नारद: कोंग्रेस
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Thursday, July 11, 2013

मुसलमानो का मोदी विरोध


एसा नहीं है २००२ से पहले या बाद में कोई दंगे नहीं हुए, कब हुए, कितने हुए, कहाँ हुए, किसके सरकार में हुए  ये सब नहीं लिखूंगा, सभी जानते है. लेकिन २००२ के दंगो को ही निशाना जादा बनाया जाता रहा है. साथ उसको "स्टेट स्पोंसर्ड" का दर्जा राजनीतिज्ञों  द्वारा बताया जाना इस बात का  सबुत है की उन्हें अपनी करनी पे विश्वाश नहीं बल्कि दंगो का की राजनीति का ही सहारा है , नहीं तो "स्टेट स्पोंसर्ड" दंगा क्या होता है ??  क्या बाकी के दंगे सहमती से गोलमेज मीटिंग टाइप के बाद हुए  है ? ख़ासकर  उस  केस में जब तक किसी भी कोर्ट ने मोदी पे कोई टिप्पड़ी भी न की हो. असंम  में कोंग्रेसियों (कोंग्रेस - आई )  द्वारा  बांगला देशियों का बसाया जाना फिर दंगा होना क्या एक सुनियोजित  "स्टेट स्पोंसर्ड" दंगा  नहीं है ? ये वही पार्टियाँ हैं  जो  पीछे से दंगे करा के फिर आगे इन्साफ मांगती है खासकर मुस्लिमो के लिए. 

असली बात वोट बैंक है, सभी जानते हैं. आज जबकि मोदी  किसी भी पार्टी के किसी भी नेता से जादा लोकप्रियता लिए हुए हिन्दू मुस्लिम किये बिना चुनाव जीतते है, तो बाकी पार्टी के  राजनितिज्ञो  का तिलमिलाना समझ में आता है.  मोदी को का भुत उन्हें जगाने सोने नहीं देता, एसा लगता है जैसे दंगो  ने उनके राजीनीति को भी खा लिया है.  उन्हें लगता है २००२ का दंगा उनके जितने की रेसिपी है हलाकि वो मुगालते में हैं जबकि वही मोदी तीसरी पारी खेल चुके हैं.  और २००२ के बाद जहाँ कोई दंगा नहीं हुआ तो दूसरी तरफ पुरे देश में न जाने कितने  दंगे हुए तो फिर मुसलमान मोदी से क्यों भड़कते हैं ?? 

 राजनीतिज्ञों का मोदी से भडकना समझ आता है, जलन कह लीजिये या दुर्भावना या राजनैतिक  प्रतिद्वंदता जो भी दूसरी पार्टियो का भडकना समझ में आता है, लेकिन साथ साथ ही  मुस्लिमो  मोदी का नाम से भडकना बड़ा गोल गोल घुमाता है,  क्या मोदी मुसलमान विरोधी है ? यदि एसा है तो गुजरात में कैसे जीतते ? या  मान लीजिये  मोदी देश के प्रधान मंत्री बन जाते है तो क्या देश से मुसलमानों का खात्मा कर देंगे ? तब ये सोचना चाहिए की क्या गुजरात में मुसलमान खतम हो गए ? बड़ी हास्यपद बात है, तो फिर मुसलमान मोदी से क्यों भड़कते हैं ?? 

अब आईये दुसरे पहलू पे सोंचे, आज तक मैंने किसी नेता को नहीं देखा जो अपने भाषणों में मुसलमानों की पैरवी न करते देखा गया हो, चाहे हो लालू  का  परिवर्तन रैली हो, या टोपीबाज नितीश की रैली, या मुलायम की "उत्तर प्रदेश के मुस्लिम को लडकियों वजीफा देना हो,  अरविन्द केजरीवाल का बुखारी वंदन हो (वो बात अलग है भगा दिए गए थे वहां से ) या अन्य कोई नेता, उनका पलड़ा एक तरफ इस मुसलमान "वोट बैंक" कि तरफ झुका होता है,  पलड़ा कभी बराबर  होते नहीं देखा गया.  नहीं तो क्या उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के अतिरिक्त और कोई लड़की उस योग्य नहीं है जिसको सहायता की दरकार है ?  वही कोंग्रेस के भारत विकास में एक मुस्लिम लड़की को एड में दिखाना क्या दिखता है ? 

