीं लगता ? किसी देश में कुछ भी हो तो वो वैश्विक स्तर और राजनैतिक स्तर पर बात चित होती नहीं की इस्लामी विचार धारा के अनुरूप. 


होना तो ये चाहिए की इस्लाम के नाम पर होना विश्व में कहीं भी कुछ गलत हो आप मुस्लिम आगे आयें और सबका साथ मांगे, सोचिये हम भारतीयों का सर गर्व से कितना ऊँचा उठेगा, हम सीना ठोक के दुसरे मुल्को के ऊपर लानत भेज सकते है की हमारे मुल्क का मुस्लिम पहले इंसान है उसे विधर्मियो से भी परहेज नहीं मानवता के लिए काम करने को, लेकिन नहीं, आप तभी एक्टिव होते है जब विश्व में कही मुस्लिमो पे गाज गिरी हो और एक्टिव भी बस मुस्लिम ही होते है, क्या मुस्ल्मानियत इंसानियत से ऊपर है ? क्या इस्लाम ये सिखाता है की जब मुलमान परेशान है तभी आप परेशान हो, क्या इस्लाम ये सिखाता है की कोई गैर मुस्लिम चाहे कितना भी जहीन हो और वो परेशान हो तो आप इन्तजार करो की कब मुस्लिम परेशान होता है ?  क्या आप लोग लगता है की गैरमुस्लिम आपका साथ नहीं देगा तो, लानत है आपके सोच पर. भारत की बहुसंख्यक जनता इस इन्तजार में बैठी है की वो कब अपने को भारतीय माने और हमारे गले लगे बजाय की काफिर कहने के. हम ये मानते है की मस्जिद का गिरना गलत था, मस्जिद हो या मंदिर हो, चर्च हो गुरुद्वारा जो भी चींजे भारत में है वो हर भारतीय की विरासत है,  उसे सम्हालने की जिम्मेदारी सभी भारतियों की है, न  की किसी हिन्दू, मुस्लिम सिख्ह इसाई की. 

विश्वाश कीजिये मेरा इरादा किसी का दिल दुखाना नहीं है, लेकिन मेरे मुआज्जिज दोस्त इस पर कुछ बोल नहीं रहे तो लिखना पढ़ रहा है, इसकी वजह से किसी का दिल दुखे तो मै माफ़ी मांगता हु, क्यों की कोई मेरे  लिए हिन्दू - मुस्लिम इसाई सिख्ख बाद में है पहले वो मेरे लिए इंसान है.

सादर 
कमल कुमार सिंह 

Sunday, September 8, 2013

सेकुलरों का राजधर्म



मैंने टी वी पे कई फिल्मे एसी देखि जिसमे डाकू का एक गिरोह होता है, और इन डाकुवो का एक अड्डा भी होता है, वो सारे डाकू हफ्तों तक भेस बदल कर इधर उधर लूट, पाट हत्या करते है, लेकिन सरदार के नियम के अनुसार एक निश्चित दिन इकठ्ठा हो सरदार को सब कुछ अर्पित करते है, फिर उनका हिस्सा बाटा जाता,

 कभी कभार उसी "अड्डे"  पे कई योजनाये बनती है, कहाँ कब कैसे लूट पाट  करनी है ? कहाँ कब किसकी हत्या करनी है , कौन कौन उसके रास्ते मे आ रहा है? और अड्डे से निकल कर होता है हमला. लूट पाट, मार काट, बालात्कार, आगजनी. और ये सब करने के बाद जब पुलिस दौडाए तो वापीस अड्डे मे घुस जाना और वही से गोली बारी करना. 

 इनके सरदारों को सेट्टिंग भी होती थी, गाँव के कुछ सांपो जैसे विषैले लोगो से  सांठ गाँठ, डाकू उसको प्रधान बनाने मे मदद करते और और ये उन डाकुवो कि पुलिस इत्यादि से बचाने संरक्षण देने मे. इनकी मंशा पुरे इलाके - क्षेत्र मे अपना अधिकार जमाना होता है, डाकुपन फैलाना होता है जिसमे हार्डकोर का काम सम्हालते है "अड्डे वाले" डाकू और सोफ्टकोर यानि जनता जनार्दन के बीच कि कड़ी होते हैं संपोले  विषैले जैसे इंसान दोनों कि मंशा एक ही होती है राज करना., जब कभी जनता संपोलो से गुहार लगती है कि आप तो चौधरी है हमने  आपको जिताया है आप हमरी रक्षा करें तो संपोले दलील देते हैं , वो डाकू भी हमारे भाई है, हम उन्हें मुख्य धारा मे लाना है, आदि आदि, गाँव वाले बिचारे अपना सा मुह ले के चुप होते है, वही डाकू अपना डाकूपण दिखाते हुए न जाने किस प्रकार कि "हक" कि बाते करते है. 

और ये खेल चलता रहता है, गाँव के सीधे साधे लोग इन मुठ्ठी भर  डाकुवों और संपोले के खेल मे पिसते रहते हैं, लेकिन उनका सीधापन ही उन्हें खाता रहता है, वो जादा होने के बावजूद भयग्रस्त रहते हैं,  क्योकि उनका स्वभाव लुट पाट, हत्या बलात्कार नहीं होता, न ही वो कर सकते है,  तभी कहीं से कोई बागी बनता है, वो गावँ वालो को एक करता है, फिर भी उसके खिलाफ प्रपंच चलाये जाते है, परेशानियां खड़ी कि जाती है, गाँव वालो को डराया धमकाया जाता है, लेकिन फिर भी विजय उसकि होती है क्योकि वो  सत्य के साथ होता है 

एसी फिल्मे आपने भी कई देखि होंगी, और इस तरह के कई कहानिया सुनी होंगी,  होंगी ??  अरे होंगी क्या ? अभी लाईव देखिये न .. अभी भी तो दिख ही रहा है.. नहीं ?? 

साम्प्रदायिकता का सांप ऐसा है जो किसी भी विकास को डस लेता है. और इस देश मे एक तबका ऐसा भी है जो चोरी के बाद सीना जोरी भी करता है, और जब तक उस सीने पे वजनी बठ्करे से प्रहार नहीं किया जायेगा तब तक वह तबका सीनाजोरी कर सर उठाता रहेगा. 

इन तत्वों को सहारा देते जो दीखते हैं जो अपने को सेकुलर कहते हैं, सांप के जहर का इलाज है लेकिन सेकुलरों का नहीं, यदि आपके एक दरवाजे पे एक कुत्ता और एक सेकुलर आ जाय तो कृपया कुत्ते को रोटी दें, लेकिन अब आप कहेंगे कि कोई सेकुलर तुम्हारे दरवाजे पे आयेगा क्यों ? तो आते हैं भाई, बिलकुल आते है, यूपी वालो के दरवाजो पे श्वान समूहों ने स्वांग रचकर रोटी ले ली, खा के मोटे और ताकतवर हो गए, सत्ता मिल गयी, अब वहाँ क्या हाल है पूरा देश देख रहा है.  कमोबेश अधिकतर सेकुलर पार्टियां यही करती है, 

जम्मू कश्मीर के किश्तवाड मे भी सेकुलरों का राज है, वहाँ क्या हुआ आज तक किसी को पता नहीं, और मिडिया उस समय एक बधूवा मजदुर दिखी  जिसके हाथ पाँव ही नहीं काट दाये गए बल्कि जीभ तक काट के उसके कानो मे भर दिए गए ताकि वो न बोल सके न सुन सके, मिडिया ने खुद अपने बैन का मुद्दा तक नहीं उठाया, कही कोई चर्चा नहीं. वहाँ भी शुरुवात एक सेकुलर स्थल से हुयी थी. अब समझ मे आता है कि क्यों  अमेरिका पुलिस द्वारा सेकुलर स्थलों कि निगरानी करने कि पहल कि गयी. भगवान जाने भारत सरकार को कब अक्ल आयेगी.  पता नहीं गुजरात कि तर्ज पे किश्तवाड के लोगो को सजा कब मिलेगी ? फिर भी ये सेकुलर है. इनका "नॉन सेकुलरों"  को साम्प्रदायिक कहना कुछ वैसा ही लगता है जैसे किसी  वेश्या का किसी दूसरे नारी के चरित्र पे अंगुली उठाना. 