ठीक  इसके उलट मोदी के भाषणों  में आजतक किसी ने हिन्दू मुसलमान की बात नहीं सुनी होगी. उन्होंने हमेशा बराबरी की बात की,  गुजरात मे हो तो ६ करोड़ गुजरात और  यदि देश में हो तो भारतीय कह के संबोधित करने वाले मोदी शायद यहीं चुक कर गए, उन्हें बराबरी और समानता की बात  न करके  बल्कि मनमोहन सिंह की तरह "देश में पहला हक़ अल्पसंख्यको का है" टाइप का कोई जुमला बोलते  तो शायद मुसलमान उने कभी नहीं भड़कता, क्योकि दंगे तो और भी कई  कोंग्रसी नेतावो ने करवाए हैं, सो दंगा उनके लिए ख़ास मुद्दा नहीं है क्योकि वो भी जानते हैं की वाजिब से ऊपर किस आशा रखना  उनकी आदत बन चुकी है, मिले न मिले वो बात अलग है. असली मुद्दा मोदी विरोध का है उनका "कान", जो नेतावो से " मुस्लिम मुस्लिम" सुनने का आदि हो चूका है , अभ्यस्त हो चूका है, एसे में मोदी यदि "मेरे प्यारे  भारतीय भाईयों और बहनों"  टाइप का एक सामानता की बात करेंगे  तो निश्चित और लाजिमी  है मुसलमानों का मोदी से भडकना.

Thursday, March 28, 2013

आतंकी आईटम हराम, आतंकी हलाल

कोंग्रेसी सांसद फौजिया खान के स्नेही- "हलाल आतंकवादी  अबू जिंदाल " 

 जब अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान है, या यूँ मान ले अल्लाह गधो पर ही मेहरबान होता है, क्योकि ये जिसपर भी मेहरबान होता है वो सिर्फ चारो तरफ ढेंचू ढेंचू करता है,  दुसरे की नहीं सुनता. जिसने भी ये कहावत कही होगी वो किसी न किसी दिन सत्ता पक्ष में जरुर रहा होगा या फिर कोई सेठ रहा होगा जो जिसको सुबह शाम उसका कुत्ता सडको पर घुमाता होगा या कुकरम करने वाला कोई धर्मगुरु.  

आजकल स्पेशली  हिन्दुस्तान के लिए एक स्पेशल अल्लाह डेपुट हुआ है जिसका नाम  सरकार है, कोंग्रेसी सरकार, इस अल्लाह का लोगो के  भाग्य का फैसला करने का एक स्पेशल रेंज है -गरीब तबका, पैसे वाले क्षेत्र में इस भगवान् का काम धाम ठप्प हो जाता है, या यूँ कह ले दान दक्षिणा ले अल्लाह खुश हो जाता है.  ये भारत भाग्य विधाता टाइप टाइप के  स्पेशल आईटम के दो मुह है, एक खाने के एक निकालने के हलाकि है दोनों मुह. सेठ के कई कुत्तो की तरह इनके भी श्वान है जो ये मानते है की न्याय पैसे के हिसाब से होना चाहिए. 

१९९३ में  संजय दत्त को अवैध  हथियारों के मामले गिरफ्तार किया गया, जिसमे साफ़ था की संजय दत्त के घर में किसी ने अनजाने में नहीं रखा बल्कि संजय के शौक का इसमें पूरा हाथ था. जबकि जेब्बुनिशा के घर में यही हथियार कुछ दिन तक किसी ने रखा था लेकिन जेब्बुनिशा की मर्जी इसमें थी, ये कहीं साबित नहीं हो सका, न ही उनका या उनके दिमाग या हाथ का   किसी  तरह के  "भाईवाद" या आतंकवाद में  शामिल होना पाया गया, उनका गुनाह था तो बस इतना की यह हथियार  बस कुछ दिन तक उनके घर में आराम फरमा रहा था. यदि जेब्बुनिशा की यही मात्र गलती है तो बाकियों को क्यों बक्शा जाय ?

 हथियार जिन्न की तरह प्रकट तो नहीं हुआ, वह गाडी भी उतनी दोसी है, बाहर से आया तो किसी रास्ते से आया होगा, वह रास्ता भी दोसी है, उन सबपे मुकदमा चलाना चाहिए जिस रास्ते, निर्जीव चीजों से होकर  यह हथियार गुजरा, भले उनका कोई रोल न हो, आखिर जेब्बुनिषा का घर भी एक निर्जीव चीज है और सजीव जेबू की  इसमें कोई मर्जी नहीं दिखती यहाँ तक की कानून की नजर में भी नहीं सिध्ह हुआ. यदि फिर भी सरकार या कानून इनको दोसी सिर्फ इसलिए मानती है की अनजाने में ही सही हथियार इनके घर में तो पाया गया. 

 दोस्तों याद है आपको वो कोंग्रेसी सांसद फौजिया खान जिनके घर में कुछ समय के लिए ही सही लेकिन आतंकी अबू जिंदाल था  खुद  फौजिया ने भी इस बात का माना है लेकिन ये मानने से इनकार कर दिया की उन्हें उसके आतंकी होने की जानकारी थी. अब देखिये फौजिया और जेबुनिषा दोनों अनजान लेकिन एक कानून के गिरफ्त  में और एक आजाद शायद  आतंकी आईटम हराम, आतंकी हलाल है ,   फौजिया पर क़ानून   और सरकार की आँखे कई कारणों से मूंदे हैं वह यह की फौजिया, इस ७० साला जेबुन्निषा की तरह गरीब नहीं, नहीं फौजिया इस बुजुर्ग की तरह बेबस है, और सबसे बड़ी  और  अंतिम बात, अरे भाई फौजिया कोंग्रेसी है. 

कमल कुमार सिंह 

Sunday, November 4, 2012

सत्ता ब्यूटी पार्लर है



आयरलैंड में एक प्रसिध्द व्यक्ति  और लेखक हुआ, जार्ज बनार्ड शा,  वह "लन्दन स्कुल आफ इकोनोमिक्स" के संस्थापको में से एक था.वह इंग्लैंड के साम्राज्यवाद निति से बड़ा दुखी रहता था, वह इंग्लैंड "कु-निति "का आलोचक था. उसका कहना था  इंग्लैंड वाले बनाने में बड़े निपुण हैं, सामान और लोगो को भी. नया सामान जब खपत न होता तो इंग्लैंड वाले अपने पादरी दुसरे देशो में भेज देते, बाद में उस देश में पादरियों पे उत्पीड़नका आरोप लगा जहाजो में अपने सैनिक भेज उसपे कब्ज़ा जमा अपना नया बाजार  तैयार कर लेते.

पादरी, इश्वर ही नहीं बल्कि नया बाजार भी उपलब्ध करवाता है. सन १६०० के आस पास उसने भारत के लिए भी यही रननिति  अपनाई. १९४७ में आजादी के बाद उसके सीने पे सांप लोटने लगा, क्योकि यहाँ स्वदेशी की आग लग गयी थी. वह दुखी था क्योकि वह दयालु है, परमेश्वर और बाजार का "कम्बो पैक" सदाचार में  मुफ्त में उपलब्ध करवाता है.