पिछले साल यूपी मे रमजान के दौरान हर लगभग हर शुक्रवार और उस महीने मे कई दंगा हुआ, और शुरू होता था सेकुलर स्थल से, माफ करिये जहाँ से लोग निकल कर इतने उन्मादी हो जाए वह सेकुलर स्थल डाकुवों के अड्डे से कम नहीं, और न हीं उसको  किसी भी प्रकार स्थल मानना चाहिए, हाँ उसको "अड्डा" कह सकते हैं, जैसे कुछ अड्डे चम्बल मे डाकुवो ने विकसित कर रखे है, जहाँ सबकी जाने मे रूह कांपती है क्योकि उनका  भी धर्म अलग है, "डाकू धर्म" उनपे भारतीय कानून काम नहीं करता. इसलिए उनके अपने वहाँ अपने डाकू धर्म के कानून होते है, और सरकार ये नहीं कह सकती कि चम्बल या एसी जगहों पे जहाँ डाकू रहते हों वहाँ सिविल कोड ही होने चाहिए. क्योकि सरकार वही है जिन विषैलों कि बात ऊपर सीन मे कि गयी थी. 


हाल मे मुजफ्फरनगर मे एक लड़की को छेड़ने कि घटना का का विरोध करने पे दो भाईयों को पिट पिट कर मार दिया गया, उसके विरोध के लिए पंचायत बुलाई गयी, लेकिन एम्बुश लगा के उन पर आक्रमण किये गए वो भी अत्याधुनिक हथियारिओं के साथ. और तो और एफ आई आर उन मा बाप के खिलाफ लिखा गया जिनके बेटी,बेटो कि हत्या हो गयी.  

मिडिया तब तक चुप थी जब तक मामला सोशल मिडिया मे जन के नहीं उछला, ये तो उसको भी पचा जाते "खास किस्म के चूरन" के साथ लेकिन मामला तब बिगड गया जब एक मुस्लिम और हिंदू पत्रकार मारा गया. और दिखाया भी है तो खाने के बाद बस एक पाचक कि तरह, असली खाना तो इनका अभी आश्राम बना है, शायद आशाराम  जैसा इंसान इनके लिए जादा महत्वपूर्ण  बजाय कि दसियों जानो कि चिंता करने कि, इस समय मिडिया का सबसे बड़ा दुःख ये है कि ये हालत गुजरात मे क्यों नहीं बन रहे ? 

बावजूद इसके धर्म निरपेक्षता , गंगा जामुनी तहजीब और भाई चारा का हवाला दिया जाता है, गंगा -जमुनी तहजीब समझ मे नहीं आता ?  वास्तव मे  "गंगा - जेहादी" तहजीब सही टर्म है. क्योकि गंगा तो समझ मे आता है जो एक तहजीब से संबंध रखता है और दूसरा जेहादी और जेह्दाइयों का कोई धर्म नहीं होता. क्या अब  भी गंगा - जामुनी तहजीब कहना वाजिब है ? 

रही बात भाईचारा कि तो भाड़ मे जाए एसी भाईचारा जिसमे एक पक्ष बस "भाई" कहता रहे और  भाई दूसरे पक्ष को "चारा" मान उसका मनमानी तरीके से भक्षण करता रहे.  

खैर ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक हम सब एक न  हो जाएँ और एक होकर उस गाँव वाले बागी को नेता मान कमान सौंप  दें ताकि इन सांपो के जहर का इलाज और डाकुवो को आत्म समर्पण करवाया जा सके और गाँव मे सुख और शांति आये. 

सादर 

कमल कुमार सिंह.