स्वदेशी ज्वाला में कही भारत जनता कहीं जल न जाएँ यह सोच के इंग्लैण्ड की आँखों में आंसू आने लगे. उसने अपनी रणनीति बदली अबकी पादरी न हो के महिलाओं का सहारा लिया गया. उसे पता था भारत में नारियो को माता, देवी शक्ति माना जाता है. नारी को अपनानाने में भारतवासी भी पीछे नहीं है. भारत ने  लेडी गोगो के गानों से लेकर वस्त्रो के आतंक से मुक्त रहने वाली "लीयोनी" जी तक को अपना लिया. उसने एक महिला को चुनकर भारत के उस समय के शक्तिशाली राजनैतिक परिवार के पुत्र के पास भेजा. उसने शायद भारतीय पुस्तके पढ़ी थी, उसे पता था की अप्सरावों को भेज किसी भी विश्वामित्र का तप भंग किया जा सकता है तो ये तो बस एक भारतीय राजनैतिक पुत्र है, यदि ये अपने झांसे में आ गया तो अपना धन्धा पहले से भी बढ़िया. हुआ भी यही, अंग्रेजी इन्द्र अपने अप्सरा को भारत में भेजने में सफल रहा. उसने प्रेममय "हवाले" से स्त्री को भारत में "इम्पोर्ट" किया, आप इसको "इम्पोज" भी कह सकते हैं. वह अप्सरा भारत आई और इस आधुनीक विश्वामित्र से कहा तुमने मुझे भारत लाके इस देश का और यूरोप का भला किया है, अब तुम्हारा काम पूरा हुआ, तुम्हारे जीवन का उद्देश्य सफल हुआ, अब तुम जाओ तुम्हारा काम बस इतना ही था, तुम्हारे इस पुन्य कार्य लिए हमारे पादरियों  ने स्वर्ग में एक स्पेशल " होलीडे सेल" का निर्माण किया है. वही मौज मनाओ, यहाँ  का काम हम देख लेंगी, अब आप आराम करो.  और इस देश की जनता का क्या ? वसुधैव कुटुम्बकम सभी अपने है बस अपना उल्लू सीधा होना चाहिए.
सेर भर कबाब हो

एक अद्धा शराब हो

नूरजहाँ का राज हो

ख़ूब हो--

                                         भले ही ख़राब हो  ------- (स्व श्री सुदामा पांडे)

भारत की  नारिन्मोख जनता ने इनको भी स्वीकार कर लिया, भारत के लिए असली  ग्लोबलाईजेशन का दौर यहीं से शुरू हुआ.  "वसुधैव  कुटुम्बकम" का इससे बड़ा नमूना क्या होगा जहा भारतवासी किसी भी देश के नारी को अपना मान लेते हैं, पहले भी उन्होंने अंग्रेजो को अपना भाई माना था, क्या हुआ जो कुछ  हिस्सा ले के भाग लिए, अब भाई है तो जाय्दादा में बटवारा भी होगा ही. ये तो उनका हक़ था. नाहक ही उन्हें लोग विदेशी लुटेरे कहते हैं.  

सत्ता मिलते ही सत्ताधीन  पहले कई साल तक सत्ता को समझने की कोशिश करता है, क्योकि वह अपने को सत्ता का पति और सत्ता को  अपने हरम की एक बंदी समझता है जिसका कन्यादान  मुर्ख जनता खुद करती है.  शुरुवात में  थोडा प्यार मनुहार करता है, फिर भोगता है,  फिर बांदियो सा व्यवहार करता है, वह भूल जाता  है की जागरूकता के इस समय में दुल्हन भी तलाक ले कहीं और जा सकती है.  अपने कर्म को बताने कुकर्म को छुपाने के लिए लालची "पड़ोस के देवरों" को लगा देता है जो जनता को ये बताते है की तुमने ठीक जगह कन्यादान किया वो सुखी है तुम भी खुश रहो.   देवर भी कैमरा ले के बड़े भईया को नीचा नहीं होने देते. दुल्हन  है भी तो एकदम सीधी भारतीय ब्रांड, एक हद तक सहने को तैयार, सामने वाला  चाहे कितना भी कुकर्मी हो उसे सहना ही पड़ता है, वो बात अलग है को वो सिसकती है, रोतीहै, आजाद होना चाहती है, लेकिन उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता, अंततोगत्वा वह दुल्हे को तलाक का नोटिस दे इन्तजार करती है. नोटिस मिलने पर "यह"  चिंतित होता है. हाय ये क्या हुआ, क्या मेरा अब तलाक हो जायेगा? और यह कहीं और चली जाएगी ?कैसे रह पाउँगा मै इसके बिना ?  हमने सात जन्मो तक साथ जीने मरने की कसम खायी थी, इतनी जल्दी साथ छुट गया तो परमात्मा को क्या मुह दिखलाऊंगा.  नहीं नहीं यह नहीं हो सकता, ये मेरी है सिर्फ मेरी है, मेरे पुरखो ने न जाने कितनो का खून बहा के इसे छीना है, एसे न जाने दूंगा.और "यह" मुर्ख "बाबुल" से  अपनी मजबूत दावेदारी सीध्ह करने को मजमा करता है , जलसा करता है, सारे  उपक्रम  फिर से करता है.  इनके लिए सत्ता का मतलब बस इतना ही है.

हाल में रामलीला मैदान में हुए एक रैली के "त्रिफला चूर्ण" (माता -पुत्र और चचा) का भाषण रख रहा हु  जिससे  पता चलता है की ये जनता के हाजमा का कितना ख्याल करते हैं.  नेतावों की जनसेवा का अमरत्व भाव पता चलता है :-
जिसको आधी रोटी मिलती है वो पूरी खायेगा, जो आधा पेट खाता है वो पूरा पेट खायेगा, (भाई बिना सत्ता के मै भी आधा था, पहले अपना पूरा करूँ, पहले मै खाऊ, आखिर मै भी जनता हूँ. मै ठीक रहूँगा तो आप लोगो की भी सेवा होगी).
भारत एक बार फिर से खड़ा होगा पूरी दुनिया उसको एक बार फिर पहचानेगी, (यानि अभी तक ६० सालो में हमने उसे लंगड़ा कर रखा है, ताकि पहले हम खड़े हो सके, हम अपनी पहचान बना लें फेर बाकी का भी हो जायेगा).
मै बहुत आभारी हूँ आप दूर दूर आधे पेट हमारी रैली में आये आशा है आगे भी आधे पेट या खाली पेट अपनी हालत की परवाह किये बगैर हमारी रैली में आ देश को तरक्की के रास्ते पे ले जायेंगे. हमारी रैलियों में आईये  हमारे भाषण को सुनिए, आधा पेट तो आप वैसे ही भर जायेगा.

हमने इस देश में इन्फ्रास्टकचर पे ख़ास ध्यान दिया है आदर्श जैसी बिल्डिंगे बनायीं है जिससे जनता और नेता दोनों का पेट भरा है, बिल्डिंग देखिये और पेट भरिये, इतने पर भी खाली रहे तो हमारा क्या दोष ?  भ्रष्टाचारियों को दंड मिलेगा वो बात अलग है की हम उस दायरे में अपने आपको नहीं लायेंगे, हम अगर इन कानूनी लफडो में पद गए तो देश की तरक्की कौन करेगा ?..
हमारी पार्टी पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे है, उसमे सच क्या है , झूठ क्या है , ये आपके विवेक पे निर्भर करता है , लेकिन एक बात आपको समझना होगा की जो शाशन में होता है वही सत्य है , वही शाश्वत है, नहीं तो है सत्ता की ताकत से बना लेंगे आप चिंता न करे आप बस सच के साथ रहें, बाकी आपके विवेक पे निर्भर है.
हमने ही सुचना का अधिकार लाया है, जिसके तहत कोई भी जानकारी आप ले सकते हैं, बशर्ते सरकार के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में न हो, हम पैदायशी साफ़ पाक है, और आपको भी "साफ़" कर के रहेंगे.
 हमारे विरोधी हमारे बारे में उलटी बाते करते रहें, लेकिन हम उनके बारे में कोई उलटी बात नहीं कहेंगे (क्योकि हम करने में विश्वाश रखते हैं) तभी एक लोकल महिला उठती है. अपना भाषण पद्धति है और साथ वाले नेतावों को "माननीय", "सम्माननीय" जैसे प्रमाण पत्रों से नवाजती है.

एक नेता को दुसरे नेतावों को  "आदरनीय" और  "सम्मानानीय" शब्द  से नवाजना एसा लगता है जैसे एसा लगता है एक चोर दुसरे चोर को बड़े से बड़ा बताना चाहता हो ताकि उसकी बारी आये तो सामने वाला चोर भी उसे बड़ा बताये. आजादी के बाद जिन नेतावो ने चोरो को पकड़ने के लिए कड़े कानून बनाये आज उसी परिवार या दल के नेता चोरों को सर्टिफाईडी बनाने के कानून बना रहें हैं .सर्टिफाईडी चोर यानी जिनके लिए चोरी करना वैध है. इन चोर, डाकुवो को सम्मत बनाने के लिए, जनता के बीच पचाने के लिए त्रिफलाओ की पाचनपूर्ण  रैली का मख्हन से लपेटा "पाचक भाषण" परोसा जाता है. जिसको  जनता अभी समझ नहीं पा रही है. शायद जनता का जन्तत्व ख़त्म हो गया है.


''पता नहीं हम कहां से चल कर, कहां पहुंच कर ठहर गए हैं, 
हमारे सीनों पे पांव रखकर, गधों के लश्कर गुजर गए हैं, 
हमारी टूटन, तुम्हारे वादे, फना हुए कहां तेरे इरादे 
जिन चेहरों पे है निगाह डाली, कई लबादे उतर गए हैं।''


नेता अपने चोर, डाकुवों वाले वीभत्स चहरे को छुपाने के लिए सत्ता का ब्यूटीपार्लर की तरह इस्तेमाल कर रहा है. और सत्ता के तंत्र इसके प्रसाधन है(मिडिया वगैरह) जिससे अपने चहरे मोहरे चाल चलन का ट्रिमिंग, फेशियल करा खुबसूरत चेहरा जनता के सामने रख रहा है. सच ही है, सत्ता में बहुत शक्ति है, चुड़ैल को देवी और राक्षस को देवता बना सकती है, लेकिन जनता को जनता के रूप में नहि बल्कि अपने साधन के लिए इस्तमाल कर रही है.


न कोई प्रजा है

न कोई तंत्र है

यह आदमी के खिलाफ़

आदमी का खुला सा

                                             षड़यन्त्र है .---------(स्व श्री सुदामा पांडे)



सादर

कमल कुमार सिंह

४ नवम्बर २०१२

Monday, June 25, 2012

कोंग्रेसियों के एक और वीर : वीरभद्र


पहली बात तो नाम ही गलत है "वीर-भद्र " अरे भाई कभी कोई "वीर" मनुस्य "भद्र" हुआ है ?? पुराने जमाने कि बात छोडिये. कम से कम कोंग्रेसियों से तो एसी उम्मीद नहीं. 

अभी नया मामला आया है कि इन वीर महाशय ने भद्रता पूर्वक लाखो रूपये उगाहे, जिससे कोंग्रेस चिंतित है, हमें भी इनसे सहानुभूति है लेकिन चिंता करने वाली कौन सी बात ?? अरे तो हर हफ्ते का कार्य है कही न कहीं कोई न कही वीरता पूर्वक कोई कारनामा न हो कोंग्रेस किस काम कि ?? एक आदमी जब काम धाम करते हुए बोर हो जाता है तो सप्ताहांत मानता है, वैसे कोंग्रेसी भी अपने हिसाब साप्ताहांत मे  कोई न कोई वीरोचित कार्य कर देते हैं जिससे इनका मन बहल जाता है, जिससे इनको अगले  हफ्ते के कारनामे करने कि नई ऊर्जा मिलती है. 

घोटाला उद्योग और सिनेमा उद्योग मे झंडे गाड़ने के बाद यदि इस प्रकार का कोई कारनामा न हो तो निश्चय ही कोंग्रेस उद्योग सिंडिकेट गड़बड़ा जाएगा.  लेकिन डरने कि कोई बात नहीं इस पार्टी के सरकार मे एक से बढ़कर एक वीर हैं. कोई सिनेमा डाईरेक्टर है तो कोई एक्टर, कोई घोटाला एक्सपर्ट है तो कोई उगाहिबाज़, और इसमें बुरा भी क्या है ?? क्या सचिन, धोनी  क्रिकेट के  अलावा पार्टटाइम  विज्ञापन से उद्द्यम  नहीं कमाते ?? 
क्या अन्ना समाज सेवा के साथ साथ चंदा नहीं लेते ?? शायद कोंग्रेस सचिन से ही प्रभावित है तभी तत्काल सांसद बना उनको अपने बगल मे बिठा लिया,अरे भाई मार्गदर्शक बगल मे बैठे तो क्या बात है ... आसानी से टिप्स मिल सकती है.  अन्ना को रास्ट्रपति पद आफर हुआ था लेकिन उनको पता है कि ये साब बाद मे तिहाड के ड्यूटी पे लगा देते हैं.

 बड़े दुःख कि बात है वीर साथ मे अनुचित भद्र जी शर्माते हुए  इस्तीफा देने पहुच गए, अरे इसमें शर्माना  कैसा ?? क्यों इस्तीफा देना ?? "जो करे शरम उसके फूटे करम, कोंग्रेस  को भी पता है कि ये गर्वोचित कार्य है, परम्परागत कार्य है,  इसलये बता भी दिया कि अपने पद पे बने रहें और जो आप बच जाएँ तो कुछ हिस्सा जनपथ के जन को हवाले करें. सैयाँ भये  कोतवाल डर काहे का ? प्रेमी संग भये फरार डर काहे का ?? आप इस्तीफा  दे दोगे तो पार्टी आपके जैसा उगाहेबाज़ फिर कहाँ से लाएगी ?? आप पार्टी मे बने रहिये और प्रियंका गाँधी के शिमले वाले बगंले का कामकाज तन्मयता पूर्वक देखिये.  पहले ही पार्टी मदेरना / सिंघवी जैसे  कालजयी अभिनेता खो के अपना नुक्सान  कर चुकी  है. 

मुझे याद है बहुत पहले रामायण और महाभारत के लिए सडके ठप्प हो जाया करती थी, लोग दूरदर्शन से चिपके रहते थे, ठीक वैसे ही भारत कि जनता हर सप्ताह बैचनी पूर्वक कोंग्रेस के कारनामे देखने को बेताब रहती है, लेकिन वो रामायण, महाभारत वाली बात नहीं है, कारनामो मे कुछ गुणवत्ता होनी चाहिए, थोडा और उम्दा तरीके से होना चाहिए, बिलकुल लज्जत पूर्ण मदेरणा सिंघवी टाइप. जहाँ हजारों करोडो के घोटाले जनता मे मेगा  हिट हो चुके हों वहाँ लाखो के उगाही का प्रोग्राम उतना दिलचस्प नहीं, टी आर पि भी नहीं आ पाती. 

गुणवत्ता यदि कलमाड़ी या रोचकता मदेरणा /सिंघवी टाइप रखी जाए तो विज्ञापन से कमाई का एक और अच्छा जरिया बन सकता है.  मै तो आश्चर्य चकित हूँ कि वियाग्रा वाले मदेरणा / सिंघवी को क्यों नहीं ढूढ़ रहे ?? उनसे आदर्श कोहिनूर माडल शायद ही कहीं मिले अपने उत्पाद के लिए. 

अब देखना है अगले हफ्ते कौन सा सनसनी खेज प्रस्तुति होती है कोंग्रेस एंड इंटरटेनमेंट ग्रुप कि तरफ से.